क्या यूनानी महाकाव्य इलियाड और भारतीय महाभारत के बीच सच में है कोई गहरा संबंध?

धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
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क्या यूनानी महाकाव्य इलियाड और भारतीय महाभारत के बीच सच में है कोई गहरा संबंध?

प्राचीन विश्व की दो सबसे महान और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं ‘यूनानी तथा भारतीय’ मानव इतिहास, दर्शन, धर्म और खगोलशास्त्र को आकार देने में सबसे अग्रणी रही हैं। विशेष रूप से 600 BCE से 300 CE के धार्मिक युग के दौरान, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रह्मांड की संरचना, देवताओं के स्वरूप और महाकाव्यों की रचना को लेकर अत्यंत चिंतनशील विचार पनपे। यूनानी पौराणिक कथाओं में जहाँ माउंट ओलिंपस (Mount Olympus) को संपूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र और देवताओं का निवास माना गया, वहीं भारतीय मनीषा में हिमालय की चोटियों के बीच स्थित माउंट कैलाश को देवों के देव महादेव का धाम और जगत का मुख्य अक्ष स्वीकार किया गया। जब हम प्रसिद्ध यूनानी कविं होमर (Homer) के महाकाव्यों की तुलना महर्षि व्यास की कालजयी कृतियों से करते हैं, तो दोनों संस्कृतियों के बीच गाथाओं, नायकों और ब्रह्मांडीय सिद्धांतों के कई चौंकाने वाले समानांतर सूत्र उजागर होते हैं।

ग्रीक पौराणिक कथाओं में माउंट ओलिंपस का धार्मिक और भौगोलिक स्थान क्या है?
माउंट ओलिंपस उत्तरी ग्रीस में स्थित देश का सबसे ऊंचा पर्वत है, जिसकी ऊँचाई और समुद्र से निकटता एक अनूठे सूक्ष्म जलवायु का निर्माण करती है। इस पर्वत की भौगोलिक संरचना में हिमनद गर्त, चूना पत्थर की चट्टानें, चूना-गर्त और गहरी घाटियाँ शामिल हैं, जिनमें एनिपियास (Enipeas) घाटी और मितिकास-स्टेफ़ानी (Mytikas-Stefani) जैसी ऊँची नुकीली चोटियां प्रमुख हैं। यह क्षेत्र अपनी भू-वैज्ञानिक गतिविधियों और समृद्ध वनस्पति जैव-विविधता के लिए जाना जाता है। प्राचीन यूनानियों के लिए यह केवल एक पर्वत नहीं था, बल्कि उनके बारह ओलंपियन देवताओं (Twelve Olympian Gods) का अलौकिक निवास स्थान था, जिनके राजा सर्वशक्तिमान ज़ीउस (Zeus) थे। इसके साथ ही यहाँ कला और सौंदर्य की देवी म्यूज़ेस (Muses) और ग्रेसेस (Graces) का भी वास माना जाता था।

प्रसिद्ध यूनानी कवियों होमर और हेसियड (Hesiod) की रचनाओं के माध्यम से माउंट ओलिंपस पूरी यूनानी और रोमन दुनिया के लिए पौराणिक कथाओं का मुख्य संदर्भ बिंदु बन गया। यूनानी वास्तुकला की अवधारणा के अनुसार, माउंट ओलिंपस की चोटी पर बादलों के पार एक दिव्य दुर्ग और स्वर्ण निर्मित महल था, जिसका निर्माण शिल्प के देवता हेफेस्टस (Hephaestus) ने किया था। इस महल के द्वार की रक्षा होरे (Horae) देवियाँ करती थीं। यहाँ देवता अमृत (Ambrosia) और नेक्टर (Nectar) का पान करते हुए पूरी पृथ्वी और मानव जाति की गतिविधियों पर नज़र रखते थे।

भारतीय अध्यात्म और पौराणिक ग्रंथों में माउंट कैलाश की पवित्रता का क्या आधार है?
भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत के नगारी क्षेत्र में ट्रांसहिमालय की गांगदीसे पर्वत- श्रृंखला में स्थित माउंट कैलाश, समुद्र तल से लगभग 6,638 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक अत्यंत पवित्र और अभेद्य पर्वत है। हिंदू धर्म में माउंट कैलाश को भगवान शिव, उनकी पत्नी माता पार्वती, तथा उनके पुत्रों गणेश और कार्तिकेय का प्रत्यक्ष निवास स्थान माना गया है। विष्णु पुराण और रामायण व महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में माउंट कैलाश को पौराणिक 'माउंट मेरु' के रूप में पहचाना गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र और स्वर्ग की सीढ़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब लंका के राजा रावण ने अभिमान में आकर माउंट कैलाश को हिलाने का प्रयास किया था, तब भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबाकर रावण के अहंकार को चूर कर दिया था, जिसके बाद रावण ने एक हज़ार वर्षों तक शिव तांडव स्तोत्र गाकर महादेव को प्रसन्न किया था।

माउंट कैलाश केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह चार प्रमुख धर्मों हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन का साझा आध्यात्मिक केंद्र है। जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार, प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने माउंट कैलाश पर ही मोक्ष प्राप्त किया था। उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत ने यहाँ रत्नजड़ित 24 तीर्थंकरों के स्तूपों का निर्माण कराया था। बौद्ध धर्म में माउंट कैलाश को जगत् का पिता और पास ही स्थित मानसरवर झील को जगत् की माता माना जाता है। बौद्ध संत मिलारेपा और बोन धर्म के आचार्य नारो बोनचम के बीच माउंट कैलाश की चोटी पर पहुँचने की प्रसिद्ध पौराणिक प्रतिस्पर्धा का भी वर्णन मिलता है। यह क्षेत्र सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र और घाघरा जैसी चार प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल भी है। धार्मिक आस्था और अखंड पवित्रता के कारण चीन सरकार द्वारा माउंट कैलाश पर पर्वतारोहण पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इतिहास में ह्यूग रटलेज (Hugh Rutledge) (1926), हरबर्ट टिची (Herbert Tichy) (1936) और प्रसिद्ध पर्वतारोही राइनहोल्ड मेसनर (Reinhold Messner) जैसे लोगों ने इस पर्वत की दुर्गमता और आध्यात्मिक महत्व को स्वीकार किया है।

माउंट ओलिंपस और माउंट कैलाश के ब्रह्मांडीय स्वरूप में क्या समानताएँ और अंतर हैं?
ग्रीक और भारतीय दोनों ही परंपराओं में पवित्र पर्वतों को ब्रह्मांडीय व्यवस्था के शीर्ष स्तंभ के रूप में देखा गया है। यूनानी ब्रह्मांड विज्ञान में माउंट ओलिंपस एक लंबवत ब्रह्मांडीय संरचना के शीर्ष पर स्थित है। इस व्यवस्था में सबसे ऊपर माउंट ओलिंपस (देवताओं का लोक), मध्य में नश्वर मनुष्यों की पृथ्वी और सबसे नीचे पाताल लोक यानी हेडीज़ (Hades) स्थित है। टाइटन्स (Titans) को हराने के बाद ओलंपियन देवताओं ने माउंट ओलिंपस से ही राजनीतिक सत्ता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की स्थापना की थी।

इसके विपरीत, भारतीय दर्शन में माउंट कैलाश को केवल एक राजनीतिक सत्ता केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के 'अक्ष' के रूप में देखा जाता है। माउंट कैलाश स्वयं कमल के फूल की पंखुड़ियों की भांति छह पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है। जहाँ माउंट ओलिंपस में देवता भौतिक रूप से स्वर्ण महलों में बैठकर मदिरा और भोजन का आनंद लेते हैं और मानवीय ईर्ष्या व युद्धों में भाग लेते हैं, वहीं माउंट कैलाश पर भगवान शिव ध्यानमग्न अवस्था में समाधिस्थ रहते हैं, जो शांति, वैराग्य और आत्मज्ञान का प्रतीक है।

होमर की इलियाड और महर्षि व्यास के महाकाव्यों में कथात्मक समानताएँ क्या दर्शाती हैं?
प्राचीन महाकाव्यों का गहन अध्ययन करने वाले विद्वानों, जैसे फ़रनांडो वुल्फ़ अलोंसो (Fernando Wulff Alonso), ने यह रेखांकित किया है कि होमर की इलियाड और महर्षि व्यास की महाभारत व रामायण के बीच कथात्मक ढांचे में अप्रत्याशित समानताएँ मौजूद हैं।

सबसे प्रमुख समानता स्त्रियों के अपहरण और उसके परिणामस्वरूप होने वाले विनाशकारी युद्धों में दिखाई देती है। इलियाड में ट्रॉय (Troy) के राजकुमार पेरिस (Paris) द्वारा स्पार्टा के राजा मेनेलाउस (Menelaus) की पत्नी हेलेन (Helen) का अपहरण कर लिया जाता है, जिसके कारण प्रसिद्ध ट्रोजन युद्ध (Trojan War) छिड़ता है। ठीक इसी प्रकार, रामायण में लंकापति रावण द्वारा सीता का हरण किया जाता है, जो राम और रावण के बीच धर्म-युद्ध का कारण बनता है। हेलेन और सीता दोनों ही केवल चरित्र नहीं हैं, बल्कि वे पूरे साम्राज्य के भाग्य का फ़ैसला करने वाली दैवीय नीतियाँ हैं।

दूसरी बड़ी समानता पृथ्वी का भार कम करने के लिए देवताओं द्वारा रचे गए नरसंहार की योजना है। इलियाड और साइप्रिया (Cypria) में परमपिता ज़ीउस बढ़ते हुए अभिमानी राजाओं का विनाश करने के लिए युद्ध की योजना बनाते हैं। महाभारत में भी ठीक यही विचार मिलता है, जहाँ पृथ्वी के पाप और भार को मिटाने के लिए भगवान कृष्ण की उपस्थिति में कुरुक्षेत्र के मैदान में 18 दिनों का भयंकर युद्ध होता है।

यूनानी और भारतीय पौराणिक गाथाओं में दिव्य हस्तक्षेप तथा नायकों के जीवन का क्या महत्व है?
दोनों संस्कृतियों के महाकाव्यों में देवता केवल दर्शक बनकर नहीं रहते, बल्कि वे मनुष्यों के युद्ध में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते हैं। इलियाड में एथेना (Athena), हेरा (Hera) और अपोलो (Apollo) योद्धाओं की रक्षा करते हैं और युद्ध की दिशा बदलते हैं। रामायण और महाभारत में भी भगवान विष्णु के अवतार राम और कृष्ण, तथा पवनपुत्र हनुमान जैसी दैवीय शक्तियाँ धर्म की स्थापना के लिए प्रत्यक्ष भूमिका निभाती हैं।

इसके अलावा, अजय माने जाने वाले महानायकों की दुखद मृत्यु का ढांचा भी दोनों परंपराओं में समान है। ग्रीक महाकाव्य में अकिलीस (Achilles) जैसा सर्वशक्तिमान योद्धा, जिसे कोई हरा नहीं सकता था, उसकी एड़ी में तीर लगने से मृत्यु हो जाती है। रामायण में रावण का पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत), जो युद्ध में अजेय था, एक पवित्र यज्ञ करते समय निहत्थेपन की स्थिति में मारा जाता है। इसी प्रकार इलियाड में पेट्रोक्लस (Patroclus) की मृत्यु अकिलीस को झकझोर देती है, और हेक्टर (Hector) की मृत्यु ट्रॉय में शोक की लहर दौड़ जाती है। महाभारत में कर्ण, भीष्म और दुर्योधन का अंत तथा रामायण में जटायु और लक्ष्मण का संकट युद्ध की अंतहीन त्रासदी और भावनात्मक क्षति को उजागर करता है।

प्राचीन यूनानी और भारतीय विज्ञान व खगोलशास्त्र का आपस में क्या ऐतिहासिक संबंध रहा है?
सिकंदर के भारत आगमन से बहुत पहले, प्राचीन व्यापारिक मार्गों के माध्यम से भारत, मेसोपोटेमिया, मिस्र और ग्रीस के बीच विचारों और ज्ञान का आदान-प्रदान हो रहा था। प्रोफेसर सुभाष काक के शोधपत्रों के अनुसार, 600 BCE से पूर्व ही भारतीय वैदिक खगोलशास्त्र, गणित और आयुर्वेद का विकास हो चुका था। जहाँ यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड (Euclid) से पूर्व भारत के शुल्बसूत्रों में रेखागणितीय निर्माण और पाइथागोरस प्रमेय के सिद्धांत मौजूद थे, वहीं चिकित्सा के क्षेत्र में भारत के चरक व सुश्रुत की 'त्रिदोष' (वात, पित्त, कफ़) प्रणाली और यूनान के हिपोक्रेटिस (Hippocrates) व एम्पेडोकलीज़ (Empedocles) की 'चार ह्यूमर्स' प्रणाली में गहरा साम्य दिखाई देता है।

हालाँकि, दोनों सभ्यताओं ने अपनी-अपनी ब्रह्मांडीय दृष्टि के अनुसार स्वतंत्र रूप से विज्ञान को विकसित किया। यूनानी विज्ञान यंत्रवत और सीमित ब्रह्मांड की अवधारणा पर आधारित था, जबकि भारतीय विज्ञान अनंत एवं चक्रीय ब्रह्मांड के विचार पर निर्मित था, जहाँ 8.64 अरब वर्षों के विशाल युगों की कल्पना की गई थी। बाद के काल में यवना जातक जैसे ग्रंथों और खगोलीय गणनाओं में दोनों संस्कृतियों के संपर्क के प्रमाण मिलते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन काल में ज्ञान का प्रवाह किसी एक देश तक सीमित नहीं था।

कुल मिलाकर 600 BCE से 300 CE का युग मानव इतिहास का वह स्वर्णिम काल था जब माउंट ओलिंपस और माउंट कैलाश जैसे दिव्य पर्वतों ने इंसानी चेतना, कला, धर्म और महाकाव्यों को अमिट प्रेरणा दी। इन दोनों महान परंपराओं का अध्ययन हमें सिखाता है कि भूगोल और भाषा की दूरियों के बावजूद, न्याय, कर्तव्य, प्रेम, त्याग और सत्य की खोज में मानव मन की मूल भावनाएँ सदैव एक समान रही हैं।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/26rod2fk 

2. https://tinyurl.com/27ty54gd 

3. https://tinyurl.com/22pwhkwb 

4. https://tinyurl.com/26oa78so 

5. https://tinyurl.com/yznebdk9 

6. https://tinyurl.com/29lwc3s2 

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