मोहम्मदी वालों के लिए खुशखबरी: अब दिल्ली जैसा आँखों का इलाज आपके घर के पास!
हम सब जानते हैं कि आंखें हमारे शरीर का सबसे अनमोल हिस्सा हैं। ये सिर्फ हमें बाहरी दुनिया का खूबसूरत नजारा ही नहीं दिखातीं, बल्कि हमारे जीवन के हर छोटे-बड़े काम को मुमकिन बनाती हैं। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली और सेहत की अनदेखी के चलते बड़ी तादाद में लोग आंखों की गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान साफ कहता है कि आंखों की बीमारियां केवल नजर को धुंधला नहीं करतीं, बल्कि अगर समय पर सही इलाज न मिले, तो ये हमेशा के लिए अंधेपन का कारण भी बन सकती हैं।मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी बीमारियां आंखों को कैसे नुकसान पहुंचाती हैं?स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, आज आंखों की कई बीमारियां घर-घर की कहानी बन गई हैं। इनमें मोतियाबिंद (Cataract), ग्लूकोमा (Glaucoma), और रेटिना से जुड़ी समस्याएं सबसे मुख्य हैं। मोतियाबिंद में हमारी आंखों का कुदरती लेंस धुंधला पड़ जाता है, जिससे धीरे-धीरे दिखाई देना कम हो जाता है। वहीं ग्लूकोमा, जिसे हम आम भाषा में 'काला मोतिया' भी कहते हैं, आंखों की नसों पर दबाव डालकर उन्हें चुपचाप खराब कर देता है। इसके अलावा, बढ़ती उम्र के साथ होने वाला मैकुलर डिजनरेशन (AMD) और शुगर के मरीजों में डायबिटिक रेटिनोपैथी सीधा रेटिना पर हमला करती है। बच्चों में अक्सर 'लेजी आई' (Amblyopia) की समस्या देखी जाती है, जिसका अगर बचपन में इलाज न हो, तो उनकी नजर हमेशा के लिए कमजोर रह सकती है।आप आंखों की गंभीर बीमारी के लक्षण और कारण कैसे पहचान सकते हैं?इन बीमारियों को वक्त रहते पहचानना बेहद जरूरी है। अगर आपको अचानक धुंधला दिखाई देने लगे, आंखों में तेज दर्द उठे, रोशनी के चारों तरफ घेरे (Halos) नजर आएं, या आंखें लगातार लाल रहें, तो सावधान हो जाएं—यह किसी गंभीर बीमारी की दस्तक हो सकती है। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, जैसे परिवार में बीमारी का इतिहास (आनुवंशिकता), बढ़ता प्रदूषण, डायबिटीज जैसी बीमारियां और सूरज की तेज किरणों का असर। कई बार आंखों में लगी पुरानी चोट या खाने में पोषक तत्वों की कमी भी नजर कमजोर होने की बड़ी वजह बनती है।अंधेपन को मिटाने के लिए सरकार का 'राष्ट्रीय कार्यक्रम' क्या कर रहा है?भारत से अंधेपन की समस्या को जड़ से खत्म करने और लोगों को जागरूक करने के लिए केंद्र सरकार पूरी ताकत से 'राष्ट्रीय अंधता एवं दृष्टि दोष नियंत्रण कार्यक्रम' (NPCBVI) चला रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत 1976 में शुरू हुए इस मिशन का एक ही मकसद है—देश में दृष्टि दोष के मामलों को कम करना। सरकार का पूरा जोर मोतियाबिंद के ऑपरेशन, बच्चों को विटामिन-ए (Vitamin A) की खुराक देने और स्कूलों में जाकर उनकी आंखों की जांच करने पर है।सरकार का लक्ष्य है कि समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी आंखों के इलाज की सुविधा मिले। इस प्रोग्राम के तहत मुफ्त नेत्र शिविर लगाए जाते हैं और गरीब मरीजों को मुफ्त चश्मा व इलाज दिया जाता है। सरकार अकेले नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों और एनजीओ (NGOs) के साथ मिलकर काम करती है ताकि दूर-दराज के गांवों तक रौशनी पहुंचाई जा सके। दृष्टि दोष के मामलों को कम करना ही इस योजना की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।'डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल' रोशनी बचाने में कैसे मदद कर रहा है?इसी सेवा भाव और आंखों की सुरक्षा की दिशा में 'डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल' (Dr. Shroff Charity Eye Hospital) एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। इस संस्थान का इतिहास दशकों पुराना है और इसकी नींव ही इंसानियत की सेवा के लिए रखी गई थी। एससीईएच (SCEH) का मिशन सिर्फ इलाज करना नहीं, बल्कि ऐसी बेहतरीन नेत्र चिकित्सा देना है जो हर किसी की जेब के मुफीद हो। संस्थान का सपना एक ऐसी दुनिया बनाना है जहाँ पैसे की कमी की वजह से किसी की आंखों की रोशनी न जाए। अपनी हाई-टेक मशीनों और तजुर्बेकार डॉक्टरों की टीम के साथ, यह अस्पताल लाखों लोगों की दुनिया रोशन कर रहा है।गाँव-देहात में अच्छी सुविधाओं की कमी को देखते हुए, डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल ने लखीमपुर खीरी के 'मोहम्मदी' में भी अपना केंद्र खोला है। मोहम्मदी मे स्थित यह अस्पताल आज इस पूरे इलाके के सबसे बेहतरीन नेत्र अस्पतालों में गिना जाता है। दिल्ली के बेस अस्पताल की देखरेख में चलने वाला यह केंद्र स्थानीय लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यहाँ न केवल आधुनिक मशीनों से आंखों की बारीक जांच होती है, बल्कि अनुभवी विशेषज्ञों की निगरानी में जटिल से जटिल ऑपरेशन भी किए जाते हैं।मोहम्मदी और आसपास के ग्रामीणों को अब अपनी आंखों के अच्छे इलाज के लिए दूर-दराज के बड़े शहरों में भटकने की जरूरत नहीं है। एससीईएच का मोहम्मदी केंद्र अपनी चैरिटी सेवाओं के लिए मशहूर है, जहाँ जरूरतमंदों का खास ख्याल रखा जाता है। अस्पताल की टीम मरीजों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है। यह अस्पताल सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांवों में जाकर लोगों को बीमारियों से बचने के तरीके भी सिखाता है, जो सरकारी मिशन के साथ कदम मिलाकर चलने की एक शानदार मिसाल है।कुल मिलाकर बात यह है कि जागरूकता और सही समय पर इलाज ही आंखों को बचाने का सबसे बड़ा हथियार है। जहाँ एक ओर क्लीवलैंड क्लिनिक जैसी वैश्विक संस्थाएं हमें सचेत करती हैं, वहीं भारत सरकार का अभियान और डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल जैसे संस्थान जमीन पर असली बदलाव ला रहे हैं। अगर हम लक्षणों को नजरअंदाज न करें और मौजूद सुविधाओं का फायदा उठाएं, तो रोशनी का यह अधिकार हर इंसान तक पहुँच सकता है।संदर्भ https://tinyurl.com/2alnbrnghttps://tinyurl.com/27ahj6bthttps://tinyurl.com/25v5lzxjhttps://tinyurl.com/2a2uhvy8
अवधारणा II - नागरिक की पहचान
भीड़ या नागरिक? शाहजहांपुर की गलियों से बिस्मिल की शहादत तक पहचान का असली सच!
जब हम शाहजहांपुर की गलियों से गुजरते हैं, तो हमें केवल एक शहर नहीं, बल्कि लाखों लोग दिखाई देते हैं जो इस देश की धड़कन हैं। लेकिन क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि एक 'भीड़' और एक 'नागरिक' में क्या फर्क होता है? शाहजहांपुर के इतिहास और आज के हालात को अगर हम 'नागरिक की पहचान' के नजरिए से देखें, तो यह एक बहुत लंबी यात्रा दिखाई देती है। यह सफर अंग्रेजों के जमाने की 'प्रजा' से शुरू होकर आधुनिक भारत के उस 'नागरिक' तक जाता है, जिसे अपनी पहचान साबित करनी होती है, जिसकी पंजीकरण होती है, और जो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जानता है।आज शाहजहांपुर में एक नागरिक होने का मतलब केवल यहाँ पैदा हो जाना नहीं है। इसका असली मतलब है “कागजों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना, सरकारी दफ्तरों के नक्शे में अपनी जगह बनाना, और लोकतंत्र में अपनी आवाज बुलंद करना।” यह कहानी उस अधिकार की है जिसे पाने के लिए हमारे पूर्वजों ने जान दी और जिसे बनाए रखने के लिए आज हम कतारों में खड़े होते हैं।नागरिकता: क्या यह कोई उपहार है या हमारा बुनियादी हक?इतिहास गवाह है कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका देश होता है। मानवाधिकारों की वैश्विक घोषणा का अनुच्छेद 15 साफ शब्दों में कहता है "हर किसी को राष्ट्रीयता का अधिकार है।" यह पंक्ति मानव इतिहास का एक अहम मोड़ थी। इसका मतलब था कि कोई भी इंसान बेनाम या बेघर नहीं हो सकता; उसे किसी न किसी देश का नागरिक होने का पूरा हक है। शाहजहांपुर का हर निवासी, इसी वैश्विक अधिकार के तहत अपनी पहचान का दावा करता है।जब भारत आजाद हुआ, तो हमारे संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि इस नए देश का नागरिक कौन होगा? भारतीय संविधान के भाग 2 के दस्तावेज हमें बताते हैं कि उन्होंने इसे कैसे तय किया। अनुच्छेद 5 से 11 ने ही वह नींव रखी, जिस पर आज पूरे देश की नागरिकता टिकी है। इसके बाद आया 'नागरिकता अधिनियम 1955', जो उस संवैधानिक वादे को एक कानूनी 'प्रक्रिया' में बदलता है। यह कानून बताता है कि आप नागरिकता कैसे पा सकते हैं। शाहजहांपुर के किसी भी व्यक्ति के लिए, भारतीय होने का कानूनी आधार यही दस्तावेज है।बिस्मिल की विरासत और आज के दफ्तरों की कतारें क्या कहती हैं?लेकिन नागरिकता केवल कानूनों की मोटी किताब नहीं है, यह एक जज्बा भी है। शाहजहांपुर में इस जज्बे का जन्म आजादी की लड़ाई के दौरान हुआ था। हमारे शहर के महान सपूत, राम प्रसाद बिस्मिल का संघर्ष हमें बताता है कि उस दौर में 'नागरिक' होने का मतलब था—विदेशी सत्ता को ठुकराना और अपनी आजादी को छीनना। बिस्मिल के लिए आजादी कोई भीख नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अधिकार था जिसे नागरिकों को खुद हासिल करना था।बिस्मिल के दौर से आगे बढ़कर, आज के शाहजहांपुर में नागरिकता का मतलब बदल गया है। अब इसका मतलब है—प्रशासन के साथ जुड़ना। सदर, पुवायां, तिलहर और जलालाबाद जैसी तहसीलें और विकास खंड ही आज 'सरकार' का असली चेहरा हैं। जब एक निवासी को जाति प्रमाण पत्र चाहिए होता है, या सरकारी योजनाओं का लाभ लेना होता है, तो वह इन्हीं दफ्तरों का दरवाजा खटखटाता है। यहीं पर एक आम इंसान सरकारी सेवा के नक्शे में दर्ज होता है और संविधान के बड़े-बड़े वादे एक प्रमाण पत्र के रूप में उसके हाथ में आते हैं।क्या आज हमारी पहचान चेहरे से नहीं, कागजों से होती है?आज के दौर की कड़वी सच्चाई यह है कि आपकी पहचान आपके चेहरे से ज्यादा आपके दस्तावेजों से होती है। आधार नामांकन की प्रक्रिया पूरी तरह से 'पहचान के प्रमाण' और 'पते के प्रमाण' पर टिकी है। अगर किसी के पास कागज नहीं हैं, तो सिस्टम के लिए वह अदृश्य है। शाहजहांपुर के आधार केंद्रों पर लगी लंबी लाइनें बताती हैं कि आज 'रोजमर्रा की नागरिकता' दस्तावेजों में कैद है।लेकिन इन सबके बीच, नागरिकता का सबसे बड़ा उत्सव है “भागीदारी।” और इस भागीदारी का सबूत है मतदाता सूची। शाहजहांपुर में जब मतदाता सूची को अपडेट करने का काम चलता है, तो बूथ लेवल ऑफिसर (Bootgh level officerr - BLO) की भागदौड़ यह तय करती है कि लोकतंत्र में किसकी गिनती होगी। जिसका नाम इस सूची में है, वही सरकार चुनने का असली हकदार है। जब BLO घर-घर जाकर सत्यापन करता है, तो वह असल में यह सुनिश्चित कर रहा होता है कि शाहजहांपुर का हर पात्र नागरिक लोकतंत्र की मुख्यधारा में शामिल हो सके।संदर्भ https://tinyurl.com/27uvfw6ahttps://tinyurl.com/2ckurfp2https://tinyurl.com/28tptl9ahttps://tinyurl.com/2yua4xylhttps://tinyurl.com/ygx7e9kzhttps://tinyurl.com/yp2y49ch
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
शहीद द्वार से बिस्मिल स्मारक तक: शाहजहाँपुर का वो सच जो शायद ही आप जानते हों!
अक्सर हम खूबसूरती का मतलब सिर्फ बाहरी चमक-दमक या सजावट से लगा लेते हैं। लेकिन, भारतीय सोच इससे कहीं गहरी है। हमारे यहाँ 'रस' का सिद्धांत है, जो हमें समझाता है कि कोई भी इमारत या कलाकृति सिर्फ अपनी बनावट से सुंदर नहीं होती, बल्कि उस अहसास से सुंदर होती है जो उसे देखकर हमारे भीतर पैदा होता है। इसे आसान शब्दों में समझें तो, जब हम किसी ऐतिहासिक इमारत को देखते हैं, तो हमें सिर्फ पत्थर नहीं दिखते, बल्कि उनसे जुड़ी गर्व, करुणा या भक्ति की भावना महसूस होती है। शाहजहाँपुर को समझने के लिए भी हमें इसी 'नजरिये' की जरूरत है।शाहजहाँपुर की खूबसूरती कोरी या सतही नहीं है; इस पर इतिहास की कई परतें चढ़ी हुई हैं। इतिहास गवाह है कि इस शहर की नींव मुगल काल में पड़ी थी। उस दौर में शहर बसाने के तौर-तरीकों और वास्तुकला में नज़ाकत (बारीकी) का बहुत ख्याल रखा जाता था। आज भी जब हम पुराने शहर की गलियों से गुजरते हैं, तो उस पुराने दौर की झलक साफ महसूस होती है। यही ऐतिहासिक बनावट आज भी शहर की पहचान है, जो शाहजहाँपुर को एक अलग और खास रूप देती है।शाहजहाँपुर में स्मारकों का मतलब सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि 'यादें' हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल आजादी की लड़ाई की जीती-जागती मिसाल हैं। शहर का 'शहीद द्वार' और 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' यहाँ के माथे पर तिलक की तरह सजते हैं। जब कोई शहीद द्वार के नीचे से निकलता है, तो उसे सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं दिखता, बल्कि उन क्रांतिकारियों की याद आती है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। सच कहें तो, इस शहर की असल सुंदरता यहाँ की देशभक्ति में ही है।खासकर, 'अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' की बात करें, तो यह जगह प्रकृति और इतिहास का एक सुंदर मिलन है। यह स्मारक महान क्रांतिकारी बिस्मिल जी को श्रद्धांजलि तो है ही, साथ ही शहर के बीचों-बीच बना एक शांत और हरा-भरा पार्क भी है। यहाँ का शांत माहौल हमें सिखाता है कि अपने नायकों का सम्मान कैसे किया जाए—सिर्फ मूर्तियों में नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवंत माहौल में जहाँ आकर मन को शांति मिले।पत्थरों के स्मारकों से अलग, शाहजहाँपुर की रौनक यहाँ के मेलों और त्योहारों में भी बदलती रहती है। हमारे त्योहार शहर को एक सजी-धजी आर्ट गैलरी में बदल देते हैं। हाल ही में हुआ 'शाहजहाँपुर महोत्सव 2025' इसका बेहतरीन उदाहरण है। 9 से 12 अक्टूबर 2025 तक चले इस महोत्सव ने शहर की फिजा ही बदल दी थी। सजे हुए मंच, रोशनी और कलाकारों की प्रस्तुतियों ने रोजमर्रा की जिंदगी में एक नई उमंग भर दी। ऐसे आयोजन बताते हैं कि शहर केवल इमारतों से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों के उत्साह से बनता है।अगर कोई शाहजहाँपुर की आत्मा को समझना चाहे, तो उसे इस शहर में पैदल सैर जरूर करनी चाहिए। एक पर्यटक अपनी यात्रा 'शहीद द्वार' से शुरू करे, फिर 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' की शांति को महसूस करे और अंत में यहाँ के ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन करे। यह सैर सिर्फ घूमना नहीं है, बल्कि शाहजहाँपुर के अतीत और वर्तमान को एक साथ जीने का तरीका है। यह हमें बताता है कि कैसे यह शहर अपने इतिहास को सहेजते हुए आज के दौर का जश्न मनाता है।अंत में, सवाल यह है कि हम इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसे बचाएं? इसके लिए हमें अपने शहर की देख-रेख पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। हमारे शहर के भित्ति चित्रों, ऐतिहासिक दरवाजों और मंदिरों की कला को सहेजना होगा। जो चीजें शाहजहाँपुर को खास बनाती हैं, उनकी सुरक्षा के साथ-साथ बेहतर लाइटिंग और साफ-सफाई से उन्हें और निखारना होगा। शहर की सुंदरता को बनाए रखना सिर्फ प्रशासन का काम नहीं, बल्कि हम सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।संदर्भ https://tinyurl.com/224ucvjyhttps://tinyurl.com/26hx3j6ghttps://tinyurl.com/244b4fchhttps://tinyurl.com/2y9pz9enhttps://tinyurl.com/2cwqud8ahttps://tinyurl.com/27l258hr
दृष्टि III - कला/सौंदर्य
शाहजहांपुर महोत्सव: जानें कैसे शहर की हर गली बन जाती है कला का मंच?
क्या सुंदरता केवल आंखों को भाने वाली सजावट है? या यह उससे कहीं अधिक गहरा अर्थ रखती है? जब हम किसी शहर की कला, उसके स्मारकों और उत्सवों को देखते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि सौंदर्य केवल बाहरी आवरण नहीं है, बल्कि यह वह माध्यम है जिसके जरिए समाज अपने मूल्यों और इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाता है। शाहजहांपुर के संदर्भ में, यह सौंदर्य यहाँ के पवित्र स्थलों, उद्यानों और शहीदों के स्मारकों में जीवित है।भारतीय परंपरा में कला और सौंदर्य को देखने का नजरिया बहुत गहरा है। भरत मुनि का 'रस सिद्धांत' हमें बताता है कि दृश्य रूप—चाहे वह कोई मूर्ति हो, इमारत हो या उद्यान—दर्शक को केवल उपयोगिता से परे ले जाकर एक गहरे अर्थ से जोड़ते हैं। 'रस' वह सौंदर्यबोध है जो किसी कृति को देखने पर हमारे भीतर उत्पन्न होता है। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपनी निजी चिंताओं से ऊपर उठकर एक सार्वभौमिक आनंद का अनुभव करता है। जब हम शाहजहांपुर की विरासत को देखते हैं, तो हम इसी 'रस' का अनुभव करते हैं, जहाँ ईंट-पत्थर केवल संरचना नहीं, बल्कि भावनाओं के वाहक बन जाते हैं।शहर के सौंदर्य को समझने के लिए हमें इसके अतीत की परतों को खोलना होगा। शाहजहांपुर का इतिहास और इसकी उत्पत्ति मुगल काल से जुड़ी है, जो आज भी यहाँ की गलियों और प्रतीकों में झलकती है। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शहर को एक विशिष्ट पहचान देती है। संस्कृति और विरासत के लिहाज से शाहजहांपुर एक समृद्ध जिला है। यहाँ की वास्तुकला और पुरानी बसावटें हमें उस दौर की याद दिलाती हैं जब इस शहर की नींव रखी गई थी। इतिहास का यह ताना-बाना आज के शाहजहांपुर के दृश्य परिदृश्य को आकार देता है, जिससे यह शहर केवल कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि एक जीवित इतिहास की किताब जैसा प्रतीत होता है।शाहजहांपुर में सार्वजनिक सौंदर्य का सीधा संबंध हमारी 'स्मृति' और स्वाधीनता संग्राम से है। यहाँ सुंदरता का अर्थ केवल सजावट नहीं, बल्कि बलिदान का सम्मान है। जब हम शहर में घूमते हैं, तो 'शहीद द्वार' और 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' जैसे प्रमुख स्थल हमारे सामने आते हैं। ये केवल ईंट-गारे से बनी संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि ये स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को एक 'चलने योग्य दृश्य परिदृश्य' में बदल देती हैं। विश्वसनीय प्रशासनिक स्रोतों द्वारा चिन्हित किए गए 'रुचि के स्थानों' में इन स्मारकों का विशेष महत्व है। यहाँ के प्रमुख मंदिर और ऐतिहासिक इमारतें उस 'कला/सौंदर्य मानचित्र' का हिस्सा हैं जो पर्यटकों और स्थानीय नागरिकों को गर्व का अनुभव कराते हैं।इस 'सौंदर्य मानचित्र' में सबसे महत्वपूर्ण स्थान 'अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' का है। यह स्मारक महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को समर्पित है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। यह स्मारक शाहजहांपुर शहर में ही स्थित है और इसे एक पार्क के रूप में विकसित किया गया है। यहाँ की हरियाली और शांत वातावरण इसे न केवल एक स्मृति स्थल बनाते हैं, बल्कि यह एक ऐसा स्थान भी है जहाँ लोग आकर सुकून के पल बिता सकते हैं और इतिहास से जुड़ सकते हैं। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने इसे एक दर्शनीय स्थल के रूप में संजोया है, ताकि युवा पीढ़ी अपने नायकों को याद रख सके। यह स्मारक इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक शहर अपने शहीदों की याद को सुंदरता के साथ संजो कर रख सकता है।शाहजहांपुर का सौंदर्य केवल स्थिर स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहाँ के उत्सवों में भी जीवंत हो उठता है। त्यौहार और मेले शहर के लिए 'अस्थायी दीर्घाओं' का काम करते हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण 'शाहजहांपुर महोत्सव' है। वर्ष 2025 में, शाहजहांपुर महोत्सव का आयोजन 9 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक गांधी भवन प्रेक्षागृह में किया जाना तय हुआ था। यह महोत्सव शहर के सांस्कृतिक कैलेंडर का एक प्रमुख हिस्सा है।महोत्सव के दौरान पूरा शहर एक नई रंगत में रंगा नजर आता है। शाहजहांपुर महोत्सव 2025 का आगाज सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक भव्य श्रृंखला के साथ हुआ था। इस दौरान आयोजित होने वाली सजावट, विभिन्न प्रतियोगिताएं और सार्वजनिक मंच शहर के स्वरूप को हर साल नया जीवन देते हैं। यह वह समय होता है जब शहर अपनी पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर कला और संस्कृति के एक भव्य मंच में तब्दील हो जाता है। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है और शहरवासी एक सामूहिक उत्सव का आनंद लेते हैं। ये आयोजन साबित करते हैं कि सुंदरता स्थिर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक भागीदारी से निखरती है।पर्यटन के नजरिए से देखें, तो शाहजहांपुर में एक 'ब्यूटी वॉक' की अपार संभावनाएं हैं। विश्वसनीय जिला पर्यटन स्रोतों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, शहर में कई ऐसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं जिन्हें एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। हनुमान धाम, कोरोनेशन पिलर और अन्य प्रमुख स्थलों को जोड़कर एक ऐसा मार्ग तैयार किया जा सकता है जो पर्यटकों को शहर की असली आत्मा से परिचित कराए। यह 'साइटसीइंग फ्रेमवर्क' न केवल बाहरी लोगों के लिए, बल्कि स्थानीय निवासियों के लिए भी अपने शहर को नए नजरिए से देखने का एक माध्यम बन सकता है।अंत में, शहर की सुंदरता को बनाए रखने और संवारने के लिए एक 'ब्यूटी ऑडिट' की आवश्यकता है। यह एक साधारण लेकिन प्रभावी प्रक्रिया हो सकती है। हमें अपने शहर की भित्ति चित्रों, ऐतिहासिक द्वारों, मजारों की कला और स्मृति स्थलों का दस्तावेजीकरण करना चाहिए। जो चीजें शाहजहांपुर को अनूठा बनाती हैं, उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही, इन स्थलों पर उचित प्रकाश व्यवस्था, स्पष्ट संकेत और साफ-सफाई पर ध्यान देकर हम अपने शहर के सौंदर्य बोध को और निखार सकते हैं। संदर्भ https://tinyurl.com/25pkf6cghttps://tinyurl.com/25oz3269https://tinyurl.com/2dbb2p7uhttps://tinyurl.com/253sghythttps://tinyurl.com/24yo6v3uhttps://tinyurl.com/2cu3f5fjhttps://tinyurl.com/2cv523ex
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
21 मेगावाट बिजली और गन्ने के खेत: क्या शाहजहांपुर बन रहा है यूपी का नया एनर्जी हब?
जब हम 'शहरीकरण' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारी आँखों के सामने ऊँची इमारतें और चमकते मॉल आ जाते हैं। लेकिन अगर हम शाहजहांपुर को गौर से देखें, तो यहाँ शहर बनने की कहानी ईंट-गारे से नहीं, बल्कि 'ऊर्जा' से लिखी जा रही है। एक कस्बा या शहर तभी फैलता है जब वह अपने स्थानीय संसाधनों को बिजली, काम और रफ़्तार में बदल सके। शाहजहांपुर इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहाँ शहर केवल ऊर्जा की खपत नहीं करते, बल्कि बदलाव के इंजन बनते हैं। यहाँ के खेत और कारखाने मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं जहाँ गन्ने की फसल सिर्फ चीनी नहीं देती, बल्कि वह ईंधन भी देती है जो इस शहर के पहिए को घुमाता है।शाहजहांपुर की ऊर्जा को समझने के लिए हमें सबसे पहले इसकी जमीन को समझना होगा। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी और जलवायु गन्ने की खेती के लिए वरदान है। यह 'एग्रो-इकोलॉजी' (agro - ecology) ही वह बुनियाद है जिस पर जिले की पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है। यहाँ का शहरीकरण किसी बाहरी उद्योग के कारण नहीं, बल्कि इसी गन्ने की पट्टी के कारण हुआ है। यह एक ऐसा मॉडल है जो धीरे-धीरे खेती (क्रॉप इकोनॉमी - crop economy) को ऊर्जा (एनर्जी इकोनॉमी - energy economy) में बदल रहा है, बिना अपनी ग्रामीण जड़ों को काटे।गन्ने की खोई 'काला सोना' और बिजली में कैसे बदल जाती है?एक आम आदमी के लिए गन्ने का रस निकालने के बाद बचा हुआ अवशेष यानी 'खोई' कचरा हो सकता है, लेकिन शाहजहांपुर की चीनी मिलों के लिए यह 'काला सोना' है। 'बगास को-जनरेशन' एक ऐसी तकनीक है जिसमें चीनी मिलें गन्ने की खोई को जलाकर उच्च दबाव वाली भाप बनाती हैं। इस भाप से न केवल मिल की टर्बाइन (turbine) घूमती है, बल्कि इससे भारी मात्रा में बिजली भी पैदा होती है। यह कचरे से ऊर्जा बनाने का एक शानदार उदाहरण है जो शाहजहांपुर के विकास को 'सस्टेनेबल' यानी टिकाऊ बनाता है।इस तकनीक को जमीन पर देखना हो तो हमें शाहजहांपुर के पुवायां स्थित बजाज हिंदुस्तान शुगर (sugar) मिल की मकसूदापुर यूनिट को देखना चाहिए। इस इकाई में 21 मेगावाट का को-जनरेशन पावर प्लांट लगा हुआ है। यह 'कैप्टिव पावर' यानी अपनी बिजली खुद बनाने की क्षमता ही है जो इन मिलों को बिना रुके चलने में मदद करती है। जब मिल चलती है, तो आसपास के कस्बों में रोशनी रहती है और रोजगार का पहिया घूमता रहता है।क्या शहर की धड़कन चीनी मिलों के साथ चलती है?शाहजहांपुर में साल के 12 महीने एक जैसे नहीं होते; यहाँ का शहरी जीवन चीनी मिलों के 'पराई सत्र' (Crushing Season) के साथ धड़कता है। जैसे ही मिलें चालू होती हैं, सड़कों पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की कतारें लग जाती हैं। वेल्डिंग की दुकानें, मरम्मत केंद्र, ढाबे और ट्रांसपोर्ट का कारोबार अचानक तेज हो जाता है। जहाँ बिजली है और जहाँ कच्चा माल है, वहीं मजदूर और व्यापारी इकट्ठा होते हैं। यही वह प्रक्रिया है जो एक शांत ग्रामीण इलाके को एक व्यस्त कस्बे में बदल देती है।ऊर्जा का मतलब सिर्फ चीनी मिलें नहीं, बल्कि रेलवे और ग्रिड का विस्तार भी है। हाल ही में रोजा जंक्शन से बट वेल्डिंग प्लांट तक रेलवे लाइन के विद्युतीकरण का फैसला लिया गया है। यह नई ओवरहेड इलेक्ट्रिक लाइन बताती है कि शहर का माल ढुलाई सिस्टम अब डीजल से बिजली की ओर शिफ्ट हो रहा है। जब रेलवे लाइन बिजली से लैस होती है, तो उद्योगों के लिए व्यापार सस्ता और तेज हो जाता है।क्या हम विकास की कीमत अपने पर्यावरण से चुका रहे हैं?लेकिन विकास की इस दौड़ में हमें उन चुनौतियों को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे पर्यावरण पर मंडरा रही हैं। शाहजहांपुर के भूजल की स्थिति अब चिंताजनक होने लगी है क्योंकि चीनी मिलें और उद्योग भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करते हैं। हमें ऐसी तकनीकें अपनानी होंगी जो बिजली तो दें, लेकिन हवा और पानी को जहरीला न करें। शाहजहांपुर के लिए यह सवाल अहम है कि क्या हम अपनी 'ऊर्जा-समृद्धि' को पर्यावरण की कीमत पर बचा पाएंगे?अंत में, शाहजहांपुर की कहानी हमें यह सिखाती है कि ऊर्जा कोई अदृश्य चीज नहीं है जो तार में बहती है। यह वह ताकत है जो गन्ने के खेत को चीनी मिल से, और चीनी मिल को शहर के बाजार से जोड़ती है। शाहजहांपुर का शहरीकरण कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि एक 'ऊर्जा-चक्र' है जो हर साल गन्ने की फसल के साथ नया हो जाता है।संदर्भ https://tinyurl.com/29kh2tz4https://tinyurl.com/256w6ywhhttps://tinyurl.com/2b5rqym7https://tinyurl.com/2xnmm4ryhttps://tinyurl.com/yqpg5ybl
अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
पत्थरों से डिजिटल स्क्रीन तक: शाहजहांपुर की अनाज मंडी में कैसे बदल गया ईमानदारी का पैमाना?
शाहजहांपुर की अनाज मंडियों और गल्ला बाजारों में दिन की शुरुआत भले ही शोर-शराबे से होती हो, लेकिन इस पूरी अर्थव्यवस्था की असली डोर एक शांत यंत्र के हाथ में होती है और वह है 'तराजू'। यह केवल एक मशीन नहीं, बल्कि भरोसे का वह पैमाना है जहाँ कुछ ग्राम का हेर-फेर भी मुनाफा, सजा या आपसी विश्वास तय कर सकता है। शाहजहांपुर की पूरी अनाज मंडी इसी वजन और माप (weighing scale) पर टिकी है।पुराने जमाने में, भारत में वजन और लंबाई नापने की कोई एक व्यवस्था नहीं थी। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय नियमों का बोलबाला था। इसका सीधा मतलब था कि जो व्यक्ति नाप रहा है, उसी का गणित आखिरी माना जाता था। लेकिन पुरानी और नई व्यवस्था के बीच एक दिलचस्प पुल बना 'मन' (Maund)। यह वजन की एक ऐसी इकाई थी जो भारत के कई हिस्सों में चलती थी। जब आधुनिक मीट्रिक प्रणाली लागू हुई, तो सरकार ने पुरानी आदतों को नए मानकों में ढालने के लिए 'मन' को आधिकारिक तौर पर ठीक 37.3242 किलोग्राम (kg) के बराबर तय किया। यह आंकड़ा बताता है कि कैसे पुराने बाजार की भाषा को आधुनिक सप्लाई चेन का हिस्सा बनाया गया। यह बदलाव सिर्फ गणित का नहीं था, बल्कि परंपरा और आधुनिकता को एक ही तराजू पर तोलने का था।मीट्रिक प्रणाली और कानून ने बाजार का चेहरा कैसे बदला?भारत में जब 'मीट्रिकरण' (Metrication) या दशमलव प्रणाली आई, तो बाजार का पूरा चेहरा ही बदल गया। किलोग्राम और मीटर ने रोजमर्रा की खरीद-फरोख्त और सरकारी खरीद में अपनी पक्की जगह बना ली। सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि नाप-तौल अब दुकानदार की 'निजी आदत' नहीं रह गई, बल्कि यह एक 'सार्वजनिक नियम' बन गई। अब शाहजहांपुर हो या देश का कोई और कोना, सबके लिए एक किलो का मतलब एक ही है। इसने बाजारों और सरकारी कामकाज में एकरूपता ला दी।लेकिन सिर्फ मानक तय कर देना काफी नहीं था, उसे लागू करना भी जरूरी था। यहीं भूमिका आती है 'विधिक माप विज्ञान अधिनियम' (Legal Metrology Act) की। इस कानून ने तय किया कि बाजार में इस्तेमाल होने वाले हर बाट और तराजू का 'सत्यापन और मुहर' (stamping) लगवाना अनिवार्य होगा। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार अब बाजार के भीतर मौजूद है ताकि उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा हो सके। सरकारी विभाग, जिसे हम लीगल मेट्रोलॉजी कहते हैं, का काम ही यह पक्का करना है कि आपको पूरा सामान मिले। यह विभाग नियमित रूप से व्यापारियों के तोलने वाले उपकरणों की जांच करता है, ताकि ग्राहक के साथ धोखा न हो और पारदर्शिता बनी रहे।शाहजहांपुर में राशन की 'घटतौली' पर लगाम कैसे लगेगी?अब इस कहानी को शाहजहांपुर के जमीनी हालात से जोड़ते हैं। जिले की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। 'अमृत विचार' की रिपोर्ट बताती है कि राशन वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए कोटेदारों की दुकानों पर अब ई-वेइंग मशीन (इलेक्ट्रॉनिक तराजू) लगाने की योजना है।शाहजहांपुर में करीब 1,358 सरकारी राशन की दुकानें हैं। योजना के मुताबिक, इन सभी दुकानों को हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक कांटों से लैस किया जा रहा है, जो सीधे ई-पॉस (e-POS) मशीनों से जुड़े होंगे। इसका मकसद बिल्कुल साफ है 'घटतौली' (कम तोलने की चोरी) को जड़ से खत्म करना। अब तक राशन कम मिलने की शिकायतें आती थीं, लेकिन नई व्यवस्था में राशन का वजन सीधे मशीन रिकॉर्ड करेगी। जब तक मशीन सही वजन नहीं बताएगी, तब तक वितरण की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाएगी। यह तकनीक कोटेदारों और कार्डधारकों के बीच के विवाद को खत्म करने की दिशा में एक अहम कदम है।क्या तराजू सिर्फ वजन बताता है या जवाबदेही तय करता है?एक तराजू का सफर सिर्फ दुकान से खरीदकर लाने तक सीमित नहीं होता। उसका असली सफर तो उसके बाद शुरू होता है “उसका कैलिब्रेशन, उसका रोजमर्रा का इस्तेमाल, कभी-कभी उसका खराब होना, और उस पर उठने वाली शिकायतें।” शाहजहांपुर में हो रहा यह बदलाव हमें बताता है कि एक साधारण सा दिखने वाला माप यंत्र कैसे 'जवाबदेही' (accountability) का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।जब 1,358 दुकानों पर एक साथ इलेक्ट्रॉनिक मशीनें काम करेंगी, तो यह केवल अनाज तोलने की प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि यह उस भरोसे को तोलने की कोशिश होगी जो एक आम नागरिक और सरकारी सिस्टम के बीच होना चाहिए। शाहजहांपुर के गल्ला बाजारों से लेकर राशन की कतारों तक, 'वजन' अब सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि न्याय का प्रतीक बन रहा है।संदर्भ https://tinyurl.com/23hfl9s6https://tinyurl.com/24p6k4x8https://tinyurl.com/236htjurhttps://tinyurl.com/22zndodqhttps://tinyurl.com/2dxozgcghttps://tinyurl.com/yv52zukh
दृष्टि II - अभिनय कला
यूनेस्को वाली रामलीला: शाहजहाँपुर का मंच दुनिया में क्यों गूंज रहा है?
शाहजहांपुर का रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह शहर की आत्मा और उसकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का जीवित प्रमाण है। यह लेख हमें राष्ट्रीय स्तर पर 'संगीत नाटक अकादमी' से लेकर स्थानीय 'ओसीएफ रामलीला' और अब जापान-फिलीपींस जैसे देशों तक फैले इसके वैश्विक सफर तक ले जाएगा।इससे पहले कि हम शाहजहांपुर की गलियों और ओसीएफ के मैदानों की धूल फांकें, यह समझना जरूरी है कि हमारे देश में इन कलाओं की सांसें कैसे चलती हैं। भारत सरकार की 'संगीत नाटक अकादमी' (Sangeet Natak Akademi) किसी सरकारी दफ्तर से कहीं ज्यादा, हमारी संस्कृति की 'रक्षक' है । जिस तरह एक माली अपने बगीचे के हर फूल का ध्यान रखता है, ठीक उसी तरह यह अकादमी यह सुनिश्चित करती है कि भारत की रंग-बिरंगी कलाएं "चाहे वो शास्त्रीय हों या लोक" मुरझाने न पाएं। यही राष्ट्रीय ढांचा है जो शाहजहांपुर जैसे शहरों के कलाकारों को यह भरोसा देता है कि उनकी कला सुरक्षित है और उसका सम्मान किया जाएगा।अब हम राष्ट्रीय स्तर से उतरकर शाहजहांपुर के उस मंच की ओर चलते हैं, जिसकी मिट्टी में यहाँ के लोगों की यादें बसी हैं—'ओसीएफ रामलीला'। यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि शहर का अपना त्यौहार है जहाँ हर कोई भागीदार है। यहाँ के मेलों में जो मेहनत, कारीगरी और अभिनय दिखता है, वह बेमिसाल है। 'ओसीएफ रामलीला' का नाम सुनते ही शहरवासियों के चेहरे खिल उठते हैं, क्योंकि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक 'सार्वजनिक उत्सव' है जो पूरे शहर को एक सूत्र में पिरोता है।20 सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बार भी रामलीला की शुरुआत पूरे विधि-विधान और गणेश पूजन के साथ हुई । यह वह पल होता है जब पर्दा उठता है और शहर की हवा में एक अलग ही जोश भर जाता है। महीनों की मेहनत के बाद आयोजक और कलाकार इसी घड़ी का इंतजार करते हैं।रामलीला की गूंज केवल शाहजहांपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया ने इसका लोहा माना है। यूनेस्को (UNESCO) ने इसे 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा दिया है । यूनेस्को के मुताबिक, रामलीला केवल रामायण का मंचन नहीं है, बल्कि यह गीतों, कहानियों और संवादों के जरिए पूरे समाज को जोड़ने का एक तरीका है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ऐसा जश्न है, जो जाति और धर्म की दीवारों को गिरा देता है। शाहजहांपुर में जब रामलीला होती है, तो वह यूनेस्को की इसी परिभाषा को हकीकत में बदल देती है।रामलीला का मंचन देखना अपने आप में एक अनुभव है। 29 सितंबर 2025 की रिपोर्ट बताती है कि ओसीएफ रामलीला में 'सीता हरण' का दृश्य इतना भावुक था कि दर्शक दीर्घा में बैठा हर शख्स उस दर्द को महसूस कर रहा था । यह अभिनय की ताकत ही है जो सदियों पुरानी कहानी को आज भी हमारे दिलों के करीब रखती है।लेकिन मंच के पीछे भी एक दुनिया है जो अक्सर हमारी नजरों से ओझल रहती है। एक रामलीला को तैयार करने में रिहर्सल, वेशभूषा और पुतले बनाने वालों की मेहनत छिपी होती है। इसके इर्द-गिर्द एक पूरी 'मेला अर्थव्यवस्था' चलती है। जहाँ एक तरफ मंच पर राम-रावण का युद्ध चल रहा होता है, वहीं मैदान में कोई पिता अपने बच्चे को खिलौना दिला रहा होता है और कोई चाट-पकौड़े बेचकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहा होता है। यही शाहजहांपुर की असली और जीती-जागती तस्वीर है।अपनी परंपराओं को संजोने के साथ-साथ शाहजहांपुर का रंगमंच अब नई करवट ले रहा है। शहर के कलाकार अब केवल अपनी कहानियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सात समंदर पार की कलाओं को भी अपना रहे हैं। 10 दिसंबर 2025 की एक खास खबर के मुताबिक, अब यहाँ के थिएटर कलाकार जापान और फिलीपींस की रंगमंच शैलियों से रूबरू होंगे ।यह बदलाव एक बहुत बड़े सवाल का जवाब है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक कैसे बना जाए? जब शाहजहांपुर का कोई कलाकार जापानी कला की बारीकियों को अपनी रामलीला में शामिल करेगा, तो उससे एक अनूठा संगम पैदा होगा। यह साबित करता है कि हमारा शहर अब दुनिया से सीखने और दुनिया को अपनी कला सिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है। शाहजहांपुर का रंगमंच आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक हाथ में रामलीला की भव्य विरासत है और दूसरे हाथ में भविष्य की नई संभावनाएं।संदर्भ https://tinyurl.com/2beorrvthttps://tinyurl.com/24m9nt75https://tinyurl.com/289fjd4vhttps://tinyurl.com/2cu3f5fjhttps://tinyurl.com/ycq3seyrhttps://tinyurl.com/2b7r92gfhttps://tinyurl.com/2b3nzehd
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
शाही मुहर से डिजिटल सिग्नेचर तक: कैसे बदल गया शाहजहांपुर की कचहरी का 400 साल पुराना चेहरा?
जब हम किसी सरकारी दफ्तर या कचहरी की इमारत को देखते हैं, तो हमारी नजर अक्सर उसकी ऊँची दीवारों, मेहराबों और गुंबदों पर टिक जाती है। हमें लगता है कि 'वास्तुकला' बस यही ईंट और गाराहै। लेकिन अगर आप थोड़ा ध्यान से देखें, तो एक दफ्तर की असली बनावट उसकी दीवारों से नहीं, बल्कि उन औजारों से तय होती है जो उसके अंदर काम को चलाते हैं। शाहजहांपुर के दफ्तरों में एक खामोश लेकिन शक्तिशाली बदलाव हुआ है।यह सफर हाथ से बने कागज और स्याही की दवात से शुरू होकर, छपे हुए फॉर्म और टाइपराइटर की खटर"पटर से गुजरते हुए, आज कंप्यूटर के माउस और स्कैन की गई 'ई"फाइलों' तक आ पहुँचा है। यह केवल उपकरणों का बदलना नहीं है, बल्कि इसने कमरों के नक्शे, फर्नीचर की बनावट और यहाँ तक कि 'अधिकार' के मायने भी बदल दिए हैं। पहले जहाँ मुंशी जी की गद्दी होती थी, वहाँ अब कंप्यूटर टेबल है; यह बदलाव सिर्फ सजावट का नहीं, बल्कि काम करने के तरीके का है।कागज, छपाई और टाइपराइटर ने राज"काज को कैसे बदला?इतिहास बताता है कि प्रशासन तभी संभव हो पाया जब इंसान के पास अपनी बात दूर तक भेजने का जरिया आया। वह जरिया था-कागज। जब हाथ से बना कागज दफ्तरों में आया, तो उसने मौखिक आदेशों को लिखित दस्तावेजों में बदल दिया। शाहजहांपुर के पुराने रिकॉर्ड रूम इसी दौर की गवाही देते हैं। कागज ने ही लंबी दूरी के प्रशासन को मुमकिन बनाया, क्योंकि एक फरमान दिल्ली या लखनऊ से चलकर शाहजहांपुर तक बिना बदले पहुँच सकता था। लेकिन हाथ से लिखना धीमा था। प्रशासन को रफ़्तार तब मिली जब 'प्रिंटिंग' या छपाई का युग आया।जब आदेश और आवेदन पहले से छपे हुए फॉर्म के रूप में आने लगे, तो दफ्तरों का नजारा बदल गया। अब हर काम के लिए एक तय फॉर्मेट था। इसने प्रशासन को बड़े पैमाने पर काम करने की ताकत दी। शाहजहांपुर की तहसीलों और कलेक्ट्रेट में आज भी जो फॉर्म भरे जाते हैं, वे इसी बदलाव की देन हैं। फिर आया वह दौर जिसने भारतीय अदालतों और दफ्तरों को एक खास आवाज दी-"टाइपराइटर की 'खट"खट'।" टाइपराइटर भारतीय अदालतों की जीवनरेखा बन गया। इसने क्लर्क और बाबू के काम करने की रफ़्तार बढ़ा दी और दफ्तर के फर्नीचर को भी बदला-अब डेस्क मजबूत चाहिए थी और कुर्सी सीधी। यह मशीन सिर्फ लिखने का औजार नहीं थी, बल्कि यह सत्ता और आदेश की एक नई भाषा थी।क्या शाहजहांपुर शुरू से ही एक 'प्रशासनिक शहर' रहा है?शाहजहांपुर को इस बदलाव के उदाहरण के रूप में देखना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह शहर अपनी नींव से ही एक 'प्रशासनिक शहर' रहा है। इस शहर की स्थापना 1647 में शाहजहां के फरमान से हुई थी। बाद में, 1835 में यहाँ 'छावनी' की स्थापना की गई। यहाँ की पुरानी इमारतें और कलेक्ट्रेट सिर्फ ईंटों के ढांचे नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था के गवाह हैं जहाँ फाइलें, रजिस्टर और रिकॉर्ड रूम शहर के 'इंजन' की तरह काम करते थे।यहाँ का दैनिक जीवन इन दफ्तरों के खुलने और बंद होने से तय होता था। एक समय था जब फाइलों के ढेर और रजिस्टरों के बंडल ही किसी दफ्तर की शान माने जाते थे। रिकॉर्ड रूम में रखी धूल भरी फाइलें उस दौर की याद दिलाती हैं जब हर छोटी"बड़ी जानकारी को कागज पर दर्ज करना और उसे सहेजना ही प्रशासन का सबसे बड़ा काम था।आज 'ई"ऑफिस' के दौर में पुरानी आदतें कैसे बदल रही हैं?अब हम 2025 में खड़े हैं, और शाहजहांपुर के दफ्तरों में एक नई क्रांति दस्तक दे रही है। यह क्रांति है 'ई"ऑफिस'। उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी जिला कार्यालयों को पेपरलेस बनाने और फाइलों की भौतिक आवाजाही को रोकने का अभियान छेड़ रखा है। इसका मकसद है-देरी को कम करना, फाइलों के खोने का डर खत्म करना और 'बाबूगिरी' पर लगाम लगाना। अब दफ्तर की वास्तुकला फिर बदल रही है। जहाँ पहले धूल भरी फाइलों के ढेर होते थे, अब वहां स्कैनिंग हब और सर्वर रूम बन रहे हैं।लेकिन बदलाव इतना आसान नहीं होता। शाहजहांपुर के दफ्तरों में आज हम एक अजीब कशमकश देख सकते हैं। एक तरफ नई चमकदार मशीनें हैं, तो दूसरी तरफ वही पुरानी मुहरें और कागजों के बंडल। कर्मचारियों की आदतें इतनी जल्दी नहीं बदलतीं; आज भी डिजिटल फाइल के साथ तसल्ली के लिए उसका प्रिंटआउट लेने की पुरानी ललक कायम है। यह संक्रमण काल है, जहाँ 'आधिकारिक' होने का मतलब बदल रहा है-पहले जिस कागज पर ठप्पा लगा हो वही सच था, आज डिजिटल सिग्नेचर ही प्रमाण है। शाहजहांपुर की यह कहानी हमें बताती है कि दफ्तर सिर्फ काम करने की जगह नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सोच का आईना है। शाही मुहर से लेकर आज के डिजिटल क्लिक तक, हर उपकरण ने हमारे काम करने के तरीके को गढ़ा है।संदर्भ https://tinyurl.com/256fwo89https://tinyurl.com/2cu3f5fjhttps://tinyurl.com/25f5ff93https://tinyurl.com/2982z3fchttps://tinyurl.com/23yje9z3https://tinyurl.com/2clk4e7lhttps://tinyurl.com/2554pr8p
पर्वत, पहाड़ियाँ और पठार
शाहजहाँपुर का 'पहाड़ी' कनेक्शन: क्या आपके खेतों की मिट्टी हिमालय से चलकर आई है?
जब हम शाहजहांपुर की समतल जमीन पर खड़े होकर चारों ओर देखते हैं, तो हमें दूर-दूर तक सिर्फ सपाट खेत और आबादी नजर आती है। यहाँ कोई पहाड़ नहीं हैं, कोई ऊँची चट्टानें नहीं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे पैरों के नीचे की यह जमीन, हमारे खेतों की यह उपजाऊ मिट्टी, और हमारे शहर के बीच से बहती नदियाँ—ये सब एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं जो यहाँ से सैकड़ों किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ों में लिखी गई है?शाहजहांपुर भले ही भूगोल की किताबों में एक मैदानी जिला हो, लेकिन इसका अस्तित्व, इसका स्वभाव और इसका भविष्य उन पहाड़ों से तय होता है, जो हमें यहाँ से दिखाई भी नहीं देते। यह कहानी सिर्फ भूगोल की नहीं है, यह कहानी है उस मिट्टी के सफर की, जो पहाड़ों से टूटकर यहाँ बिछी और हमारे जीवन का आधार बनी। आज हम 'गर्रा' नदी के नजरिए से समझेंगे कि कैसे हमारा यह शहर असल में "गाद (silt) का एक पठार" है, जिसे नदियों ने परत-दर-परत बनाया है।विज्ञान हमें बहुत ही सरल शब्दों में बताता है कि पहाड़ कैसे बनते हैं। जब धरती की बड़ी-बड़ी परतें आपस में टकराती हैं, तो जमीन ऊपर उठती है और पहाड़ों का निर्माण होता है। लेकिन पहाड़ बनकर खड़े ही नहीं रहते। जैसे ही पहाड़ ऊपर उठते हैं, हवा, पानी और बर्फ उन पर अपना काम शुरू कर देते हैं। ये ताकतें पहाड़ों को धीरे-धीरे घिसती हैं, काटती हैं और चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों, रेत और मिट्टी में बदल देती हैं। यही वह मलबा या अवसाद है, जो नदियों के साथ नीचे की ओर बहता है। हमारा शाहजहांपुर और पूरा गंगा का मैदान इसी प्रक्रिया का नतीजा है। यह समतल जमीन पहले से ऐसी नहीं थी, बल्कि इसे लाखों सालों में हिमालय से आने वाली नदियों ने मिट्टी की परतें बिछाकर बनाया है। जिसे हम आज 'समतल' कहते हैं, वह असल में पहाड़ों की घिसी हुई चट्टानों का ही बदला हुआ रूप है।शाहजहांपुर जिला पूरी तरह से गंगा और उसकी सहायक नदियों के सिस्टम का हिस्सा है। यहाँ की मुख्य नदियाँ—रामगंगा, गर्रा, गोमती और खन्नौत—सिर्फ पानी बहने के रास्ते नहीं हैं, बल्कि ये इस जिले की निर्माता हैं। शाहजहांपुर की मिट्टी 'एल्यूवियल' यानी जलोढ़ मिट्टी है। यह वह मिट्टी है जिसे नदियाँ अपने साथ बहाकर लाती हैं। गर्रा नदी, जो इस जिले को बांटती हुई बहती है, इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी गवाह है। यह साबित करता है कि हमारा 'मैदानी भूगोल' पूरी तरह से पहाड़ी सिद्धांतों पर काम करता है।शाहजहांपुर के लोगों के लिए गर्रा नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं है। यह वह डोर है जो हमें पहाड़ों से जोड़ती है। हाल ही की घटनाओं ने हमें फिर याद दिलाया है कि हम पहाड़ों से कितने गहरे जुड़े हैं। जब पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश हुई और बांधों से पानी छोड़ा गया, तो उसका नतीजा यहाँ गर्रा नदी के जलस्तर में 1 मीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी के रूप में सामने आया। प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार नदी का बढ़ा हुआ पानी न सिर्फ किनारों को काटता है, बल्कि आसपास के इलाकों में खतरा भी पैदा करता है। यह घटना हमें बताती है कि 'पहाड़ी बारिश' और 'मैदानी बाढ़' का रिश्ता कितना सीधा है। पुलों के नीचे से बहता हुआ वह मटमैला पानी अपने साथ वही पहाड़ी मिट्टी ला रहा होता है, जो बाढ़ उतरने के बाद हमारे खेतों को नई जान देती है।जब नदियाँ बहती हैं, तो वे अपने किनारों पर मिट्टी जमा करके प्राकृतिक तटबंध बनाती हैं। इतिहास गवाह है कि समझदार बसावटें हमेशा इन्हीं थोड़ी ऊँची जगहों पर होती आई हैं ताकि बाढ़ से बचा जा सके। शाहजहांपुर का भूगोल भी इसी नियम का पालन करता है। ताज़ा दस्तावेज़ों में जिले की मिट्टी और भूजल का जो जिक्र है, वह साफ करता है कि यहाँ जमीन के नीचे पानी का जो भंडार है, वह भी इन्हीं रेतीली परतों में जमा है जो कभी नदियों ने बिछाई थीं। यानी, हमारे हैंडपंप से निकलने वाला पानी भी इन्हीं प्राचीन नदी-प्रणालियों का तोहफा है।हमारे किसान भाई अक्सर कहते हैं कि बाढ़ का पानी तबाही लाता है, लेकिन साथ ही 'सोना' भी छोड़ जाता है। यह सोना और कुछ नहीं, बल्कि वह नई गाद है जो नदियाँ अपने साथ लाती हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि गंगा का यह मैदानी इलाका दुनिया की सबसे उपजाऊ जमीनों में से एक इसलिए है क्योंकि यहाँ की मिट्टी लगातार 'रिन्यू' होती रहती है। शाहजहांपुर की लहलहाती फसलें इस बात का सबूत हैं कि पहाड़ों की जो चट्टानें वहां टूट रही हैं, वे यहाँ आकर हमारी रोटी का जरिया बन रही हैं। यह एक कुदरती चक्र है—पहाड़ का नुकसान, मैदान का फायदा बन जाता है।आज के दौर में जब हम शाहजहांपुर में नए पुल, रिवरफ्रंट या विकास की योजना बनाते हैं, तो हमें यह याद रखना पड़ता है कि हम एक 'जीवंत' भूगोल में रह रहे हैं। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत जो एक्शन प्लान बनाए गए हैं, उनमें सीवेज प्रबंधन और विकास की बातें शामिल हैं। लेकिन ये तमाम आधुनिक निर्माण तभी सफल हो सकते हैं जब हम नदी के स्वभाव को समझें। जब हम नदी के रास्ते में कंक्रीट की दीवारें खड़ी करते हैं, तो हम असल में उस प्राचीन सिस्टम से लड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं जिसने इस शहर को बनाया है।संदर्भ https://tinyurl.com/2bnvg7yahttps://tinyurl.com/2294nofmhttps://tinyurl.com/2b5rqym7https://tinyurl.com/2ckurfp2https://tinyurl.com/242vnam7https://tinyurl.com/22qdkze6https://tinyurl.com/2dxgrq82
मरुस्थल
'सोना उगलने वाली' शाहजहाँपुर की धरती क्यों हो रही है बंजर?
जब हम 'रेगिस्तान' शब्द सुनते हैं, तो हमारी आँखों के सामने राजस्थान के दूर-दूर तक फैले रेत के टीले, चिलचिलाती धूप और पानी की कमी की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हरे-भरे गंगा के मैदान में बसे हमारे शाहजहांपुर जिले के भीतर भी कई 'छोटे रेगिस्तान' छिपे हुए हैं? ये रेगिस्तान रेत के नहीं हैं, बल्कि यह खेतों पर बिछी उस सफेद, नमकीन परत के हैं जिसे हम स्थानीय भाषा में 'ऊसर' या 'रेह' कहते हैं। नक्शे पर शाहजहांपुर कोई रेगिस्तान नहीं है, लेकिन जमीन की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यहाँ कई इलाकों में खेतों के बीचों-बीच बंजर जमीन के ऐसे टुकड़े मिलते हैं जहाँ सफेद पपड़ी, सख्त मिट्टी और कमजोर फसलें दिखाई देती हैं, मानो खेत वीरान छोड़ दिए गए हों।यह समस्या केवल शाहजहांपुर की नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की एक बड़ी चुनौती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जमीन का वह हिस्सा है जो खराब जल निकासी और मिट्टी में सोडियम लवणों के जमाव के कारण बीमार हो गया है। इसे 'सोडिक लैंड' या ऊसर भूमि कहा जाता है। यह जमीन बिल्कुल किसी रेगिस्तान की तरह व्यवहार करती है। जिस तरह रेगिस्तान में जीवन पनपना मुश्किल होता है, वैसे ही इन खेतों में भी सोडियम की अधिकता के कारण पौधों की जड़ें सांस नहीं ले पातीं और फसलें दम तोड़ देती हैं। यह गंगा के मैदानी इलाके के भीतर पनप रहा एक 'इनलैंड डेजर्ट' यानी अंतर्देशीय रेगिस्तान है।मानव इतिहास बताता है कि जब-जब इंसान के सामने रेगिस्तान या बंजर जमीन जैसी चुनौतियां आईं, उसने नए रास्ते खोज निकाले। रेगिस्तानों में पानी की कमी ने ही इंसान को जल संरक्षण और मिट्टी के उपचार की नई तकनीकें खोजने के लिए मजबूर किया। ठीक यही तर्क आज शाहजहांपुर के उन किसानों के काम आ रहा है जो अपनी बंजर होती जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाने की जद्दोजहद में लगे हैं। आज हमारे किसान आधुनिक विज्ञान की मदद से जिप्सम, लीचिंग और नमक-सहिष्णु फसलों का उपयोग कर इस 'सफेद रेगिस्तान' को हरा-भरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।इस 'सफेद रेगिस्तान' से निपटने का तरीका जादुई नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक है। विशेषज्ञों ने इसके लिए एक सीधा और सरल तरीका सुझाया है। सबसे पहले खेत को समतल किया जाता है और उसके चारों ओर मेड़बंदी की जाती है। इसके बाद मिट्टी की जांच के आधार पर उसमें 'जिप्सम' (Gypsum) मिलाया जाता है। जिप्सम एक ऐसा खनिज है जो मिट्टी के कणों से चिपके हुए जहरीले सोडियम को हटा देता है। इसके बाद की प्रक्रिया को 'लीचिंग' कहते हैं। खेत में पानी भरकर खड़ा कर दिया जाता है। जिप्सम की वजह से मिट्टी का सोडियम पानी में घुल जाता है और फिर वह पानी जमीन के नीचे चला जाता है या नालियों के जरिए खेत से बाहर निकाल दिया जाता है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि सुधार के शुरुआती दौर में ऐसी फसलें लगानी चाहिए जो नमक को सह सकें, जैसे कि धान या ढैंचा।शाहजहांपुर में चल रही यह कवायद असल में उत्तर प्रदेश के एक बड़े मिशन का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में ऊसर भूमि सुधार एक बड़ा मुद्दा रहा है, जिसमें विश्व बैंक ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भरोसेमंद रिपोर्टों के मुताबिक यूपी में सोडिक भूमि की समस्या ने लाखों छोटे और सीमांत किसानों की रोजी-रोटी को प्रभावित किया था। विश्व बैंक द्वारा समर्थित परियोजनाओं ने न केवल बंजर जमीन को सुधारा, बल्कि वहां जल निकासी की व्यवस्था को भी दुरुस्त किया। इन परियोजनाओं के परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। जो जमीनें पहले वीरान पड़ी थीं, वहां सुधार के बाद फसलों की पैदावार में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। विश्वसनीय शोध भी पुष्टि करते हैं कि बड़े पैमाने पर चलाए गए इन सुधार कार्यक्रमों ने उत्पादकता बढ़ाने में सफलता हासिल की है।अब जरा अपने जिले, शाहजहांपुर की स्थिति पर गौर करें। आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि जिले में मिट्टी और खेती का स्वरूप कैसा है। यहाँ की प्रमुख फसलें गन्ना, धान और गेहूं हैं, लेकिन ऊसर या लवणीय मिट्टी की मौजूदगी किसानों के फैसलों को प्रभावित करती है। जिले का भूजल स्तर और मिट्टी की बनावट यह साबित करती है कि यहाँ 'रेगिस्तान' बनने का मतलब रेत के टीले नहीं हैं। यहाँ रेगिस्तान बनने का मतलब है—मिट्टी की संरचना का टूटना और उसके अंदर मौजूद कार्बनिक तत्वों का धीरे-धीरे खत्म होना। जब मिट्टी कार्बन खो देती है, तो वह बेजान हो जाती है। यही वह प्रक्रिया है जिसे वैज्ञानिक 'मरुस्थलीकरण' कहते हैं।हाल ही में आई मृदा परीक्षण की एक रिपोर्ट ने शाहजहांपुर के किसानों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। शाहजहांपुर की जिस धरती को 'सोना उगलने वाली' कहा जाता था, वह अब बंजर होने की कगार पर है। विशेषज्ञों की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि अगर हम नहीं संभले, तो हमारे खेत सचमुच के रेगिस्तान बन सकते हैं। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और खारेपन का बढ़ना यह संकेत दे रहा है कि जमीन अब थक चुकी है। हालांकि, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सही समय पर उठाए गए कदम इस 'सफेद रेगिस्तान' को वापस हरियाली में बदल सकते हैं। जरूरत है कि किसान अपनी मिट्टी की नियमित जांच करवाएं और जिप्सम का प्रयोग, हरी खाद की बुवाई और सही जल निकासी पर ध्यान दें।संदर्भ https://tinyurl.com/29yktuhphttps://tinyurl.com/25lvk9ufhttps://tinyurl.com/2cgt2ljwhttps://tinyurl.com/2ae6xry9https://tinyurl.com/2d5s3ovrhttps://tinyurl.com/2ynfkjot
कोशिका प्रकार के अनुसार वर्गीकरण
गन्ने की एक कोशिका से कैसे बचेगी, शाहजहांपुर के किसानों की कमाई?
शाहजहांपुर की पहचान हमेशा से चीनी और गन्ने की मिठास से रही है। लेकिन आज यहाँ के खेतों में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। अब गन्ने की खेती केवल किसान के पसीने और हल की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रयोगशाला (Lab) की बारीकियों और विज्ञान की समझ से जुड़ गई है। इस बदलाव के पीछे है—गन्ने के पौधे की एक नन्ही सी कोशिका, जिसे वैज्ञानिक 'मेरिस्टम' (Meristem) कहते हैं। शाहजहांपुर का यह मॉडल (model) आज देश के सामने मिसाल बन रहा है कि कैसे विज्ञान के जरिए किसानों की किस्मत बदली जा सकती है।अक्सर किसान इस बात से परेशान रहते हैं कि उनकी गन्ने की फसल में 'लाल सड़न' (Red Rot) या खतरनाक वायरस लग जाते हैं। मुश्किल यह है कि जब किसान पुराने गन्ने को ही बीज के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो ये बीमारियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती हैं। इसका समाधान गन्ने के सबसे ऊपरी हिस्से यानी 'शूट टिप' में छिपा है।इस हिस्से में मौजूद 'मेरिस्टम कोशिकाएं' बहुत ही अनोखी होती हैं। ये इतनी तेजी से बढ़ती और विभाजित होती हैं कि कोई भी वायरस उनकी रफ्तार का मुकाबला नहीं कर पाता। सरल शब्दों में कहें तो, वायरस जब तक इन नई कोशिकाओं को बीमार करने की कोशिश करता है, तब तक ये कोशिकाएं विभाजित होकर आगे निकल चुकी होती हैं। इसी वैज्ञानिक सच्चाई का फायदा उठाकर टिश्यू कल्चर के जरिए ऐसे पौधे तैयार किए जा रहे हैं जो पूरी तरह से रोगमुक्त और सेहतमंद होते हैं।शाहजहांपुर का 'उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद' (UPCSR), को इस वैज्ञानिक क्रांति का केंद्र माना जा रहा है। 1912 में स्थापित इस संस्थान का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। आज यहाँ टिश्यू कल्चर (Tissue Culture) की मदद से युद्धस्तर पर नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इसकी प्रक्रिया किसी नन्हे बच्चे की परवरिश जैसी है:शुरुआत (Lab Process): सबसे पहले गन्ने के ऊपरी हिस्से (Shoot tip) को सावधानी से निकाला जाता है। इसे लैब के अंदर 'एमएस माध्यम' (एक खास पोषक जेल) पर रखा जाता है, जहाँ ये नन्ही कोशिकाएं फलती-फूलती हैं।जड़ों का विकास: जब ये कोशिकाएं गुच्छों का रूप ले लेती हैं, तो इन्हें खास रसायनों में रखा जाता है ताकि इनकी मजबूत जड़ें निकल सकें।हार्डनिंग (Hardening): लैब का तापमान और बाहर का मौसम बहुत अलग होता है। इसलिए इन नाजुक पौधों को सीधे खेत में न लगाकर पहले बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाया जाता है, जिसे 'हार्डनिंग' कहते हैं।नर्सरी से खेत तक: अंत में, जब ये पौधे मजबूत हो जाते हैं, तो इन्हें नर्सरी में लगाया जाता है। यहाँ से ये किसानों के खेतों में जाने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं।सालों से किसान गन्ने के पुराने टुकड़ों को ही बीज की तरह बोते आए हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'वेजीटेव सीड केन' कहते हैं। लेकिन वक्त के साथ इस बीज की ताकत कम होने लगती है और बीमारियां इसे घेर लेती हैं। आज के दौर में सिर्फ खाद और पानी डालना काफी नहीं है, बल्कि 'बीज की गुणवत्ता' ही सबसे बड़ा हथियार है। लैब में तैयार किए गए इन बीजों से मोज़ेक वायरस (Mosaic Virus) जैसी बीमारियों का खतरा खत्म हो जाता है, जो पारंपरिक खेती में लगभग असंभव था।उत्तर प्रदेश सरकार और कृषि विभाग का विजन अब बिल्कुल साफ है। इस उन्नत तकनीक को सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रखना है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 के लिए प्रदेश में करीब 15.90 लाख (15 लाख 90 हजार) रोगमुक्त पौधे तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।यह केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का एक ठोस रास्ता है। जब बीज रोगमुक्त होगा, तो फसल की पैदावार बढ़ेगी और कीटनाशकों पर होने वाला फालतू खर्च बचेगा। शाहजहांपुर के साथ-साथ राजस्थान के चूरू और अन्य इलाकों के किसान भी, जो खेती में नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं, इस मॉडल से काफी कुछ सीख सकते हैं।जैसे-जैसे हम अगले फसली सीजन की ओर बढ़ रहे हैं, सबसे बड़ी चुनौती इस तकनीक को हर छोटे-बड़े किसान तक पहुँचाने की है। लक्ष्य सिर्फ पौधे उगाना नहीं, बल्कि किसानों के बीच वह भरोसा पैदा करना है कि लैब में तैयार यह छोटा सा पौधा उनके खेत की मिट्टी में 'सोना' उगाएगा। शाहजहांपुर का यह सफल प्रयोग बताता है कि जब तकनीक और परंपरा का संगम होता है, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि मुनाफे की गारंटी बन जाती है।सारांश https://tinyurl.com/298n9svnhttps://tinyurl.com/2yq37w4qhttps://tinyurl.com/28kqktq2https://tinyurl.com/28fdxu2vhttps://tinyurl.com/2yhycoqzhttps://tinyurl.com/23uzlzpg
सरीसृप
गर्रा नदी का 'खामोश शिकारी': क्या मगरमच्छों के साथ रहना मुमकिन है?
शाहजहांपुर की गर्रा नदी न केवल एक जलधारा है, बल्कि यह मगरमच्छों (Mugger crocodile) जैसे 'कीस्टोन' जीवों का एक सुरक्षित आवास भी है, जिनका रिहायशी इलाकों में आना नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की जीवंतता का संकेत है! यह लेख डर को जागरूकता में बदलते हुए मगरमच्छों के साथ सह-अस्तित्व के उस 'यूपी मॉडल' की चर्चा करता है, जो हमारी नदियों के संरक्षण के लिए अनिवार्य है।क्या गर्रा नदी की लहरों के नीचे कोई खामोश दुनिया हमारा इंतजार कर रही है?शाहजहांपुर जिला अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए मशहूर है, लेकिन इसकी एक और पहचान है जो अक्सर बाढ़ के दिनों में हमारे दरवाजों तक दस्तक देती है। यह पहचान है इसकी नदियों, खासकर गर्रा नदी में बसने वाले जलीय जीवों की। गर्रा नदी केवल पानी का बहाव नहीं है, बल्कि यह मगरमच्छों और कछुओं का एक 'छिपा हुआ घर' है। मानसून के दौरान जब नदी उफान पर होती है, तो अक्सर ये जीव पानी के साथ बहकर बस्तियों और नहरों के करीब आ जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम डर के साये में जिएं, या फिर जानकारी के साथ इन जीवों के साथ रहने का कोई रास्ता निकालें? यह केवल एक आपदा नहीं, बल्कि हमारी नदियों और इंसानी आबादी के बीच के उस पुराने रिश्ते की परीक्षा है, जिसे हमें फिर से समझने की जरूरत है।क्यों शाहजहांपुर का भूगोल मगरमच्छों के लिए एक 'पसंदीदा जन्नत' बना हुआ है?शाहजहांपुर की भौगोलिक बनावट इस कहानी की असली नींव है, क्योंकि गर्रा नदी पूरे जिले के परिदृश्य को दो खूबसूरत हिस्सों में बांटती है। यह विभाजन केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह नदी के मोड़ों पर शांत 'सैंडबार्स' (रेतीले टीले) और आर्द्रभूमियों (Wetlands) का निर्माण करता है, जो मगरमच्छों के लिए धूप सेंकने और अंडे देने की आदर्श जगहें हैं! जैसे-जैसे शहर फैल रहा है, नदी के ये शांत कोने ही इन जीवों के अस्तित्व का आखिरी सहारा बचे हैं। जुलाई 2024 में आई भीषण बाढ़ के दौरान जब एक मगरमच्छ गांव की दहलीज तक आ पहुँचा और डरे हुए ग्रामीणों ने उसे रस्सी से बांध लिया, तो उस घटना ने इस संघर्ष को पूरी तरह उजागर कर दिया। यह दिखाता है कि जब जंगली जीव और इंसान अचानक आमने-सामने होते हैं, तो जानकारी के अभाव में पहली प्रतिक्रिया हमेशा घबराहट और बचाव की होती है।गांव में मगरमच्छ का दिखना नदी की 'अच्छी सेहत' का सबसे बड़ा सबूत कैसे है?अक्सर हम मगरमच्छ को सिर्फ एक खतरनाक शिकारी मान लेते हैं, लेकिन विज्ञान कहता है कि वे नदी के 'डॉक्टर' या 'मैनेजर' हैं। नदी में इनकी मौजूदगी यह बताती है कि वहाँ मछलियों की संख्या पर्याप्त है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अभी भी सांस ले रहा है! ये 'कीस्टोन स्पीशीज' हैं, जिनका होना जलीय खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखता है। अगर गर्रा नदी में मगरमच्छ बचे हुए हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि नदी में प्रदूषण के बावजूद खुद को पुनर्जीवित करने की क्षमता अभी बाकी है। उत्तर प्रदेश का गंगा-रामगंगा तंत्र मीठे पानी के कछुओं का भी एक महत्वपूर्ण घर है, जिनकी रक्षा के लिए हमें उनके प्रजनन स्थलों को बचाना होगा।भ्रम (Fear)वैज्ञानिक तथ्य (Scientific Fact)मगरमच्छ इंसान का शिकार करने गांव आते हैं।बाढ़ के दौरान पानी के बहाव के साथ वे रास्ता भटककर नहरों में आ जाते हैं। नदी में मगरमच्छ होना खतरे की घंटी है।यह नदी की अच्छी सेहत और पर्याप्त भोजन (मछलियों) का प्रमाण है।कचरा फेंकने से कोई फर्क नहीं पड़ता।नदी किनारे फेंका गया मांस या कचरा शिकारियों को तट की ओर आकर्षित करता है। क्या दहशत छोड़कर 'नदी मित्र' बनना ही हमारे कल की असली चाबी है?मगरमच्छों के साथ संघर्ष को कम करने का सबसे बेहतरीन रास्ता 'यूपी मॉडल' है, जिसमें 'नदी मित्र' (River Friends) और सामुदायिक घोंसला संरक्षण जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। शाहजहांपुर के नदी तटों पर भी स्थानीय लोगों को शामिल कर उनके बीच जागरूकता फैलानी होगी कि नदी में कचरा या बचा हुआ भोजन न फेंकें, क्योंकि यह मांसाहारी जीवों को आबादी की ओर आकर्षित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, घबराहट और अज्ञानता को पीछे छोड़कर ही हम अपनी प्राचीन जल-विरासत को सुरक्षित रख सकते हैं। जब हम इन जीवों को शत्रु के बजाय नदी के रक्षक के रूप में देखना शुरू करेंगे, तभी शाहजहांपुर की ये नदियाँ अपने असली वैभव को प्राप्त कर सकेंगी। यह सह-अस्तित्व ही हमारे और इन जलीय शिकारियों के भविष्य का एकमात्र सुरक्षित रास्ता है।शाहजहांपुर की गर्रा नदी न केवल एक जलधारा है, बल्कि यह मगरमच्छों (Mugger crocodile) जैसे 'कीस्टोन' जीवों का एक सुरक्षित आवास भी है, जिनका रिहायशी इलाकों में आना नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की जीवंतता का संकेत है! यह लेख डर को जागरूकता में बदलते हुए मगरमच्छों के साथ सह-अस्तित्व के उस 'यूपी मॉडल' की चर्चा करता है, जो हमारी नदियों के संरक्षण के लिए अनिवार्य है।क्या गर्रा नदी की लहरों के नीचे कोई खामोश दुनिया हमारा इंतजार कर रही है?शाहजहांपुर जिला अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए मशहूर है, लेकिन इसकी एक और पहचान है जो अक्सर बाढ़ के दिनों में हमारे दरवाजों तक दस्तक देती है। यह पहचान है इसकी नदियों, खासकर गर्रा नदी में बसने वाले जलीय जीवों की। गर्रा नदी केवल पानी का बहाव नहीं है, बल्कि यह मगरमच्छों और कछुओं का एक 'छिपा हुआ घर' है। मानसून के दौरान जब नदी उफान पर होती है, तो अक्सर ये जीव पानी के साथ बहकर बस्तियों और नहरों के करीब आ जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम डर के साये में जिएं, या फिर जानकारी के साथ इन जीवों के साथ रहने का कोई रास्ता निकालें? यह केवल एक आपदा नहीं, बल्कि हमारी नदियों और इंसानी आबादी के बीच के उस पुराने रिश्ते की परीक्षा है, जिसे हमें फिर से समझने की जरूरत है।क्यों शाहजहांपुर का भूगोल मगरमच्छों के लिए एक 'पसंदीदा जन्नत' बना हुआ है?शाहजहांपुर की भौगोलिक बनावट इस कहानी की असली नींव है, क्योंकि गर्रा नदी पूरे जिले के परिदृश्य को दो खूबसूरत हिस्सों में बांटती है। यह विभाजन केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह नदी के मोड़ों पर शांत 'सैंडबार्स' (रेतीले टीले) और आर्द्रभूमियों (Wetlands) का निर्माण करता है, जो मगरमच्छों के लिए धूप सेंकने और अंडे देने की आदर्श जगहें हैं! जैसे-जैसे शहर फैल रहा है, नदी के ये शांत कोने ही इन जीवों के अस्तित्व का आखिरी सहारा बचे हैं। जुलाई 2024 में आई भीषण बाढ़ के दौरान जब एक मगरमच्छ गांव की दहलीज तक आ पहुँचा और डरे हुए ग्रामीणों ने उसे रस्सी से बांध लिया, तो उस घटना ने इस संघर्ष को पूरी तरह उजागर कर दिया। यह दिखाता है कि जब जंगली जीव और इंसान अचानक आमने-सामने होते हैं, तो जानकारी के अभाव में पहली प्रतिक्रिया हमेशा घबराहट और बचाव की होती है।गांव में मगरमच्छ का दिखना नदी की 'अच्छी सेहत' का सबसे बड़ा सबूत कैसे है?अक्सर हम मगरमच्छ को सिर्फ एक खतरनाक शिकारी मान लेते हैं, लेकिन विज्ञान कहता है कि वे नदी के 'डॉक्टर' या 'मैनेजर' हैं। नदी में इनकी मौजूदगी यह बताती है कि वहाँ मछलियों की संख्या पर्याप्त है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अभी भी सांस ले रहा है! ये 'कीस्टोन स्पीशीज' हैं, जिनका होना जलीय खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखता है। अगर गर्रा नदी में मगरमच्छ बचे हुए हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि नदी में प्रदूषण के बावजूद खुद को पुनर्जीवित करने की क्षमता अभी बाकी है। उत्तर प्रदेश का गंगा-रामगंगा तंत्र मीठे पानी के कछुओं का भी एक महत्वपूर्ण घर है, जिनकी रक्षा के लिए हमें उनके प्रजनन स्थलों को बचाना होगा।भ्रम (Fear)वैज्ञानिक तथ्य (Scientific Fact)मगरमच्छ इंसान का शिकार करने गांव आते हैं।बाढ़ के दौरान पानी के बहाव के साथ वे रास्ता भटककर नहरों में आ जाते हैं। नदी में मगरमच्छ होना खतरे की घंटी है।यह नदी की अच्छी सेहत और पर्याप्त भोजन (मछलियों) का प्रमाण है।कचरा फेंकने से कोई फर्क नहीं पड़ता।नदी किनारे फेंका गया मांस या कचरा शिकारियों को तट की ओर आकर्षित करता है। क्या दहशत छोड़कर 'नदी मित्र' बनना ही हमारे कल की असली चाबी है?मगरमच्छों के साथ संघर्ष को कम करने का सबसे बेहतरीन रास्ता 'यूपी मॉडल' है, जिसमें 'नदी मित्र' (River Friends) और सामुदायिक घोंसला संरक्षण जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। शाहजहांपुर के नदी तटों पर भी स्थानीय लोगों को शामिल कर उनके बीच जागरूकता फैलानी होगी कि नदी में कचरा या बचा हुआ भोजन न फेंकें, क्योंकि यह मांसाहारी जीवों को आबादी की ओर आकर्षित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, घबराहट और अज्ञानता को पीछे छोड़कर ही हम अपनी प्राचीन जल-विरासत को सुरक्षित रख सकते हैं। जब हम इन जीवों को शत्रु के बजाय नदी के रक्षक के रूप में देखना शुरू करेंगे, तभी शाहजहांपुर की ये नदियाँ अपने असली वैभव को प्राप्त कर सकेंगी। यह सह-अस्तित्व ही हमारे और इन जलीय शिकारियों के भविष्य का एकमात्र सुरक्षित रास्ता है।संदर्भ https://tinyurl.com/2dboes63https://tinyurl.com/2bhe4pvthttps://tinyurl.com/263suejvhttps://tinyurl.com/2dqbavkkhttps://tinyurl.com/25uparyyhttps://tinyurl.com/2294nofm
दृष्टि I - लेंस/फोटोग्राफी
11-01-2026 09:04 AM • Shahjahanpur-Hindi
मोहम्मदी वालों के लिए खुशखबरी: अब दिल्ली जैसा आँखों का इलाज आपके घर के पास!
हम सब जानते हैं कि आंखें हमारे शरीर का सबसे अनमोल हिस्सा हैं। ये सिर्फ हमें बाहरी दुनिया का खूबसूरत नजारा ही नहीं दिखातीं, बल्कि हमारे जीवन के हर छोटे-बड़े काम को मुमकिन बनाती हैं। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली और सेहत की अनदेखी के चलते बड़ी तादाद में लोग आंखों की गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान साफ कहता है कि आंखों की बीमारियां केवल नजर को धुंधला नहीं करतीं, बल्कि अगर समय पर सही इलाज न मिले, तो ये हमेशा के लिए अंधेपन का कारण भी बन सकती हैं।
मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी बीमारियां आंखों को कैसे नुकसान पहुंचाती हैं? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, आज आंखों की कई बीमारियां घर-घर की कहानी बन गई हैं। इनमें मोतियाबिंद (Cataract), ग्लूकोमा (Glaucoma), और रेटिना से जुड़ी समस्याएं सबसे मुख्य हैं। मोतियाबिंद में हमारी आंखों का कुदरती लेंस धुंधला पड़ जाता है, जिससे धीरे-धीरे दिखाई देना कम हो जाता है। वहीं ग्लूकोमा, जिसे हम आम भाषा में 'काला मोतिया' भी कहते हैं, आंखों की नसों पर दबाव डालकर उन्हें चुपचाप खराब कर देता है। इसके अलावा, बढ़ती उम्र के साथ होने वाला मैकुलर डिजनरेशन (AMD) और शुगर के मरीजों में डायबिटिक रेटिनोपैथी सीधा रेटिना पर हमला करती है। बच्चों में अक्सर 'लेजी आई' (Amblyopia) की समस्या देखी जाती है, जिसका अगर बचपन में इलाज न हो, तो उनकी नजर हमेशा के लिए कमजोर रह सकती है।
आप आंखों की गंभीर बीमारी के लक्षण और कारण कैसे पहचान सकते हैं? इन बीमारियों को वक्त रहते पहचानना बेहद जरूरी है। अगर आपको अचानक धुंधला दिखाई देने लगे, आंखों में तेज दर्द उठे, रोशनी के चारों तरफ घेरे (Halos) नजर आएं, या आंखें लगातार लाल रहें, तो सावधान हो जाएं—यह किसी गंभीर बीमारी की दस्तक हो सकती है। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, जैसे परिवार में बीमारी का इतिहास (आनुवंशिकता), बढ़ता प्रदूषण, डायबिटीज जैसी बीमारियां और सूरज की तेज किरणों का असर। कई बार आंखों में लगी पुरानी चोट या खाने में पोषक तत्वों की कमी भी नजर कमजोर होने की बड़ी वजह बनती है।
अंधेपन को मिटाने के लिए सरकार का 'राष्ट्रीय कार्यक्रम' क्या कर रहा है? भारत से अंधेपन की समस्या को जड़ से खत्म करने और लोगों को जागरूक करने के लिए केंद्र सरकार पूरी ताकत से 'राष्ट्रीय अंधता एवं दृष्टि दोष नियंत्रण कार्यक्रम' (NPCBVI) चला रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत 1976 में शुरू हुए इस मिशन का एक ही मकसद है—देश में दृष्टि दोष के मामलों को कम करना। सरकार का पूरा जोर मोतियाबिंद के ऑपरेशन, बच्चों को विटामिन-ए (Vitamin A) की खुराक देने और स्कूलों में जाकर उनकी आंखों की जांच करने पर है।
सरकार का लक्ष्य है कि समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी आंखों के इलाज की सुविधा मिले। इस प्रोग्राम के तहत मुफ्त नेत्र शिविर लगाए जाते हैं और गरीब मरीजों को मुफ्त चश्मा व इलाज दिया जाता है। सरकार अकेले नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों और एनजीओ (NGOs) के साथ मिलकर काम करती है ताकि दूर-दराज के गांवों तक रौशनी पहुंचाई जा सके। दृष्टि दोष के मामलों को कम करना ही इस योजना की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
'डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल' रोशनी बचाने में कैसे मदद कर रहा है? इसी सेवा भाव और आंखों की सुरक्षा की दिशा में 'डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल' (Dr. Shroff Charity Eye Hospital) एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। इस संस्थान का इतिहास दशकों पुराना है और इसकी नींव ही इंसानियत की सेवा के लिए रखी गई थी। एससीईएच (SCEH) का मिशन सिर्फ इलाज करना नहीं, बल्कि ऐसी बेहतरीन नेत्र चिकित्सा देना है जो हर किसी की जेब के मुफीद हो। संस्थान का सपना एक ऐसी दुनिया बनाना है जहाँ पैसे की कमी की वजह से किसी की आंखों की रोशनी न जाए। अपनी हाई-टेक मशीनों और तजुर्बेकार डॉक्टरों की टीम के साथ, यह अस्पताल लाखों लोगों की दुनिया रोशन कर रहा है।
गाँव-देहात में अच्छी सुविधाओं की कमी को देखते हुए, डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल ने लखीमपुर खीरी के 'मोहम्मदी' में भी अपना केंद्र खोला है। मोहम्मदी मे स्थित यह अस्पताल आज इस पूरे इलाके के सबसे बेहतरीन नेत्र अस्पतालों में गिना जाता है। दिल्ली के बेस अस्पताल की देखरेख में चलने वाला यह केंद्र स्थानीय लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यहाँ न केवल आधुनिक मशीनों से आंखों की बारीक जांच होती है, बल्कि अनुभवी विशेषज्ञों की निगरानी में जटिल से जटिल ऑपरेशन भी किए जाते हैं।
मोहम्मदी और आसपास के ग्रामीणों को अब अपनी आंखों के अच्छे इलाज के लिए दूर-दराज के बड़े शहरों में भटकने की जरूरत नहीं है। एससीईएच का मोहम्मदी केंद्र अपनी चैरिटी सेवाओं के लिए मशहूर है, जहाँ जरूरतमंदों का खास ख्याल रखा जाता है। अस्पताल की टीम मरीजों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है। यह अस्पताल सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांवों में जाकर लोगों को बीमारियों से बचने के तरीके भी सिखाता है, जो सरकारी मिशन के साथ कदम मिलाकर चलने की एक शानदार मिसाल है।
कुल मिलाकर बात यह है कि जागरूकता और सही समय पर इलाज ही आंखों को बचाने का सबसे बड़ा हथियार है। जहाँ एक ओर क्लीवलैंड क्लिनिक जैसी वैश्विक संस्थाएं हमें सचेत करती हैं, वहीं भारत सरकार का अभियान और डॉ. श्रॉफ चैरिटी आई हॉस्पिटल जैसे संस्थान जमीन पर असली बदलाव ला रहे हैं। अगर हम लक्षणों को नजरअंदाज न करें और मौजूद सुविधाओं का फायदा उठाएं, तो रोशनी का यह अधिकार हर इंसान तक पहुँच सकता है।
भीड़ या नागरिक? शाहजहांपुर की गलियों से बिस्मिल की शहादत तक पहचान का असली सच!
जब हम शाहजहांपुर की गलियों से गुजरते हैं, तो हमें केवल एक शहर नहीं, बल्कि लाखों लोग दिखाई देते हैं जो इस देश की धड़कन हैं। लेकिन क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि एक 'भीड़' और एक 'नागरिक' में क्या फर्क होता है? शाहजहांपुर के इतिहास और आज के हालात को अगर हम 'नागरिक की पहचान' के नजरिए से देखें, तो यह एक बहुत लंबी यात्रा दिखाई देती है। यह सफर अंग्रेजों के जमाने की 'प्रजा' से शुरू होकर आधुनिक भारत के उस 'नागरिक' तक जाता है, जिसे अपनी पहचान साबित करनी होती है, जिसकी पंजीकरण होती है, और जो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जानता है।
आज शाहजहांपुर में एक नागरिक होने का मतलब केवल यहाँ पैदा हो जाना नहीं है। इसका असली मतलब है “कागजों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना, सरकारी दफ्तरों के नक्शे में अपनी जगह बनाना, और लोकतंत्र में अपनी आवाज बुलंद करना।” यह कहानी उस अधिकार की है जिसे पाने के लिए हमारे पूर्वजों ने जान दी और जिसे बनाए रखने के लिए आज हम कतारों में खड़े होते हैं।
नागरिकता: क्या यह कोई उपहार है या हमारा बुनियादी हक? इतिहास गवाह है कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका देश होता है। मानवाधिकारों की वैश्विक घोषणा का अनुच्छेद 15 साफ शब्दों में कहता है "हर किसी को राष्ट्रीयता का अधिकार है।" यह पंक्ति मानव इतिहास का एक अहम मोड़ थी। इसका मतलब था कि कोई भी इंसान बेनाम या बेघर नहीं हो सकता; उसे किसी न किसी देश का नागरिक होने का पूरा हक है। शाहजहांपुर का हर निवासी, इसी वैश्विक अधिकार के तहत अपनी पहचान का दावा करता है।
जब भारत आजाद हुआ, तो हमारे संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि इस नए देश का नागरिक कौन होगा? भारतीय संविधान के भाग 2 के दस्तावेज हमें बताते हैं कि उन्होंने इसे कैसे तय किया। अनुच्छेद 5 से 11 ने ही वह नींव रखी, जिस पर आज पूरे देश की नागरिकता टिकी है। इसके बाद आया 'नागरिकता अधिनियम 1955', जो उस संवैधानिक वादे को एक कानूनी 'प्रक्रिया' में बदलता है। यह कानून बताता है कि आप नागरिकता कैसे पा सकते हैं। शाहजहांपुर के किसी भी व्यक्ति के लिए, भारतीय होने का कानूनी आधार यही दस्तावेज है।
बिस्मिल की विरासत और आज के दफ्तरों की कतारें क्या कहती हैं? लेकिन नागरिकता केवल कानूनों की मोटी किताब नहीं है, यह एक जज्बा भी है। शाहजहांपुर में इस जज्बे का जन्म आजादी की लड़ाई के दौरान हुआ था। हमारे शहर के महान सपूत, राम प्रसाद बिस्मिल का संघर्ष हमें बताता है कि उस दौर में 'नागरिक' होने का मतलब था—विदेशी सत्ता को ठुकराना और अपनी आजादी को छीनना। बिस्मिल के लिए आजादी कोई भीख नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अधिकार था जिसे नागरिकों को खुद हासिल करना था।
बिस्मिल के दौर से आगे बढ़कर, आज के शाहजहांपुर में नागरिकता का मतलब बदल गया है। अब इसका मतलब है—प्रशासन के साथ जुड़ना। सदर, पुवायां, तिलहर और जलालाबाद जैसी तहसीलें और विकास खंड ही आज 'सरकार' का असली चेहरा हैं। जब एक निवासी को जाति प्रमाण पत्र चाहिए होता है, या सरकारी योजनाओं का लाभ लेना होता है, तो वह इन्हीं दफ्तरों का दरवाजा खटखटाता है। यहीं पर एक आम इंसान सरकारी सेवा के नक्शे में दर्ज होता है और संविधान के बड़े-बड़े वादे एक प्रमाण पत्र के रूप में उसके हाथ में आते हैं।
क्या आज हमारी पहचान चेहरे से नहीं, कागजों से होती है? आज के दौर की कड़वी सच्चाई यह है कि आपकी पहचान आपके चेहरे से ज्यादा आपके दस्तावेजों से होती है। आधार नामांकन की प्रक्रिया पूरी तरह से 'पहचान के प्रमाण' और 'पते के प्रमाण' पर टिकी है। अगर किसी के पास कागज नहीं हैं, तो सिस्टम के लिए वह अदृश्य है। शाहजहांपुर के आधार केंद्रों पर लगी लंबी लाइनें बताती हैं कि आज 'रोजमर्रा की नागरिकता' दस्तावेजों में कैद है।
लेकिन इन सबके बीच, नागरिकता का सबसे बड़ा उत्सव है “भागीदारी।” और इस भागीदारी का सबूत है मतदाता सूची। शाहजहांपुर में जब मतदाता सूची को अपडेट करने का काम चलता है, तो बूथ लेवल ऑफिसर (Bootgh level officerr - BLO) की भागदौड़ यह तय करती है कि लोकतंत्र में किसकी गिनती होगी। जिसका नाम इस सूची में है, वही सरकार चुनने का असली हकदार है। जब BLO घर-घर जाकर सत्यापन करता है, तो वह असल में यह सुनिश्चित कर रहा होता है कि शाहजहांपुर का हर पात्र नागरिक लोकतंत्र की मुख्यधारा में शामिल हो सके।
शहीद द्वार से बिस्मिल स्मारक तक: शाहजहाँपुर का वो सच जो शायद ही आप जानते हों!
अक्सर हम खूबसूरती का मतलब सिर्फ बाहरी चमक-दमक या सजावट से लगा लेते हैं। लेकिन, भारतीय सोच इससे कहीं गहरी है। हमारे यहाँ 'रस' का सिद्धांत है, जो हमें समझाता है कि कोई भी इमारत या कलाकृति सिर्फ अपनी बनावट से सुंदर नहीं होती, बल्कि उस अहसास से सुंदर होती है जो उसे देखकर हमारे भीतर पैदा होता है। इसे आसान शब्दों में समझें तो, जब हम किसी ऐतिहासिक इमारत को देखते हैं, तो हमें सिर्फ पत्थर नहीं दिखते, बल्कि उनसे जुड़ी गर्व, करुणा या भक्ति की भावना महसूस होती है। शाहजहाँपुर को समझने के लिए भी हमें इसी 'नजरिये' की जरूरत है।
शाहजहाँपुर की खूबसूरती कोरी या सतही नहीं है; इस पर इतिहास की कई परतें चढ़ी हुई हैं। इतिहास गवाह है कि इस शहर की नींव मुगल काल में पड़ी थी। उस दौर में शहर बसाने के तौर-तरीकों और वास्तुकला में नज़ाकत (बारीकी) का बहुत ख्याल रखा जाता था। आज भी जब हम पुराने शहर की गलियों से गुजरते हैं, तो उस पुराने दौर की झलक साफ महसूस होती है। यही ऐतिहासिक बनावट आज भी शहर की पहचान है, जो शाहजहाँपुर को एक अलग और खास रूप देती है।
शाहजहाँपुर में स्मारकों का मतलब सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि 'यादें' हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल आजादी की लड़ाई की जीती-जागती मिसाल हैं। शहर का 'शहीद द्वार' और 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' यहाँ के माथे पर तिलक की तरह सजते हैं। जब कोई शहीद द्वार के नीचे से निकलता है, तो उसे सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं दिखता, बल्कि उन क्रांतिकारियों की याद आती है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। सच कहें तो, इस शहर की असल सुंदरता यहाँ की देशभक्ति में ही है।
खासकर, 'अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' की बात करें, तो यह जगह प्रकृति और इतिहास का एक सुंदर मिलन है। यह स्मारक महान क्रांतिकारी बिस्मिल जी को श्रद्धांजलि तो है ही, साथ ही शहर के बीचों-बीच बना एक शांत और हरा-भरा पार्क भी है। यहाँ का शांत माहौल हमें सिखाता है कि अपने नायकों का सम्मान कैसे किया जाए—सिर्फ मूर्तियों में नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवंत माहौल में जहाँ आकर मन को शांति मिले।
पत्थरों के स्मारकों से अलग, शाहजहाँपुर की रौनक यहाँ के मेलों और त्योहारों में भी बदलती रहती है। हमारे त्योहार शहर को एक सजी-धजी आर्ट गैलरी में बदल देते हैं। हाल ही में हुआ 'शाहजहाँपुर महोत्सव 2025' इसका बेहतरीन उदाहरण है। 9 से 12 अक्टूबर 2025 तक चले इस महोत्सव ने शहर की फिजा ही बदल दी थी। सजे हुए मंच, रोशनी और कलाकारों की प्रस्तुतियों ने रोजमर्रा की जिंदगी में एक नई उमंग भर दी। ऐसे आयोजन बताते हैं कि शहर केवल इमारतों से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों के उत्साह से बनता है।
अगर कोई शाहजहाँपुर की आत्मा को समझना चाहे, तो उसे इस शहर में पैदल सैर जरूर करनी चाहिए। एक पर्यटक अपनी यात्रा 'शहीद द्वार' से शुरू करे, फिर 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' की शांति को महसूस करे और अंत में यहाँ के ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन करे। यह सैर सिर्फ घूमना नहीं है, बल्कि शाहजहाँपुर के अतीत और वर्तमान को एक साथ जीने का तरीका है। यह हमें बताता है कि कैसे यह शहर अपने इतिहास को सहेजते हुए आज के दौर का जश्न मनाता है।
अंत में, सवाल यह है कि हम इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसे बचाएं? इसके लिए हमें अपने शहर की देख-रेख पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। हमारे शहर के भित्ति चित्रों, ऐतिहासिक दरवाजों और मंदिरों की कला को सहेजना होगा। जो चीजें शाहजहाँपुर को खास बनाती हैं, उनकी सुरक्षा के साथ-साथ बेहतर लाइटिंग और साफ-सफाई से उन्हें और निखारना होगा। शहर की सुंदरता को बनाए रखना सिर्फ प्रशासन का काम नहीं, बल्कि हम सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
शाहजहांपुर महोत्सव: जानें कैसे शहर की हर गली बन जाती है कला का मंच?
क्या सुंदरता केवल आंखों को भाने वाली सजावट है? या यह उससे कहीं अधिक गहरा अर्थ रखती है? जब हम किसी शहर की कला, उसके स्मारकों और उत्सवों को देखते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि सौंदर्य केवल बाहरी आवरण नहीं है, बल्कि यह वह माध्यम है जिसके जरिए समाज अपने मूल्यों और इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाता है। शाहजहांपुर के संदर्भ में, यह सौंदर्य यहाँ के पवित्र स्थलों, उद्यानों और शहीदों के स्मारकों में जीवित है।
भारतीय परंपरा में कला और सौंदर्य को देखने का नजरिया बहुत गहरा है। भरत मुनि का 'रस सिद्धांत' हमें बताता है कि दृश्य रूप—चाहे वह कोई मूर्ति हो, इमारत हो या उद्यान—दर्शक को केवल उपयोगिता से परे ले जाकर एक गहरे अर्थ से जोड़ते हैं। 'रस' वह सौंदर्यबोध है जो किसी कृति को देखने पर हमारे भीतर उत्पन्न होता है। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपनी निजी चिंताओं से ऊपर उठकर एक सार्वभौमिक आनंद का अनुभव करता है। जब हम शाहजहांपुर की विरासत को देखते हैं, तो हम इसी 'रस' का अनुभव करते हैं, जहाँ ईंट-पत्थर केवल संरचना नहीं, बल्कि भावनाओं के वाहक बन जाते हैं।
शहर के सौंदर्य को समझने के लिए हमें इसके अतीत की परतों को खोलना होगा। शाहजहांपुर का इतिहास और इसकी उत्पत्ति मुगल काल से जुड़ी है, जो आज भी यहाँ की गलियों और प्रतीकों में झलकती है। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शहर को एक विशिष्ट पहचान देती है। संस्कृति और विरासत के लिहाज से शाहजहांपुर एक समृद्ध जिला है। यहाँ की वास्तुकला और पुरानी बसावटें हमें उस दौर की याद दिलाती हैं जब इस शहर की नींव रखी गई थी। इतिहास का यह ताना-बाना आज के शाहजहांपुर के दृश्य परिदृश्य को आकार देता है, जिससे यह शहर केवल कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि एक जीवित इतिहास की किताब जैसा प्रतीत होता है।
शाहजहांपुर में सार्वजनिक सौंदर्य का सीधा संबंध हमारी 'स्मृति' और स्वाधीनता संग्राम से है। यहाँ सुंदरता का अर्थ केवल सजावट नहीं, बल्कि बलिदान का सम्मान है। जब हम शहर में घूमते हैं, तो 'शहीद द्वार' और 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' जैसे प्रमुख स्थल हमारे सामने आते हैं। ये केवल ईंट-गारे से बनी संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि ये स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को एक 'चलने योग्य दृश्य परिदृश्य' में बदल देती हैं। विश्वसनीय प्रशासनिक स्रोतों द्वारा चिन्हित किए गए 'रुचि के स्थानों' में इन स्मारकों का विशेष महत्व है। यहाँ के प्रमुख मंदिर और ऐतिहासिक इमारतें उस 'कला/सौंदर्य मानचित्र' का हिस्सा हैं जो पर्यटकों और स्थानीय नागरिकों को गर्व का अनुभव कराते हैं।
इस 'सौंदर्य मानचित्र' में सबसे महत्वपूर्ण स्थान 'अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' का है। यह स्मारक महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को समर्पित है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। यह स्मारक शाहजहांपुर शहर में ही स्थित है और इसे एक पार्क के रूप में विकसित किया गया है। यहाँ की हरियाली और शांत वातावरण इसे न केवल एक स्मृति स्थल बनाते हैं, बल्कि यह एक ऐसा स्थान भी है जहाँ लोग आकर सुकून के पल बिता सकते हैं और इतिहास से जुड़ सकते हैं। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने इसे एक दर्शनीय स्थल के रूप में संजोया है, ताकि युवा पीढ़ी अपने नायकों को याद रख सके। यह स्मारक इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक शहर अपने शहीदों की याद को सुंदरता के साथ संजो कर रख सकता है।
शाहजहांपुर का सौंदर्य केवल स्थिर स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहाँ के उत्सवों में भी जीवंत हो उठता है। त्यौहार और मेले शहर के लिए 'अस्थायी दीर्घाओं' का काम करते हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण 'शाहजहांपुर महोत्सव' है। वर्ष 2025 में, शाहजहांपुर महोत्सव का आयोजन 9 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक गांधी भवन प्रेक्षागृह में किया जाना तय हुआ था। यह महोत्सव शहर के सांस्कृतिक कैलेंडर का एक प्रमुख हिस्सा है।
महोत्सव के दौरान पूरा शहर एक नई रंगत में रंगा नजर आता है। शाहजहांपुर महोत्सव 2025 का आगाज सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक भव्य श्रृंखला के साथ हुआ था। इस दौरान आयोजित होने वाली सजावट, विभिन्न प्रतियोगिताएं और सार्वजनिक मंच शहर के स्वरूप को हर साल नया जीवन देते हैं। यह वह समय होता है जब शहर अपनी पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर कला और संस्कृति के एक भव्य मंच में तब्दील हो जाता है। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है और शहरवासी एक सामूहिक उत्सव का आनंद लेते हैं। ये आयोजन साबित करते हैं कि सुंदरता स्थिर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक भागीदारी से निखरती है।
पर्यटन के नजरिए से देखें, तो शाहजहांपुर में एक 'ब्यूटी वॉक' की अपार संभावनाएं हैं। विश्वसनीय जिला पर्यटन स्रोतों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, शहर में कई ऐसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं जिन्हें एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। हनुमान धाम, कोरोनेशन पिलर और अन्य प्रमुख स्थलों को जोड़कर एक ऐसा मार्ग तैयार किया जा सकता है जो पर्यटकों को शहर की असली आत्मा से परिचित कराए। यह 'साइटसीइंग फ्रेमवर्क' न केवल बाहरी लोगों के लिए, बल्कि स्थानीय निवासियों के लिए भी अपने शहर को नए नजरिए से देखने का एक माध्यम बन सकता है।
अंत में, शहर की सुंदरता को बनाए रखने और संवारने के लिए एक 'ब्यूटी ऑडिट' की आवश्यकता है। यह एक साधारण लेकिन प्रभावी प्रक्रिया हो सकती है। हमें अपने शहर की भित्ति चित्रों, ऐतिहासिक द्वारों, मजारों की कला और स्मृति स्थलों का दस्तावेजीकरण करना चाहिए। जो चीजें शाहजहांपुर को अनूठा बनाती हैं, उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही, इन स्थलों पर उचित प्रकाश व्यवस्था, स्पष्ट संकेत और साफ-सफाई पर ध्यान देकर हम अपने शहर के सौंदर्य बोध को और निखार सकते हैं।
21 मेगावाट बिजली और गन्ने के खेत: क्या शाहजहांपुर बन रहा है यूपी का नया एनर्जी हब?
जब हम 'शहरीकरण' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारी आँखों के सामने ऊँची इमारतें और चमकते मॉल आ जाते हैं। लेकिन अगर हम शाहजहांपुर को गौर से देखें, तो यहाँ शहर बनने की कहानी ईंट-गारे से नहीं, बल्कि 'ऊर्जा' से लिखी जा रही है। एक कस्बा या शहर तभी फैलता है जब वह अपने स्थानीय संसाधनों को बिजली, काम और रफ़्तार में बदल सके। शाहजहांपुर इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहाँ शहर केवल ऊर्जा की खपत नहीं करते, बल्कि बदलाव के इंजन बनते हैं। यहाँ के खेत और कारखाने मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं जहाँ गन्ने की फसल सिर्फ चीनी नहीं देती, बल्कि वह ईंधन भी देती है जो इस शहर के पहिए को घुमाता है।
शाहजहांपुर की ऊर्जा को समझने के लिए हमें सबसे पहले इसकी जमीन को समझना होगा। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी और जलवायु गन्ने की खेती के लिए वरदान है। यह 'एग्रो-इकोलॉजी' (agro - ecology) ही वह बुनियाद है जिस पर जिले की पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है। यहाँ का शहरीकरण किसी बाहरी उद्योग के कारण नहीं, बल्कि इसी गन्ने की पट्टी के कारण हुआ है। यह एक ऐसा मॉडल है जो धीरे-धीरे खेती (क्रॉप इकोनॉमी - crop economy) को ऊर्जा (एनर्जी इकोनॉमी - energy economy) में बदल रहा है, बिना अपनी ग्रामीण जड़ों को काटे।
गन्ने की खोई 'काला सोना' और बिजली में कैसे बदल जाती है? एक आम आदमी के लिए गन्ने का रस निकालने के बाद बचा हुआ अवशेष यानी 'खोई' कचरा हो सकता है, लेकिन शाहजहांपुर की चीनी मिलों के लिए यह 'काला सोना' है। 'बगास को-जनरेशन' एक ऐसी तकनीक है जिसमें चीनी मिलें गन्ने की खोई को जलाकर उच्च दबाव वाली भाप बनाती हैं। इस भाप से न केवल मिल की टर्बाइन (turbine) घूमती है, बल्कि इससे भारी मात्रा में बिजली भी पैदा होती है। यह कचरे से ऊर्जा बनाने का एक शानदार उदाहरण है जो शाहजहांपुर के विकास को 'सस्टेनेबल' यानी टिकाऊ बनाता है।
इस तकनीक को जमीन पर देखना हो तो हमें शाहजहांपुर के पुवायां स्थित बजाज हिंदुस्तान शुगर (sugar) मिल की मकसूदापुर यूनिट को देखना चाहिए। इस इकाई में 21 मेगावाट का को-जनरेशन पावर प्लांट लगा हुआ है। यह 'कैप्टिव पावर' यानी अपनी बिजली खुद बनाने की क्षमता ही है जो इन मिलों को बिना रुके चलने में मदद करती है। जब मिल चलती है, तो आसपास के कस्बों में रोशनी रहती है और रोजगार का पहिया घूमता रहता है।
क्या शहर की धड़कन चीनी मिलों के साथ चलती है? शाहजहांपुर में साल के 12 महीने एक जैसे नहीं होते; यहाँ का शहरी जीवन चीनी मिलों के 'पराई सत्र' (Crushing Season) के साथ धड़कता है। जैसे ही मिलें चालू होती हैं, सड़कों पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की कतारें लग जाती हैं। वेल्डिंग की दुकानें, मरम्मत केंद्र, ढाबे और ट्रांसपोर्ट का कारोबार अचानक तेज हो जाता है। जहाँ बिजली है और जहाँ कच्चा माल है, वहीं मजदूर और व्यापारी इकट्ठा होते हैं। यही वह प्रक्रिया है जो एक शांत ग्रामीण इलाके को एक व्यस्त कस्बे में बदल देती है।
ऊर्जा का मतलब सिर्फ चीनी मिलें नहीं, बल्कि रेलवे और ग्रिड का विस्तार भी है। हाल ही में रोजा जंक्शन से बट वेल्डिंग प्लांट तक रेलवे लाइन के विद्युतीकरण का फैसला लिया गया है। यह नई ओवरहेड इलेक्ट्रिक लाइन बताती है कि शहर का माल ढुलाई सिस्टम अब डीजल से बिजली की ओर शिफ्ट हो रहा है। जब रेलवे लाइन बिजली से लैस होती है, तो उद्योगों के लिए व्यापार सस्ता और तेज हो जाता है।
क्या हम विकास की कीमत अपने पर्यावरण से चुका रहे हैं? लेकिन विकास की इस दौड़ में हमें उन चुनौतियों को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे पर्यावरण पर मंडरा रही हैं। शाहजहांपुर के भूजल की स्थिति अब चिंताजनक होने लगी है क्योंकि चीनी मिलें और उद्योग भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करते हैं। हमें ऐसी तकनीकें अपनानी होंगी जो बिजली तो दें, लेकिन हवा और पानी को जहरीला न करें। शाहजहांपुर के लिए यह सवाल अहम है कि क्या हम अपनी 'ऊर्जा-समृद्धि' को पर्यावरण की कीमत पर बचा पाएंगे?
अंत में, शाहजहांपुर की कहानी हमें यह सिखाती है कि ऊर्जा कोई अदृश्य चीज नहीं है जो तार में बहती है। यह वह ताकत है जो गन्ने के खेत को चीनी मिल से, और चीनी मिल को शहर के बाजार से जोड़ती है। शाहजहांपुर का शहरीकरण कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि एक 'ऊर्जा-चक्र' है जो हर साल गन्ने की फसल के साथ नया हो जाता है।
पत्थरों से डिजिटल स्क्रीन तक: शाहजहांपुर की अनाज मंडी में कैसे बदल गया ईमानदारी का पैमाना?
शाहजहांपुर की अनाज मंडियों और गल्ला बाजारों में दिन की शुरुआत भले ही शोर-शराबे से होती हो, लेकिन इस पूरी अर्थव्यवस्था की असली डोर एक शांत यंत्र के हाथ में होती है और वह है 'तराजू'। यह केवल एक मशीन नहीं, बल्कि भरोसे का वह पैमाना है जहाँ कुछ ग्राम का हेर-फेर भी मुनाफा, सजा या आपसी विश्वास तय कर सकता है। शाहजहांपुर की पूरी अनाज मंडी इसी वजन और माप (weighing scale) पर टिकी है।
पुराने जमाने में, भारत में वजन और लंबाई नापने की कोई एक व्यवस्था नहीं थी। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय नियमों का बोलबाला था। इसका सीधा मतलब था कि जो व्यक्ति नाप रहा है, उसी का गणित आखिरी माना जाता था। लेकिन पुरानी और नई व्यवस्था के बीच एक दिलचस्प पुल बना 'मन' (Maund)। यह वजन की एक ऐसी इकाई थी जो भारत के कई हिस्सों में चलती थी। जब आधुनिक मीट्रिक प्रणाली लागू हुई, तो सरकार ने पुरानी आदतों को नए मानकों में ढालने के लिए 'मन' को आधिकारिक तौर पर ठीक 37.3242 किलोग्राम (kg) के बराबर तय किया। यह आंकड़ा बताता है कि कैसे पुराने बाजार की भाषा को आधुनिक सप्लाई चेन का हिस्सा बनाया गया। यह बदलाव सिर्फ गणित का नहीं था, बल्कि परंपरा और आधुनिकता को एक ही तराजू पर तोलने का था।
मीट्रिक प्रणाली और कानून ने बाजार का चेहरा कैसे बदला? भारत में जब 'मीट्रिकरण' (Metrication) या दशमलव प्रणाली आई, तो बाजार का पूरा चेहरा ही बदल गया। किलोग्राम और मीटर ने रोजमर्रा की खरीद-फरोख्त और सरकारी खरीद में अपनी पक्की जगह बना ली। सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि नाप-तौल अब दुकानदार की 'निजी आदत' नहीं रह गई, बल्कि यह एक 'सार्वजनिक नियम' बन गई। अब शाहजहांपुर हो या देश का कोई और कोना, सबके लिए एक किलो का मतलब एक ही है। इसने बाजारों और सरकारी कामकाज में एकरूपता ला दी।
लेकिन सिर्फ मानक तय कर देना काफी नहीं था, उसे लागू करना भी जरूरी था। यहीं भूमिका आती है 'विधिक माप विज्ञान अधिनियम' (Legal Metrology Act) की। इस कानून ने तय किया कि बाजार में इस्तेमाल होने वाले हर बाट और तराजू का 'सत्यापन और मुहर' (stamping) लगवाना अनिवार्य होगा। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार अब बाजार के भीतर मौजूद है ताकि उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा हो सके। सरकारी विभाग, जिसे हम लीगल मेट्रोलॉजी कहते हैं, का काम ही यह पक्का करना है कि आपको पूरा सामान मिले। यह विभाग नियमित रूप से व्यापारियों के तोलने वाले उपकरणों की जांच करता है, ताकि ग्राहक के साथ धोखा न हो और पारदर्शिता बनी रहे।
शाहजहांपुर में राशन की 'घटतौली' पर लगाम कैसे लगेगी? अब इस कहानी को शाहजहांपुर के जमीनी हालात से जोड़ते हैं। जिले की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। 'अमृत विचार' की रिपोर्ट बताती है कि राशन वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए कोटेदारों की दुकानों पर अब ई-वेइंग मशीन (इलेक्ट्रॉनिक तराजू) लगाने की योजना है।
शाहजहांपुर में करीब 1,358 सरकारी राशन की दुकानें हैं। योजना के मुताबिक, इन सभी दुकानों को हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक कांटों से लैस किया जा रहा है, जो सीधे ई-पॉस (e-POS) मशीनों से जुड़े होंगे। इसका मकसद बिल्कुल साफ है 'घटतौली' (कम तोलने की चोरी) को जड़ से खत्म करना। अब तक राशन कम मिलने की शिकायतें आती थीं, लेकिन नई व्यवस्था में राशन का वजन सीधे मशीन रिकॉर्ड करेगी। जब तक मशीन सही वजन नहीं बताएगी, तब तक वितरण की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाएगी। यह तकनीक कोटेदारों और कार्डधारकों के बीच के विवाद को खत्म करने की दिशा में एक अहम कदम है।
क्या तराजू सिर्फ वजन बताता है या जवाबदेही तय करता है? एक तराजू का सफर सिर्फ दुकान से खरीदकर लाने तक सीमित नहीं होता। उसका असली सफर तो उसके बाद शुरू होता है “उसका कैलिब्रेशन, उसका रोजमर्रा का इस्तेमाल, कभी-कभी उसका खराब होना, और उस पर उठने वाली शिकायतें।” शाहजहांपुर में हो रहा यह बदलाव हमें बताता है कि एक साधारण सा दिखने वाला माप यंत्र कैसे 'जवाबदेही' (accountability) का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।
जब 1,358 दुकानों पर एक साथ इलेक्ट्रॉनिक मशीनें काम करेंगी, तो यह केवल अनाज तोलने की प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि यह उस भरोसे को तोलने की कोशिश होगी जो एक आम नागरिक और सरकारी सिस्टम के बीच होना चाहिए। शाहजहांपुर के गल्ला बाजारों से लेकर राशन की कतारों तक, 'वजन' अब सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि न्याय का प्रतीक बन रहा है।
यूनेस्को वाली रामलीला: शाहजहाँपुर का मंच दुनिया में क्यों गूंज रहा है?
शाहजहांपुर का रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह शहर की आत्मा और उसकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का जीवित प्रमाण है। यह लेख हमें राष्ट्रीय स्तर पर 'संगीत नाटक अकादमी' से लेकर स्थानीय 'ओसीएफ रामलीला' और अब जापान-फिलीपींस जैसे देशों तक फैले इसके वैश्विक सफर तक ले जाएगा।
इससे पहले कि हम शाहजहांपुर की गलियों और ओसीएफ के मैदानों की धूल फांकें, यह समझना जरूरी है कि हमारे देश में इन कलाओं की सांसें कैसे चलती हैं। भारत सरकार की 'संगीत नाटक अकादमी' (Sangeet Natak Akademi) किसी सरकारी दफ्तर से कहीं ज्यादा, हमारी संस्कृति की 'रक्षक' है । जिस तरह एक माली अपने बगीचे के हर फूल का ध्यान रखता है, ठीक उसी तरह यह अकादमी यह सुनिश्चित करती है कि भारत की रंग-बिरंगी कलाएं "चाहे वो शास्त्रीय हों या लोक" मुरझाने न पाएं। यही राष्ट्रीय ढांचा है जो शाहजहांपुर जैसे शहरों के कलाकारों को यह भरोसा देता है कि उनकी कला सुरक्षित है और उसका सम्मान किया जाएगा।
अब हम राष्ट्रीय स्तर से उतरकर शाहजहांपुर के उस मंच की ओर चलते हैं, जिसकी मिट्टी में यहाँ के लोगों की यादें बसी हैं—'ओसीएफ रामलीला'। यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि शहर का अपना त्यौहार है जहाँ हर कोई भागीदार है। यहाँ के मेलों में जो मेहनत, कारीगरी और अभिनय दिखता है, वह बेमिसाल है। 'ओसीएफ रामलीला' का नाम सुनते ही शहरवासियों के चेहरे खिल उठते हैं, क्योंकि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक 'सार्वजनिक उत्सव' है जो पूरे शहर को एक सूत्र में पिरोता है।
20 सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बार भी रामलीला की शुरुआत पूरे विधि-विधान और गणेश पूजन के साथ हुई । यह वह पल होता है जब पर्दा उठता है और शहर की हवा में एक अलग ही जोश भर जाता है। महीनों की मेहनत के बाद आयोजक और कलाकार इसी घड़ी का इंतजार करते हैं।
रामलीला की गूंज केवल शाहजहांपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया ने इसका लोहा माना है। यूनेस्को (UNESCO) ने इसे 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा दिया है । यूनेस्को के मुताबिक, रामलीला केवल रामायण का मंचन नहीं है, बल्कि यह गीतों, कहानियों और संवादों के जरिए पूरे समाज को जोड़ने का एक तरीका है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ऐसा जश्न है, जो जाति और धर्म की दीवारों को गिरा देता है। शाहजहांपुर में जब रामलीला होती है, तो वह यूनेस्को की इसी परिभाषा को हकीकत में बदल देती है।
रामलीला का मंचन देखना अपने आप में एक अनुभव है। 29 सितंबर 2025 की रिपोर्ट बताती है कि ओसीएफ रामलीला में 'सीता हरण' का दृश्य इतना भावुक था कि दर्शक दीर्घा में बैठा हर शख्स उस दर्द को महसूस कर रहा था । यह अभिनय की ताकत ही है जो सदियों पुरानी कहानी को आज भी हमारे दिलों के करीब रखती है।
लेकिन मंच के पीछे भी एक दुनिया है जो अक्सर हमारी नजरों से ओझल रहती है। एक रामलीला को तैयार करने में रिहर्सल, वेशभूषा और पुतले बनाने वालों की मेहनत छिपी होती है। इसके इर्द-गिर्द एक पूरी 'मेला अर्थव्यवस्था' चलती है। जहाँ एक तरफ मंच पर राम-रावण का युद्ध चल रहा होता है, वहीं मैदान में कोई पिता अपने बच्चे को खिलौना दिला रहा होता है और कोई चाट-पकौड़े बेचकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहा होता है। यही शाहजहांपुर की असली और जीती-जागती तस्वीर है।
अपनी परंपराओं को संजोने के साथ-साथ शाहजहांपुर का रंगमंच अब नई करवट ले रहा है। शहर के कलाकार अब केवल अपनी कहानियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सात समंदर पार की कलाओं को भी अपना रहे हैं। 10 दिसंबर 2025 की एक खास खबर के मुताबिक, अब यहाँ के थिएटर कलाकार जापान और फिलीपींस की रंगमंच शैलियों से रूबरू होंगे ।
यह बदलाव एक बहुत बड़े सवाल का जवाब है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक कैसे बना जाए? जब शाहजहांपुर का कोई कलाकार जापानी कला की बारीकियों को अपनी रामलीला में शामिल करेगा, तो उससे एक अनूठा संगम पैदा होगा। यह साबित करता है कि हमारा शहर अब दुनिया से सीखने और दुनिया को अपनी कला सिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है। शाहजहांपुर का रंगमंच आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक हाथ में रामलीला की भव्य विरासत है और दूसरे हाथ में भविष्य की नई संभावनाएं।
शाही मुहर से डिजिटल सिग्नेचर तक: कैसे बदल गया शाहजहांपुर की कचहरी का 400 साल पुराना चेहरा?
जब हम किसी सरकारी दफ्तर या कचहरी की इमारत को देखते हैं, तो हमारी नजर अक्सर उसकी ऊँची दीवारों, मेहराबों और गुंबदों पर टिक जाती है। हमें लगता है कि 'वास्तुकला' बस यही ईंट और गाराहै। लेकिन अगर आप थोड़ा ध्यान से देखें, तो एक दफ्तर की असली बनावट उसकी दीवारों से नहीं, बल्कि उन औजारों से तय होती है जो उसके अंदर काम को चलाते हैं। शाहजहांपुर के दफ्तरों में एक खामोश लेकिन शक्तिशाली बदलाव हुआ है।
यह सफर हाथ से बने कागज और स्याही की दवात से शुरू होकर, छपे हुए फॉर्म और टाइपराइटर की खटर"पटर से गुजरते हुए, आज कंप्यूटर के माउस और स्कैन की गई 'ई"फाइलों' तक आ पहुँचा है। यह केवल उपकरणों का बदलना नहीं है, बल्कि इसने कमरों के नक्शे, फर्नीचर की बनावट और यहाँ तक कि 'अधिकार' के मायने भी बदल दिए हैं। पहले जहाँ मुंशी जी की गद्दी होती थी, वहाँ अब कंप्यूटर टेबल है; यह बदलाव सिर्फ सजावट का नहीं, बल्कि काम करने के तरीके का है।
कागज, छपाई और टाइपराइटर ने राज"काज को कैसे बदला? इतिहास बताता है कि प्रशासन तभी संभव हो पाया जब इंसान के पास अपनी बात दूर तक भेजने का जरिया आया। वह जरिया था-कागज। जब हाथ से बना कागज दफ्तरों में आया, तो उसने मौखिक आदेशों को लिखित दस्तावेजों में बदल दिया। शाहजहांपुर के पुराने रिकॉर्ड रूम इसी दौर की गवाही देते हैं। कागज ने ही लंबी दूरी के प्रशासन को मुमकिन बनाया, क्योंकि एक फरमान दिल्ली या लखनऊ से चलकर शाहजहांपुर तक बिना बदले पहुँच सकता था। लेकिन हाथ से लिखना धीमा था। प्रशासन को रफ़्तार तब मिली जब 'प्रिंटिंग' या छपाई का युग आया।
जब आदेश और आवेदन पहले से छपे हुए फॉर्म के रूप में आने लगे, तो दफ्तरों का नजारा बदल गया। अब हर काम के लिए एक तय फॉर्मेट था। इसने प्रशासन को बड़े पैमाने पर काम करने की ताकत दी। शाहजहांपुर की तहसीलों और कलेक्ट्रेट में आज भी जो फॉर्म भरे जाते हैं, वे इसी बदलाव की देन हैं। फिर आया वह दौर जिसने भारतीय अदालतों और दफ्तरों को एक खास आवाज दी-"टाइपराइटर की 'खट"खट'।" टाइपराइटर भारतीय अदालतों की जीवनरेखा बन गया। इसने क्लर्क और बाबू के काम करने की रफ़्तार बढ़ा दी और दफ्तर के फर्नीचर को भी बदला-अब डेस्क मजबूत चाहिए थी और कुर्सी सीधी। यह मशीन सिर्फ लिखने का औजार नहीं थी, बल्कि यह सत्ता और आदेश की एक नई भाषा थी।
क्या शाहजहांपुर शुरू से ही एक 'प्रशासनिक शहर' रहा है? शाहजहांपुर को इस बदलाव के उदाहरण के रूप में देखना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह शहर अपनी नींव से ही एक 'प्रशासनिक शहर' रहा है। इस शहर की स्थापना 1647 में शाहजहां के फरमान से हुई थी। बाद में, 1835 में यहाँ 'छावनी' की स्थापना की गई। यहाँ की पुरानी इमारतें और कलेक्ट्रेट सिर्फ ईंटों के ढांचे नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था के गवाह हैं जहाँ फाइलें, रजिस्टर और रिकॉर्ड रूम शहर के 'इंजन' की तरह काम करते थे।
यहाँ का दैनिक जीवन इन दफ्तरों के खुलने और बंद होने से तय होता था। एक समय था जब फाइलों के ढेर और रजिस्टरों के बंडल ही किसी दफ्तर की शान माने जाते थे। रिकॉर्ड रूम में रखी धूल भरी फाइलें उस दौर की याद दिलाती हैं जब हर छोटी"बड़ी जानकारी को कागज पर दर्ज करना और उसे सहेजना ही प्रशासन का सबसे बड़ा काम था।
आज 'ई"ऑफिस' के दौर में पुरानी आदतें कैसे बदल रही हैं? अब हम 2025 में खड़े हैं, और शाहजहांपुर के दफ्तरों में एक नई क्रांति दस्तक दे रही है। यह क्रांति है 'ई"ऑफिस'। उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी जिला कार्यालयों को पेपरलेस बनाने और फाइलों की भौतिक आवाजाही को रोकने का अभियान छेड़ रखा है। इसका मकसद है-देरी को कम करना, फाइलों के खोने का डर खत्म करना और 'बाबूगिरी' पर लगाम लगाना। अब दफ्तर की वास्तुकला फिर बदल रही है। जहाँ पहले धूल भरी फाइलों के ढेर होते थे, अब वहां स्कैनिंग हब और सर्वर रूम बन रहे हैं।
लेकिन बदलाव इतना आसान नहीं होता। शाहजहांपुर के दफ्तरों में आज हम एक अजीब कशमकश देख सकते हैं। एक तरफ नई चमकदार मशीनें हैं, तो दूसरी तरफ वही पुरानी मुहरें और कागजों के बंडल। कर्मचारियों की आदतें इतनी जल्दी नहीं बदलतीं; आज भी डिजिटल फाइल के साथ तसल्ली के लिए उसका प्रिंटआउट लेने की पुरानी ललक कायम है। यह संक्रमण काल है, जहाँ 'आधिकारिक' होने का मतलब बदल रहा है-पहले जिस कागज पर ठप्पा लगा हो वही सच था, आज डिजिटल सिग्नेचर ही प्रमाण है। शाहजहांपुर की यह कहानी हमें बताती है कि दफ्तर सिर्फ काम करने की जगह नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सोच का आईना है। शाही मुहर से लेकर आज के डिजिटल क्लिक तक, हर उपकरण ने हमारे काम करने के तरीके को गढ़ा है।
शाहजहाँपुर का 'पहाड़ी' कनेक्शन: क्या आपके खेतों की मिट्टी हिमालय से चलकर आई है?
जब हम शाहजहांपुर की समतल जमीन पर खड़े होकर चारों ओर देखते हैं, तो हमें दूर-दूर तक सिर्फ सपाट खेत और आबादी नजर आती है। यहाँ कोई पहाड़ नहीं हैं, कोई ऊँची चट्टानें नहीं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे पैरों के नीचे की यह जमीन, हमारे खेतों की यह उपजाऊ मिट्टी, और हमारे शहर के बीच से बहती नदियाँ—ये सब एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं जो यहाँ से सैकड़ों किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ों में लिखी गई है?
शाहजहांपुर भले ही भूगोल की किताबों में एक मैदानी जिला हो, लेकिन इसका अस्तित्व, इसका स्वभाव और इसका भविष्य उन पहाड़ों से तय होता है, जो हमें यहाँ से दिखाई भी नहीं देते। यह कहानी सिर्फ भूगोल की नहीं है, यह कहानी है उस मिट्टी के सफर की, जो पहाड़ों से टूटकर यहाँ बिछी और हमारे जीवन का आधार बनी। आज हम 'गर्रा' नदी के नजरिए से समझेंगे कि कैसे हमारा यह शहर असल में "गाद (silt) का एक पठार" है, जिसे नदियों ने परत-दर-परत बनाया है।
विज्ञान हमें बहुत ही सरल शब्दों में बताता है कि पहाड़ कैसे बनते हैं। जब धरती की बड़ी-बड़ी परतें आपस में टकराती हैं, तो जमीन ऊपर उठती है और पहाड़ों का निर्माण होता है। लेकिन पहाड़ बनकर खड़े ही नहीं रहते। जैसे ही पहाड़ ऊपर उठते हैं, हवा, पानी और बर्फ उन पर अपना काम शुरू कर देते हैं। ये ताकतें पहाड़ों को धीरे-धीरे घिसती हैं, काटती हैं और चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों, रेत और मिट्टी में बदल देती हैं। यही वह मलबा या अवसाद है, जो नदियों के साथ नीचे की ओर बहता है। हमारा शाहजहांपुर और पूरा गंगा का मैदान इसी प्रक्रिया का नतीजा है। यह समतल जमीन पहले से ऐसी नहीं थी, बल्कि इसे लाखों सालों में हिमालय से आने वाली नदियों ने मिट्टी की परतें बिछाकर बनाया है। जिसे हम आज 'समतल' कहते हैं, वह असल में पहाड़ों की घिसी हुई चट्टानों का ही बदला हुआ रूप है।
शाहजहांपुर जिला पूरी तरह से गंगा और उसकी सहायक नदियों के सिस्टम का हिस्सा है। यहाँ की मुख्य नदियाँ—रामगंगा, गर्रा, गोमती और खन्नौत—सिर्फ पानी बहने के रास्ते नहीं हैं, बल्कि ये इस जिले की निर्माता हैं। शाहजहांपुर की मिट्टी 'एल्यूवियल' यानी जलोढ़ मिट्टी है। यह वह मिट्टी है जिसे नदियाँ अपने साथ बहाकर लाती हैं। गर्रा नदी, जो इस जिले को बांटती हुई बहती है, इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी गवाह है। यह साबित करता है कि हमारा 'मैदानी भूगोल' पूरी तरह से पहाड़ी सिद्धांतों पर काम करता है।
शाहजहांपुर के लोगों के लिए गर्रा नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं है। यह वह डोर है जो हमें पहाड़ों से जोड़ती है। हाल ही की घटनाओं ने हमें फिर याद दिलाया है कि हम पहाड़ों से कितने गहरे जुड़े हैं। जब पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश हुई और बांधों से पानी छोड़ा गया, तो उसका नतीजा यहाँ गर्रा नदी के जलस्तर में 1 मीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी के रूप में सामने आया। प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार नदी का बढ़ा हुआ पानी न सिर्फ किनारों को काटता है, बल्कि आसपास के इलाकों में खतरा भी पैदा करता है। यह घटना हमें बताती है कि 'पहाड़ी बारिश' और 'मैदानी बाढ़' का रिश्ता कितना सीधा है। पुलों के नीचे से बहता हुआ वह मटमैला पानी अपने साथ वही पहाड़ी मिट्टी ला रहा होता है, जो बाढ़ उतरने के बाद हमारे खेतों को नई जान देती है।
जब नदियाँ बहती हैं, तो वे अपने किनारों पर मिट्टी जमा करके प्राकृतिक तटबंध बनाती हैं। इतिहास गवाह है कि समझदार बसावटें हमेशा इन्हीं थोड़ी ऊँची जगहों पर होती आई हैं ताकि बाढ़ से बचा जा सके। शाहजहांपुर का भूगोल भी इसी नियम का पालन करता है। ताज़ा दस्तावेज़ों में जिले की मिट्टी और भूजल का जो जिक्र है, वह साफ करता है कि यहाँ जमीन के नीचे पानी का जो भंडार है, वह भी इन्हीं रेतीली परतों में जमा है जो कभी नदियों ने बिछाई थीं। यानी, हमारे हैंडपंप से निकलने वाला पानी भी इन्हीं प्राचीन नदी-प्रणालियों का तोहफा है।
हमारे किसान भाई अक्सर कहते हैं कि बाढ़ का पानी तबाही लाता है, लेकिन साथ ही 'सोना' भी छोड़ जाता है। यह सोना और कुछ नहीं, बल्कि वह नई गाद है जो नदियाँ अपने साथ लाती हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि गंगा का यह मैदानी इलाका दुनिया की सबसे उपजाऊ जमीनों में से एक इसलिए है क्योंकि यहाँ की मिट्टी लगातार 'रिन्यू' होती रहती है। शाहजहांपुर की लहलहाती फसलें इस बात का सबूत हैं कि पहाड़ों की जो चट्टानें वहां टूट रही हैं, वे यहाँ आकर हमारी रोटी का जरिया बन रही हैं। यह एक कुदरती चक्र है—पहाड़ का नुकसान, मैदान का फायदा बन जाता है।
आज के दौर में जब हम शाहजहांपुर में नए पुल, रिवरफ्रंट या विकास की योजना बनाते हैं, तो हमें यह याद रखना पड़ता है कि हम एक 'जीवंत' भूगोल में रह रहे हैं। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत जो एक्शन प्लान बनाए गए हैं, उनमें सीवेज प्रबंधन और विकास की बातें शामिल हैं। लेकिन ये तमाम आधुनिक निर्माण तभी सफल हो सकते हैं जब हम नदी के स्वभाव को समझें। जब हम नदी के रास्ते में कंक्रीट की दीवारें खड़ी करते हैं, तो हम असल में उस प्राचीन सिस्टम से लड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं जिसने इस शहर को बनाया है।
'सोना उगलने वाली' शाहजहाँपुर की धरती क्यों हो रही है बंजर?
जब हम 'रेगिस्तान' शब्द सुनते हैं, तो हमारी आँखों के सामने राजस्थान के दूर-दूर तक फैले रेत के टीले, चिलचिलाती धूप और पानी की कमी की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हरे-भरे गंगा के मैदान में बसे हमारे शाहजहांपुर जिले के भीतर भी कई 'छोटे रेगिस्तान' छिपे हुए हैं? ये रेगिस्तान रेत के नहीं हैं, बल्कि यह खेतों पर बिछी उस सफेद, नमकीन परत के हैं जिसे हम स्थानीय भाषा में 'ऊसर' या 'रेह' कहते हैं। नक्शे पर शाहजहांपुर कोई रेगिस्तान नहीं है, लेकिन जमीन की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यहाँ कई इलाकों में खेतों के बीचों-बीच बंजर जमीन के ऐसे टुकड़े मिलते हैं जहाँ सफेद पपड़ी, सख्त मिट्टी और कमजोर फसलें दिखाई देती हैं, मानो खेत वीरान छोड़ दिए गए हों।
यह समस्या केवल शाहजहांपुर की नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की एक बड़ी चुनौती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जमीन का वह हिस्सा है जो खराब जल निकासी और मिट्टी में सोडियम लवणों के जमाव के कारण बीमार हो गया है। इसे 'सोडिक लैंड' या ऊसर भूमि कहा जाता है। यह जमीन बिल्कुल किसी रेगिस्तान की तरह व्यवहार करती है। जिस तरह रेगिस्तान में जीवन पनपना मुश्किल होता है, वैसे ही इन खेतों में भी सोडियम की अधिकता के कारण पौधों की जड़ें सांस नहीं ले पातीं और फसलें दम तोड़ देती हैं। यह गंगा के मैदानी इलाके के भीतर पनप रहा एक 'इनलैंड डेजर्ट' यानी अंतर्देशीय रेगिस्तान है।
मानव इतिहास बताता है कि जब-जब इंसान के सामने रेगिस्तान या बंजर जमीन जैसी चुनौतियां आईं, उसने नए रास्ते खोज निकाले। रेगिस्तानों में पानी की कमी ने ही इंसान को जल संरक्षण और मिट्टी के उपचार की नई तकनीकें खोजने के लिए मजबूर किया। ठीक यही तर्क आज शाहजहांपुर के उन किसानों के काम आ रहा है जो अपनी बंजर होती जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाने की जद्दोजहद में लगे हैं। आज हमारे किसान आधुनिक विज्ञान की मदद से जिप्सम, लीचिंग और नमक-सहिष्णु फसलों का उपयोग कर इस 'सफेद रेगिस्तान' को हरा-भरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस 'सफेद रेगिस्तान' से निपटने का तरीका जादुई नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक है। विशेषज्ञों ने इसके लिए एक सीधा और सरल तरीका सुझाया है। सबसे पहले खेत को समतल किया जाता है और उसके चारों ओर मेड़बंदी की जाती है। इसके बाद मिट्टी की जांच के आधार पर उसमें 'जिप्सम' (Gypsum) मिलाया जाता है। जिप्सम एक ऐसा खनिज है जो मिट्टी के कणों से चिपके हुए जहरीले सोडियम को हटा देता है। इसके बाद की प्रक्रिया को 'लीचिंग' कहते हैं। खेत में पानी भरकर खड़ा कर दिया जाता है। जिप्सम की वजह से मिट्टी का सोडियम पानी में घुल जाता है और फिर वह पानी जमीन के नीचे चला जाता है या नालियों के जरिए खेत से बाहर निकाल दिया जाता है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि सुधार के शुरुआती दौर में ऐसी फसलें लगानी चाहिए जो नमक को सह सकें, जैसे कि धान या ढैंचा।
शाहजहांपुर में चल रही यह कवायद असल में उत्तर प्रदेश के एक बड़े मिशन का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में ऊसर भूमि सुधार एक बड़ा मुद्दा रहा है, जिसमें विश्व बैंक ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भरोसेमंद रिपोर्टों के मुताबिक यूपी में सोडिक भूमि की समस्या ने लाखों छोटे और सीमांत किसानों की रोजी-रोटी को प्रभावित किया था। विश्व बैंक द्वारा समर्थित परियोजनाओं ने न केवल बंजर जमीन को सुधारा, बल्कि वहां जल निकासी की व्यवस्था को भी दुरुस्त किया। इन परियोजनाओं के परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। जो जमीनें पहले वीरान पड़ी थीं, वहां सुधार के बाद फसलों की पैदावार में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। विश्वसनीय शोध भी पुष्टि करते हैं कि बड़े पैमाने पर चलाए गए इन सुधार कार्यक्रमों ने उत्पादकता बढ़ाने में सफलता हासिल की है।
अब जरा अपने जिले, शाहजहांपुर की स्थिति पर गौर करें। आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि जिले में मिट्टी और खेती का स्वरूप कैसा है। यहाँ की प्रमुख फसलें गन्ना, धान और गेहूं हैं, लेकिन ऊसर या लवणीय मिट्टी की मौजूदगी किसानों के फैसलों को प्रभावित करती है। जिले का भूजल स्तर और मिट्टी की बनावट यह साबित करती है कि यहाँ 'रेगिस्तान' बनने का मतलब रेत के टीले नहीं हैं। यहाँ रेगिस्तान बनने का मतलब है—मिट्टी की संरचना का टूटना और उसके अंदर मौजूद कार्बनिक तत्वों का धीरे-धीरे खत्म होना। जब मिट्टी कार्बन खो देती है, तो वह बेजान हो जाती है। यही वह प्रक्रिया है जिसे वैज्ञानिक 'मरुस्थलीकरण' कहते हैं।
हाल ही में आई मृदा परीक्षण की एक रिपोर्ट ने शाहजहांपुर के किसानों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। शाहजहांपुर की जिस धरती को 'सोना उगलने वाली' कहा जाता था, वह अब बंजर होने की कगार पर है। विशेषज्ञों की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि अगर हम नहीं संभले, तो हमारे खेत सचमुच के रेगिस्तान बन सकते हैं। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और खारेपन का बढ़ना यह संकेत दे रहा है कि जमीन अब थक चुकी है। हालांकि, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सही समय पर उठाए गए कदम इस 'सफेद रेगिस्तान' को वापस हरियाली में बदल सकते हैं। जरूरत है कि किसान अपनी मिट्टी की नियमित जांच करवाएं और जिप्सम का प्रयोग, हरी खाद की बुवाई और सही जल निकासी पर ध्यान दें।
गन्ने की एक कोशिका से कैसे बचेगी, शाहजहांपुर के किसानों की कमाई?
शाहजहांपुर की पहचान हमेशा से चीनी और गन्ने की मिठास से रही है। लेकिन आज यहाँ के खेतों में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। अब गन्ने की खेती केवल किसान के पसीने और हल की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रयोगशाला (Lab) की बारीकियों और विज्ञान की समझ से जुड़ गई है। इस बदलाव के पीछे है—गन्ने के पौधे की एक नन्ही सी कोशिका, जिसे वैज्ञानिक 'मेरिस्टम' (Meristem) कहते हैं। शाहजहांपुर का यह मॉडल (model) आज देश के सामने मिसाल बन रहा है कि कैसे विज्ञान के जरिए किसानों की किस्मत बदली जा सकती है।
अक्सर किसान इस बात से परेशान रहते हैं कि उनकी गन्ने की फसल में 'लाल सड़न' (Red Rot) या खतरनाक वायरस लग जाते हैं। मुश्किल यह है कि जब किसान पुराने गन्ने को ही बीज के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो ये बीमारियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती हैं। इसका समाधान गन्ने के सबसे ऊपरी हिस्से यानी 'शूट टिप' में छिपा है।
इस हिस्से में मौजूद 'मेरिस्टम कोशिकाएं' बहुत ही अनोखी होती हैं। ये इतनी तेजी से बढ़ती और विभाजित होती हैं कि कोई भी वायरस उनकी रफ्तार का मुकाबला नहीं कर पाता। सरल शब्दों में कहें तो, वायरस जब तक इन नई कोशिकाओं को बीमार करने की कोशिश करता है, तब तक ये कोशिकाएं विभाजित होकर आगे निकल चुकी होती हैं। इसी वैज्ञानिक सच्चाई का फायदा उठाकर टिश्यू कल्चर के जरिए ऐसे पौधे तैयार किए जा रहे हैं जो पूरी तरह से रोगमुक्त और सेहतमंद होते हैं। शाहजहांपुर का 'उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद' (UPCSR), को इस वैज्ञानिक क्रांति का केंद्र माना जा रहा है। 1912 में स्थापित इस संस्थान का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। आज यहाँ टिश्यू कल्चर (Tissue Culture) की मदद से युद्धस्तर पर नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इसकी प्रक्रिया किसी नन्हे बच्चे की परवरिश जैसी है:
शुरुआत (Lab Process): सबसे पहले गन्ने के ऊपरी हिस्से (Shoot tip) को सावधानी से निकाला जाता है। इसे लैब के अंदर 'एमएस माध्यम' (एक खास पोषक जेल) पर रखा जाता है, जहाँ ये नन्ही कोशिकाएं फलती-फूलती हैं।
जड़ों का विकास: जब ये कोशिकाएं गुच्छों का रूप ले लेती हैं, तो इन्हें खास रसायनों में रखा जाता है ताकि इनकी मजबूत जड़ें निकल सकें।
हार्डनिंग (Hardening): लैब का तापमान और बाहर का मौसम बहुत अलग होता है। इसलिए इन नाजुक पौधों को सीधे खेत में न लगाकर पहले बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाया जाता है, जिसे 'हार्डनिंग' कहते हैं।
नर्सरी से खेत तक: अंत में, जब ये पौधे मजबूत हो जाते हैं, तो इन्हें नर्सरी में लगाया जाता है। यहाँ से ये किसानों के खेतों में जाने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं।
सालों से किसान गन्ने के पुराने टुकड़ों को ही बीज की तरह बोते आए हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'वेजीटेव सीड केन' कहते हैं। लेकिन वक्त के साथ इस बीज की ताकत कम होने लगती है और बीमारियां इसे घेर लेती हैं। आज के दौर में सिर्फ खाद और पानी डालना काफी नहीं है, बल्कि 'बीज की गुणवत्ता' ही सबसे बड़ा हथियार है। लैब में तैयार किए गए इन बीजों से मोज़ेक वायरस (Mosaic Virus) जैसी बीमारियों का खतरा खत्म हो जाता है, जो पारंपरिक खेती में लगभग असंभव था।
उत्तर प्रदेश सरकार और कृषि विभाग का विजन अब बिल्कुल साफ है। इस उन्नत तकनीक को सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रखना है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 के लिए प्रदेश में करीब 15.90 लाख (15 लाख 90 हजार) रोगमुक्त पौधे तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। यह केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का एक ठोस रास्ता है। जब बीज रोगमुक्त होगा, तो फसल की पैदावार बढ़ेगी और कीटनाशकों पर होने वाला फालतू खर्च बचेगा। शाहजहांपुर के साथ-साथ राजस्थान के चूरू और अन्य इलाकों के किसान भी, जो खेती में नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं, इस मॉडल से काफी कुछ सीख सकते हैं।
जैसे-जैसे हम अगले फसली सीजन की ओर बढ़ रहे हैं, सबसे बड़ी चुनौती इस तकनीक को हर छोटे-बड़े किसान तक पहुँचाने की है। लक्ष्य सिर्फ पौधे उगाना नहीं, बल्कि किसानों के बीच वह भरोसा पैदा करना है कि लैब में तैयार यह छोटा सा पौधा उनके खेत की मिट्टी में 'सोना' उगाएगा। शाहजहांपुर का यह सफल प्रयोग बताता है कि जब तकनीक और परंपरा का संगम होता है, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि मुनाफे की गारंटी बन जाती है।
गर्रा नदी का 'खामोश शिकारी': क्या मगरमच्छों के साथ रहना मुमकिन है?
शाहजहांपुर की गर्रा नदी न केवल एक जलधारा है, बल्कि यह मगरमच्छों (Mugger crocodile) जैसे 'कीस्टोन' जीवों का एक सुरक्षित आवास भी है, जिनका रिहायशी इलाकों में आना नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की जीवंतता का संकेत है! यह लेख डर को जागरूकता में बदलते हुए मगरमच्छों के साथ सह-अस्तित्व के उस 'यूपी मॉडल' की चर्चा करता है, जो हमारी नदियों के संरक्षण के लिए अनिवार्य है।
क्या गर्रा नदी की लहरों के नीचे कोई खामोश दुनिया हमारा इंतजार कर रही है? शाहजहांपुर जिला अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए मशहूर है, लेकिन इसकी एक और पहचान है जो अक्सर बाढ़ के दिनों में हमारे दरवाजों तक दस्तक देती है। यह पहचान है इसकी नदियों, खासकर गर्रा नदी में बसने वाले जलीय जीवों की। गर्रा नदी केवल पानी का बहाव नहीं है, बल्कि यह मगरमच्छों और कछुओं का एक 'छिपा हुआ घर' है। मानसून के दौरान जब नदी उफान पर होती है, तो अक्सर ये जीव पानी के साथ बहकर बस्तियों और नहरों के करीब आ जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम डर के साये में जिएं, या फिर जानकारी के साथ इन जीवों के साथ रहने का कोई रास्ता निकालें? यह केवल एक आपदा नहीं, बल्कि हमारी नदियों और इंसानी आबादी के बीच के उस पुराने रिश्ते की परीक्षा है, जिसे हमें फिर से समझने की जरूरत है।
क्यों शाहजहांपुर का भूगोल मगरमच्छों के लिए एक 'पसंदीदा जन्नत' बना हुआ है? शाहजहांपुर की भौगोलिक बनावट इस कहानी की असली नींव है, क्योंकि गर्रा नदी पूरे जिले के परिदृश्य को दो खूबसूरत हिस्सों में बांटती है। यह विभाजन केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह नदी के मोड़ों पर शांत 'सैंडबार्स' (रेतीले टीले) और आर्द्रभूमियों (Wetlands) का निर्माण करता है, जो मगरमच्छों के लिए धूप सेंकने और अंडे देने की आदर्श जगहें हैं! जैसे-जैसे शहर फैल रहा है, नदी के ये शांत कोने ही इन जीवों के अस्तित्व का आखिरी सहारा बचे हैं। जुलाई 2024 में आई भीषण बाढ़ के दौरान जब एक मगरमच्छ गांव की दहलीज तक आ पहुँचा और डरे हुए ग्रामीणों ने उसे रस्सी से बांध लिया, तो उस घटना ने इस संघर्ष को पूरी तरह उजागर कर दिया। यह दिखाता है कि जब जंगली जीव और इंसान अचानक आमने-सामने होते हैं, तो जानकारी के अभाव में पहली प्रतिक्रिया हमेशा घबराहट और बचाव की होती है।
गांव में मगरमच्छ का दिखना नदी की 'अच्छी सेहत' का सबसे बड़ा सबूत कैसे है? अक्सर हम मगरमच्छ को सिर्फ एक खतरनाक शिकारी मान लेते हैं, लेकिन विज्ञान कहता है कि वे नदी के 'डॉक्टर' या 'मैनेजर' हैं। नदी में इनकी मौजूदगी यह बताती है कि वहाँ मछलियों की संख्या पर्याप्त है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अभी भी सांस ले रहा है! ये 'कीस्टोन स्पीशीज' हैं, जिनका होना जलीय खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखता है। अगर गर्रा नदी में मगरमच्छ बचे हुए हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि नदी में प्रदूषण के बावजूद खुद को पुनर्जीवित करने की क्षमता अभी बाकी है। उत्तर प्रदेश का गंगा-रामगंगा तंत्र मीठे पानी के कछुओं का भी एक महत्वपूर्ण घर है, जिनकी रक्षा के लिए हमें उनके प्रजनन स्थलों को बचाना होगा।
भ्रम (Fear)
वैज्ञानिक तथ्य (Scientific Fact)
मगरमच्छ इंसान का शिकार करने गांव आते हैं।
बाढ़ के दौरान पानी के बहाव के साथ वे रास्ता भटककर नहरों में आ जाते हैं।
नदी में मगरमच्छ होना खतरे की घंटी है।
यह नदी की अच्छी सेहत और पर्याप्त भोजन (मछलियों) का प्रमाण है।
कचरा फेंकने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
नदी किनारे फेंका गया मांस या कचरा शिकारियों को तट की ओर आकर्षित करता है।
क्या दहशत छोड़कर 'नदी मित्र' बनना ही हमारे कल की असली चाबी है? मगरमच्छों के साथ संघर्ष को कम करने का सबसे बेहतरीन रास्ता 'यूपी मॉडल' है, जिसमें 'नदी मित्र' (River Friends) और सामुदायिक घोंसला संरक्षण जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। शाहजहांपुर के नदी तटों पर भी स्थानीय लोगों को शामिल कर उनके बीच जागरूकता फैलानी होगी कि नदी में कचरा या बचा हुआ भोजन न फेंकें, क्योंकि यह मांसाहारी जीवों को आबादी की ओर आकर्षित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, घबराहट और अज्ञानता को पीछे छोड़कर ही हम अपनी प्राचीन जल-विरासत को सुरक्षित रख सकते हैं। जब हम इन जीवों को शत्रु के बजाय नदी के रक्षक के रूप में देखना शुरू करेंगे, तभी शाहजहांपुर की ये नदियाँ अपने असली वैभव को प्राप्त कर सकेंगी। यह सह-अस्तित्व ही हमारे और इन जलीय शिकारियों के भविष्य का एकमात्र सुरक्षित रास्ता है।
शाहजहांपुर की गर्रा नदी न केवल एक जलधारा है, बल्कि यह मगरमच्छों (Mugger crocodile) जैसे 'कीस्टोन' जीवों का एक सुरक्षित आवास भी है, जिनका रिहायशी इलाकों में आना नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की जीवंतता का संकेत है! यह लेख डर को जागरूकता में बदलते हुए मगरमच्छों के साथ सह-अस्तित्व के उस 'यूपी मॉडल' की चर्चा करता है, जो हमारी नदियों के संरक्षण के लिए अनिवार्य है।
क्या गर्रा नदी की लहरों के नीचे कोई खामोश दुनिया हमारा इंतजार कर रही है? शाहजहांपुर जिला अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए मशहूर है, लेकिन इसकी एक और पहचान है जो अक्सर बाढ़ के दिनों में हमारे दरवाजों तक दस्तक देती है। यह पहचान है इसकी नदियों, खासकर गर्रा नदी में बसने वाले जलीय जीवों की। गर्रा नदी केवल पानी का बहाव नहीं है, बल्कि यह मगरमच्छों और कछुओं का एक 'छिपा हुआ घर' है। मानसून के दौरान जब नदी उफान पर होती है, तो अक्सर ये जीव पानी के साथ बहकर बस्तियों और नहरों के करीब आ जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम डर के साये में जिएं, या फिर जानकारी के साथ इन जीवों के साथ रहने का कोई रास्ता निकालें? यह केवल एक आपदा नहीं, बल्कि हमारी नदियों और इंसानी आबादी के बीच के उस पुराने रिश्ते की परीक्षा है, जिसे हमें फिर से समझने की जरूरत है।
क्यों शाहजहांपुर का भूगोल मगरमच्छों के लिए एक 'पसंदीदा जन्नत' बना हुआ है? शाहजहांपुर की भौगोलिक बनावट इस कहानी की असली नींव है, क्योंकि गर्रा नदी पूरे जिले के परिदृश्य को दो खूबसूरत हिस्सों में बांटती है। यह विभाजन केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह नदी के मोड़ों पर शांत 'सैंडबार्स' (रेतीले टीले) और आर्द्रभूमियों (Wetlands) का निर्माण करता है, जो मगरमच्छों के लिए धूप सेंकने और अंडे देने की आदर्श जगहें हैं! जैसे-जैसे शहर फैल रहा है, नदी के ये शांत कोने ही इन जीवों के अस्तित्व का आखिरी सहारा बचे हैं। जुलाई 2024 में आई भीषण बाढ़ के दौरान जब एक मगरमच्छ गांव की दहलीज तक आ पहुँचा और डरे हुए ग्रामीणों ने उसे रस्सी से बांध लिया, तो उस घटना ने इस संघर्ष को पूरी तरह उजागर कर दिया। यह दिखाता है कि जब जंगली जीव और इंसान अचानक आमने-सामने होते हैं, तो जानकारी के अभाव में पहली प्रतिक्रिया हमेशा घबराहट और बचाव की होती है।
गांव में मगरमच्छ का दिखना नदी की 'अच्छी सेहत' का सबसे बड़ा सबूत कैसे है? अक्सर हम मगरमच्छ को सिर्फ एक खतरनाक शिकारी मान लेते हैं, लेकिन विज्ञान कहता है कि वे नदी के 'डॉक्टर' या 'मैनेजर' हैं। नदी में इनकी मौजूदगी यह बताती है कि वहाँ मछलियों की संख्या पर्याप्त है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अभी भी सांस ले रहा है! ये 'कीस्टोन स्पीशीज' हैं, जिनका होना जलीय खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखता है। अगर गर्रा नदी में मगरमच्छ बचे हुए हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि नदी में प्रदूषण के बावजूद खुद को पुनर्जीवित करने की क्षमता अभी बाकी है। उत्तर प्रदेश का गंगा-रामगंगा तंत्र मीठे पानी के कछुओं का भी एक महत्वपूर्ण घर है, जिनकी रक्षा के लिए हमें उनके प्रजनन स्थलों को बचाना होगा।
भ्रम (Fear)
वैज्ञानिक तथ्य (Scientific Fact)
मगरमच्छ इंसान का शिकार करने गांव आते हैं।
बाढ़ के दौरान पानी के बहाव के साथ वे रास्ता भटककर नहरों में आ जाते हैं।
नदी में मगरमच्छ होना खतरे की घंटी है।
यह नदी की अच्छी सेहत और पर्याप्त भोजन (मछलियों) का प्रमाण है।
कचरा फेंकने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
नदी किनारे फेंका गया मांस या कचरा शिकारियों को तट की ओर आकर्षित करता है।
क्या दहशत छोड़कर 'नदी मित्र' बनना ही हमारे कल की असली चाबी है? मगरमच्छों के साथ संघर्ष को कम करने का सबसे बेहतरीन रास्ता 'यूपी मॉडल' है, जिसमें 'नदी मित्र' (River Friends) और सामुदायिक घोंसला संरक्षण जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। शाहजहांपुर के नदी तटों पर भी स्थानीय लोगों को शामिल कर उनके बीच जागरूकता फैलानी होगी कि नदी में कचरा या बचा हुआ भोजन न फेंकें, क्योंकि यह मांसाहारी जीवों को आबादी की ओर आकर्षित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, घबराहट और अज्ञानता को पीछे छोड़कर ही हम अपनी प्राचीन जल-विरासत को सुरक्षित रख सकते हैं। जब हम इन जीवों को शत्रु के बजाय नदी के रक्षक के रूप में देखना शुरू करेंगे, तभी शाहजहांपुर की ये नदियाँ अपने असली वैभव को प्राप्त कर सकेंगी। यह सह-अस्तित्व ही हमारे और इन जलीय शिकारियों के भविष्य का एकमात्र सुरक्षित रास्ता है।