समय - सीमा 286
मानव और उनकी इंद्रियाँ 1057
मानव और उनके आविष्कार 826
भूगोल 262
जीव-जंतु 317
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!
मेरठवासियों, हमारा शहर केवल क्रांति और सैन्य इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि उन अदृश्य परंपराओं के लिए भी जाना जाता है जो राष्ट्रीय गौरव के क्षणों में अपनी छाप छोड़ती हैं। हर वर्ष जब गणतंत्र दिवस के समापन पर विजय चौक में बीटिंग रिट्रीट की गूंज सुनाई देती है, तब उस संगीत की आत्मा में कहीं न कहीं मेरठ की जाली कोठी क्षेत्र की मेहनत, शिल्प और परंपरा समाई होती है। पीतल से बने वे वाद्ययंत्र, जिनकी ध्वनि राष्ट्रपति से लेकर आम नागरिक तक को राष्ट्रभक्ति से भर देती है, मेरठ को भारत की सैन्य-सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जोड़ते हैं।
इस लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र देशभर के बैंड वाद्ययंत्रों की रीढ़ बना, बीटिंग रिट्रीट समारोह कैसे गणतंत्र दिवस का गरिमामय समापन बनता है, इसमें राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं की क्या भूमिका होती है, कौन-सी ऐतिहासिक धुनें इसकी पहचान हैं, इसका ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप कैसे विकसित हुआ, तथा आधुनिक समय में यह परंपरा किन नए रूपों में सामने आई है।
मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र और पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों की राष्ट्रीय आपूर्ति
मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र दशकों से देश में पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ निर्मित तुरही, बिगुल, ट्रम्पेट, ड्रम और अन्य वाद्ययंत्र केवल सामाजिक आयोजनों या शादी-ब्याह के बैंडों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस बैंडों तक नियमित रूप से पहुँचते हैं। यह माना जाता है कि भारत में उपयोग होने वाले लगभग 95 प्रतिशत पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती है। जाली कोठी के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी इस शिल्प से जुड़े रहे हैं और हाथों से वाद्ययंत्रों को तराशते हुए उनमें ऐसी ध्वनि गुणवत्ता विकसित करते हैं, जो अनुशासन, शौर्य और गरिमा को अभिव्यक्त करती है। जब राष्ट्रीय समारोहों में ये वाद्ययंत्र गूंजते हैं, तो उनके पीछे छिपी मेहनत और परंपरा मेरठ को देश की सांगीतिक सैन्य पहचान का मौन आधार बना देती है।

गणतंत्र दिवस का बीटिंग रिट्रीट समारोह: आयोजन और सैन्य सहभागिता
हर वर्ष गणतंत्र दिवस के तीसरे दिन, यानी 29 जनवरी की संध्या को, राष्ट्रीय उत्सव का औपचारिक और गरिमामय समापन बीटिंग रिट्रीट (Beating Retreat) समारोह के साथ होता है। नई दिल्ली के विजय चौक पर आयोजित इस आयोजन में थल सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के बैंड एक साथ मंच पर उतरते हैं। यह समारोह केवल संगीत प्रस्तुति भर नहीं होता, बल्कि सैन्य अनुशासन, समन्वय और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन होता है। तीनों सेनाओं के सामूहिक मार्च और तालबद्ध धुनें यह संदेश देती हैं कि राष्ट्र की रक्षा में सभी अंग एकजुट होकर कार्य करते हैं। बीटिंग रिट्रीट इस बात का प्रतीक है कि गणतंत्र दिवस का उत्सव शौर्य, अनुशासन और सम्मान के साथ पूर्ण हुआ है।
बीटिंग रिट्रीट में राष्ट्रपति की भूमिका और औपचारिक सैन्य परंपराएँ
बीटिंग रिट्रीट समारोह की गरिमा का केंद्र भारत के राष्ट्रपति होते हैं, जो इस आयोजन के मुख्य अतिथि होते हैं। उनके विजय चौक में प्रवेश करते ही तुरही की विशेष धुन बजाई जाती है, जो सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति सम्मान का प्रतीक होती है। इसके बाद राष्ट्रपति अंगरक्षक द्वारा राष्ट्रीय सलामी दी जाती है। सामूहिक सैन्य बैंड ‘जन गण मन’ का वादन करता है और ध्वज स्तंभ से राष्ट्रीय ध्वज को विधिपूर्वक उतारा जाता है। इस अवसर पर राष्ट्रपति भवन को विशेष रोशनी से सजाया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में नागरिक एकत्रित होते हैं। ये सभी औपचारिक सैन्य परंपराएँ इस समारोह को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक बना देती हैं।

बीटिंग रिट्रीट में बजाई जाने वाली ऐतिहासिक और लोकप्रिय सैन्य धुनें
बीटिंग रिट्रीट समारोह की पहचान उसकी विशिष्ट और ऐतिहासिक सैन्य धुनों से होती है। कर्नल बोगी मार्च (Colonel Bogey March), सन्स ऑफ़ द ब्रेव (Sons of the Brave) और ‘क़दम क़दम बढ़ाए जा’ जैसी रचनाएँ पूरे वातावरण में देशभक्ति और गर्व की भावना भर देती हैं। ड्रमरों द्वारा प्रस्तुत ‘ड्रमर कॉल’ (Drummer Call) अनुशासन और सैन्य तालमेल का प्रतीक होती है, जबकि सूर्यास्त के समय बजाया जाने वाला बिगुल समारोह को भावनात्मक ऊँचाई पर पहुँचा देता है। इन धुनों के माध्यम से केवल संगीत नहीं, बल्कि बलिदान, शौर्य और कर्तव्यबोध की भावना भी व्यक्त होती है, जो दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ती है।
बीटिंग रिट्रीट समारोह का ऐतिहासिक उद्भव और अंतरराष्ट्रीय संबंध
भारत में बीटिंग रिट्रीट समारोह की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, जब ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और प्रिंस फिलिप स्वतंत्र भारत की यात्रा पर आए थे। इस अवसर को विशेष और स्मरणीय बनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने थल सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के अधिकारी मेजर जी. ए. रॉबर्ट्स को एक विशेष सामूहिक बैंड प्रदर्शन की योजना बनाने का निर्देश दिया। यहीं से बीटिंग रिट्रीट को गणतंत्र दिवस के औपचारिक समापन के रूप में स्थापित किया गया। समय के साथ यह समारोह न केवल राष्ट्रीय परंपरा बना, बल्कि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान और भारत की कूटनीतिक संस्कृति का भी प्रतीक बन गया।
बीटिंग रिट्रीट की वैश्विक सैन्य परंपरा और विदेशी बैंडों की भागीदारी
बीटिंग रिट्रीट की परंपरा की जड़ें 17वीं शताब्दी के इंग्लैंड में मिलती हैं, जहाँ सूर्यास्त के समय इसे सैनिकों को उनकी चौकियों से वापस बुलाने के संकेत के रूप में प्रयोग किया जाता था। प्रारंभ में इसे ‘वॉच सेटिंग’ कहा जाता था और यह शाम की तोप की आवाज़ से जुड़ा होता था। धीरे-धीरे यह एक औपचारिक सैन्य समारोह में परिवर्तित हो गया। आज ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और भारत सहित कई देशों में यह परंपरा निभाई जाती है। कुछ विशेष अवसरों पर विदेशी सैन्य बैंडों की भागीदारी ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया है, जिससे सैन्य संगीत के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद भी स्थापित होता है।
आधुनिक बीटिंग रिट्रीट: नए प्रयोग, विशेष रचनाएँ और समकालीन संदर्भ
आधुनिक समय में बीटिंग रिट्रीट समारोह में कई नए प्रयोग देखने को मिले हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और दिल्ली पुलिस के बैंडों की भागीदारी ने इसके दायरे को और व्यापक बनाया है। आर्मी सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और पारंपरिक कलाकारों की प्रस्तुतियाँ सैन्य संगीत को शास्त्रीय और लोक तत्वों से जोड़ती हैं। 1971 के युद्ध में भारत की विजय के 50 वर्ष पूरे होने पर प्रस्तुत विशेष रचना ‘स्वर्णिम विजय’ ने इस समारोह को ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ दिया। कोविड काल जैसी चुनौतियों के बावजूद यह परंपरा निरंतर अपनी गरिमा, अनुशासन और राष्ट्रीय भावनाओं को बनाए हुए आगे बढ़ती रही है।
संदर्भ :-
https://bit.ly/35jVsQt
https://bit.ly/3nT5eiV
https://bit.ly/3KEQBtq
https://tinyurl.com/23jxb4yt
A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.
B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.
C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.
D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.
E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.