क्यों हरित क्रांति की कहानी, आज भी रामपुर के खेतों और किसानों की उम्मीद बनकर ज़िंदा है?

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03-01-2026 09:22 AM
क्यों हरित क्रांति की कहानी, आज भी रामपुर के खेतों और किसानों की उम्मीद बनकर ज़िंदा है?

रामपुरवासियों, भले ही हमारा शहर अपनी नज़ाकत, तहज़ीब, शेर-ओ-शायरी और खानपान के लिए जाना जाता है, लेकिन ज्ञान की दुनिया में सरहदें कभी मायने नहीं रखतीं। आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तन के बारे में जानेंगे जिसने न केवल भारत की कृषि व्यवस्था को बदला, बल्कि करोड़ों लोगों की ज़िंदगी और भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। यह परिवर्तन था - हरित क्रांति (Green Revolution)। वह समय याद कीजिए जब भारत खाद्यान्न संकट, अकाल और भूख से जूझ रहा था। उसी दौर में एक वैज्ञानिक और तकनीकी आंदोलन ने खेती को पारंपरिक ढांचे से निकालकर आधुनिक विज्ञान पर आधारित व्यवस्था में बदल दिया। हरित क्रांति सिर्फ एक कृषि सुधार नहीं थी, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भर बनने की सबसे बड़ी कोशिशों में से एक था।
आज के इस लेख में हम हरित क्रांति को चरणबद्ध और सरल तरीक़े से समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि हरित क्रांति की शुरुआत क्यों हुई और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी। इसके बाद, हम समझेंगे कि नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) और डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन जैसे वैज्ञानिकों ने इसे सफल बनाने में क्या भूमिका निभाई। आगे चलकर हम यह जानेंगे कि एचवाईवी (HYV) बीज, सिंचाई व्यवस्था, उर्वरक, कीटनाशक और मशीनरी जैसी तकनीकों ने भारतीय कृषि को कैसे बदल दिया। अंत में, हम हरित क्रांति के सकारात्मक परिणामों, चुनौतियों और भविष्य की आधुनिक तकनीकों, जैसे जीएम (GM) फसलें और स्मार्ट खेती के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

हरित क्रांति की शुरुआत और आवश्यकता
1950 और 1960 के दशक भारतीय इतिहास के उन कठिन समयों में गिने जाते हैं जब भारत भयंकर खाद्य संकट से गुजर रहा था। देश की आबादी तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन खेती पुरानी विधियों पर आधारित थी - जहाँ वर्षा के भरोसे सिंचाई होती थी और पारंपरिक बीज कम मात्रा में उत्पादन देते थे। इन परिस्थितियों के कारण भारत को अमेरिका जैसे देशों से "पीएल-480" (PL-480) कार्यक्रम के तहत गेहूँ मंगवाना पड़ता था, जिससे देश की आर्थिक और राजनीतिक निर्भरता बढ़ती जा रही थी। उस दौर के अखबारों में भूख, अकाल और अनाज संकट की खबरें आम थीं। ऐसे समय में सरकार, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं ने महसूस किया कि केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नई वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। इसी समझ और बदलाव की आवश्यकता ने जन्म दिया हरित क्रांति को - जो सिर्फ खेती की तकनीक का परिवर्तन नहीं था, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक कदम था।

मुख्य वैज्ञानिक और नेतृत्वकर्ता
हरित क्रांति को सफल बनाने के पीछे कई व्यक्तियों की शोध, मेहनत और दूरदर्शी सोच थी, लेकिन दो नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पहला - नॉर्मन बोरलॉग, जिन्होंने उच्च उत्पादन क्षमता वाले गेहूं के बीज विकसित किए और दुनिया को भूख से लड़ने के लिए वैज्ञानिक समाधान दिए। उन्हें उनके योगदान के लिए नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) भी मिला। दूसरा - डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, जिन्होंने इन तकनीकों को भारत की जलवायु, मिट्टी और किसानों की परिस्थितियों के अनुरूप बनाया। उन्होंने किसानों के साथ संवाद, फील्ड रिसर्च (Field Research) और जागरूकता के माध्यम से इस तकनीक को व्यवहार में उतारा। उनके नेतृत्व में वैज्ञानिक केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खेतों तक पहुंचे और किसानों को प्रशिक्षित किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि बोरलॉग इस विचार के सूत्रधार थे, तो स्वामीनाथन इसके भारतीय स्वरूप के वास्तुकार।

हरित क्रांति की प्रमुख तकनीकें और साधन
हरित क्रांति केवल एक विचार नहीं थी, बल्कि कई वैज्ञानिक तकनीकों का संयोजन थी, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई एचवाईवी (High Yielding Variety) बीजों ने। ये बीज कम समय में अधिक उत्पादन देने में सक्षम थे और रोग प्रतिरोधी भी थे। इनके साथ ही सिंचाई प्रणाली में बड़े बदलाव किए गए - नहरों का विस्तार हुआ, ट्यूबवेल लगे और भूजल उपयोग बढ़ा। रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग ने फसलों को मजबूत बनाया और उत्पादन में तेजी लाई। इसके साथ ही ट्रैक्टर, थ्रेशर (thresher), हार्वेस्टर (harvestor) और अन्य मशीनों के आगमन ने कृषि को आधुनिक और तेज़ बनाया। इस बदलाव के बाद खेती अनुभव और परंपरा के बजाय विज्ञान, तकनीक और कुशल प्रबंधन पर आधारित हो गई।

भारत में हरित क्रांति के परिणाम: सफलता और उपलब्धियाँ
हरित क्रांति के परिणाम उतने ही तेज़ थे जितनी तेज़ी से यह लागू हुई। कुछ ही वर्षों में भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि की। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्र "भारत का अनाज भंडार" कहलाने लगे। पहले जहां देश अनाज आयात करता था, वहीं बाद में भारत अनाज का निर्यातक देश बनने लगा। लाखों किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई, कृषि से जुड़े उद्योग विकसित हुए और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर बने। यह वह दौर था जब भारत ने आत्मविश्वास के साथ दुनिया को दिखाया कि सही नीतियों, ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ कोई भी देश अपनी नियति बदल सकता है।

हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव और चुनौतियाँ
हरित क्रांति ने जहाँ कई लाभ दिए, वहीं इसके कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी सामने आए। लंबे समय तक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग ने मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को नुकसान पहुँचाया। अत्यधिक भूजल उपयोग के कारण कई क्षेत्रों में पानी के स्तर में भारी गिरावट आई। इसके अलावा यह कृषि मॉडल मुख्य रूप से उन किसानों के पक्ष में था जिनके पास पर्याप्त भूमि, पूंजी और संसाधन थे, जबकि छोटे और सीमांत किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ गया। इससे सामाजिक और क्षेत्रीय असमानता भी दिखाई दी। यानी, हरित क्रांति ने उत्पादन तो बढ़ाया, लेकिन प्रकृति और कमजोर वर्ग इसकी कीमत चुकाते रहे।

जीएम फसलें और आधुनिक कृषि का भविष्य दिशा
अब भारत एक नए कृषि युग की दहलीज पर खड़ा है जहाँ खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आधुनिक तकनीकें जैसे जीएम फसलें, ड्रिप सिंचाई (drip irrigation), हाइड्रोपोनिक्स (hydroponics), एआई आधारित फसल प्रबंधन, ड्रोन निरीक्षण (drone monitoring), सेंसर आधारित डेटा मॉनिटरिंग (sensor based data monitoring) और स्मार्ट कृषि मशीनरी खेती को अधिक टिकाऊ, सटीक और लाभकारी बना रही हैं। भविष्य की खेती केवल अधिक उत्पादन पर आधारित नहीं होगी, बल्कि पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जल-ऊर्जा बचत पर भी केंद्रित होगी। आने वाला समय सतत कृषि का होगा - जहाँ विज्ञान, तकनीक, प्रकृति और किसान एक साथ काम करेंगे।

संदर्भ
https://tinyurl.com/3dyakty6 
https://shorturl.at/zLpu1 
https://tinyurl.com/y4z6ra73
https://tinyurl.com/36pdrpeh 

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