कबीर के 20 हजार दोहों से प्रेमचंद के गोदान तक हिंदी साहित्य का पूरा इतिहास

ध्वनि II - भाषाएँ
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कबीर के 20 हजार दोहों से प्रेमचंद के गोदान तक हिंदी साहित्य का पूरा इतिहास

साहित्य किसी भी समाज की अंतरात्मा और उसकी ऐतिहासिक यात्रा का सबसे प्रामाणिक दर्पण होता है। विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हिंदी का साहित्यिक इतिहास एक सहस्राब्दी से भी अधिक समय के सांस्कृतिक मंथन का परिणाम है। एथ्नोलॉग (Ethnologue) के 26वें संस्करण (2023) के अनुसार, विश्वभर में 60.95 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं। संस्कृत की कोख से निकली प्राकृत और शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित होकर आधुनिक मानक हिंदी तक पहुँची इस भाषा ने सदियों के उतार-चढ़ाव, सामाजिक क्रांतियों और राजनीतिक परिवर्तनों को अपने भीतर समेटा है। यह साहित्य केवल कल्पना का विलास नहीं रहा, बल्कि समय-समय पर सत्ता, रूढ़िवादिता और औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध लोकचेतना की प्रखर आवाज़ बनकर उभरा है।

14 सितंबर को ही क्यों चुना गया था हिंदी दिवस और इसमें साहित्यकारों का क्या योगदान था?
राष्ट्रीय हिंदी दिवस को 14 सितंबर को मनाए जाने के पीछे एक सुदृढ़ संवैधानिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि है। 14 सितंबर 1949 को भारत की संविधान सभा ने गहन विचार-विमर्श के उपरांत भारतीय संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343(1) में यह स्पष्ट प्रावधान किया कि "संघ की राजभाषा, हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।" इस निर्णय का ऐतिहासिक आधार वर्ष 1918 में तैयार हुआ था, जब महात्मा गांधी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में सर्वप्रथम हिंदी को देश की संपर्क और राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करवाने का मुख्य श्रेय मूर्धन्य साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंह को जाता है। उन्होंने काका कालेलकर, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, और सेठ गोविन्ददास जैसे शीर्ष विद्वानों को एक मंच पर लाकर इस अभियान का नेतृत्व किया। जिस दिन संविधान सभा ने यह ऐतिहासिक निर्णय लिया, यानी 14 सितंबर 1949 को, उसी दिन व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50वाँ जन्मदिन भी था। अतः उनके इस अविस्मरणीय योगदान के सम्मान में और राजभाषा के प्रचार-प्रसार के संकल्प के साथ वर्ष 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को पूरे देश में हिंदी दिवस के रूप में मनाने की औपचारिक शुरुआत हुई।

आदिकाल (वीरगाथा काल) में चारण कवियों और रासो साहित्य ने कैसे रखी हिंदी साहित्य की नींव?
हिंदी साहित्य के इतिहास का आरंभ लगभग 1050 ईस्वी से 1375 ईस्वी के मध्य माना जाता है, जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'वीरगाथा काल' और सामान्यतः 'आदिकाल' कहा है। वर्ष 646 में सम्राट हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में जो राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई, उसने राजपूत राजाओं के आपसी संघर्षों और दिल्ली पर 1340 के आसपास तुगलक वंश के शासन तक के कालखंड को युद्धों का केंद्र बना दिया। कन्नौज, दिल्ली और अजमेर से लेकर मध्य भारत तक चारण कवियों ने युद्ध और शौर्य को अपने काव्य का मुख्य विषय बनाया।

इस कालखंड का सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान के राजकवि चंदबरदाई द्वारा रचित 'पृथ्वीराज रासो' है, जिसे हिंदी साहित्य की प्रथम प्रामाणिक कृति के रूप में स्वीकार किया जाता है। चंदबरदाई के समकालीन जगनिक ने 'आल्हा खंड' की रचना की, जिसमें महोबा के दो अमर वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल के अदम्य साहस का वर्णन मिलता है। इसी क्रम में सारंगधर ने 'हम्मीर रासो' और 'हम्मीर काव्य' में रणथंभौर के राजा हम्मीर देव चौहान की वीरता को अमर किया। इसके अतिरिक्त नल सिंह का 'विजयपाल रासो', नरपति नाल्ह का 'बीसलदेव रासो' और अज्ञात कवि का 'खुमान रासो' भी डिंगल और अपभ्रंश भाषा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

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आदिकाल केवल युद्धों तक सीमित नहीं था। इसे तीन अन्य धाराओं ने भी समृद्ध किया:

  • सिद्ध साहित्य: बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सरहपा, शबरपा और कण्हपा जैसे संतों ने लोकभाषा में रचनाएँ कीं।
  • जैन साहित्य: देवसेन की 'श्रावकाचार' और शालिभद्र सूरि की 'रेवंतगिरि रास' के माध्यम से धार्मिक सिद्धांतों को काव्य रूप दिया गया।
  • नाथ साहित्य: गोरखनाथ ने सिद्धों की विलासिता का विरोध करते हुए गुरु-महिमा, इंद्रिय-निग्रह, वैराग्य, कुण्डलिनी जागरण और समाधि को साहित्य का मुख्य स्वर बनाया।

इसी दौर में अमीर खुसरो ने अपनी पहेलियों और मुकरियों में जनसाधारण की सरल 'हिंदवी' का प्रयोग कर खड़ी बोली की प्रारंभिक मिठास घोली, जबकि कुशलरायवाचक ने 'ढोला मारू रा दूहा' जैसी लोकप्रिय लौकिक कृतियों का सृजन किया।

भक्तिकाल और सूफी परंपरा ने हिंदी साहित्य को स्वर्ण युग कैसे बनाया?
वर्ष 1375 से 1700 ईस्वी तक का समय हिंदी साहित्य के इतिहास में 'भक्तिकाल' के नाम से विख्यात है, जिसे सर्वसम्मति से साहित्य का स्वर्ण युग माना गया है। विदेशी आक्रमणों और सामाजिक उथल-पुथल के दौर में जनमानस की आस्था को संबल प्रदान करने के लिए भक्ति आंदोलन की दो प्रमुख धाराएँ प्रस्फुटित हुईं: निर्गुण और सगुण।

निर्गुण काव्यधारा की 'ज्ञानाश्रयी शाखा' में संत कबीरदास का योगदान अद्वितीय रहा। कबीर ने अकेले ही लगभग बीस हज़ार श्लोकों, साखियों और पदों की रचना की। उनकी निर्भीक वाणी ने धार्मिक पाखंड, जातिगत भेदभाव और बाह्य आडंबरों पर करारी चोट करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता की सुदृढ़ आधारशिला रखी। इसी परंपरा में सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक देव, दादू दयाल, सुंदर दास और मलूक दास ने ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा की।

निर्गुण की दूसरी धारा 'प्रेमाश्रयी' यानी सूफी संतों की थी। इन कवियों ने भारतीय लोककथाओं के माध्यम से अलौकिक प्रेम और योग दर्शन की सुंदर व्याख्या की। इसमें मुल्ला दाऊद की 'चंदायन' (चंदावत), कुतुबन की 'मृगावती', मंझन की 'मधुमालती' और मलिक मुहम्मद जायसी का विश्वप्रसिद्ध महाकाव्य 'पद्मावत' मील के पत्थर साबित हुए।

दूसरी ओर, सगुण काव्यधारा में ईश्वर के साकार रूप की उपासना हुई। 'कृष्णाश्रयी शाखा' में वल्लभाचार्य और निम्बार्काचार्य के दर्शन से अनुप्राणित होकर सूरदास ने ब्रजभाषा में वात्सल्य और माधुर्य की पराकाष्ठा रची, जबकि राजस्थान की पावन भूमि पर मीराबाई ने अपने पदों के माध्यम से समर्पण का अमर संगीत दिया। 'रामाश्रयी शाखा' के शिखर पुरुष गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में 'श्रीरामचरितमानस' की रचना कर भारतीय संस्कृति को आदर्श जीवन मूल्यों की अनुपम निधि सौंपी।

रीतिकाल के शृंगार और लक्षण ग्रंथों की क्या प्रमुख विशेषताएँ थीं?
वर्ष 1700 से 1900 ईस्वी के कालखंड को 'रीतिकाल' के नाम से जाना जाता है। इस युग में मुग़ल दरबारों और देशी रियासतों के राजाश्रय में दरबारी संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा। इसे 'रीति' इसलिए कहा गया क्योंकि इस काल में कवियों ने संस्कृत के काव्य-शास्त्र, अलंकारों, छंदों और नायिका-भेद के नियमों का अनुसरण करते हुए लक्षण ग्रंथों की रचना को अपनी प्रतिष्ठा का आधार बनाया।

इस युग में दोहा और सवैया छंद सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। कविवर बिहारी लाल की एकमात्र अमर कृति 'बिहारी सतसई' ने भक्ति, नीति और शृंगार के त्रिवेणी संगम से साहित्य को चमत्कृत कर दिया। रीतिकाल की बंधी-बंधाई परिपाटी के बीच कुछ ऐसे स्वाभिमानी कवि भी उभरे जिन्होंने किसी राजा की चाटुकारिता स्वीकार नहीं की और न ही शास्त्रीय नियमों का अंधानुकरण किया। इन्हें 'रीतिमुक्त' कवि कहा गया, जिनमें घनानंद, आलम और बोधा ठाकुर प्रमुख हैं। इन कवियों ने दरबारी विलासिता के स्थान पर हृदय की सच्ची अनुभूतियों और विरह की तड़प को वाणी दी।

आधुनिक काल में गद्य के उदय से लेकर प्रेमचंद और आंचलिक उपन्यासों तक का सफर कैसा रहा?
1900 ईस्वी के बाद आरंभ हुए आधुनिक काल ने हिंदी साहित्य की दिशा पूरी तरह बदल दी। अंग्रेज़ी शासन की स्थापना और वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के साथ पद्य के स्थान पर 'गद्य' साहित्य की प्रमुख विधा बनकर उभरा। लल्लू जी लाल ने आधुनिक हिंदी गद्य की आधारशिला रखी, जबकि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नाटकों और निबंधों के माध्यम से राष्ट्रीय नवजागरण का शंखनाद किया।

हिंदी कथा साहित्य में यथार्थवाद की वास्तविक प्रतिष्ठा उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के आगमन से हुई। 1936 में प्रकाशित उनका अंतिम कालजयी उपन्यास 'गोदान' आज भी भारतीय ग्रामीण जीवन, कृषक जीवन की त्रासदी और सामाजिक विद्रूपताओं का सबसे जीवंत दस्तावेज़ है। प्रेमचंद के बाद कथा साहित्य में एक और बड़ा क्रांतिकारी मोड़ फणीश्वर नाथ रेणु के आगमन से आया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'मैला आंचल' के माध्यम से 'आंचलिक उपन्यास' की विधा को जन्म दिया और बिहार के सुदूर ग्रामीण अंचल की माटी की गंध, लोकगीत, राजनीति और सामाजिक अंतर्विरोधों को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया।

काव्य के क्षेत्र में भी इस युग में अभूतपूर्व प्रयोग हुए। छायावाद और प्रगतिवाद के बाद डॉ. जगदीश गुप्त और डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के संपादन में 'नई कविता' आंदोलन का सूत्रपात हुआ। सुमित्रानंदन पंत की 'कला और बूढ़ा चाँद', राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 'रश्मिरथी' व 'चक्रवाल', और जनकवि नागार्जुन की जनपक्षधर कविताओं ने आधुनिक हिंदी कविता को विचार और संवेदना की नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।

दलित, बहुजन और आदिवासी विमर्श ने हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को कैसे बदला?
वर्ष 1990 के बाद जब देश में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं और आर्थिक उदारीकरण का दौर आया, तो उसका सीधा असर विश्वविद्यालय परिसरों और साहित्य के स्थापित ढाँचों पर पड़ा। दशकों से सवर्ण और वामपंथी दृष्टि के प्रभुत्व वाले हिंदी साहित्य में दलित, बहुजन और आदिवासी (डीबीए) रचनाकारों ने अपनी जीवंत अनुभूतियों के साथ प्रवेश किया।

इस वैचारिक क्रांति का सबसे बड़ा प्रस्थान बिंदु वर्ष 1997 में आया, जब ओमप्रकाश वाल्मीकि की ऐतिहासिक आत्मकथा 'जूठन' प्रकाशित हुई। 'जूठन' ने हिंदी साहित्य की दुनिया को झकझोर कर रख दिया। यह यात्रा केवल दूसरों के प्रति दिखाई जाने वाली 'सहानुभूति' की नहीं थी, बल्कि अपनी पीड़ा को स्वयं स्वर देने वाली 'स्वानुभूति' की थी। इसके बाद सूरजपाल चौहान की 'तिरस्कृत' (2002), प्रो. श्योराज सिंह बेचैन की 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर' (2009), और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. तुलसीराम की दो खंडों में आई बहुचर्चित आत्मकथा 'मुर्दहिया' (2010) व 'मणिकर्णिका' (2016) ने हिंदी आत्मकथा विधा को नए शिखर पर पहुँचाया।

इसके साथ ही, रजत रानी 'मीनू', अनिता भारती और तारा परमार जैसी दलित महिला लेखिकाओं ने विमर्श को नया आयाम दिया। आदिवासी जीवन के शोषण और अस्मिता को झारखंड की कवयित्री जसिंता केरकेट्टा ने अपने संग्रह 'ईश्वर और बाज़ार' (2022) के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया, जिसका अनुवाद जर्मन, इतालवी और फ्रेंच भाषाओं में हुआ। राजस्थान के युवा दलित कवि श्याम निर्मोही ने 'संताप का सफर' और 'रेत पर कश्तियाँ' (2022) के जरिए सामाजिक विषमता के विरुद्ध तीखे सवाल खड़े किए।

वर्तमान परिदृश्य में हिंदी साहित्य के सामने क्या चुनौतियाँ और नए अवसर हैं?
समकालीन दौर में हिंदी साहित्य दो स्पष्ट धाराओं में बँटा दिखाई देता है। एक ओर गंभीर, विचारप्रधान और राजनीतिक रूप से सजग साहित्य है, जिसमें चंदन पांडे का 'वैधानिक गल्प' (2020) व 'कीर्तिगान' (2022), तथा प्रवीन कुमार का उपन्यास 'अमर देसवा' (2021) समकालीन सत्ता और नागरिक अधिकारों पर कड़े प्रश्न उठाते हैं। वर्ष 2018 में प्रकाशित गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' को 2022 में मिले इंटरनेशनल बुकर प्राइज (International Booker Prize) ने वैश्विक स्तर पर हिंदी गद्य की रचनात्मक क्षमता का लोहा मनवाया।

दूसरी ओर, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर बिकने वाले गुलशन नंदा, वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के लोकप्रिय साहित्य की तर्ज पर आज युवा पीढ़ी के बीच बेस्टसेलर (bestseller) लेखकों का एक नया उभार देखा जा रहा है। दिव्य प्रकाश दुबे ('मुसाफ़िर कैफ़े'), नीलोत्पल मृणाल और अनुराग पाठक जैसे लेखक आधुनिक युवाओं की भाषा और आकांक्षाओं को स्वर दे रहे हैं।

किंतु इस चमक-दमक के बीच कुछ गंभीर संकट भी हैं। धर्मयुग, दिनमान, कादंबिनी और 50 वर्षों तक निरंतर निकलने वाली पत्रिका 'पहल' (2021 में बंद) जैसी ऐतिहासिक साहित्यिक पत्रिकाओं का बंद हो जाना साहित्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है। वर्तमान में मुंशी प्रेमचंद द्वारा 1930 में स्थापित और 1986 में राजेंद्र यादव द्वारा पुनर्जीवित 'हंस', तथा 1950 से निरंतर प्रकाशित 'नई धारा', 'आलोचना', 'कथादेश' व 'तद्भव' जैसी गिनी-चुनी पत्रिकाएँ ही इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ. रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसी गंभीर और निर्भीक साहित्यिक आलोचना का स्थान अब औपचारिक और हल्की समीक्षाओं ने ले लिया है। इसके बावजूद, इंटरनेट पर ब्लॉग (blog) क्रांति और युवा पाठकों का किताबों की ओर बढ़ता रुझान यह आश्वस्त करता है कि माध्यम भले ही बदल जाएँ, किंतु हिंदी साहित्य की जीवनधारा सदैव प्रवाहमान रहेगी।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/29252ypv

2. https://tinyurl.com/26a6tdwn

3. https://tinyurl.com/2ytgue7a

4. https://tinyurl.com/29h3sc5a

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