मुंगेर जिले के अनोखे पक्षियों के उदाहरण से समझें, वे क्यों है प्रकृति के अनदेखे नायक?
पक्षी
31-07-2026 06:04 PM
क्या आप पक्षियों के बिना दुनिया की कल्पना कर सकते हैं? पक्षी दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्र के संचालन में एक आवश्यक भूमिका निभाते हैं, जो सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और भोजन उत्पादन के साथ-साथ, लाखों अन्य प्रजातियों को प्रभावित करती है। अतः पक्षियों द्वारा हमें मिलने वाले लाभ, केवल सांस्कृतिक नहीं हैं।
एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि पक्षी प्रति वर्ष 400-500 मिलियन (40 से 50 करोड़) टन कीड़े खाते हैं। इससे पर्यावरण में जैविक नियंत्रण प्राप्त होता है, क्योंकि कीड़ों की अधिक आबादी घातक हो सकती है।
जब परागणकों (Pollinators) की बात आती है, तो मधुमक्खियों और तितलियों के बारे में ही सोचते हैं। लेकिन, कुछ विशेष पक्षी भी परागणक होते हैं। हमने फूलों के आसपास कुछ पक्षियों को अवश्य देखा होगा! परागणकों के रूप में उनकी भूमिका हमें सीधे लाभ पहुंचाती है, क्योंकि भोजन या दवा के लिए मनुष्यों द्वारा उपयोग किए जाने वाले लगभग 5% पौधों का परागण पक्षियों द्वारा किया जाता है।
आकाश में मंडराते गिद्धों का दृश्य डरावना लग सकता है, लेकिन किसी जानवर की मृत्यु पर उनका आगमन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे मृत जानवर पर भक्षण कर बीमारियों एवं जीवाणुओं के पनपने और फैलने से रोकते हैं। अपने जीवनकाल में, एक अकेला गिद्ध लगभग 11,600 अमेरिकी डॉलर मूल्य की अपशिष्ट निपटान सेवाएं प्रदान करता है।
जब पक्षी यात्रा करते हैं, तो वे उनके द्वारा खाए गए बीजों को अपनी बीट के माध्यम से अन्य जगहों पर फैलाते हैं। इससे पेड़ बढ़ते हैं। पक्षियों ने हमारे आसपास और पूरी दुनिया में दिखने वाले वनस्पति जीवन को आकार देने में मदद की है। पक्षी, पौधे और शाकाहारी जीव एवं शिकारी और शिकार के बीच नाजुक संतुलन बनाए रखते हैं।
कुछ समुद्री पक्षी, पोषक तत्वों के चक्रण और प्रवाल भित्तियों जैसे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को पनपने में मदद करते हैं। समुद्री पक्षी खुले समुद्र में भोजन की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। जब वे वापस लौटते हैं, तब अपने आवासों में बीट की परतें जमा करते हैं। यह बीट, समुद्र में रिसता है और प्रवाल भित्तियों जैसे आसपास के पारिस्थितिक तंत्र को उपजाऊ बनाता है।
भारत में पक्षियों की हजारों प्रजातियां हैं, जो हमारे पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखती हैं। हमारे मुंगेर जिले में भी ऐसे कई उपयुक्त एवं सुंदर पक्षी देखे जा सकते हैं। मुंगेर जिले में पाए जाने वाले प्रमुख पक्षी निम्नलिखित हैं -
1. मानव बस्तियों एवं आसपास पाए जाने वाले पक्षी
गौरैया: यह हमारे राज्य बिहार का राज्य पक्षी है। गौरैया, जंगलों के बजाय प्रमुख रूप से मनुष्यों के आसपास रहती है। हालांकि, पिछले दो दशकों में, लगभग हर शहर में इनकी संख्या में गिरावट आई है।
फाख्ता: हम अक्सर फाख्ता (Dove) और कबूतर (Pigeon) की पहचान करने में भ्रमित हो जाते हैं। वे समान ही दिखते हैं, लेकिन पक्षीविज्ञान में कबूतर को फाख्ता की तुलना में आकार में बड़ा माना जाता है।
मैना: मैना मानव निवास से निकटता से जुड़ी होती है। यह कुशल अपशिष्ट भक्षी हैं, जो कीड़ों, फलों और सब्जियों, बचे हुए भोजन, एवं पालतू जानवरों के भोजन को खा सकती हैं।
गयंगा/पेंगिया मैना: ये पक्षी सात से दस या उससे अधिक के झुंड में रहते हैं। यह एक शोर मचाने वाला पक्षी है, और इसके सदस्यों के चीखने और चहकने से दूर से ही झुंड की उपस्थिति का पता चल सकता है।
काली चिड़ी: यह भी अक्सर मानव बस्तियों के करीब पाए जाते हैं। वे मुख्य रूप से शुष्क आवासों में पाए जाते हैं और ज्यादातर घने जंगल क्षेत्रों और उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों से अनुपस्थित रहते हैं। वे पत्थरों के बीच, इमारत में हुए छेदों में, खोखले पेड़ों में और यहां तक कि लंबे समय से बेकार पड़े हमारे सामानों के अंदर अपना घोंसला बनाते हैं।
अबलक मैना/सिरोली मैना: यह सामान्य मैना की तुलना में थोड़ी शर्मीली होती है और मनुष्यों के करीब आने से बचती है।
पैराकीट: हम अक्सर ही एक पैराकीट और तोते (Parrot) में भ्रमित हो जाते हैं। जिस पक्षी को हम अपने आसपास आमतौर पर देखते हैं, वह तोता न होकर रोज़ रिंग पैराकीट होता है।
रूफस ट्रीपी: चिड़चिड़ी दोहराने वाली आवाजों के साथ, यह एक निडर और शोर मचाने वाला पक्षी है। वे भोजन की तलाश में मानव बस्ती के बहुत करीब आ सकते हैं।
कबूतर: ये पक्षी व्यापक रूप से फैले हुए हैं, और इनकी आबादी भी बड़ी है। हम उन्हें अपने दैनिक जीवन में हमेशा ही देखते हैं।
कौआ
बैंक मैना
2. पेड़ों, बगीचों एवं खुले क्षेत्रों में पाए जाने वाले पक्षी
दहियर/काली सुई चिड़िया: ये पक्षी चमकदार नीले-काले और सफेद रंग के होते हैं। ये भारत के सबसे बेहतरीन गायक पक्षियों में से एक है, एवं विभिन्न स्वरों और तानों में चहकते हैं। इससे गीत का आभास होता है।
पीलक चिड़िया: यह एक गायक पक्षी है। यह इस सूची में सबसे अविश्वसनीय रूप से आकर्षक पक्षी भी है। वे स्वभाव से बहुत शर्मीले होते हैं और उनकी आवाज बांसुरी जैसी बहुत विशिष्ट होती है।
फुलचूही: यह एक छोटी सनबर्ड प्रजाति है, जिसकी चोंच पतली व मुड़ी हुई और जीभ नलीदार होती है। यह जीभ फूलों के मकरंद को खाने के लिए पूरी तरह से अनुकूलित होती है।
छोटा कठफोड़वा: "कुट्रू-कुट्रू या पुकरूक-पुकरूक" जैसी आवाज आने पर, समझ जाइए कि हमारे आसपास कठफोड़वा है। इसके शरीर के ऊपरी हिस्सों, पैर और पूंछ सहित पंख हरे रंग के होते हैं। जबकि, सिर, गला, गर्दन और छाती भूरे रंग की होती है। साथ ही, इसके सिर और छाती पर प्रमुख हल्की धारियाँ होती हैं।
नीलकंठ: दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ माना जाता है। नीलकंठ, भगवान शिव का दूसरा नाम है, और अतः यह पक्षी हिंदुओं द्वारा पूजनीय है।
पतरिंगा: कीटभक्षी होने के कारण, यह मुख्य रूप से मधुमक्खियों को खाता है। वे तितलियों, झींगुरों, ड्रैगनफ्लाई, इल्ली और मकड़ियों को भी खाते हैं। ये पक्षी धीमी, सुरीली आवाज 'ट्री-ट्री-ट्री', या छोटी, तीखी चेतावनी वाली आवाजें निकालते हैं, जो 'टि-इक' या 'टि-टि-टि' जैसी लगती हैं।
कालासिर बुलबुल: बुलबुल की आवाजें तेज़ और कलकल की होती हैं। वे अधिक चहचहाने वाले पक्षी हैं और छोटी जड़ी-बूटियों एवं झाड़ियों पर घोंसला बनाते हैं।
कोतवाल: यह स्वभाव से आक्रामक और निडर है। कोतवाल कौवे जैसा दिखता है, लेकिन इसकी पूंछ लंबी और दो भागों में बंटी होती है।
महोख: ये बहुत शर्मीले होते हैं और घास के मैदानों में, जंगल के किनारों पर, खेती वाले क्षेत्रों और पानी के पास रहते हैं।
कोयल: यह सबसे प्रसिद्ध गायक पक्षी है, जिसे वसंत ऋतु के दौरान आसानी से सुना जा सकता है। नर और मादा कोयल बिल्कुल अलग दिखते हैं। नर, कौवे की तरह चमकदार नीले-काले रंग के होते हैं, जिनकी लाल आंखें होती हैं। दूसरी ओर, मादाएं गहरे भूरे रंग की होती हैं, जिनके शरीर पर सफेद और हल्के पीले धब्बे होते हैं।
पर्पल-रम्प्ड सनबर्ड (Purple-rumped Sunbird)
कॉपरस्मिथ बार्बेट
फ्लॉवरपेकर (Flowerpecker)
3. खेतों, घास के मैदानों एवं कृषि क्षेत्रों के पक्षी
चातक: भारत में, इस पक्षी की कुछ उप-प्रजातियां उत्तरी भारत में ग्रीष्मकालीन प्रजनन आगंतुक हैं। माना जाता है कि वे दक्षिण अफ्रीका से प्रवास करती हैं।
टिटहरी: यह पक्षी दिन या रात में "टिटहरी... टिटहरी..." के रूप में तेज़ चेतावनी जैसी आवाज निकालता है।
सुराखिया: चरने वाले मवेशियों के पीछे हमेशा दिखने वाला सफेद रंग का पक्षी, सुराखिया होता है। उनका आहार ज्यादातर बड़े कीड़े होते हैं।
4. तालाबों, झीलों एवं जल क्षेत्रों के पक्षी
किलकिला: यह पक्षी कृषि क्षेत्रों, दलदलों, तालाबों, झीलों के पास, पार्क की जमीनों और मैंग्रोव दलदलों में आम हैं।
काला बाझ: यह एक प्रवासी पक्षी है, जिसे इंडियन ब्लैक आइबिस भी कहा जाता है। इसके चमकदार काले पंख तथा पतली, काली-हरी और नीचे की ओर मुड़ी हुई चोंच अद्भुत लगती है।
छोटा पनकौवा: यह एक जल पक्षी है।
मल्लार्ड डक (Mallard Duck)
ग्रे पॉन्ड हेरॉन (Gery pond Heron)
5. शिकारी एवं रात्रिचर पक्षी
शिकारा: मादाएं, आमतौर पर गहरे भूरे रंग की होती हैं, जिनकी छाती पर एक नाजुक जंग के रंग में टोकरी जैसी बुनावट होती है। दूसरी ओर, नर पक्षी समान पैटर्न के साथ रेशमी-स्लेटी हो सकते हैं।
चील: यह एक अत्यंत सामाजिक प्रजाति है। विशेष रूप से भक्षण करते समय या बसेरा करते समय, कभी-कभी कई हज़ार पक्षी एक साथ आते हैं।
स्पॉटेड ऑवलेट
इन मुख्य पक्षियों के अलावा, हमारे मुंगेर जिले में एक दुर्लभ पक्षी भी देखा गया है। यह ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क (Leptoptilos dubius - गरुड़) है। इसे मुंगेर ज़िले में पहली बार देखा गया है और यह विश्व स्तर पर एक संकटग्रस्त पक्षी है। इनकी प्रजनन गतिविधि सितंबर माह में शुरू होती है। जबकि, जून से अगस्त महीनों के बीच इन्हें अपने भोजन की तलाश के दौरान देखा जा सकता है।
ग्रेटर एडजुटेंट को आईयूसीएन (IUCN) की ‘रेड लिस्ट (लाल सूची)’ में संकटग्रस्त (Endangered) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारत में यह केवल असम और बिहार राज्यों, तथा कंबोडिया (Combodia) में रहता है। हाल ही में मुंगेर के गंगा तट पर, लगभग 10 पक्षियों का एक परिवार देखा गया है।
ग्रेटर एडजुटेंट, 8 फीट के पंखों के फैलाव के साथ, 5 फीट की ऊंचाई तक बढ़ सकता है। यह भारत में शीर्ष पांच सबसे बड़े और सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है। इनकी लंबी, मोटी व पीली चोंच, बिखरे हुए पंखों वाले पीले से गुलाबी रंग के सिर और गर्दन के आगे होती है। इन्हें एक लटकती हुई व फूलने वाली गले की थैली (Gular pouch) की उपस्थिति से पहचाना जाता है।
असम और बिहार के गांवों के स्थानीय निवासियों द्वारा, ग्रेटर एडजुटेंट की आबादी को बचाने के लिए 2009 से ही कई अभियान चलाए गए हैं। दावा है कि हाल ही में, भागलपुर और गंगा तथा कोसी के मैदानों के आसपास, मुंगेर ज़िले में ग्रेटर एडजुटेंट के लिए पर्याप्त घोंसला बनाने के स्थल बन गए हैं। उन्हें दलदल, झीलों के साथ-साथ शहर के पास शुष्क घास के मैदानों और खेतों के पास आसानी से देखा जा सकता है। वे अक्सर बूचड़खानों और मानव बस्तियों के पास कचरे के स्थलों से जुड़े होते हैं।