12,000 वर्ष पूर्व हमारे क्षेत्र की अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों में कैसे पनपी एक उत्कृष्ट संस्कृति

सभ्यता : 10000 ई.पू. से 2000 ई.पू.
10-01-2026 09:05 AM
12,000 वर्ष पूर्व हमारे क्षेत्र की अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों में कैसे पनपी एक उत्कृष्ट संस्कृति

जब भी हम शाहजहांपुर का नाम लेते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में मुगल काल की इमारतें या आजादी की लड़ाई लड़ने वाले शहीदों की तस्वीरें ही आती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस जिले की मिट्टी के नीचे इतिहास का एक ऐसा पन्ना भी दबा है, जो हमें किताबों में लिखे इतिहास से हजारों साल पीछे ले जाता है? रामगंगा, गर्रा और देवहा जैसी नदियों की गोद में बसे इस इलाके में इंसानी बसावट का इतिहास करीब 12,000 साल पुराना है। भरोसेमंद रिपोर्ट्स और निगोही में मिले पुराने अवशेषों ने यह साबित कर दिया है कि जब दुनिया की बड़ी-बड़ी सभ्यताएं बन रही थीं, ठीक उसी वक्त शाहजहांपुर की नदियों के किनारे आदिमानव अपनी बस्तियाँ बसा रहा था।

आदिमानवों ने रहने के लिए इसी इलाके को क्यों चुना?
शाहजहांपुर की बनावट और यहाँ का भूगोल ही इसकी पुरानी सभ्यता की असली वजह है। यह जिला गंगा के विशाल मैदान का हिस्सा है और हिमालय की तराई के दक्षिण में बसा है। यहाँ की जमीन नदियों द्वारा बहाकर लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से बनी है। भौगोलिक सबूत बताते हैं कि उस जमाने के इंसानों ने रहने के लिए इस 'गलियारे' को इसलिए चुना क्योंकि यह उनके लिए सबसे सुरक्षित था और यहाँ संसाधनों की कोई कमी नहीं थी।

अगर हम इतिहास में थोड़ा और पीछे जाएं, तो मध्य पाषाण काल यानी 'मेसोलिथिक' युग में यहाँ का नजारा बिल्कुल अलग था। उस समय गंगा के मैदानी इलाकों में इंसानों के छोटे-छोटे समूह रहते थे। ये लोग एक जगह घर बनाकर नहीं रहते थे, बल्कि घुमंतू जीवन जीते थे और नदियों के किनारे अपने कच्चे डेरे डालते थे। पुराने दस्तावेज बताते हैं कि शाहजहांपुर के इन इलाकों में शिकार करना और मछली पकड़ना ही उनकी जिंदगी का मुख्य सहारा था। उस समय का इंसान पत्थर के बहुत छोटे औजार इस्तेमाल करता था, जो आकार में भले ही छोटे थे लेकिन उनकी धार बहुत तेज होती थी।

नदियाँ यहाँ की जीवनरेखा क्यों मानी जाती हैं?
नदियों का पूरा जाल शाहजहांपुर की जान रहा है।रामगंगा नदी का जाल यहाँ के पूरे वातावरण को संतुलित करता है। रामगंगा के साथ गर्रा और देवहा जैसी सहायक नदियाँ इस मैदानी इलाके में टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर बहती हैं। नदियों के जानकार बताते हैं कि पुराने समय में जब मानसूनी बाढ़ आती थी, तो ये नदियाँ अपने किनारों पर बहुत उपजाऊ मिट्टी छोड़ जाती थीं। इन्हीं नदियों के प्राकृतिक और ऊंचे किनारों पर शुरुआती इंसानों ने अपने पहले चूल्हे जलाए और बस्तियाँ बसाना शुरू किया।

इंसान ने कब सीखा खेती करना और तांबे का इस्तेमाल?
जैसे-जैसे वक्त बीता, शाहजहांपुर का इंसान शिकार से आगे बढ़ा और उसने खेती-बाड़ी व पशुपालन की तरफ कदम बढ़ाए। करीब 3,000 ईसा पूर्व के आसपास, यह इलाका 'गेरूवर्णी मृदभांड' (Ochre Coloured Pottery - OCP) संस्कृति का गवाह बना। यह ताम्रपाषाण काल का वह दौर था जब इंसान ने मिट्टी के बर्तनों को खास गेरुए रंग से रंगना और तांबे का इस्तेमाल करना सीख लिया था। ऐतिहासिक शोध साफ़ कहते हैं कि इस संस्कृति के विकास में शाहजहांपुर एक बहुत ही अहम कड़ी है।

निगोही की खोज ने इतिहास में कौन सा नया मोड़ लाया?
शाहजहांपुर के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव निगोही क्षेत्र की खोज से आया। शोधकर्ताओं ने यहाँ मिले अवशेषों को करीब 2400 ईसा पूर्व (आज से 4,400 साल पुराना) का बताया है। निगोही में मिली चीजों में तांबे के औजार और ओसीपी शैली के बर्तन शामिल हैं। यह खोज पक्के तौर पर साबित करती है कि शाहजहांपुर का यह हिस्सा उस समय के बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तांबे की उपलब्धता और उससे बनी चीजें यह इशारा करती हैं कि यहाँ के लोग बहुत कुशल कारीगर थे।

अगर वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो शाहजहांपुर की मिट्टी में इतना पुराना इतिहास इसलिए छिपा है क्योंकि यहाँ 'क्वार्टरनरी एलोवियम' (Quarternary Allovium) मिट्टी है। नदियों के पुराने रास्तों (Palaeochannels) के पास अक्सर ऐसे ऐतिहासिक खजाने मिलते हैं। जानकारों का मानना है कि ओसीपी संस्कृति के लोग जानबूझकर ऐसी जगहों पर बसते थे, जहाँ उन्हें खेती के लिए पानी और बर्तन बनाने के लिए अच्छी मिट्टी आसानी से मिल सके।

क्या उस समय के लोग धातु विज्ञान में भी माहिर थे?
ताम्रपाषाण काल में शाहजहांपुर का समाज सिर्फ खेती-किसानी तक सीमित नहीं था। यहाँ तांबे के हथियारों और औजारों के ढेर मिलना इस बात का सबूत है कि वे लोग धातु विज्ञान (Metallurgy) में काफी आगे निकल चुके थे। पुरातत्व विभाग के सबूत बताते हैं कि इन जगहों पर अक्सर तांबे की कुल्हाड़ियाँ, तलवारें और इंसानी शक्ल जैसी आकृतियाँ मिलती हैं, जो उनकी उन्नत तकनीक को दिखाती हैं।

अगर हमें आज शाहजहांपुर के इस पुराने दौर को समझना है, तो हमें यहाँ की नदियों के स्वभाव को बारीकी से देखना होगा। पुरानी बस्तियों के निशान आज भी नदियों के उन ऊंचे टीलों पर मिल सकते हैं जहाँ बाढ़ का पानी सीधे नहीं पहुँचता था। अगर हम निगोही जैसे इलाकों में जमीन के नीचे दबे अवशेषों की सही से जांच करें, तो शाहजहांपुर के विकास की पूरी कहानी हमारे सामने आ जाएगी।

कुल मिलाकर, शाहजहांपुर का इतिहास सिर्फ राजाओं और नवाबों की कहानियों तक नहीं सिमटा है। इसकी जड़ों में वह आदिमानव और ताम्रयुगीन सभ्यता बसी है, जिसने गंगा-रामगंगा के इस उपजाऊ इलाके को अपनी कर्मभूमि बनाया। निगोही की खोज तो बस एक शुरुआत है, अभी बहुत कुछ जानना बाकी है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2axvf5da
https://tinyurl.com/29mj4lae
https://tinyurl.com/27rvpmb8
https://tinyurl.com/2blp4rud
https://tinyurl.com/2xlll84o
https://tinyurl.com/2cbcuaj5
https://tinyurl.com/2dmncflp

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