भारत ही नहीं दुनिया के इन 6 देशों में भी धूमधाम से मनाई जाती है गणेश चतुर्थी
भारतीय संस्कृति में प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की महिमा केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और हिंदू व बौद्ध धर्म के विस्तार के माध्यम से गणपति की आराधना संपूर्ण एशिया और उसके उपरांत प्रवासी भारतीयों के जरिए विश्व के कोने-कोने में फैल गई। तिब्बत, चीन, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक, भगवान गणेश को ज्ञान, समृद्धि, सौभाग्य और बाधाओं के निवारण के देवता के रूप में पूजा जाता है। यद्यपि विभिन्न देशों में उनकी प्रतिमाओं के स्वरूप, पूजा पद्धतियों और चढ़ावे में स्थानीय संस्कृतियों के अनुसार अद्भुत विविधता दिखाई देती है, किंतु उनके प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति का भाव सर्वत्र एक समान है।https://sceh.net/नेपाल में नेवार समुदाय किस अनूठी परंपरा और पकवानों के साथ करता है बप्पा का पूजन?भारत के पड़ोसी देश नेपाल (Nepal) में गणेश चतुर्थी को स्थानीय भाषा में 'विनायक चतुर्थी' के रूप में बड़े श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। विशेष रूप से काठमांडू घाटी का पारंपरिक नेवार समुदाय इस पर्व को अत्यंत निष्ठा के साथ मनाता है। इस दिन परिवार अपने घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन की एक प्रमुख धार्मिक परंपरा यह है कि श्रद्धालु रात के समय चंद्रमा के दर्शन करने से बचते हैं, जिसे व्रत का आवश्यक अंग माना जाता है।नेपाल में गणेश पूजन के दौरान भगवान को नेवार संस्कृति का सबसे प्रामाणिक पारंपरिक व्यंजन 'समयबजी' (Samaybaji) नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है। इस विशेष भोग में उबला हुआ अंडा, तली हुई मछली, भैंस के मांस का चोइला, भटमास (सोयाबीन), चटमरी, बारा (दाल का वड़ा), चिवड़ा (पीटकर चपटा किया गया चावल), साग और नेवारी शराब 'आयला' (Ayla) शामिल होती है। यह अनूठा भोग नेवारी जीवनशैली और उनकी धार्मिक परंपरा का प्रतीक है। पर्व के अवसर पर काठमांडू घाटी के प्रमुख गणेश मंदिरों जैसे अशोक विनायक, चंद्र विनायक, सूर्य विनायक, कमल विनायक, मारु गणेश और कमलादी गणेश मंदिर में गर्भगृह में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। नेपाली श्रद्धालु जीवन में बुद्धि, समृद्धि और विघ्नों के नाश के लिए इस दिन निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखते हैं।इंडोनेशिया के सक्रिय ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो (Mount Bromo) पर 7,000 फीट चढ़कर क्यों होती है गणेश पूजा?इंडोनेशिया (Indonesia) के पूर्वी जावा (Java) में स्थित तेन्ग्गेर पर्वत (Tengger mountains) श्रृंखला में गणेश भक्ति का एक ऐसा विस्मयकारी दृश्य देखने को मिलता है, जो समूचे विश्व को चकित कर देता है। यहाँ तेन्ग्गेर सेमेरू नेशनल पार्क (Tengger Semeru National Park) में स्थित सक्रिय ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो के क्रेटर (ज्वालामुखी के मुहाने) के बिल्कुल किनारे 7,641 फीट की ऊँचाई पर भगवान गणेश की एक प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह प्रतिमा लगभग 700 वर्ष पूर्व स्थापित की गई थी।स्थानीय तेन्ग्गेर समुदाय और जावानी हिंदू अत्यंत कठिन चढ़ाई चढ़कर ज्वालामुखी के मुहाने तक पहुँचते हैं और बप्पा के चरणों में फल, फूल और अगरबत्तियाँ अर्पित करते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि धधकते लावे और बार-बार होने वाले विस्फोटों से यह गणेश प्रतिमा ही सदियों से उनकी रक्षा करती आ रही है। इस पर्वत का नामकरण भी भगवान ब्रह्मा के नाम पर हुआ है, जिसे स्थानीय लोग 'ब्रोमो' कहते हैं। यहाँ के लोग स्थानीय देवता 'इदा सांग ह्यांग विधी वासा' के साथ-साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) की पूजा हिंदू पंचांग के अनुसार करते हैं। प्राचीन काल में जावा में शैव धर्म और तांत्रिक बौद्ध धर्म के मिलन से एक विशिष्ट पंथ बना था, जहाँ गणेश जी को एक शक्तिशाली तांत्रिक देवता के रूप में पूजा जाता था, जिनके मुकुट और सिंहासन पर नरमुंडों के अलंकरण होते थे। इंडोनेशिया की संस्कृति में गणेश जी का स्थान इतना गहरा है कि वर्ष 1998 में इंडोनेशिया सरकार ने 20,000 रूपिया (rupiah) के राष्ट्रीय मुद्रा नोट पर भगवान गणेश का चित्र प्रमुखता से मुद्रित किया था। इसके अतिरिक्त, बाली द्वीप के हिंदू मंदिरों में भी गणेश चतुर्थी अत्यंत उल्लास के साथ मनाई जाती है।जापान में मोदक की जगह डाइकॉन (daikon) मूली क्यों चढ़ाई जाती है और कांगितेन का क्या रहस्य है?उगते सूरज की भूमि कहे जाने वाले जापान (Japan) में भगवान गणेश की उपस्थिति लगभग 1000 वर्षों से अधिक पुरानी है। बौद्ध धर्म के माध्यम से जापान पहुँचे गणपति को वहाँ कांगितेन (Kangiten) अथवा विनायकतेन (Bināyaka-ten) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें गणबाची, गणव्हा, शो-तेन और आर्यदेव के नामों से भी जाना जाता है। जापानी शिगोन और तेंडाई संप्रदाय में गणेश जी की एक अत्यंत दुर्लभ और अनूठी प्रतिमा पूजी जाती है, जिसे 'सोशिन कांगि-तेन' कहा जाता है। इसमें दो हाथी-मुख वाले देवता एक-दूसरे को आलिंगनबद्ध किए हुए दिखाई देते हैं, जिसे संस्कृत में नंदिकेश्वर के समान माना गया है।जापान की राजधानी टोक्यो (Tokyo) के ऐतिहासिक असाकुसा (Asakusa) क्षेत्र में सुमिदागावा नदी (Sumidagawa river) के तट पर स्थित मात्सुचियामा शोडेन (Matsuchiyama Shoden) मंदिर भगवान गणेश (कांगितेन) का प्रमुख तीर्थ है। यह मंदिर 601 ईस्वी में स्थापित हुआ था, जो वहाँ के प्रसिद्ध सेन्सो-जी (Sensō-ji) मंदिर से भी प्राचीन है। यहाँ का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जापानी परंपरा में बप्पा को मोदक नहीं, बल्कि सफेद डाइकॉन (daikon) मूली का भोग लगाया जाता है। मंदिर की दीवारों, छतों और लालटेनों पर डाइकॉन मूली के चित्र उकेरे गए हैं। जापानी संस्कृति में डाइकॉन मूली को वैवाहिक सौहार्द, उत्तम जीवनसाथी की प्राप्ति और संतानोत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है।प्रतिवर्ष 7 जनवरी को इस मंदिर में भव्य 'डाइकॉन महोत्सव' आयोजित होता है, जहाँ भक्तों को पकाई गई मूली और चावल की पवित्र मदिरा (ओमिकी) का प्रसाद दिया जाता है। मंदिर में धन की थैलियों के प्रतीक चिह्न भी बने हैं, जो व्यापारिक सफलता के सूचक हैं। इसके साथ ही, लाल बीन के मीठे पेस्ट से बने विशेष पकवान 'कांगि-दान' का भोग लगाया जाता है तथा मनोकामना पूर्ति के लिए तेल-स्नान (योकुयु कीतो) का गुप्त अनुष्ठान किया जाता है। जापान के नारा में माउंट इकोमा (Mount Ikoma) पर स्थित होजान-जी (Hōzan-ji) मंदिर और क्योटो (Kyoto) में 1372 ईस्वी में सम्राट गिकोगोन (Emperor Gikogon) द्वारा स्थापित विशाल कांगितेन प्रतिमा भी अत्यंत प्रसिद्ध है।थाईलैंड, कंबोडिया और मलेशिया में गणेश आराधना के क्या प्राचीन साक्ष्य मिलते हैं?दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में भी गणेश पूजन का गौरवशाली इतिहास रहा है। थाईलैंड (Thailand) में भगवान गणेश को 'फ्रा फिकानेट' के नाम से जाना जाता है। वहाँ उन्हें कला, संगीत, साहित्य और व्यापार का संरक्षक देवता माना जाता है। थाईलैंड में 550 से 600 ईस्वी के बीच की गणेश प्रतिमाएँ पाई गई हैं। गणेश चतुर्थी पर बैंकॉक स्थित वाट फ्रा श्री उमादेवी (Wat Phra Sri Umadevi) जैसे भव्य मंदिरों में विशेष प्रार्थनाएँ और सांस्कृतिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।कंबोडिया (Cambodia) में गणेश जी की पूजा का इतिहास 7वीं शताब्दी और प्राचीन खमेर साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। विश्वप्रसिद्ध अंगकोर वाट (Angkor Wat) मंदिर परिसर में भगवान गणेश की प्राचीन नक्काशीदार मूर्तियाँ आज भी सुरक्षित हैं। कंबोडिया में गणेश जी के कुछ ऐसे प्राचीन स्वरूप भी मिलते हैं, जहाँ उनका मुख हाथी के बजाय मानवीय स्वरूप का दर्शाया गया है।मलेशिया (Malaysia) में तमिल हिंदू समुदाय गणेश चतुर्थी को अत्यंत भक्तिभाव से मनाता है। राजधानी कुआलालंपुर (Kuala Lumpur) में स्थित प्रसिद्ध श्री सिथि विनयगर मंदिर में कई दिनों तक सामुदायिक प्रार्थनाएँ, शास्त्रीय भजन-कीर्तन और पारंपरिक भोज आयोजित किए जाते हैं। यहाँ गणेश जी को किसी भी नए उद्यम के शुभारंभ के देवता के रूप में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है।पेरिस, लंदन, मॉरीशस और अमेरिका में कैसे गूंजते हैं गणपति बप्पा के जयकारे?एशियाई देशों के साथ-साथ पश्चिमी और अफ्रीकी देशों में भी गणेश चतुर्थी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है:फ़्रांस (France): पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) के ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में श्री मणिका विनायकरालयम मंदिर द्वारा प्रतिवर्ष विशाल रथ-यात्रा निकाली जाती है। 30 अगस्त को आयोजित इस शोभायात्रा में श्रद्धालु रस्सियों से सुसज्जित रथ को खींचते हैं और पेरिस की सड़कों पर ढोल-नगाड़ों के साथ भजन गाते हुए मिठाइयाँ वितरित करते हैं।यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom): लंदन (London) के लक्ष्मी नारायण मंदिर में 5,000 से अधिक श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यहाँ भव्य आरती, सांस्कृतिक नृत्य और फैंसी ड्रेस (Fancy Dress) प्रतियोगिताओं के बाद 4,000 से अधिक भक्त एक विशाल जुलूस के साथ प्रसिद्ध थेम्स नदी (River Thames) में बप्पा का विसर्जन करते हैं।मॉरीशस (Mauritius): इस द्वीपीय देश में लगभग 52 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। यहाँ वर्ष 1982 से गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है और इस पावन अवसर पर वहाँ की सरकार द्वारा प्रथम दिन आधिकारिक सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है। घरों और मंदिरों में मिट्टी की प्रतिमाओं की स्थापना कर पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं।यूएसए (USA) एवं कनाडा (Canada): अमेरिका में भारतीय समुदाय द्वारा मुंबई से विशेष मूर्तियाँ मँगवाकर 11 दिनों तक यह महापर्व मनाया जाता है, जिसमें 10,000 से अधिक लोग भाग लेते हैं। कनाडा के टोरंटो (Toronto) और वैंकूवर (Vancouver) में भी प्रवासी भारतीय अत्यंत भव्यता के साथ गणपति स्थापना और विसर्जन संपन्न करते हैं। इसके अलावा फ़िजी (Fiji), सिंगापुर (Singapore) और बर्मा (Burma) में भी यह पर्व पूर्ण आस्था के साथ मनाया जाता है।यह वैश्विक विस्तार इस बात का जीवंत प्रमाण है कि देश, काल और संस्कृतियों के भेद से परे, विघ्नहर्ता भगवान गणेश का आशीर्वाद और उनकी आध्यात्मिक प्रासंगिकता संपूर्ण मानवता के लिए सार्वभौमिक है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/222f6why2. https://tinyurl.com/22lamdrc3. https://tinyurl.com/2xm5b3cm4. https://tinyurl.com/y49pnkla5. https://tinyurl.com/28xqhlx36. https://tinyurl.com/2a4257ye
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
अफ्रीका में तबाही मचाने वाले इबोला वायरस से भारत कितना सुरक्षित?
दुनिया भर में संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में कई ऐसी महामारियां सामने आई हैं जिन्होंने मानव सभ्यता को झकझोर कर रख दिया है। इन्हीं जानलेवा बीमारियों में से एक इबोला वायरस डिसीज है। यह एक गंभीर और अक्सर जानलेवा साबित होने वाली बीमारी है जो मुख्य रूप से उप-सहारा अफ्रीका में पाई जाती है। जब यह वायरस इंसान के शरीर में प्रवेश करता है तो यह रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है जिससे गंभीर रक्तस्रावी बुखार होता है। इस बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मृत्यु दर 25 से 90 प्रतिशत के बीच रहती है और औसतन 50 प्रतिशत संक्रमित मरीजों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी से बचाव के लिए इसके लक्षणों, फैलने के कारणों और रोकथाम के उपायों को समझना बेहद जरूरी है।https://sceh.net/ इबोला वायरस आखिर क्या है और इसकी शुरुआत कहाँ से हुई? इबोला रोग आर्थोइबोलावायरस जीनस (Orthoebolavirus Genus) के वायरसों के कारण होता है। इस बीमारी का पहला मामला साल 1976 में सामने आया था जब दो अलग-अलग जगहों पर एक साथ इसका प्रकोप देखा गया था। पहला मामला वर्तमान दक्षिण सूडान के नज़ारा में और दूसरा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के याम्बुकु में सामने आया था। कांगो में यह प्रकोप इबोला नदी के पास स्थित एक गांव में हुआ था और इसी नदी के नाम पर इस जानलेवा वायरस का नाम इबोला रखा गया। वैज्ञानिकों ने अब तक आर्थोइबोलावायरस की छह प्रजातियों की पहचान की है। इनमें से जायरे इबोलावायरस (Zaire Ebolavirus), सूडान इबोलावायरस (Sudan Ebolavirus), ताई फॉरेस्ट इबोलावायरस (Tai Forest Ebolavirus) और बुंदीबुग्यो इबोलावायरस (Bundibugyo Ebolavirus) इंसानों में बीमारी पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा रेस्टन वायरस (Reston Virus) और बॉम्बाली वायरस (Bombali Virus) भी पाए गए हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से जानवरों को प्रभावित करते हैं। जायरे इबोलावायरस सबसे आम है और इसी के कारण दुनिया में इबोला की सबसे बड़ी महामारियां फैली हैं।यह बीमारी एक इंसान से दूसरे इंसान में कैसे फैलती है?यह एक गलत धारणा है कि इबोला हवा से फैलता है। खांसने या छींकने से इबोला का संक्रमण नहीं होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि फ्रूट बैट यानी फल खाने वाले चमगादड़ इस वायरस के प्राकृतिक वाहक होते हैं। जब इंसान जंगल में बीमार या मरे हुए जानवरों जैसे चमगादड़, चिंपैंजी, गोरिल्ला, बंदर या साही के खून या उनके शरीर के तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आते हैं तो यह वायरस इंसानों में प्रवेश कर जाता है। एक बार जब कोई इंसान संक्रमित हो जाता है तो यह बीमारी दूसरे इंसानों में बहुत तेजी से फैल सकती है। यह संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, उल्टी, मल, मूत्र, स्तन के दूध, लार और वीर्य के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। इसके अलावा उन वस्तुओं या सतहों को छूने से भी संक्रमण हो सकता है जो किसी बीमार व्यक्ति के तरल पदार्थों से दूषित हो गई हों। यौन संबंध बनाने से भी इबोला का वायरस फैल सकता है क्योंकि ठीक होने के महीनों बाद भी यह वायरस वीर्य में जीवित रह सकता है।इस बीमारी के शुरुआती और गंभीर लक्षण क्या हैं?इबोला वायरस के शरीर में प्रवेश करने से लेकर लक्षण दिखने तक का समय 2 से 21 दिनों का हो सकता है। औसतन आठ से दस दिनों के भीतर मरीज बीमार पड़ने लगता है। शुरुआत में इबोला के लक्षण फ्लू जैसे होते हैं जिन्हें ड्राई या सूखे लक्षण कहा जाता है। इनमें अचानक तेज बुखार आना, अत्यधिक थकान, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश और ठंड लगना शामिल है। कुछ ही दिनों बाद बीमारी दूसरे चरण में पहुंच जाती है और मरीज को उल्टी, पेट दर्द और खूनी दस्त होने लगते हैं। शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और आंखें लाल हो जाती हैं। गंभीर मामलों में मरीज के शरीर के अंगों से खून बहना शुरू हो जाता है। मल या उल्टी में खून आ सकता है और मसूड़ों, नाक तथा त्वचा के छिद्रों से भी रक्तस्राव हो सकता है। यह वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर भी हमला करता है जिससे मरीज भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे दौरे भी पड़ सकते हैं। अंततः लिवर और किडनी जैसे अंग काम करना बंद कर देते हैं, जिससे मरीज की मौत हो सकती है।क्या इस बीमारी का परीक्षण और सटीक इलाज संभव है? शुरुआती चरण में इबोला की पहचान करना मुश्किल होता है क्योंकि इसके लक्षण मलेरिया या टाइफाइड जैसी अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। इसकी सटीक पहचान करने के लिए डॉक्टर पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction) परीक्षण करते हैं। रक्त नमूनों का परीक्षण अत्यधिक सुरक्षित प्रयोगशालाओं में किया जाता है क्योंकि इबोला के नमूने बेहद खतरनाक होते हैं। इलाज की बात करें तो वर्तमान में जायरे इबोलावायरस के लिए दो विशेष उपचार मौजूद हैं जिन्हें अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने मंजूरी दी है। इनमें इनमाजेब (Inmazeb) और इबांगा (Ibanga) शामिल हैं जो मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज (monoclonal antibodies) हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस से लड़ने में मदद करते हैं। इसके अलावा मरीजों को ऑक्सीजन देना, नसों के जरिए तरल पदार्थ चढ़ाना और उनके रक्तचाप को संतुलित रखना उनके बचने की संभावना को काफी बढ़ा देता है।इबोला वायरस से बचाव के लिए कौन सी वैक्सीन उपलब्ध है?इबोला से बचाव के लिए अब विश्व स्तर पर वैक्सीन उपलब्ध हैं। जायरे इबोलावायरस (Zaire Ebolavirus) के लिए एर्वेबो वैक्सीन को मंजूरी दी गई है जो केवल एक खुराक में दी जाती है। यह वैक्सीन महामारी के दौरान प्रतिक्रिया स्वरूप इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा एक अन्य वैक्सीन ज़ब्डेनो (Zabdeno) और म्वाबीया (Mwabia) भी मौजूद हैं जो दो खुराकों में दी जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन महामारी फैलने पर रिंग वैक्सीनेशन की रणनीति अपनाता है। इसके तहत मरीज के सीधे संपर्क में आने वाले लोगों और उनके करीबियों का टीकाकरण किया जाता है ताकि वायरस के प्रसार को वहीं रोका जा सके। कई मामलों में पूरे गांव या इलाके का भी टीकाकरण किया जाता है, जिसे भौगोलिक टीकाकरण कहते हैं।अफ्रीका में इबोला महामारी ने कैसा आर्थिक और सामाजिक कहर बरपाया था? साल 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में इबोला का अब तक का सबसे बड़ा प्रकोप देखा गया था। गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। इस दौरान दुनिया भर में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए और 11 हजार से अधिक लोगों की जान चली गई। इस महामारी ने पश्चिमी अफ्रीका के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को पूरी तरह तोड़ दिया था। व्यापार और यातायात पर प्रतिबंध के कारण भारी आर्थिक नुकसान हुआ। सिएरा लियोन में निजी क्षेत्र के 50 प्रतिशत कर्मचारियों का रोजगार छिन गया। महामारी के प्रबंधन पर अरबों डॉलर खर्च हुए। स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई और कई अस्पतालों को बंद करना पड़ा। इबोला का इलाज करते हुए सैकड़ों स्वास्थ्य कर्मियों की भी जान चली गई। लाखों बच्चों की पढ़ाई छूट गई क्योंकि महीनों तक स्कूल बंद रहे। लाइबेरिया और सिएरा लियोन में जंगली जानवरों के मांस पर प्रतिबंध लगने से कई परिवारों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया। जिन लोगों ने इस बीमारी को मात दी, उन्हें समाज में कलंक का सामना करना पड़ा। अवसाद, घबराहट और आत्महत्या के प्रयास जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखे गए।विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाओं ने महामारी को कैसे नियंत्रित किया? महामारी की शुरुआत में प्रतिक्रिया धीमी थी लेकिन बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने इसे नियंत्रित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम किया। इंसिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम की स्थापना की गई जिसके जरिए प्रभावित देशों में मरीजों को अलग-थलग करने, उनका इलाज करने और मृतकों के सुरक्षित अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। इबोला से मरने वालों का अंतिम संस्कार भी एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि अफ्रीकी संस्कृति में शवों को छूने की परंपरा है। इससे संक्रमण बहुत तेजी से फैला। बाद में सुरक्षित और सम्मानजनक दफन के नियम बनाए गए और समुदायों को जागरूक किया गया। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर कांटेक्ट ट्रेसिंग (contact tracing) की गई। हर उस व्यक्ति को 21 दिनों तक निगरानी में रखा गया जो किसी मरीज के संपर्क में आया था। सीमा नियंत्रण को सख्त किया गया और हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू की गई।कोविड महामारी और इबोला के अनुभवों से दुनिया ने क्या सीखा? इबोला महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी भी संक्रामक बीमारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसके बाद जब कोविड महामारी आई तो अफ्रीकी देशों और दुनिया भर ने इबोला के दौरान सीखी गई रणनीतियों का इस्तेमाल किया। आइसोलेशन सेंटर बनाना, कांटेक्ट ट्रेसिंग करना और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना इबोला के ही सबक थे। इन महामारियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि हर देश के पास पर्याप्त टेस्टिंग किट, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी और एक मजबूत स्वास्थ्य ढांचा होना चाहिए। सूचनाओं के सही आदान-प्रदान और समुदाय की भागीदारी के बिना किसी भी महामारी को हराना असंभव है।https://sceh.net/ क्या भारत में इबोला वायरस के फैलने का कोई भारी खतरा है? अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के कारण भारत में इबोला वायरस के प्रवेश का कुछ जोखिम जरूर हो सकता है लेकिन एक बड़ी महामारी फैलने की संभावना बहुत कम है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इबोला कोविड की तरह हवा से नहीं फैलता है। यह केवल संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से ही फैलता है। पिछले वैश्विक स्वास्थ्य संकटों के बाद भारत ने हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग, रोग निगरानी, क्वारंटाइन सिस्टम और अस्पतालों की तैयारियों को काफी मजबूत कर लिया है। यदि कोई संदिग्ध मामला सामने आता है तो भारतीय स्वास्थ्य एजेंसियां उसे तुरंत आइसोलेट करने में सक्षम हैं। हालांकि किसी भी भविष्य के खतरे से बचने के लिए निरंतर जागरूकता, त्वरित प्रतिक्रिया और मजबूत स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली बनाए रखना हमारे देश के लिए अत्यंत आवश्यक है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/y24gcxvg 2. https://tinyurl.com/2kbvwzsm 3. https://tinyurl.com/yua3zmjb 4. https://tinyurl.com/237tetdk 5. https://tinyurl.com/27rgabmn 6. https://tinyurl.com/25paj4wh
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
भारत के प्राचीन शहर सिरकप में कैसे स्थापित हुआ था यूनानी ग्रिड-प्लान नगर नियोजन?
प्राचीन विश्व के इतिहास में 600 BCE से 300 CE का कालखंड सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक स्वर्णिम युग माना जाता है। जब सिकंदर (Alexander) के आक्रमण के पश्चात यूनानी संस्कृति का भूमध्य सागर से लेकर मध्य एशिया और भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमाओं तक प्रसार हुआ, तब एक नई और अनूठी सभ्यता का जन्म हुआ जिसे 'हिन्द-यूनानी साम्राज्य' (Indo-Greek Kingdom) के नाम से जाना जाता है। उत्तर-पश्चिम भारत और बैक्ट्रिया (Bactria) के क्षेत्र में यूनानी और भारतीय संस्कृतियों का यह मेल केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारतीय कला, वास्तुकला, मुद्राशास्त्र (Coinage) और धार्मिक दर्शन पर एक दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ा। शाहजहाँपुर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना वाले शहर के संदर्भ में, प्राचीन भारत की इस बहु-सांस्कृतिक विरासत का अनुशीलन अत्यंत प्रेरणादायी है।भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्द-यूनानी साम्राज्य की स्थापना और विस्तार कैसे हुआ?बैक्ट्रिया क्षेत्र (आधुनिक अफ़गानिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान) में लगभग 250 BCE के आसपास सेल्युकसिड (Seleucid) साम्राज्य से अलग होकर डिओडोटस प्रथम (Diodotus I) ने स्वतंत्र यूनानी राज्य की नींव रखी थी। इसके पश्चात, राजा डेमेट्रियस प्रथम (Demetrius I) ने 180 BCE के आसपास हिंदू कुश पर्वत श्रृंखला को पार करके भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अपने साम्राज्य का विस्तार किया।हिन्द-यूनानी राजाओं में सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली सम्राट मेनांडर प्रथम (Menander I) थे, जिनका शासनकाल 165 BCE से 130 BCE के मध्य माना जाता है। मेनांडर के समय में हिन्द-यूनानी साम्राज्य गांधार (Gandhara), पंजाब, तक्षशिला (Taxila) और मथुरा तक फैल गया था। इन यूनानी राजाओं ने भारत की स्थानीय भाषाओं, लिपियों और धर्मों को अपनाया और वे भारतीय समाज का एक अभिन्न अंग बन गए। इतिहास में इन यूनानी शासकों और निवासियों को 'यवन' कहा गया।हिन्द-यूनानी शासकों के सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं का चित्रण कैसे शुरू हुआ?हिन्द-यूनानी साम्राज्य की सबसे महान और अमूल्य देन उनकी अनूठी मुद्रा प्रणाली (Coinage) है, जिसे प्राचीन काल की सबसे कलात्मक मुद्राओं में गिना जाता है। भारत में शासन करने वाले यूनानी राजाओं ने द्विभाषी (Bilingual) सिक्के जारी करने की परंपरा शुरू की। इन सिक्कों के एक तरफ यूनानी भाषा और लिपि में लेख होता था, जबकि दूसरी तरफ भारत की स्थानीय ब्राह्मी या खरोष्ठी लिपि में राजा का नाम और उपाधि अंकित होती थी।इस दिशा में सबसे ऐतिहासिक कदम राजा अगाथोकल्स (Agathocles) (190 BCE से 180 BCE) ने उठाया। अगाथोकल्स ने चांदी के ऐसे सिक्के जारी किए जिन पर भारतीय देवी-देवताओं का प्रत्यक्ष चित्रण था। अफ़गानिस्तान के आई-फ़ानूम (AI-Khanoum) शहर के उत्खनन में अगाथोकल्स के छह ऐसे चांदी के सिक्के (ड्राम) मिले हैं, जिन पर भगवान वासुदेव-कृष्ण और बलराम-संकर्षण के चित्र उकेरे गए हैं। इन सिक्कों में बलराम के हाथों में गदा और हल है, जबकि वासुदेव-कृष्ण के हाथों में शंख और सुदर्शन चक्र स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय इतिहास में किसी सिक्कों पर हिंदू देवी-देवताओं का यह सबसे प्राचीन उपलब्ध चित्रण माना जाता है। बाद के राजाओं ने अपने सिक्कों पर गज (हाथी), वृषभ (बैल), सिंह और बौद्ध धर्मचक्र को भी प्रमुखता से अंकित किया।यूनानी राजदूत हेलियोडोरस के परिवर्तन और विदिशा स्तंभ का धार्मिक महत्व क्या है?हिन्द-यूनानी राजाओं का भारत के प्रति आकर्षण केवल सिक्कों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे यहाँ के धर्म और दर्शन से गहराई से प्रभावित हुए। इसका सबसे प्रत्यक्ष और प्रामाणिक उदाहरण मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित 'हेलियोडोरस स्तंभ' (Heliodorus Pillar) है।लगभग 115 BCE में, हिन्द-यूनानी राजा एंटियालकिडास (Antialcidas) ने अपने राजदूत हेलियोडोरस (Heliodorus) को शुंग साम्राज्य के राजा भागभद्र के दरबार में विदिशा भेजा था। विदिशा आकर हेलियोडोरस भारतीय दर्शन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वैष्णव धर्म स्वीकार कर लिया और स्वयं को 'भागवत' घोषित किया। हेलियोडोरस ने भगवान वासुदेव के सम्मान में विदिशा में एक विशाल पत्थर का गरुड़ स्तंभ स्थापित करवाया, जिस पर ब्राह्मी लिपि में एक प्राकृत अभिलेख उकेरा गया है। यह अभिलेख भारतीय इतिहास में वैष्णव धर्म और वासुदेव भक्ति का सबसे प्राचीन पुरातात्विक प्रमाण माना जाता है।गांधार और मथुरा कला शैली पर यूनानी वास्तुकला तथा मूर्तिकला का क्या प्रभाव पड़ा?यूनानियों के आगमन से भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया, जिसे 'गांधार कला' (Gandhara Art) या ग्रीको-बौद्ध कला (Greco-Buddhist Art) कहा जाता है। गांधार क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान व अफ़गानिस्तान) में विकसित हुई इस कला शैली में भारतीय आध्यात्मिक विषयों को यूनानी यथार्थवादी (Realistic) शैली में प्रस्तुत किया गया।गांधार कला में महात्मा बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियां यूनानी देवता अपोलो और ज़ीउस (Zeus) की भांति बनाई जाने लगीं। यूनानी मूर्तिकला के प्रभाव से बुद्ध की मूर्तियों में यथार्थवादी शारीरिक बनावट, घुंघराले बाल, सिर पर उष्णीष और कपड़ों की सुंदर सिलवटें (काइटन और हिमेटियन वस्त्र शैली) उकेरी गईं। इसके अलावा, भवनों और स्तूपों के निर्माण में यूनानी कुरिंथियन (Corinthian) स्तंभों, पत्तों की नक्काशी और ज्यामितीय डिजाइनों का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ।उसी समय मथुरा कला केंद्र में भी यवन शासन के दौरान विशाल पत्थर की मूर्तियां बननी शुरू हुईं। मथुरा में यक्ष, नाग और अग्नि देव की विशालकाय आकृतियों में यूनानी शैली का प्रभाव देखा जा सकता है, जिसमें यक्ष मुदगरपाणि के हाथों में गदा और यूनानी नायक हरक्यूलिस (Heracles) जैसी शारीरिक सुडौलता दिखाई देती है।बौद्ध धर्म के विकास और स्तूप निर्माण में हिंदू-यूनानी राजाओं की क्या भूमिका थी?हिन्द-यूनानी राजाओं ने बौद्ध धर्म को न केवल अपनाया बल्कि उसे राजकीय संरक्षण भी प्रदान किया। इनमें सबसे प्रमुख नाम सम्राट मेनांडर प्रथम का है, जिन्हें बौद्ध ग्रंथों में 'मिलिंद' कहा गया है। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ 'मिलिंदपन्हो' (मिलिंद के प्रश्न) में राजा मेनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच हुए दार्शनिक संवादों का विस्तृत वर्णन है।मेनांडर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद कई बौद्ध स्तूपों और विहारों का निर्माण व विस्तार कराया। स्वात घाटी स्थित बुतकारा स्तूप (Butkara Stupa) के पुनरुद्धार और विस्तार में मेनांडर की मुख्य भूमिका रही है। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के शिंकोट (Shinkot) से प्राप्त एक धातु की मंजूषा (Casket) पर मेनांडर प्रथम का नाम उकेरा गया है, जिसमें बुद्ध के पवित्र अवशेष रखे गए थे। बौद्ध स्तूपों के भीतर अवशेष रखने वाले पत्थरों के पात्र (Reliquaries) सीधे तौर पर यूनानी पिक्सिस (Pyxis) बर्तनों से प्रेरित थे। बिमरन (Bimaran) मंजूषा जैसी कलाकृतियों में बुद्ध का चित्रण यूनानी मेहराबों के बीच किया गया है।हिन्द-यूनानी नगर नियोजन और दैनिक जीवन की कलाकृतियों में कौन से यूनानी तत्व मिलते हैं?हिन्द-यूनानी शासकों ने भारत में कई व्यवस्थित नगरों की स्थापना की। तक्षशिला के निकट स्थित 'सिरकप' (Sirkap) और स्वात घाटी में स्थित 'बारिकोट' (Barikot) इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। सिरकप नगर का निर्माण यूनानी 'हिपोडामियन' (Hippodamian) ग्रिड-प्लान के आधार पर किया गया था, जहाँ एक मुख्य चौड़ी सड़क और उसके समकोण पर कटती हुई 15 गलियां बनाई गई थीं। इन नगरों के चारों ओर मजबूत रक्षात्मक दीवारें और बुर्ज बनाए गए थे।उत्खनन में इन यूनानी नगरों से पत्थरों की गोल तश्तरियां (Stone Palettes) मिली हैं, जिन्हें कॉस्मेटिक या धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाता था। इन तश्तरियों पर यूनानी जलपरी, सिबेले (Cybele), हेलियोस (Helios) और यूनानी पौराणिक दृश्य उकेरे गए हैं। इसके अलावा, यूनानी शैली के अंगूठियों के पत्थर (Intaglio gems), कांच के पात्र और मोहरें भी मिली हैं जो यह दर्शाती हैं कि 600 BCE से 300 CE के बीच भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में यूनानी और भारतीय जीवनशैली का एक सुंदर सामंजस्य स्थापित हो चुका था।नानी साम्राज्य केवल एक राजनीतिक दौर नहीं था, बल्कि यह दो महान विश्व सभ्यताओं के मिलन का अद्वितीय इतिहास था। यूनानियों की यथार्थवादी कला, मुद्रा निर्माण कला और नगर नियोजन ने भारत के कलात्मक परिदृश्य को एक नया आयाम दिया, जबकि भारत के वेदांत, बौद्ध धर्म और वैष्णव भक्ति ने यूनानी मन को गहराई से आंदोलित किया। संदर्भ1. https://tinyurl.com/26rod2fk 2. https://tinyurl.com/27ty54gd 3. https://tinyurl.com/22pwhkwb 4. https://tinyurl.com/29esfhae 5. https://tinyurl.com/25u8g3rz 6. https://tinyurl.com/28r9dmn5
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
भाई-बहनों के प्यार वाले त्योहार पर जानें, जुड़वाँ बच्चों की व्यक्तिगतता को बढ़ावा देने के उपाय
रक्षाबंधन का त्योहार, भाई-बहनों के प्यार का प्रतीक है। इसके विपरीत, भाई-बहनों की प्रतिद्वंद्विता स्वाभाविक है, लेकिन जुड़वाँ बच्चों के साथ यह और बड़ी लग सकती है। वे अक्सर अपने माता-पिता के समय और ध्यान के लिए सीधी प्रतिस्पर्धा में होते हैं, और चूंकि वे समान विकासात्मक चरणों में होते हैं, समान आवश्यकताएं और इच्छाएं पैदा होती हैं। तुलना करना या होना, जुड़वाँ बच्चों की प्रतिद्वंद्विता का सबसे बड़ा कारण है। रिश्तेदार, शिक्षक, दोस्त और अजनबी स्वाभाविक रूप से जुड़वाँ बच्चों की तुलना करते हैं। यह कोई दुर्भावनापूर्ण बात नहीं है और केवल एक स्वाभाविक मानवीय व्यवहार है।लेकिन जुड़वाँ बच्चों के लिए, किसी दूसरे व्यक्ति के मुकाबले लगातार आंके जाने का अनुभव, कभी-कभार संरचनात्मक रूप से उनके अस्तित्व के रूप में एक दबाव पैदा करता है। उदाहरण के लिए, उनके व्यक्तित्व बहुत अलग हो सकते हैं। एक जुड़वाँ अधिक बहिर्मुखी (extrovert) हो सकता है, जबकि दूसरा अधिक अंतर्मुखी (introvert) हो सकता है। यह अंतर, उनके रिश्ते में तनाव पैदा कर सकता है।https://sceh.net/ प्रतिद्वंद्विता की गतिशीलता जुड़वाँ बच्चों के प्रकार के अनुसार काफी भिन्न होती है। समरूप जुड़वाँ (आइडेंटिकल ट्विन्स - Identical Twins) बच्चों की तुलना उनके रूप-रंग और व्यक्तित्व पर की जाती है। समलैंगिक भ्रातृ जुड़वाँ (फ्रेटर्नल ट्विन्स - Fraternal Twins) बच्चों को अक्सर एक ही श्रेणी में रख दिया जाता है, भले ही उनमें किसी भी अन्य भाई-बहन की तुलना में कोई अधिक आनुवंशिक समानता न हो। इसके अलावा, लड़का-लड़की (भाई-बहन) की जुड़वाँ जोड़ी को उन विकासात्मक समय-सीमाओं पर तुलना का सामना करना पड़ता है, जो मेल नहीं खाती हैं। उदाहरण के लिए, लड़कियाँ आमतौर पर शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से तेजी से सुचिंतित होती हैं, जिससे उसका जुड़वाँ भाई खुद को हमेशा पीछे महसूस कर सकता है।परिणामस्वरूप, जुड़वाँ बच्चों को अक्सर स्व-अस्तित्व की भावना महसूस नहीं होती है। माता-पिता, दूसरे लोगों को अपने जुड़वाँ बच्चों की तुलना करने से नहीं रोक सकते, लेकिन वे खुद ऐसा करने से बच सकते हैं। जब दूसरे ऐसा करते हैं, तो वे सौम्य तरीके से उनका ध्यान भटका सकते हैं। यह आवश्यक है क्योंकि, दोनों बच्चे दो अलग-अलग लोग हैं, और प्रत्येक अपने दम पर दिलचस्प है।ईर्ष्या, एक आम और प्रबंधनीय भावना है। अधिकांश जुड़वाँ बच्चे किसी न किसी मोड़ पर, अपने भाई–बहन से ईर्ष्या का अनुभव करते हैं। अधिकांश बच्चे, इस रिश्ते को बिना किसी स्थायी नुकसान पहुँचाए, इससे निपटना सीख जाते हैं। परंतु, द्वेष करना कुछ अलग है। जुड़वाँ बच्चों में द्वेष, विशेषकर वर्षों की तुलना और महसूस की गई असमानता के बाद विकसित होता है। वास्तव में, यह घातक हो सकता है, और गलत टिप्पणियों, रिश्तों या अवसरों में नुकसान या शत्रुता में परिवर्तित हो सकता है। जो जुड़वाँ बच्चे गहरे द्वेष को अपने अंदर रखते हैं, वे अक्सर इसे खुद भी स्वीकार नहीं कर पाते।अतः माता-पिता के लिए व्यावहारिक निष्कर्ष यह है कि यदि आपके जुड़वाँ बच्चे लड़ रहे हैं, तो केवल यह न पूछें कि वे किस बात पर लड़ रहे हैं, बल्कि यह पूछें कि यह लड़ाई उनपर क्या प्रभाव डाल रही है। कुछ जुड़वाँ बच्चों को लग सकता है कि वे अपने माता-पिता का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहे हैं। यह भावना खासकर शुरुआती वर्षों में आम है, जब उनको माता–पिता की बार-बार जरूरत होती हैं।अगर, हम अपने परिचित जुड़वाँ बच्चों में प्यार चाहते हैं या उनके माता-पिता हैं, तो निम्नलिखित कुशल तरीकें मददगार हो सकते हैं।1. व्यक्तिगतता को बढ़ावा दें और तुलना से बचेंजुड़वाँ बच्चों के व्यक्तिगत गुणों को उजागर करना, तुलना से बचने का अच्छा तरीका है। जुड़वाँ बच्चों को अपने स्वयं के हितों और गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें। उदाहरण के लिए, यदि एक बच्चे को चित्रकारी करना पसंद है और दूसरे को संगीत पसंद है, तो दोनों बच्चों की व्यक्तिगत पसंद का समर्थन करें। इससे उन्हें आत्म-सम्मान और स्वायत्तता की भावना विकसित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, प्रत्येक बच्चे की अनूठी उपलब्धियों और गुणों का जश्न मनाएं।2. स्पष्ट और सुसंगत सीमाएँ निर्धारित करेंस्पष्ट नियमों और दिनचर्या को स्थापित करने से घर में संघर्ष को कम करने और निष्पक्षता को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। जुड़वाँ बच्चों को अक्सर तब प्रतिस्पर्धा की भावना महसूस होती है, जब उन्हें लगता है कि उनकी तुलना में दूसरे के साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है। प्रतिद्वंद्विता को कम करने के लिए, व्यवहार, अपेक्षाओं और अनुशासन को संभालने के तरीके में सुसंगत रहें। सुसंगत दिनचर्या और अपेक्षाएं होने से दोनों जुड़वाँ बच्चों को यह समझने में मदद मिलती है कि क्या स्वीकार्य है, उनसे क्या उम्मीद की जाती है, और एक-दूसरे की जगह और सामान का सम्मान करने का क्या महत्व है।3. सहयोग को प्रोत्साहित करेंजबकि प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है, जुड़वाँ बच्चों को सहयोग करना और एक संघ के रूप में एक साथ काम करना सिखाना, अधिक सकारात्मक रिश्ते को बढ़ावा दे सकता है। संघ आधारित गतिविधियाँ आपके जुड़वाँ बच्चों को प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे का समर्थन करने के मूल्य को देखने की अनुमति देती हैं। इसके अतिरिक्त, जब आप उनके सहयोग के क्षणों को देखते हैं, तो इस व्यवहार की प्रशंसा करें और उन्हें प्रोत्साहित करें।दूसरी ओर, उनके बीच यदि कोई असहमति उत्पन्न होती है, तो उन्हें इसे हल करने की प्रक्रिया के माध्यम से मार्गदर्शन करें। उन्हें अपनी भावनाओं को संप्रेषित करने और एक समाधान पर आने में उनकी मदद करें।4. पक्षपात से बचें और निष्पक्ष रहेंसुनिश्चित करें कि दोनों बच्चों को मूल्यवान महसूस हो और उनकी जरूरतें पूरी हों। यदि एक जुड़वाँ को किसी कार्य में अधिक सहायता की आवश्यकता है या उसकी कोई विशिष्ट आवश्यकता है, तो इस बात का ध्यान रखें कि आप अपना समय और ध्यान कैसे वितरित करते हैं। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि दोनों बच्चों को यह महसूस हो कि उन्हें आपके प्यार, ध्यान और समय का उचित हिस्सा मिल रहा है, तथा केवल किसी एक बच्चे की ही प्रशंसा नहीं हो रही है।5. संघर्ष कौशल सिखाएंजुड़वाँ बच्चों को यह सिखाना कि अपने दम पर संघर्षों को कैसे हल किया जाए, एक आवश्यक जीवन कौशल है। जब कोई असहमति उत्पन्न होती है, तो केवल तभी हस्तक्षेप करें जब आवश्यक हो और इसे सीखने के अवसर के रूप रूप में उपयोग करें। स्वस्थ तरीके से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में उनकी मदद करना और शांत भाषा का उपयोग करके समझौते को प्रोत्साहित करना मददगार होता है।https://sceh.net/ 6. प्रत्येक बच्चे को समान समय प्रदान करेंजुड़वाँ बच्चे, अक्सर समान अनुभवों और पर्यावरण को साझा करते हैं, जिससे उपेक्षा या असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है। प्रत्येक बच्चे के साथ एक मजबूत बंधन को बढ़ावा देने और प्रतिद्वंद्विता को कम करने के लिए, प्रत्येक बच्चे के साथ समान क्षणों के लिए समय निकालें। इससे दोनों बच्चों को खास महसूस करने में मदद मिलती है और उनकी व्यक्तिगत जरूरतों का पोषण होता है।7. धैर्यवान और सहानुभूतिपूर्ण बनेंजुड़वाँ बच्चों के प्रति सहानुभूति का अभ्यास करें, तथा उनकी भावनाओं और निराशाओं को स्वीकार करें। जब एक बच्चा परेशान हो, तो उसकी चिंताओं को सुनें, उसकी भावनाओं को मान्य करें और आराम प्रदान करें। जैसे-जैसे आपके जुड़वाँ बड़े होंगे, संघर्ष को संभालने और अपनी भावनाओं को साझा करने की उनकी क्षमता में सुधार होगा।8. बाहरी मदद कब लें?यदि आपके जुड़वाँ बच्चों के बीच भाई-बहनों की प्रतिद्वंद्विता विशेष रूप से तीव्र हो जाती है या लगातार आक्रामकता का कारण बनती है, तो माता-पिता को किसी विशेषज्ञ से मार्गदर्शन लेना मददगार हो सकता है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/mtptydfx 2. https://tinyurl.com/2phdxfur 3. https://tinyurl.com/25ymj468
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
शाहजहाँपुर घराने की पहचान है सरोद,व पश्चिमी संगीत में लय और ऊर्जा का आधार हैं परकशन वाद्य
शाहजहाँपुर भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा के लिए जाना जाता है। यही नगर प्रसिद्ध शाहजहाँपुर घराने का उद्गम स्थल भी माना जाता है, जिसने सरोद वादन की परंपरा को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संगीत की यही विरासत हमें दुनिया की अन्य संगीत परंपराओं को जानने के लिए भी प्रेरित करती है। पश्चिमी संगीत में लय और ऊर्जा का आधार माने जाने वाले प्रमुख वाद्यों में ड्रम और अन्य तालवाद्यों (परकशन) का विशेष स्थान है।https://sceh.net/ ड्रम और अन्य तालवाद्य किसी भी संगीत रचना की लय, गति और ऊर्जा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ड्रम किट में बास ड्रम, स्नेयर, टॉम और झाँझ जैसे अनेक वाद्य शामिल होते हैं, जिनके संयोजन से विभिन्न प्रकार की तालें और प्रभाव उत्पन्न किए जाते हैं। जैज़, रॉक, पॉप, लोक और विश्व संगीत सहित लगभग हर संगीत शैली में परकशन वाद्यों का प्रयोग श्रोताओं को संगीत की लय से जोड़ने का कार्य करता है।परकशन वादन की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। महान जैज़ ड्रमर बडी रिच (Buddy Rich) की प्रस्तुति उनकी अद्भुत गति, नियंत्रण और तकनीकी दक्षता का परिचय कराती है। वहीं स्टीव गैड (Steve Gadd) का वादन यह दर्शाता है कि सटीक लय और सहज अभिव्यक्ति किसी भी संगीत रचना को किस प्रकार नई ऊँचाई दे सकती है। भारतीय संदर्भ में मिकी हार्ट (Mickey Hart) और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन की संयुक्त प्रस्तुतियाँ यह दिखाती हैं कि पश्चिमी ड्रम और भारतीय तबला जैसी ताल परंपराएँ मिलकर भी एक अनूठा और आकर्षक संगीत अनुभव रच सकती हैं।आज परकशन वाद्य केवल किसी एक देश या संगीत शैली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विश्वभर की संगीत परंपराओं को जोड़ने का माध्यम बन चुके हैं। अलग-अलग संस्कृतियों की लय जब एक साथ सुनाई देती है, तो संगीत की सार्वभौमिक भाषा और भी प्रभावशाली बन जाती है। यदि आप ताल, ऊर्जा और रचनात्मकता से भरपूर संगीत का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ परकशन वाद्यों की वैश्विक लोकप्रियता और उनकी विविध अभिव्यक्तियों का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/5yf2ctmchttps://tinyurl.com/4thbkvxt https://tinyurl.com/m4m4v9rshttps://tinyurl.com/46av5nc7 https://tinyurl.com/3srzrrja
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
दैनिक जीवन में मनोविज्ञान आपको कैसे सफल बना सकता है?
मनोविज्ञान आज हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका इतिहास जितना हम सोचते हैं, उससे कहीं अधिक पुराना और दिलचस्प है। यूं तो मनोविज्ञान का एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में जन्म 19वीं सदी के अंत में हुआ, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन मिस्र, यूनान, चीन, फारस और भारत के दर्शनशास्त्र से जुड़ी हुई हैं। 17वीं सदी में फ्रांसीसी दार्शनिक रेने देकार्त ने यह विचार प्रस्तुत किया था कि मन और शरीर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं जो एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। पहले के विचारक जहां मानव स्वभाव को समझने के लिए केवल तर्क और अवलोकन का सहारा लेते थे, वहीं आज का मनोविज्ञान वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित है।मनोविज्ञान की शुरुआत एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में कैसे हुई?19वीं सदी के मध्य में विल्हेम वुण्ट (Wilhelm Wundt) नामक एक जर्मन शरीर विज्ञानी ने प्रतिक्रिया समय की जांच के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान विधियों का उपयोग करना शुरू किया। उनकी पुस्तक ने शरीर विज्ञान और मानव विचार के बीच संबंधों को स्पष्ट किया। वर्ष 1879 में वुण्ट ने लीपज़िग (Leipzig) विश्वविद्यालय में दुनिया की पहली मनोविज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना की। इसी घटना को एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान की आधिकारिक शुरुआत माना जाता है। वुण्ट का मानना था कि मनोविज्ञान मानव चेतना का अध्ययन है। उनके एक प्रसिद्ध छात्र एडवर्ड बी टिचेनर (Edward B. Titchener) ने संरचनावाद की नींव रखी, जिसके अनुसार मानव चेतना को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जा सकता है।https://sceh.net/ इसी दौरान अमेरिका में भी मनोविज्ञान फल-फूल रहा था। विलियम जेम्स (William James) ने मनोविज्ञान की प्रसिद्ध पुस्तक लिखकर खुद को अमेरिकी मनोविज्ञान के जनक के रूप में स्थापित किया। उनके विचारों से प्रकार्यवाद का जन्म हुआ। प्रकार्यवाद इस बात पर केंद्रित था कि लोग अपने पर्यावरण में जीवित रहने के लिए व्यावहारिक रूप से कैसे व्यवहार करते हैं।सिगमंड फ्रॉयड ने मानव मन के किन अनसुलझे रहस्यों को उजागर किया?20वीं सदी की शुरुआत में ऑस्ट्रियाई न्यूरोलॉजिस्ट सिगमंड फ्रॉयड (Sigmund Freud) ने मनोविज्ञान की दिशा ही बदल दी। उन्होंने मनोविश्लेषण नामक एक नई पद्धति की खोज की, जिसने अचेतन मन के महत्व पर सबसे अधिक ज़ोर दिया। फ्रॉयड का मानना था कि हमारे बचपन के अनुभव और अचेतन इच्छाएं हमारे व्यक्तित्व और व्यवहार को आकार देती हैं।फ्रॉयड ने यह सिद्ध किया कि मानसिक विकारों का कारण अक्सर वह अचेतन संघर्ष होता है जिसे हम समझ नहीं पाते। उन्होंने सपनों की व्याख्या को अचेतन मन तक पहुंचने का सबसे प्रामाणिक रास्ता बताया। उनके अनुसार सपने हमारी दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति का एक तरीका हैं। फ्रॉयड के मनोविश्लेषण सिद्धांत ने न केवल मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र को बल्कि कला, साहित्य और लोकप्रिय संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित किया।कार्ल युंग के विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान ने क्या नए विचार दिए? स्विस मनोचिकित्सक कार्ल युंग (Carl Jung) ने विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान की स्थापना की। युंग शुरुआत में फ्रॉयड के करीबी सहयोगी थे, लेकिन बाद में वैचारिक मतभेदों के कारण दोनों के रास्ते अलग हो गए। युंग ने व्यक्तित्व को दो मुख्य प्रकारों में बांटा जिन्हें आज हम अंतर्मुखी और बहिर्मुखी के रूप में जानते हैं।युंग का सबसे बड़ा योगदान सामूहिक अचेतन और मूलरूपों का सिद्धांत था। उनका मानना था कि कुछ यादें और विचार पूरी मानव जाति में समान रूप से पाए जाते हैं जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। युंग ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मनोविज्ञान और धर्म के बीच के संबंधों को समझने में बिताया। उन्होंने मध्य आयु वर्ग के लोगों की मनोचिकित्सा में भी अहम भूमिका निभाई और उन्हें अपने जीवन के अर्थ को फिर से खोजने में मदद की।बी एफ स्किनर और व्यवहारवाद ने मनोविज्ञान को कैसे बदला?20वीं सदी में ही मनोविज्ञान में एक नई विचारधारा का जन्म हुआ जिसे व्यवहारवाद कहा गया। इसका उद्देश्य मनोविज्ञान को एक पूर्ण वैज्ञानिक रूप देना था, इसलिए इसने केवल उस व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया जिसे स्पष्ट रूप से देखा और मापा जा सकता था।रूसी शरीर विज्ञानी इवान पावलोव (Ivan Pavlov) ने कुत्तों पर किए गए अपने प्रयोगों से क्लासिकल कंडीशनिंग की खोज की। इसके बाद जॉन बी वाटसन (John B. Watson) ने व्यवहारवाद को मजबूती दी। लेकिन इसे सबसे अधिक प्रसिद्धि बी. एफ. स्किनर (B.F. Skinner) ने दिलाई। स्किनर ने ऑपरेंट कंडीशनिंग का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार किसी भी व्यवहार को पुरस्कार या दंड के माध्यम से बदला जा सकता है। उन्होंने जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए स्किनर बॉक्स का आविष्कार किया और शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रोग्राम्ड लर्निंग और टीचिंग मशीन जैसी अवधारणाएं पेश कीं।आधुनिक मनोविज्ञान की प्रमुख शाखाएं कौन सी हैं? जैसे-जैसे मानव व्यवहार की समझ बढ़ती गई, मनोविज्ञान कई विशेष शाखाओं में बंटता चला गया। नैदानिक मनोविज्ञान मानसिक बीमारियों और असामान्य व्यवहार के निदान और उपचार पर केंद्रित है। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान इस बात का अध्ययन करता है कि लोग कैसे सोचते हैं, याद रखते हैं और निर्णय लेते हैं। विकासात्मक मनोविज्ञान जीवनभर मानव विकास और बदलाव को समझता है।इसके अलावा शैक्षिक मनोविज्ञान छात्रों के सीखने के तरीकों और शिक्षा प्रणाली को सुधारने पर काम करता है। फोरेंसिक मनोविज्ञान कानून और न्याय प्रणाली में मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग करता है। औद्योगिक-संगठनात्मक मनोविज्ञान कार्यस्थलों पर कर्मचारियों की उत्पादकता और भलाई को बढ़ाने के लिए काम करता है। खेल मनोविज्ञान एथलीटों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके प्रदर्शन को बेहतर बनाने पर ध्यान देता है। स्वास्थ्य मनोविज्ञान यह देखता है कि जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करते हैं।हमारे दैनिक जीवन में मनोविज्ञान का क्या महत्व है? मनोविज्ञान केवल अस्पतालों या किताबों तक सीमित नहीं है, यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि लोग वैसा व्यवहार क्यों करते हैं जैसा वे करते हैं। यह समझ हमारे व्यक्तिगत और व्यावसायिक रिश्तों में सहानुभूति और धैर्य लाती है।मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मनोविज्ञान की भूमिका सबसे अहम है। यह हमें तनाव, चिंता और अवसाद जैसी भावनाओं को पहचानने और उनसे निपटने के तरीके सिखाता है। मनोविज्ञान हमारे संचार कौशल को भी निखारता है। यह हमें बॉडी लैंग्वेज समझने और अपनी बात को सही ढंग से रखने में मदद करता है। इसके अलावा, हमारे दैनिक निर्णय भी भावनाओं और पुरानी यादों से प्रभावित होते हैं। मनोविज्ञान हमें संतुलित और तर्कसंगत निर्णय लेना सिखाता है। कार्यस्थलों पर नेतृत्व क्षमता बढ़ाने से लेकर समाज की भलाई तक, मनोविज्ञान हर जगह लागू होता है।मनोविज्ञान के इतिहास में महिलाओं का क्या योगदान रहा? इतिहास के पन्नों में अक्सर मनोविज्ञान के क्षेत्र में केवल पुरुषों के योगदान का ज़िक्र मिलता है, लेकिन शुरुआती दौर में तमाम चुनौतियों के बावजूद महिलाओं ने भी इस क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया है। मैरी व्हिटन काल्किन्स (Mary Whiton Calkins) ने हार्वर्ड में पढ़ाई की और वह अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (Psychological Association) की पहली महिला अध्यक्ष बनीं, हालांकि हार्वर्ड ने उन्हें केवल महिला होने के कारण डिग्री देने से मना कर दिया था। अन्ना फ्रॉयड (Anna Freud) ने बाल मनोविश्लेषण की नींव रखी और रक्षा तंत्र के कई सिद्धांतों को स्पष्ट किया। इसी तरह मैरी आइंसवर्थ ने बच्चों के विकास और उनके जुड़ाव को समझने में बहुत बड़ा योगदान दिया।भारत में मनोविज्ञान के विकास में गिरींद्रशेखर बोस की क्या भूमिका रही?जब वैश्विक स्तर पर मनोविज्ञान अपनी जड़ें जमा रहा था, तब भारत में भी इसकी शुरुआत हो रही थी। डॉ गिरींद्रशेखर बोस ने भारत में मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया। उन्होंने पश्चिमी मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ और संस्कृति के अनुसार ढाला और समझा। डॉ बोस के प्रयासों ने ही भारत में मानसिक स्वास्थ्य और मानव व्यवहार के वैज्ञानिक अध्ययन की मजबूत नींव रखी, जिससे आज की पीढ़ी लाभान्वित हो रही है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/279lprec 2. https://tinyurl.com/t4x5m4m 3. https://tinyurl.com/yd977ava 4. https://tinyurl.com/yxdzupc7 5. https://tinyurl.com/2ydyhegw 6. https://tinyurl.com/ygxnzlka 7. https://tinyurl.com/24l6q92f 8. https://tinyurl.com/2bpwl6g4
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
शाहजहाँपुर के राम प्रसाद बिस्मिल व् अशफाकउल्ला ख़ान:एकता की मिसाल रख हिलाई ब्रिटिश हुकूमत
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों के रक्त से लिखा गया है। जब भी देश के स्वतंत्रता संग्राम और सशस्त्र क्रांति का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। शाहजहाँपुर ने भारत माता को दो ऐसे महान सपूत दिए, जिन्होंने अपने शौर्य और बलिदान से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। ये दो नाम राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला ख़ान हैं। इन दोनों महान क्रांतिकारियों ने अपनी गहरी मित्रता और देशभक्ति से यह साबित कर दिया कि आज़ादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम एकता कितनी मज़बूत थी और देशप्रेम की वेदी पर प्राण न्यौछावर करने का जज़्बा कैसा होता है।https://sceh.net/ राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला ख़ान का प्रारंभिक जीवन कैसा था?बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहाँपुर ज़िले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। अपनी युवा अवस्था में बिस्मिल ने, वर्ष 1875 में दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित किए गए आर्य समाज में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने एक प्रतिभाशाली लेखक और कवि के रूप में पहचान बनाई। जब उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादी और आर्य समाज के प्रचारक भाई परमानंद को दी गई मौत की सज़ा के बारे में पढ़ा, तो उनके भीतर पहली बार देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना पैदा हुई। सिर्फ 18 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पीड़ा को 'मेरा जन्म' नामक अत्यंत सशक्त कविता के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने 'राम', 'अज्ञात' और 'बिस्मिल' (जिसका अर्थ घायल या बेचैन होता है) जैसे उपनामों का उपयोग करते हुए हिंदी और उर्दू में कई रचनाएं लिखीं और वे बिस्मिल के नाम से ही देश भर में प्रसिद्ध हुए। दूसरी ओर, अशफाकउल्ला ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 को शाहजहाँपुर में ही हुआ था। उनके पिता का नाम शफीक उल्लाह ख़ान और माता का नाम मजहूर-उन-निसा था। अशफाकउल्ला उस समय बड़े हो रहे थे जब देश में स्वतंत्रता की अलख जग चुकी थी। दोनों ही क्रांतिकारी शाहजहाँपुर की माटी से जुड़े थे और दोनों के भीतर देशप्रेम की गहरी भावना थी, जिसने उन्हें एक साथ ला खड़ा किया।क्रांतिकारी विचारधारा और सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?महात्मा गांधी ने जब देश में असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो उन्होंने भारतीयों से आग्रह किया कि वे सरकार को कर न दें और ब्रिटिश हुकूमत के साथ सहयोग न करें। लेकिन आंदोलन शुरू होने के लगभग 1.5 साल बाद, फरवरी 1922 में गोरखपुर में चौरी चौरा की घटना घटी। इस घटना में प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ पुलिस से भिड़ गई और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें लगभग 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा का कड़ा विरोध करते हुए, महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से देश के युवा बहुत निराश हुए और उनका मोहभंग हो गया। अशफाकउल्ला ख़ान और राम प्रसाद बिस्मिल भी इन्हीं युवाओं में से थे। बिस्मिल का कॉन्ग्रेस पार्टी की उदारवादी विचारधारा से मोहभंग हो गया था। वे गांधीवादी अहिंसक तरीकों के विपरीत स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी तरीकों में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि हिंसा और रक्तपात के बिना स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है। इसी विचारधारा के साथ, दोनों क्रांतिकारी एक-दूसरे के संपर्क में आए और सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना। इससे पहले बिस्मिल 'मातृवेदी' नामक एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना कर चुके थे और वर्ष 1918 के मैनपुरी षड्यंत्र में भी शामिल रहे थे।हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) का गठन क्यों किया गया था?देश को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से, अक्टूबर 1924 में कानपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, जोगेश चंद्र चटर्जी और सचिन सान्याल ने मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) की स्थापना की। इसके बाद इसमें अशफाकउल्ला ख़ान भी प्रमुखता से जुड़ गए। मध्य 1920 के दशक में, इसी संगठन को पुनर्गठित करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) के रूप में भी जाना गया, जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवा समाजवादी विचारकों ने प्रमुख भूमिका निभाई।इस संगठन का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक सरकार को उखाड़ फेंकना और उसके स्थान पर फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया (Federal Republic of United States of India) की स्थापना करना था, जिसका मूल सिद्धांत वयस्क मताधिकार होगा। वर्ष 1925 में, इस संगठन ने द रिवोल्यूशनरी (The Revolutionary) नामक एक घोषणापत्र प्रकाशित किया। इस घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया था कि इस गणराज्य के अंतिम संविधान को तब तैयार किया जाएगा जब भारत के प्रतिनिधियों के पास अपने निर्णय लेने की शक्ति होगी। साथ ही, इसका उद्देश्य मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करना था। रेलवे, परिवहन, खदानों और बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने का भी संकल्प लिया गया था।घोषणापत्र में यह भी स्पष्ट किया गया था कि भारतीय क्रांतिकारी न तो आतंकवादी हैं और न ही अराजकतावादी। वे देश में अराजकता नहीं फैलाना चाहते। उनका उद्देश्य केवल आतंकवाद नहीं है, हालांकि वे प्रभावी प्रतिशोध के रूप में कभी-कभी इस तरीके का सहारा ले सकते हैं।ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) को अंजाम कैसे दिया गया?हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की गतिविधियों और सशस्त्र क्रांति के लिए हथियारों की आवश्यकता थी, जिसके लिए भारी धन की ज़रूरत थी। इसके लिए संगठन ने ब्रिटिश खजाने को लूटने की योजना बनाई। 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला ख़ान, शचींद्रनाथ बख्शी, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त और केशव चक्रवर्ती सहित 10 युवा क्रांतिकारियों ने एक साहसिक डकैती को अंजाम दिया। यह घटना लखनऊ के पास काकोरी नामक गाँव में घटी।उन्होंने नंबर 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन (Number 8 Down Passenger Train) को रोका, जो शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही थी। इस ट्रेन में ब्रिटिश हुकूमत का आधिकारिक खज़ाना (रेलवे का पैसा) ले जाया जा रहा था, जिसका उपयोग क्रांतिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को कमज़ोर करने के लिए करना चाहते थे। क्रांतिकारियों ने ट्रेन रोककर वह सारा खज़ाना लूट लिया। इस साहसिक घटना को काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) के नाम से जाना जाता है। इस घटना से संगठन को बहुत आवश्यक वित्तीय सहायता मिली, जिससे संगठन का विस्तार हुआ।इस घटना की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने अब काकोरी और मलीहाबाद क्षेत्र के प्रसिद्ध दशहरी आमों का नाम बदलकर इस ऐतिहासिक घटना के सम्मान में काकोरी ब्रांड (Kakori Brand) कर दिया है।गिरफ्तारी, मुकदमा और अंततः शहादत की कहानी क्या है?काकोरी ट्रेन एक्शन के एक महीने के भीतर ही संगठन के कई सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए। इस मामले में कुल 17 लोगों को जेल भेजा गया और 4 को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। राम प्रसाद बिस्मिल को सितंबर 1926 में गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन अशफाकउल्ला ख़ान कुछ समय तक फरार रहे। वे कुछ समय तक अपने घर से आधा मील दूर गन्ने के खेत में छिपे रहे। उसके बाद वे बिहार गए और फिर दिल्ली चले गए, जहाँ अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।काकोरी कांड का यह मुकदमा लगभग 1.5 साल तक चला। अप्रैल 1927 में मुकदमे का फैसला आया, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला ख़ान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई, जबकि अन्य को उम्रकैद की सज़ा दी गई। 19 दिसंबर, 1927 को इन वीर सपूतों को फाँसी दे दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में अपने प्राणों की आहुति दी, जबकि अशफाकउल्ला ख़ान ने फ़ैज़ाबाद में हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया। अशफाकउल्ला ख़ान को उनके पैतृक ज़िले शाहजहाँपुर में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।इन क्रांतिकारियों के बलिदान को आज भी पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने गोरखपुर में एक प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) का नाम महान स्वतंत्रता सेनानी अशफाकउल्ला ख़ान के नाम पर रखने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है। शाहजहाँपुर की भूमि हमेशा इस बात पर गर्व करेगी कि उसने आज़ादी की बलिवेदी पर अपने दो सबसे अनमोल रत्न न्यौछावर किए।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2xwgrznn 2. https://tinyurl.com/28fegk2w 3. https://tinyurl.com/25p8ule4
हथियार और खिलौने
राइट ब्रदर्स से लेकर स्वदेशी तेजस तक, जरूर जानें विमानन का इतिहास, विज्ञान और सैन्य सफर
क्या आप जानते हैं कि, हवाई जहाज का पहला सच्चा संस्करण इंग्लैंड में सर जॉर्ज कैली (Sir George Caley) द्वारा बनाया गया था। उन्नीसवीं सदी तक निश्चित पंख और प्रोपेलेंट (Propellent) प्रणाली वाले विमान के डिजाइन नहीं थे। इसी समय, 1874 में फेलिक्स डू टेम्पल (Felix Du Temple) भाप से चलने वाले मोनोप्लेन (Monoplane) के साथ संचालित उड़ान का प्रयास करने वाले पहले व्यक्ति बने। किसी विमान में पहली निरंतर एवं नियंत्रित उड़ान, 1903 में राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) द्वारा हासिल की गई थी। 1905 फ़्लायर (Flyer), तीन-अक्ष नियंत्रण वाला पहला विमान था, और भविष्य के सभी विमानों का आधार बना।1889 में लॉरेंस हार्ग्रेव (Lawrence Hargrave) ने रोटरी इंजन का आविष्कार किया, जो संचालित उड़ान के लिए एक बड़ा कदम था। संचालित उड़ान ने अधिक नियंत्रण और अधिक सीमा की अनुमति दी, और उड़ान को परिवहन का एक व्यवहार्य तरीका बना दिया। जल्द ही लोग विमानन का अध्ययन करने लगे। फिर कुछ वर्षों बाद, 1914 में इगोर सिकोरस्की (Igor Sikorsky) ने एक बड़ा चार इंजन वाला बाइ-प्लेन (Bi–plane) बनाया, जो एक पायलट और एक सह-पायलट के लिए दोहरे नियंत्रण, केबिन प्रकाश व्यवस्था, बिस्तर और शौचालय के साथ लंबी दूरी तक उड़ान भरने में सक्षम था। इसका उपयोग निजी और सैन्य भूमिकाओं के लिए किया जाता था।https://sceh.net/ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, सशस्त्र बलों के लिए हवा से हमला करने में सक्षम होना एक रोमांचक अवधारणा थी। 1914 तक, विमानों को काफी परिष्कृत किया गया था। जबकि, दूसरे विश्व युद्ध तक विमानों में हथियारों के रूप में भी काफी सुधार हो चुका था। तब लड़ाके और बमवर्षक विमान आम हो गए थे। विश्व युद्ध के बाद, ऐसे स्टील्थ विमान (Stealth Planes) बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिन्हें रडार द्वारा पहचाना नहीं जा सकता था। इसके अलावा, सुपरसोनिक विमान 1947 से महत्वपूर्ण बने हैं। लेकिन बेहतर डिजाइनों की बदौलत, अब सुपरसोनिक उड़ान में नए सिरे से दिलचस्पी बढ़ी है।दरअसल, उड़ान हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए, एक हवाई जहाज चार बुनियादी वायुगतिकीय बलों के सावधानीपूर्वक संतुलन पर निर्भर करता है: लिफ्ट (Lift), वेट (Weight), थ्रस्ट (Thrust), और ड्रैग (Drag)। किसी विमान को सुचारू रूप से उड़ान भरने के लिए, इन बलों को संतुलित होना चाहिए।1. थ्रस्ट: यह विमान के प्रोपेलर (Propeller) या जेट इंजन द्वारा उत्पन्न वायुगतिकीय बल है, जो आकाश में हवाई जहाज को आगे धकेलता या खींचता है।2. ड्रैग: यह थ्रस्ट का विरोधी बल है। ड्रैग वह घर्षण और वायु प्रतिरोध है, जो वायुमंडल में उड़ते समय विमान को धीमा करने की कोशिश करता है। खिंचाव को कम करने और उच्च गति बनाए रखने के लिए, विमानों को वायुगतिकीय बनाया जाता है (जैसे कि, उड़ान भरने के बाद उनके लैंडिंग गियर को वापस लेना)। किसी विमान को आगे बढ़ने और उसकी गति बनाए रखने या बढ़ाने के लिए, थ्रस्ट, ड्रैग के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए।3. वेट: यह हवाई जहाज के द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर लगने वाला बल है। भारी वाणिज्यिक विमानों में काफी वजन होता है, जो उन्हें पृथ्वी की ओर खींचता है।4. लिफ्ट: यह ऊपर की ओर जाने वाला विरोधी बल है, जो वजन पर काबू पाता है, और हवाई जहाज को हवा में बनाए रखता है। विमान को ऊपर उठाने या उसकी ऊंचाई बनाए रखने के लिए, लिफ्ट, वजन के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए। लिफ्ट तभी मौजूद हो सकता है, जब किसी ठोस वस्तु और गतिशील तरल पदार्थ (वायु) के बीच गति में सापेक्ष अंतर हो। विमान का पंख आने वाले वायु प्रवाह को विभाजित करने के लिए एयरफ़ॉइल (Airfoil) के रूप में कार्य करता है।एयरफ़ॉइल आकार और हवा की गति: विमानों के पंख को विशेष रूप से आकार दिया जाता है, और वह झुका हुआ होता है। इससे पंख के शीर्ष पर बहने वाली हवा का मार्ग संकीर्ण हो जाता है, जिससे वह नीचे से गुजरने वाली हवा की तुलना में तेज़ गति से बहती है।बर्नौली का सिद्धांत (Bernoulli’s principle): द्रव गतिकी के अनुसार, जैसे-जैसे हवा की गति बढ़ती है, उसका दबाव कम हो जाता है। चूंकि पंख के ऊपर बहने वाली हवा तेजी से चलती है, यह पंख के नीचे धीमी गति से बहने वाली हवा की तुलना में कम दबाव डालती है। दबाव में यह अंतर ऊपर की ओर दबाव पैदा करता है, जिसे लिफ्ट के रूप में जाना जाता है।आकाश में दिशा बदलने और संचालन करने के लिए, पायलट एयरफ़ोइल के आकार को बदलते हैं, और विशिष्ट नियंत्रण प्रणालियों का उपयोग करके, बलों के संतुलन को समायोजित करते हैं।पूरे इतिहास में, वाणिज्यिक प्रौद्योगिकियां अक्सर सैन्य प्रगति से विकसित हुई हैं। हवाई जहाज के विकास में भी, यही नियम लागू होता है। उड़ान भरने की क्षमता का उपयोग, सबसे पहले खोज करने वाले विमानों को विकसित करने के लिए किया गया था। फिर, एक बार जब लोगों ने उन विमानों को मार गिराने की तकनीक विकसित कर ली, तो लड़ाकू विमान पेश किए गए। इस कारण, विमानों को हल्का, तेज़ और अधिक चुस्त बनाना पड़ा, जिससे राष्ट्रो को नवाचार करना पड़ा।इससे अंततः ऐसे विमान तैयार हुए जो व्यावसायिक उपयोग के लिए पर्याप्त सुरक्षित और विश्वसनीय थे। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, पूरी दुनिया में वाणिज्यिक विमान सेवाएं उभरने लगीं। हवाई यात्रा में नवाचार का अगला बड़ा दौर 1940 के दशक में द्वितीय विश्व युद्ध के साथ हुआ। बोइंग (Boeing) विमान, जो पहले छोटे मेल वाहक और वाणिज्यिक विमान थे, तब सैन्य परिदृश्य में प्रवेश कर गए।प्रथम विश्व युद्ध में पहले हवाई जहाजों का उपयोग किए जाने के बाद से, सैन्य विमानन ने एक लंबा सफर तय किया है। प्रोपेलर-चालित बाइप्लेन से लेकर गुप्त लड़ाकू विमानों तक, सैन्य विमानों की तकनीक पिछली शताब्दी में काफी विकसित हुई है। सैन्य वैमानिकी के शुरुआती दिनों में, विमान अपेक्षाकृत सरल मशीनें थीं। आम तौर पर, वे पिस्टन इंजन (Piston engine) द्वारा संचालित बाइप्लेन थे, और हवाई लड़ाई के लिए मशीन गन से लैस थे। ये विमान दुश्मन की गोलाबारी के प्रति संवेदनशील थे, और कम ऊंचाई पर ही उड़ सकते थे। हालांकि, वे खोज करने और जमीनी हमले की भूमिकाओं में अत्यधिक प्रभावी साबित हुए।प्रथम विश्व युद्ध के बाद अधिक शक्तिशाली इंजनों की शुरूआत और वायुगतिकी में प्रगति के कारण तेज और अधिक गतिशील विमानों का विकास हुआ। फिर, प्रोपेलर-चालित लड़ाकू विमान द्वितीय विश्व युद्ध में प्रमुख बन गए। ये विमान उच्च गति और ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम थे, तथा वे रडार और रॉकेट जैसी उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस थे।1940 के दशक के अंत में जेट-संचालित विमानों के विकास ने सैन्य विमानन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया। जेट इंजन, पिस्टन इंजन की तुलना में अधिक शक्तिशाली और कुशल थे, जिससे विमान बहुत अधिक गति और ऊंचाई पर उड़ सकते थे। बाद में, 1980 के दशक में स्टील्थ तकनीक (Stealth technology) के विकास ने सैन्य विमानन में क्रांति ला दी। स्टील्थ तकनीक को रडार पर विमान का पता लगाना कठिन बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, और इसने अत्यधिक उन्नत लड़ाकू जेट के विकास की अनुमति दी। ये विमान उन्नत एवियोनिक्स (Avionics), सेंसर और हथियार प्रणालियों से लैस हैं, जो उन्हें दुनिया के सबसे सक्षम लड़ाकू विमानों में से एक बनाते हैं।सैन्य विमान प्रौद्योगिकी के भविष्य में, यह संभावना है कि, विमान प्रौद्योगिकी का विकास जारी रहेगा, तथा प्रोपेलेंट, सामग्री और एवियोनिक्स में नई प्रगति के साथ और भी अधिक उन्नत लड़ाकू विमान तैयार होंगे। सैन्य विमान प्रौद्योगिकी का विकास, मानव जगत की सरलता और नवीनता का प्रमाण है, और यह सभी देशों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।इसी का एक उदाहरण, हमारे देश का लड़ाकू विमान - एचएएल तेजस (HAL Tejas) है। यह एक भारतीय एकल इंजन, 4.5 जनरेशन, एवं डेल्टा विंग वाला बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान है, जिसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी द्वारा डिजाइन किया गया है। इसे भारतीय वायु सेना (आईएएफ) और भारतीय नौसेना के लिए, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा निर्मित किया गया है। इस विमान ने 2001 में अपनी पहली उड़ान भरी थी, और इसने 2015 में भारतीय वायुसेना के साथ सेवा में प्रवेश किया। यह विमान अपनी जेनरेशन के सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों में सबसे छोटा और हल्का है।1980 के दशक में, भारतीय वायु सेना मिग-21 जैसे पुराने लड़ाकू विमानों का संचालन कर रही थी। मिग-21, 1963 से भारतीय वायुसेना का मुख्य आधार रहा है। फिर, 1983 में भारत सरकार ने भारतीय वायुसेना के पुराने बेड़े को बदलने के लिए एक नया हल्का लड़ाकू विमान विकसित करने के प्रारंभिक लक्ष्य के साथ लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (Light Combat Aircraft) कार्यक्रम की स्थापना की थी। इसी कार्यक्रम के चलते तेजस विमान का विकास किया गया।संदर्भ1. https://tinyurl.com/ynspwfdj 2. https://tinyurl.com/56rcxnku 3. https://tinyurl.com/yry42yvz 4. https://tinyurl.com/2dtcj2uw 5. https://tinyurl.com/yb5368kf 6. https://tinyurl.com/5b4wn7y5
मिट्टी के बर्तन से काँच व आभूषण तक
मणिपुर के लोंगपी काली मिट्टी बर्तन हैं एक उदाहरण, आधुनिक युग में पारंपरिक शिल्प के सम्मान का
हम जानते ही हैं कि, हमारा भारत देश शिल्प कला में दुनिया में अग्रसर है। क्या आप जानते हैं कि, मणिपुर के नुंगबी खुल्लन गांव के तांगखुल नागा लोग, कई सदियों से हाथ से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। माना जाता है कि, ये ‘लोंगपी मिट्टी बर्तन’, जिन्हें नुंगबी मिट्टी के बर्तन के नाम से भी जाना जाता है, नवपाषाण काल (10,000 ईसा पूर्व) से ही चलन में है। उखरुल जिले के नुंगबी गांव में 400 घर हैं, और लगभग 200 कारीगर आज भी इस शिल्प का अभ्यास कर रहे हैं। मुख्य कुम्हार और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ता - माचिहान सासा, तांगखुल जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, और उनके काम ने इधर की मिट्टी के बर्तनों को वैश्विक पहचान दिलाई है।पत्थर-मिट्टी के साधारण बर्तन बनाने के लिए, अगर मिट्टी को पत्थर के साथ मिलाया जाए, तो आग में गर्म करने पर वह फूट जाएगा। परंतु, तांगखुल लोगों ने इस शिल्प में महारत हासिल की है, और लोंगपी बर्तनों का भंडारण के साथ-साथ, उच्च तापमान पर खाना पकाने के लिए भी सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।हाथ से आकार दिए गए इन बर्तनों को पॉलिश किया जाता है, धूप में सुखाया जाता है, और फिर अलाव में जलाया जाता है। इससे उनका रंग काला या भूरा, और धातु जैसा दिखने लगता है। परंपरागत रूप से, हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों का उपयोग स्थानीय स्तर पर, मैतेई, माओ नागा, कोम, पाओमी, जैसे कुछ अन्य समुदायों द्वारा भी किया जाता था। अब मणिपुर के बाहर भी इनकी अच्छी मांग है, क्योंकि लोंगपी बर्तनों में पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट माना जाता है। नुंगबी में, उनका उपयोग चावल से बीयर बनाने, मसालों तथा पानी के भंडारण, और खाना पकाने के लिए किया जाता है।पहले, यह शिल्प दो गांवों – नुंगबी और लोंगपी काजुई में प्रचलित था, परंतु आज, नुंगबी खुल्लन एकमात्र कुम्हार गांव बना है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, लेकिन पुरुष कारीगरों की संख्या महिला कुम्हारों से अधिक है। लोंगपी शिल्प को मूल रूप से ‘लोरी हैमलेई’ कहा जाता था, जिसका अर्थ शाही मिट्टी के बर्तन था। तब, केवल अमीर लोग ही इसे खरीद सकते थे। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, और निर्माण काम कई महीनों तक चलता है। क्योंकि, कारीगर स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार काम करते हैं।https://sceh.net/ मिट्टी को तीन दिनों तक सुखाने के बाद, ओखली और मूसल का उपयोग करके इसका महीन पाउडर बनाया जाता है, और फिर बांस की छलनी से इसे छान लिया जाता है। सरपेंटाइन या जहरमोहरा पत्थर, इन बर्तनों में प्रयुक्त होने वाला एक अन्य प्रमुख घटक है, जिसे स्थानीय रूप से 'लेशोनलुंग' कहा जाता है। मैग्नीशियम से भरपूर होने के कारण, इसका रंग नीला, हरा या काला होता है। इस पत्थर को काफुंग्रिम पहाड़ी से निकाला जाता है, जो इस गांव से लगभग 30 मिनट की पैदल दूरी पर है। कुम्हार इसे शुष्क मौसम में एकत्र करते हैं, क्योंकि तब इसे ले जाना और साफ करना आसान होता है। फिर, इस पत्थर का भी पाउडर बनाया जाता है।इसके बाद, एक निश्चित अनुपात में छनी हुई मिट्टी का पाउडर, पत्थर का पाउडर, और पानी मिलाया जाता है, ताकि उचित बर्तन बन सकें। फिर, मिश्रण को नरम और लचीला होने तक गूंधा जाता है। बर्तन का मूल मॉडल प्राप्त करने के लिए सांचे, स्लैब और अन्य विभिन्न उपकरणों का उपयोग करके, इस सामग्री को उसमें लगाया जाता है।अगले दिन, इसे बांस के चप्पू और धागे का उपयोग करके हाथों से आकार दिया जाता है, जबकि बांस की छड़ी की मदद से ही, इनका समतलन भी किया जाता है। अंत में, वांछित आकार प्राप्त होने तक इसे सुधारा जाता है, जिसके बाद बाहरी सतह को बांस की छड़ी से खुरच कर चिकना किया जाता है। बर्तनों को दो से तीन दिनों तक सुखाया जाता है। बाद में बर्तनों को चमकाने के लिए, चिकने ठोस पत्थरों या जानवरों की हड्डियों का उपयोग किया जाता है। इसके बाद, उन्हें फिर से पॉलिश किया जाता है। पॉलिशिंग जितनी अच्छी होगी, उत्पाद उतना ही चमकदार और चिकना होगा। अंत में, बर्तनों को पांच से सात घंटों तक 1200 डिग्री सेल्सियस पर आग में पकाया जाता है।आग से निकालने के बाद, जब बर्तन गर्म होते हैं, तभी उन्हें माची चीज़ (चिरोना पेड़) की ताजी पत्तियों से साफ और पॉलिश किया जाता है। इस प्रकार, पत्तियों से चमकाने के दौरान बर्तन का रंग, काला या भूरा निर्धारित होता है। यह अंतिम चरण है, जिसके बाद बर्तन उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं।अधिकांश अन्य मिट्टी के बर्तनों के विपरीत, लोंगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया काफी श्रम-गहन है, और पूरी तरह से हाथों से की जाती है। साथ ही, इसका काला रंग भी प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इसमें कोई रसायन या पेंट की भूमिका नहीं होती। मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में किसी भी रसायन, मशीन या पहियों का उपयोग नहीं किया जाता है। कुछ बर्तन निर्माण कार्यशालाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया हस्तनिर्मित है। लोंगपी उत्पाद किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, और उत्पाद पूरी तरह से अपघटनीय हैं।2007 में, दिल्ली में लोंगपी शिल्पकार - मैथ्यू सासा द्वारा शुरू की गई ‘मैथ्यू सासा क्राफ्ट’, और सितंबर 2015 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा शुरू की गई यूएसटीटीएडी जैसी पहलें, इस शिल्प को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं। मैथ्यू सासा, जिन्होंने कारीगरों को प्रशिक्षित करने और इस शिल्प को लोकप्रिय बनाने के लिए मैथ्यू सासा क्राफ्ट की स्थापना की, माचिहान सासा के पुत्र हैं। मैथ्यू सासा की पहल, राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी और वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मेलों में भागीदारी ने, पूरे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोंगपी मिट्टी के बर्तनों की लोकप्रियता और बिक्री को बढ़ावा दिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/3jjx3e34 2. https://tinyurl.com/c3sa9zed 3. https://tinyurl.com/m5v7x4p6 4. https://tinyurl.com/2v6c7njn 5. https://tinyurl.com/2htx3nev 6. https://tinyurl.com/panmpw5k 7. https://tinyurl.com/4dz4k5c3
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
राग रामदासी मल्हार: अनूठे स्वर-विन्यास से सजा वर्षा ऋतु का विशिष्ट राग
अगर मल्हार राग-परिवार के अपेक्षाकृत कम प्रस्तुत किए जाने वाले रागों की बात की जाए, तो राग रामदासी मल्हार अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़े मल्हार अंग की मधुरता को अपने अनूठे स्वर-विन्यास के साथ प्रस्तुत करता है। यद्यपि इसकी प्रस्तुतियाँ मियाँ की मल्हार या मेघ मल्हार की तुलना में कम सुनने को मिलती हैं, फिर भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इसे एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली राग माना जाता है।https://sceh.net/ रामदासी मल्हार अपनी गंभीर, संतुलित और भावपूर्ण प्रकृति के लिए जाना जाता है। इसकी रचना में मल्हार के विशिष्ट स्वरांगों के साथ ऐसे स्वर-प्रयोग मिलते हैं, जो इसे अन्य मल्हार रागों से अलग पहचान देते हैं। आलाप, बंदिश और तानों के माध्यम से कलाकार इस राग के विभिन्न भावों को विस्तार देते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति में नई कल्पनाशीलता और संगीतात्मक सौंदर्य उभरकर सामने आता है।इस राग की विविध प्रस्तुतियाँ इसकी गहराई और अभिव्यक्ति को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। पंडित वेंकटेश कुमार की गायकी में रामदासी मल्हार का गंभीर और विस्तृत स्वरूप सुनाई देता है। पंडिता पद्मा तलवलकर अपनी सधी हुई शैली में इसकी कोमलता और भाव-संपन्नता को प्रस्तुत करती हैं, जबकि उस्ताद अमीर ख़ाँ की प्रस्तुति राग की विलंबित विस्तार शैली और सूक्ष्म स्वर-विन्यास का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।यदि आप मल्हार राग-परिवार के कम परिचित लेकिन अत्यंत समृद्ध रागों का अनुभव करना चाहते हैं, तो राग रामदासी मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट शुरुआत हैं। इनमें वर्षा ऋतु का सौंदर्य, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गहराई और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर संगम सुनाई देता है।संदर्भ -https://tinyurl.com/32tr7655https://tinyurl.com/553dyhr6https://tinyurl.com/5ywpp8nmhttps://tinyurl.com/yjz9b4m8
तितलियाँ और कीट
विलुप्ति की कगार पर 'कैसर-ए-हिंद', क्या हम बचा पाएंगे हिमालय की इस उड़ती हुई विरासत को?
शाहजहाँपुर के प्रकृति प्रेमियों और पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि हमारे देश के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में एक ऐसी तितली पाई जाती है जिसे 'कैसर-ए-हिंद' (Kaiser-i-Hind) कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम तेइनोपालपस इम्पेरियालिस (Teinopalpus imperialis) है। 'कैसर-ए-हिंद' का शाब्दिक अर्थ है 'भारत का सम्राट'। यह नाम इसे इसकी दुर्लभता और इसके पंखों पर मौजूद राजसी गहरे हरे और चमकदार पीले रंगों के कारण दिया गया है। यह भारत की सबसे दुर्लभ और संरक्षित तितलियों में से एक है, जिसे इसकी शाही भव्यता के कारण यह गौरवशाली नाम मिला है।यह तितली कहाँ पाई जाती है?कैसर-ए-हिंद मुख्य रूप से पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में दिखाई देती है। भारत में यह अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, असम, मणिपुर और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इसके अलावा यह नेपाल, भूटान, उत्तरी म्यांमार, वियतनाम और चीन के सिचुआन प्रांत में भी देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक उच्च-ऊंचाई वाली प्रजाति है जो आमतौर पर समुद्र तल से 6,000 से 10,000 फीट की ऊंचाई पर घने जंगलों वाले पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।कैसी है इसकी शारीरिक संरचना?इस तितली की बनावट बेहद अनूठी होती है। नर कैसर-ए-हिंद के पिछले पंखों पर चमकीले पीले रंग का एक पैच होता है, जबकि मादा आकार में नर से बड़ी होती है और उसके पंखों पर धूसर (Grey) रंग के बड़े निशान होते हैं। इसके पंखों की हरी चमक वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रही है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसके स्केल की त्रि-आयामी (3D) फोटोनिक संरचना के कारण यह हरा रंग इतना आकर्षक दिखाई देता है।https://sceh.net/ इसकी जीवनशैली और प्रजनन चक्र क्या है?कैसर-ए-हिंद की उड़ान बहुत तेज और शक्तिशाली होती है। यह अक्सर पेड़ों की ऊपरी शाखाओं (Tree-top level) पर उड़ती है और केवल तेज सुबह की धूप होने पर ही नीचे की वनस्पतियों पर उतरती है। इसके विपरीत, मादाएं अक्सर बादल छाए रहने या बारिश के मौसम में भी उड़ती देखी गई हैं। इनका प्रजनन चक्र काफी विशिष्ट होता है। इसके लार्वा मुख्य रूप से 'मैगनोलिया कैंपबेली' (Magnolia campbellii) नामक पौधे पर पलते हैं। मादा तितली पत्तों के निचले हिस्से में बैंगनी-लाल रंग के गोल अंडे देती है।क्या हैं इसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे?अपनी सुंदरता और दुर्लभता के कारण यह तितली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करों और संग्रहकर्ताओं (Collectors) के निशाने पर रहती है। हालांकि इसे भारतीय कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है, लेकिन अवैध शिकार अब भी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती खेती (झूम खेती), सड़कों का निर्माण और बस्तियों के बसने के कारण जंगलों की कटाई हो रही है। इस 'स्नो ड्रॉट' और वनों के विनाश के कारण इसके भोजन और प्रजनन के लिए जरूरी पौधे (मैग्नोलिया परिवार) कम होते जा रहे हैं।संरक्षण क्यों है अनिवार्य?अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में इसे 'राज्य तितली' के रूप में अपनाया है, जो इसके संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह प्रजाति उच्च-ऊंचाई वाले वनों के स्वास्थ्य का संकेत देने वाली 'कीस्टोन प्रजाति' मानी जाती है। यदि हम कैसर-ए-हिंद को बचाते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से हम हिमालय के उस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचा रहे होते हैं, जिस पर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता निर्भर करती है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2beawaw6 2. https://tinyurl.com/2aouqchs 3. https://tinyurl.com/2cjjjp6f 4. https://tinyurl.com/25oqwtbk
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
आखिर क्यों सेमीकंडक्टर को 'नया तेल' कहा जा रहा है?
आज के डिजिटल युग में, एक मनुष्य के नाखून के बराबर क्षेत्र में समाए छोटे से सेमीकंडक्टर चिप के भीतर अरबों ट्रांजिस्टर मौजूद हो सकते हैं। यह तथ्य सुनने में किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन यही आधुनिक तकनीक की वास्तविकता है। सेमीकंडक्टर चिप्स आज हमारे स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर, वाहनों और यहाँ तक कि घरेलू उपकरणों के 'दिमाग' के रूप में कार्य करते हैं। इनके बिना हमारी डिजिटल दुनिया थम सकती है। यही कारण है कि आज भारत अपनी 'सेमीकंडक्टर मिशन' के ज़रिए इस वैश्विक रेस में मज़बूती से कदम रख रहा है।सेमीकंडक्टर चिप्स क्या हैं और ये हमारे जीवन में क्यों महत्वपूर्ण हैं?सेमीकंडक्टर या अर्धचालक एक ऐसी सामग्री है जिसकी विद्युत चालकता (electrical conductivity) एक सुचालक (जैसे तांबा) और एक कुचालक (जैसे कांच) के बीच की होती है। विकिपीडिया के अनुसार, सिलिकॉन सबसे आम अर्धचालक सामग्री है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाने के लिए किया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि डोपिंग (अशुद्धियों को मिलाना) के ज़रिए इनकी चालकता को बदला और नियंत्रित किया जा सकता है।https://sceh.net/ ये छोटी सी चिप्स बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं। जब हम अपने फ़ोन पर कोई ऐप खोलते हैं या कंप्यूटर पर कोई फाइल सेव करते हैं, तो ये चिप्स ही उन निर्देशों को प्रोसेस करती हैं। आईबीईएफ (IBEF) के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर की अपरिहार्य भूमिका के कारण इन्हें अक्सर 'नया तेल' कहा जाता है।इनकी शुरुआत कैसे हुई और यह तकनीक कैसे विकसित हुई?सेमीकंडक्टर तकनीक का इतिहास 19वीं शताब्दी से शुरू होता है, लेकिन असली क्रांति 20वीं सदी के मध्य में आई। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, 1947-48 में बेल लेबोरेटरीज में अमेरिकी भौतिक विज्ञानी जॉन बर्दीन, वाल्टर ब्रेटन और विलियम शॉकली ने पहले ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया था। यह आविष्कार वैक्यूम ट्यूबों का एक छोटा, कम बिजली खपत वाला और अधिक विश्वसनीय विकल्प साबित हुआ।इसके बाद 1958 में जैक किल्बी ने पहला वर्किंग इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) प्रदर्शित किया और 1959 में रॉबर्ट नॉयस ने पहला 'मोनोलिथिक' आईसी चिप विकसित किया। इन आविष्कारों ने इलेक्ट्रॉनिक्स के लघुकरण (miniaturization) का रास्ता खोल दिया। मूर के नियम (Moore’s Law) के अनुसार, हर दो साल में एक चिप पर ट्रांजिस्टर की संख्या लगभग दोगुनी होती गई, जिससे चिप्स की गति लाखों गुना बढ़ गई और उनकी लागत कम होती गई।चिप बनाने की वैश्विक रेस में कौन आगे है?दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का निर्माण वर्तमान में कुछ ही दिग्गजों के हाथों में है। टीएसएमसी (TSMC - Taiwan Semiconductor Manufacturing Company) वर्तमान में दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का लगभग 90% हिस्सा बनाती है। एनवीडिया (Nvidia), एप्पल (Apple), टेस्ला (Tesla) और एएमडी (AMD) जैसी बड़ी कंपनियाँ अपनी चिप्स के लिए टीएसएमसी की निर्माण तकनीक पर निर्भर हैं। टीएसएमसी के संस्थापक मॉरिस चांग, जिन्हें ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग का 'गॉडफादर' कहा जाता है, का मानना है कि उनकी कंपनी उन्नत प्रक्रिया तकनीक और कुशल निर्माण के कारण अगले कुछ वर्षों तक अपनी बढ़त बनाए रखेगी।टीएसएमसी के अलावा, इंटेल (Intel) और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (Samsung) भी इस रेस के प्रमुख खिलाड़ी हैं। ये कंपनियाँ भारी अनुसंधान और विकास (R&D), अत्याधुनिक 'फैब्स' (Fabs) और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था (economies of scale) के कारण दूसरों से आगे हैं। उन्नत चिप्स के लिए 'अल्ट्रा-वायलेट लिथोग्राफी' और परमाणु-स्तर की इंजीनियरिंग की ज़रूरत होती है, जिसे वर्तमान में दुनिया की बहुत कम कंपनियाँ सफलतापूर्वक कर पाती हैं।टीएसएमसी (TSMC - Taiwan Semiconductor Manufacturing Company)भारत इस क्षेत्र में कहाँ खड़ा है?वर्तमान में, भारत अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। इसका मुख्य कारण देश में 'सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन' सुविधाओं का अभाव रहा है। हालाँकि, अब यह स्थिति तेज़ी से बदल रही है। भारत सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' विज़न के तहत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने के लिए भारी निवेश और नीतिगत प्रोत्साहन दिए हैं।टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स इस दिशा में सबसे बड़ा नाम बनकर उभरा है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की पीएसएमसी (PSMC) के साथ साझेदारी की है और गुजरात के धोलेरा में भारत का पहला एआई-सक्षम 300mm (12 इंच) फैब (Fab) स्थापित कर रहा है। यहाँ प्रति माह 50,000 वेफर्स बनाने की योजना है, जो एनालॉग और लॉजिक आईसी चिप्स का निर्माण करेंगे। यह प्लांट ऑटोमोटिव, कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज और वायरलेस कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों की ज़रूरतों को पूरा करेगा।इसके अतिरिक्त, माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) गुजरात के साणंद में लगभग 22,516 करोड़ रुपये के निवेश के साथ एक एटीएमपी (ATMP - Assembly, Testing, Marking, and Packaging) सुविधा स्थापित कर रही है। वहीं, टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (TSAT) असम के मोरीगांव में एक ओसैट (OSAT) सुविधा शुरू कर रहा है।भारत को इस क्षेत्र में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बावजूद, भारत के सामने कई कठिन चुनौतियाँ हैं। सबसे पहली चुनौती भारी पूंजी निवेश की है। एक सिंगल फैब बनाने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। दूसरी चुनौती अत्याधुनिक तकनीक का हस्तांतरण है। उन्नत चिप निर्माण के लिए गहरी विशेषज्ञता और वैश्विक दिग्गजों के भरोसे की ज़रूरत होती है।इसके अलावा, अत्यधिक शुद्ध पानी की विशाल मात्रा, निर्बाध बिजली आपूर्ति और एक बहुत ही कुशल कार्यबल (जैसे वीएलएसआई डिज़ाइनर और प्रोसेस इंजीनियर) की आवश्यकता होती है। आईबीईएफ की रिपोर्ट के अनुसार, आपूर्ति श्रृंखला और फैब्रिकेशन तकनीक में मौजूदा कमियों के कारण भारत को अभी भी हाई-एंड चिप्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।भविष्य की राह क्या है और सरकार क्या कदम उठा रही है?भारत इन कमियों को दूर करने के लिए 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (ISM) के ज़रिए सक्रिय कदम उठा रहा है। फरवरी 2026 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'ISM 2.0' की घोषणा की है। इस नए मिशन का उद्देश्य केवल चिप्स बनाना ही नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री और पूर्ण 'इंडियन आईपी' (Indian IP) विकसित करना भी है।सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के परिव्यय को बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया है। इसके अलावा, उद्योग के नेतृत्व वाले अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ताकि एक कुशल वर्कफोर्स तैयार किया जा सके। धोलेरा और साणंद जैसे क्षेत्रों को अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ तैयार किया जा रहा है ताकि वे वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर सकें।विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 तक भारत के पास अपनी खुद की ऑपरेशनल एटीएमपी और ओसैट सुविधाएँ होंगी, और फैब्रिकेशन प्लांट का काम भी काफी आगे बढ़ चुका होगा। यह न केवल रोज़गार के लाखों अवसर पैदा करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में एक विश्वसनीय खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।संदर्भ1. https://tinyurl.com/ns7o5vr 2. https://tinyurl.com/ttv5w88 3. https://tinyurl.com/ctprjx5 4. https://tinyurl.com/2dhsn6xs 5. https://tinyurl.com/22cn2twf 6. https://tinyurl.com/2arpppx3 7. https://tinyurl.com/2bqno4k7 8. https://tinyurl.com/2cqkgute 9. https://tinyurl.com/2d4wdft9 10. https://tinyurl.com/2983ffgh 11. https://tinyurl.com/29tvvsb8
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
14-09-2026 09:39 AM • Shahjahanpur-Hindi
भारत ही नहीं दुनिया के इन 6 देशों में भी धूमधाम से मनाई जाती है गणेश चतुर्थी
भारतीय संस्कृति में प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की महिमा केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और हिंदू व बौद्ध धर्म के विस्तार के माध्यम से गणपति की आराधना संपूर्ण एशिया और उसके उपरांत प्रवासी भारतीयों के जरिए विश्व के कोने-कोने में फैल गई। तिब्बत, चीन, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक, भगवान गणेश को ज्ञान, समृद्धि, सौभाग्य और बाधाओं के निवारण के देवता के रूप में पूजा जाता है। यद्यपि विभिन्न देशों में उनकी प्रतिमाओं के स्वरूप, पूजा पद्धतियों और चढ़ावे में स्थानीय संस्कृतियों के अनुसार अद्भुत विविधता दिखाई देती है, किंतु उनके प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति का भाव सर्वत्र एक समान है।
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नेपाल में नेवार समुदाय किस अनूठी परंपरा और पकवानों के साथ करता है बप्पा का पूजन? भारत के पड़ोसी देश नेपाल (Nepal) में गणेश चतुर्थी को स्थानीय भाषा में 'विनायक चतुर्थी' के रूप में बड़े श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। विशेष रूप से काठमांडू घाटी का पारंपरिक नेवार समुदाय इस पर्व को अत्यंत निष्ठा के साथ मनाता है। इस दिन परिवार अपने घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन की एक प्रमुख धार्मिक परंपरा यह है कि श्रद्धालु रात के समय चंद्रमा के दर्शन करने से बचते हैं, जिसे व्रत का आवश्यक अंग माना जाता है।
नेपाल में गणेश पूजन के दौरान भगवान को नेवार संस्कृति का सबसे प्रामाणिक पारंपरिक व्यंजन 'समयबजी' (Samaybaji) नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है। इस विशेष भोग में उबला हुआ अंडा, तली हुई मछली, भैंस के मांस का चोइला, भटमास (सोयाबीन), चटमरी, बारा (दाल का वड़ा), चिवड़ा (पीटकर चपटा किया गया चावल), साग और नेवारी शराब 'आयला' (Ayla) शामिल होती है। यह अनूठा भोग नेवारी जीवनशैली और उनकी धार्मिक परंपरा का प्रतीक है। पर्व के अवसर पर काठमांडू घाटी के प्रमुख गणेश मंदिरों जैसे अशोक विनायक, चंद्र विनायक, सूर्य विनायक, कमल विनायक, मारु गणेश और कमलादी गणेश मंदिर में गर्भगृह में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। नेपाली श्रद्धालु जीवन में बुद्धि, समृद्धि और विघ्नों के नाश के लिए इस दिन निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखते हैं।
इंडोनेशिया के सक्रिय ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो (Mount Bromo) पर 7,000 फीट चढ़कर क्यों होती है गणेश पूजा? इंडोनेशिया (Indonesia) के पूर्वी जावा (Java) में स्थित तेन्ग्गेर पर्वत (Tengger mountains) श्रृंखला में गणेश भक्ति का एक ऐसा विस्मयकारी दृश्य देखने को मिलता है, जो समूचे विश्व को चकित कर देता है। यहाँ तेन्ग्गेर सेमेरू नेशनल पार्क (Tengger Semeru National Park) में स्थित सक्रिय ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो के क्रेटर (ज्वालामुखी के मुहाने) के बिल्कुल किनारे 7,641 फीट की ऊँचाई पर भगवान गणेश की एक प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह प्रतिमा लगभग 700 वर्ष पूर्व स्थापित की गई थी।
स्थानीय तेन्ग्गेर समुदाय और जावानी हिंदू अत्यंत कठिन चढ़ाई चढ़कर ज्वालामुखी के मुहाने तक पहुँचते हैं और बप्पा के चरणों में फल, फूल और अगरबत्तियाँ अर्पित करते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि धधकते लावे और बार-बार होने वाले विस्फोटों से यह गणेश प्रतिमा ही सदियों से उनकी रक्षा करती आ रही है। इस पर्वत का नामकरण भी भगवान ब्रह्मा के नाम पर हुआ है, जिसे स्थानीय लोग 'ब्रोमो' कहते हैं। यहाँ के लोग स्थानीय देवता 'इदा सांग ह्यांग विधी वासा' के साथ-साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) की पूजा हिंदू पंचांग के अनुसार करते हैं। प्राचीन काल में जावा में शैव धर्म और तांत्रिक बौद्ध धर्म के मिलन से एक विशिष्ट पंथ बना था, जहाँ गणेश जी को एक शक्तिशाली तांत्रिक देवता के रूप में पूजा जाता था, जिनके मुकुट और सिंहासन पर नरमुंडों के अलंकरण होते थे। इंडोनेशिया की संस्कृति में गणेश जी का स्थान इतना गहरा है कि वर्ष 1998 में इंडोनेशिया सरकार ने 20,000 रूपिया (rupiah) के राष्ट्रीय मुद्रा नोट पर भगवान गणेश का चित्र प्रमुखता से मुद्रित किया था। इसके अतिरिक्त, बाली द्वीप के हिंदू मंदिरों में भी गणेश चतुर्थी अत्यंत उल्लास के साथ मनाई जाती है।
जापान में मोदक की जगह डाइकॉन (daikon) मूली क्यों चढ़ाई जाती है और कांगितेन का क्या रहस्य है? उगते सूरज की भूमि कहे जाने वाले जापान (Japan) में भगवान गणेश की उपस्थिति लगभग 1000 वर्षों से अधिक पुरानी है। बौद्ध धर्म के माध्यम से जापान पहुँचे गणपति को वहाँ कांगितेन (Kangiten) अथवा विनायकतेन (Bināyaka-ten) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें गणबाची, गणव्हा, शो-तेन और आर्यदेव के नामों से भी जाना जाता है। जापानी शिगोन और तेंडाई संप्रदाय में गणेश जी की एक अत्यंत दुर्लभ और अनूठी प्रतिमा पूजी जाती है, जिसे 'सोशिन कांगि-तेन' कहा जाता है। इसमें दो हाथी-मुख वाले देवता एक-दूसरे को आलिंगनबद्ध किए हुए दिखाई देते हैं, जिसे संस्कृत में नंदिकेश्वर के समान माना गया है।
जापान की राजधानी टोक्यो (Tokyo) के ऐतिहासिक असाकुसा (Asakusa) क्षेत्र में सुमिदागावा नदी (Sumidagawa river) के तट पर स्थित मात्सुचियामा शोडेन (Matsuchiyama Shoden) मंदिर भगवान गणेश (कांगितेन) का प्रमुख तीर्थ है। यह मंदिर 601 ईस्वी में स्थापित हुआ था, जो वहाँ के प्रसिद्ध सेन्सो-जी (Sensō-ji) मंदिर से भी प्राचीन है। यहाँ का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जापानी परंपरा में बप्पा को मोदक नहीं, बल्कि सफेद डाइकॉन (daikon) मूली का भोग लगाया जाता है। मंदिर की दीवारों, छतों और लालटेनों पर डाइकॉन मूली के चित्र उकेरे गए हैं। जापानी संस्कृति में डाइकॉन मूली को वैवाहिक सौहार्द, उत्तम जीवनसाथी की प्राप्ति और संतानोत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है।
प्रतिवर्ष 7 जनवरी को इस मंदिर में भव्य 'डाइकॉन महोत्सव' आयोजित होता है, जहाँ भक्तों को पकाई गई मूली और चावल की पवित्र मदिरा (ओमिकी) का प्रसाद दिया जाता है। मंदिर में धन की थैलियों के प्रतीक चिह्न भी बने हैं, जो व्यापारिक सफलता के सूचक हैं। इसके साथ ही, लाल बीन के मीठे पेस्ट से बने विशेष पकवान 'कांगि-दान' का भोग लगाया जाता है तथा मनोकामना पूर्ति के लिए तेल-स्नान (योकुयु कीतो) का गुप्त अनुष्ठान किया जाता है। जापान के नारा में माउंट इकोमा (Mount Ikoma) पर स्थित होजान-जी (Hōzan-ji) मंदिर और क्योटो (Kyoto) में 1372 ईस्वी में सम्राट गिकोगोन (Emperor Gikogon) द्वारा स्थापित विशाल कांगितेन प्रतिमा भी अत्यंत प्रसिद्ध है।
थाईलैंड, कंबोडिया और मलेशिया में गणेश आराधना के क्या प्राचीन साक्ष्य मिलते हैं? दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में भी गणेश पूजन का गौरवशाली इतिहास रहा है। थाईलैंड (Thailand) में भगवान गणेश को 'फ्रा फिकानेट' के नाम से जाना जाता है। वहाँ उन्हें कला, संगीत, साहित्य और व्यापार का संरक्षक देवता माना जाता है। थाईलैंड में 550 से 600 ईस्वी के बीच की गणेश प्रतिमाएँ पाई गई हैं। गणेश चतुर्थी पर बैंकॉक स्थित वाट फ्रा श्री उमादेवी (Wat Phra Sri Umadevi) जैसे भव्य मंदिरों में विशेष प्रार्थनाएँ और सांस्कृतिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।
कंबोडिया (Cambodia) में गणेश जी की पूजा का इतिहास 7वीं शताब्दी और प्राचीन खमेर साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। विश्वप्रसिद्ध अंगकोर वाट (Angkor Wat) मंदिर परिसर में भगवान गणेश की प्राचीन नक्काशीदार मूर्तियाँ आज भी सुरक्षित हैं। कंबोडिया में गणेश जी के कुछ ऐसे प्राचीन स्वरूप भी मिलते हैं, जहाँ उनका मुख हाथी के बजाय मानवीय स्वरूप का दर्शाया गया है।
मलेशिया (Malaysia) में तमिल हिंदू समुदाय गणेश चतुर्थी को अत्यंत भक्तिभाव से मनाता है। राजधानी कुआलालंपुर (Kuala Lumpur) में स्थित प्रसिद्ध श्री सिथि विनयगर मंदिर में कई दिनों तक सामुदायिक प्रार्थनाएँ, शास्त्रीय भजन-कीर्तन और पारंपरिक भोज आयोजित किए जाते हैं। यहाँ गणेश जी को किसी भी नए उद्यम के शुभारंभ के देवता के रूप में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है।
पेरिस, लंदन, मॉरीशस और अमेरिका में कैसे गूंजते हैं गणपति बप्पा के जयकारे? एशियाई देशों के साथ-साथ पश्चिमी और अफ्रीकी देशों में भी गणेश चतुर्थी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है:
फ़्रांस (France): पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) के ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में श्री मणिका विनायकरालयम मंदिर द्वारा प्रतिवर्ष विशाल रथ-यात्रा निकाली जाती है। 30 अगस्त को आयोजित इस शोभायात्रा में श्रद्धालु रस्सियों से सुसज्जित रथ को खींचते हैं और पेरिस की सड़कों पर ढोल-नगाड़ों के साथ भजन गाते हुए मिठाइयाँ वितरित करते हैं।
यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom): लंदन (London) के लक्ष्मी नारायण मंदिर में 5,000 से अधिक श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यहाँ भव्य आरती, सांस्कृतिक नृत्य और फैंसी ड्रेस (Fancy Dress) प्रतियोगिताओं के बाद 4,000 से अधिक भक्त एक विशाल जुलूस के साथ प्रसिद्ध थेम्स नदी (River Thames) में बप्पा का विसर्जन करते हैं।
मॉरीशस (Mauritius): इस द्वीपीय देश में लगभग 52 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। यहाँ वर्ष 1982 से गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है और इस पावन अवसर पर वहाँ की सरकार द्वारा प्रथम दिन आधिकारिक सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है। घरों और मंदिरों में मिट्टी की प्रतिमाओं की स्थापना कर पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं।
यूएसए (USA) एवं कनाडा (Canada): अमेरिका में भारतीय समुदाय द्वारा मुंबई से विशेष मूर्तियाँ मँगवाकर 11 दिनों तक यह महापर्व मनाया जाता है, जिसमें 10,000 से अधिक लोग भाग लेते हैं। कनाडा के टोरंटो (Toronto) और वैंकूवर (Vancouver) में भी प्रवासी भारतीय अत्यंत भव्यता के साथ गणपति स्थापना और विसर्जन संपन्न करते हैं। इसके अलावा फ़िजी (Fiji), सिंगापुर (Singapore) और बर्मा (Burma) में भी यह पर्व पूर्ण आस्था के साथ मनाया जाता है।
यह वैश्विक विस्तार इस बात का जीवंत प्रमाण है कि देश, काल और संस्कृतियों के भेद से परे, विघ्नहर्ता भगवान गणेश का आशीर्वाद और उनकी आध्यात्मिक प्रासंगिकता संपूर्ण मानवता के लिए सार्वभौमिक है।
संदर्भ
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बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
07-09-2026 10:00 AM • Shahjahanpur-Hindi
अफ्रीका में तबाही मचाने वाले इबोला वायरस से भारत कितना सुरक्षित?
दुनिया भर में संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में कई ऐसी महामारियां सामने आई हैं जिन्होंने मानव सभ्यता को झकझोर कर रख दिया है। इन्हीं जानलेवा बीमारियों में से एक इबोला वायरस डिसीज है। यह एक गंभीर और अक्सर जानलेवा साबित होने वाली बीमारी है जो मुख्य रूप से उप-सहारा अफ्रीका में पाई जाती है। जब यह वायरस इंसान के शरीर में प्रवेश करता है तो यह रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है जिससे गंभीर रक्तस्रावी बुखार होता है। इस बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मृत्यु दर 25 से 90 प्रतिशत के बीच रहती है और औसतन 50 प्रतिशत संक्रमित मरीजों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी से बचाव के लिए इसके लक्षणों, फैलने के कारणों और रोकथाम के उपायों को समझना बेहद जरूरी है।
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इबोला वायरस आखिर क्या है और इसकी शुरुआत कहाँ से हुई? इबोला रोग आर्थोइबोलावायरस जीनस (Orthoebolavirus Genus) के वायरसों के कारण होता है। इस बीमारी का पहला मामला साल 1976 में सामने आया था जब दो अलग-अलग जगहों पर एक साथ इसका प्रकोप देखा गया था। पहला मामला वर्तमान दक्षिण सूडान के नज़ारा में और दूसरा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के याम्बुकु में सामने आया था। कांगो में यह प्रकोप इबोला नदी के पास स्थित एक गांव में हुआ था और इसी नदी के नाम पर इस जानलेवा वायरस का नाम इबोला रखा गया। वैज्ञानिकों ने अब तक आर्थोइबोलावायरस की छह प्रजातियों की पहचान की है। इनमें से जायरे इबोलावायरस (Zaire Ebolavirus), सूडान इबोलावायरस (Sudan Ebolavirus), ताई फॉरेस्ट इबोलावायरस (Tai Forest Ebolavirus) और बुंदीबुग्यो इबोलावायरस (Bundibugyo Ebolavirus) इंसानों में बीमारी पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा रेस्टन वायरस (Reston Virus) और बॉम्बाली वायरस (Bombali Virus) भी पाए गए हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से जानवरों को प्रभावित करते हैं। जायरे इबोलावायरस सबसे आम है और इसी के कारण दुनिया में इबोला की सबसे बड़ी महामारियां फैली हैं।
यह बीमारी एक इंसान से दूसरे इंसान में कैसे फैलती है? यह एक गलत धारणा है कि इबोला हवा से फैलता है। खांसने या छींकने से इबोला का संक्रमण नहीं होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि फ्रूट बैट यानी फल खाने वाले चमगादड़ इस वायरस के प्राकृतिक वाहक होते हैं। जब इंसान जंगल में बीमार या मरे हुए जानवरों जैसे चमगादड़, चिंपैंजी, गोरिल्ला, बंदर या साही के खून या उनके शरीर के तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आते हैं तो यह वायरस इंसानों में प्रवेश कर जाता है। एक बार जब कोई इंसान संक्रमित हो जाता है तो यह बीमारी दूसरे इंसानों में बहुत तेजी से फैल सकती है। यह संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, उल्टी, मल, मूत्र, स्तन के दूध, लार और वीर्य के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। इसके अलावा उन वस्तुओं या सतहों को छूने से भी संक्रमण हो सकता है जो किसी बीमार व्यक्ति के तरल पदार्थों से दूषित हो गई हों। यौन संबंध बनाने से भी इबोला का वायरस फैल सकता है क्योंकि ठीक होने के महीनों बाद भी यह वायरस वीर्य में जीवित रह सकता है।
इस बीमारी के शुरुआती और गंभीर लक्षण क्या हैं? इबोला वायरस के शरीर में प्रवेश करने से लेकर लक्षण दिखने तक का समय 2 से 21 दिनों का हो सकता है। औसतन आठ से दस दिनों के भीतर मरीज बीमार पड़ने लगता है। शुरुआत में इबोला के लक्षण फ्लू जैसे होते हैं जिन्हें ड्राई या सूखे लक्षण कहा जाता है। इनमें अचानक तेज बुखार आना, अत्यधिक थकान, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश और ठंड लगना शामिल है। कुछ ही दिनों बाद बीमारी दूसरे चरण में पहुंच जाती है और मरीज को उल्टी, पेट दर्द और खूनी दस्त होने लगते हैं। शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और आंखें लाल हो जाती हैं। गंभीर मामलों में मरीज के शरीर के अंगों से खून बहना शुरू हो जाता है। मल या उल्टी में खून आ सकता है और मसूड़ों, नाक तथा त्वचा के छिद्रों से भी रक्तस्राव हो सकता है। यह वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर भी हमला करता है जिससे मरीज भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे दौरे भी पड़ सकते हैं। अंततः लिवर और किडनी जैसे अंग काम करना बंद कर देते हैं, जिससे मरीज की मौत हो सकती है।
क्या इस बीमारी का परीक्षण और सटीक इलाज संभव है? शुरुआती चरण में इबोला की पहचान करना मुश्किल होता है क्योंकि इसके लक्षण मलेरिया या टाइफाइड जैसी अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। इसकी सटीक पहचान करने के लिए डॉक्टर पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction) परीक्षण करते हैं। रक्त नमूनों का परीक्षण अत्यधिक सुरक्षित प्रयोगशालाओं में किया जाता है क्योंकि इबोला के नमूने बेहद खतरनाक होते हैं। इलाज की बात करें तो वर्तमान में जायरे इबोलावायरस के लिए दो विशेष उपचार मौजूद हैं जिन्हें अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने मंजूरी दी है। इनमें इनमाजेब (Inmazeb) और इबांगा (Ibanga) शामिल हैं जो मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज (monoclonal antibodies) हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस से लड़ने में मदद करते हैं। इसके अलावा मरीजों को ऑक्सीजन देना, नसों के जरिए तरल पदार्थ चढ़ाना और उनके रक्तचाप को संतुलित रखना उनके बचने की संभावना को काफी बढ़ा देता है।
इबोला वायरस से बचाव के लिए कौन सी वैक्सीन उपलब्ध है? इबोला से बचाव के लिए अब विश्व स्तर पर वैक्सीन उपलब्ध हैं। जायरे इबोलावायरस (Zaire Ebolavirus) के लिए एर्वेबो वैक्सीन को मंजूरी दी गई है जो केवल एक खुराक में दी जाती है। यह वैक्सीन महामारी के दौरान प्रतिक्रिया स्वरूप इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा एक अन्य वैक्सीन ज़ब्डेनो (Zabdeno) और म्वाबीया (Mwabia) भी मौजूद हैं जो दो खुराकों में दी जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन महामारी फैलने पर रिंग वैक्सीनेशन की रणनीति अपनाता है। इसके तहत मरीज के सीधे संपर्क में आने वाले लोगों और उनके करीबियों का टीकाकरण किया जाता है ताकि वायरस के प्रसार को वहीं रोका जा सके। कई मामलों में पूरे गांव या इलाके का भी टीकाकरण किया जाता है, जिसे भौगोलिक टीकाकरण कहते हैं।
अफ्रीका में इबोला महामारी ने कैसा आर्थिक और सामाजिक कहर बरपाया था? साल 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में इबोला का अब तक का सबसे बड़ा प्रकोप देखा गया था। गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। इस दौरान दुनिया भर में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए और 11 हजार से अधिक लोगों की जान चली गई। इस महामारी ने पश्चिमी अफ्रीका के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को पूरी तरह तोड़ दिया था। व्यापार और यातायात पर प्रतिबंध के कारण भारी आर्थिक नुकसान हुआ। सिएरा लियोन में निजी क्षेत्र के 50 प्रतिशत कर्मचारियों का रोजगार छिन गया। महामारी के प्रबंधन पर अरबों डॉलर खर्च हुए। स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई और कई अस्पतालों को बंद करना पड़ा। इबोला का इलाज करते हुए सैकड़ों स्वास्थ्य कर्मियों की भी जान चली गई। लाखों बच्चों की पढ़ाई छूट गई क्योंकि महीनों तक स्कूल बंद रहे। लाइबेरिया और सिएरा लियोन में जंगली जानवरों के मांस पर प्रतिबंध लगने से कई परिवारों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया। जिन लोगों ने इस बीमारी को मात दी, उन्हें समाज में कलंक का सामना करना पड़ा। अवसाद, घबराहट और आत्महत्या के प्रयास जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखे गए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाओं ने महामारी को कैसे नियंत्रित किया? महामारी की शुरुआत में प्रतिक्रिया धीमी थी लेकिन बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने इसे नियंत्रित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम किया। इंसिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम की स्थापना की गई जिसके जरिए प्रभावित देशों में मरीजों को अलग-थलग करने, उनका इलाज करने और मृतकों के सुरक्षित अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। इबोला से मरने वालों का अंतिम संस्कार भी एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि अफ्रीकी संस्कृति में शवों को छूने की परंपरा है। इससे संक्रमण बहुत तेजी से फैला। बाद में सुरक्षित और सम्मानजनक दफन के नियम बनाए गए और समुदायों को जागरूक किया गया। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर कांटेक्ट ट्रेसिंग (contact tracing) की गई। हर उस व्यक्ति को 21 दिनों तक निगरानी में रखा गया जो किसी मरीज के संपर्क में आया था। सीमा नियंत्रण को सख्त किया गया और हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू की गई।
कोविड महामारी और इबोला के अनुभवों से दुनिया ने क्या सीखा? इबोला महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी भी संक्रामक बीमारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसके बाद जब कोविड महामारी आई तो अफ्रीकी देशों और दुनिया भर ने इबोला के दौरान सीखी गई रणनीतियों का इस्तेमाल किया। आइसोलेशन सेंटर बनाना, कांटेक्ट ट्रेसिंग करना और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना इबोला के ही सबक थे। इन महामारियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि हर देश के पास पर्याप्त टेस्टिंग किट, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी और एक मजबूत स्वास्थ्य ढांचा होना चाहिए। सूचनाओं के सही आदान-प्रदान और समुदाय की भागीदारी के बिना किसी भी महामारी को हराना असंभव है।
क्या भारत में इबोला वायरस के फैलने का कोई भारी खतरा है? अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के कारण भारत में इबोला वायरस के प्रवेश का कुछ जोखिम जरूर हो सकता है लेकिन एक बड़ी महामारी फैलने की संभावना बहुत कम है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इबोला कोविड की तरह हवा से नहीं फैलता है। यह केवल संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से ही फैलता है। पिछले वैश्विक स्वास्थ्य संकटों के बाद भारत ने हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग, रोग निगरानी, क्वारंटाइन सिस्टम और अस्पतालों की तैयारियों को काफी मजबूत कर लिया है। यदि कोई संदिग्ध मामला सामने आता है तो भारतीय स्वास्थ्य एजेंसियां उसे तुरंत आइसोलेट करने में सक्षम हैं। हालांकि किसी भी भविष्य के खतरे से बचने के लिए निरंतर जागरूकता, त्वरित प्रतिक्रिया और मजबूत स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली बनाए रखना हमारे देश के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भारत के प्राचीन शहर सिरकप में कैसे स्थापित हुआ था यूनानी ग्रिड-प्लान नगर नियोजन?
प्राचीन विश्व के इतिहास में 600 BCE से 300 CE का कालखंड सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक स्वर्णिम युग माना जाता है। जब सिकंदर (Alexander) के आक्रमण के पश्चात यूनानी संस्कृति का भूमध्य सागर से लेकर मध्य एशिया और भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमाओं तक प्रसार हुआ, तब एक नई और अनूठी सभ्यता का जन्म हुआ जिसे 'हिन्द-यूनानी साम्राज्य' (Indo-Greek Kingdom) के नाम से जाना जाता है। उत्तर-पश्चिम भारत और बैक्ट्रिया (Bactria) के क्षेत्र में यूनानी और भारतीय संस्कृतियों का यह मेल केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारतीय कला, वास्तुकला, मुद्राशास्त्र (Coinage) और धार्मिक दर्शन पर एक दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ा। शाहजहाँपुर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना वाले शहर के संदर्भ में, प्राचीन भारत की इस बहु-सांस्कृतिक विरासत का अनुशीलन अत्यंत प्रेरणादायी है।
भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्द-यूनानी साम्राज्य की स्थापना और विस्तार कैसे हुआ? बैक्ट्रिया क्षेत्र (आधुनिक अफ़गानिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान) में लगभग 250 BCE के आसपास सेल्युकसिड (Seleucid) साम्राज्य से अलग होकर डिओडोटस प्रथम (Diodotus I) ने स्वतंत्र यूनानी राज्य की नींव रखी थी। इसके पश्चात, राजा डेमेट्रियस प्रथम (Demetrius I) ने 180 BCE के आसपास हिंदू कुश पर्वत श्रृंखला को पार करके भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
हिन्द-यूनानी राजाओं में सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली सम्राट मेनांडर प्रथम (Menander I) थे, जिनका शासनकाल 165 BCE से 130 BCE के मध्य माना जाता है। मेनांडर के समय में हिन्द-यूनानी साम्राज्य गांधार (Gandhara), पंजाब, तक्षशिला (Taxila) और मथुरा तक फैल गया था। इन यूनानी राजाओं ने भारत की स्थानीय भाषाओं, लिपियों और धर्मों को अपनाया और वे भारतीय समाज का एक अभिन्न अंग बन गए। इतिहास में इन यूनानी शासकों और निवासियों को 'यवन' कहा गया।
हिन्द-यूनानी शासकों के सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं का चित्रण कैसे शुरू हुआ? हिन्द-यूनानी साम्राज्य की सबसे महान और अमूल्य देन उनकी अनूठी मुद्रा प्रणाली (Coinage) है, जिसे प्राचीन काल की सबसे कलात्मक मुद्राओं में गिना जाता है। भारत में शासन करने वाले यूनानी राजाओं ने द्विभाषी (Bilingual) सिक्के जारी करने की परंपरा शुरू की। इन सिक्कों के एक तरफ यूनानी भाषा और लिपि में लेख होता था, जबकि दूसरी तरफ भारत की स्थानीय ब्राह्मी या खरोष्ठी लिपि में राजा का नाम और उपाधि अंकित होती थी।
इस दिशा में सबसे ऐतिहासिक कदम राजा अगाथोकल्स (Agathocles) (190 BCE से 180 BCE) ने उठाया। अगाथोकल्स ने चांदी के ऐसे सिक्के जारी किए जिन पर भारतीय देवी-देवताओं का प्रत्यक्ष चित्रण था। अफ़गानिस्तान के आई-फ़ानूम (AI-Khanoum) शहर के उत्खनन में अगाथोकल्स के छह ऐसे चांदी के सिक्के (ड्राम) मिले हैं, जिन पर भगवान वासुदेव-कृष्ण और बलराम-संकर्षण के चित्र उकेरे गए हैं। इन सिक्कों में बलराम के हाथों में गदा और हल है, जबकि वासुदेव-कृष्ण के हाथों में शंख और सुदर्शन चक्र स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय इतिहास में किसी सिक्कों पर हिंदू देवी-देवताओं का यह सबसे प्राचीन उपलब्ध चित्रण माना जाता है। बाद के राजाओं ने अपने सिक्कों पर गज (हाथी), वृषभ (बैल), सिंह और बौद्ध धर्मचक्र को भी प्रमुखता से अंकित किया।
यूनानी राजदूत हेलियोडोरस के परिवर्तन और विदिशा स्तंभ का धार्मिक महत्व क्या है? हिन्द-यूनानी राजाओं का भारत के प्रति आकर्षण केवल सिक्कों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे यहाँ के धर्म और दर्शन से गहराई से प्रभावित हुए। इसका सबसे प्रत्यक्ष और प्रामाणिक उदाहरण मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित 'हेलियोडोरस स्तंभ' (Heliodorus Pillar) है।
लगभग 115 BCE में, हिन्द-यूनानी राजा एंटियालकिडास (Antialcidas) ने अपने राजदूत हेलियोडोरस (Heliodorus) को शुंग साम्राज्य के राजा भागभद्र के दरबार में विदिशा भेजा था। विदिशा आकर हेलियोडोरस भारतीय दर्शन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वैष्णव धर्म स्वीकार कर लिया और स्वयं को 'भागवत' घोषित किया। हेलियोडोरस ने भगवान वासुदेव के सम्मान में विदिशा में एक विशाल पत्थर का गरुड़ स्तंभ स्थापित करवाया, जिस पर ब्राह्मी लिपि में एक प्राकृत अभिलेख उकेरा गया है। यह अभिलेख भारतीय इतिहास में वैष्णव धर्म और वासुदेव भक्ति का सबसे प्राचीन पुरातात्विक प्रमाण माना जाता है।
गांधार और मथुरा कला शैली पर यूनानी वास्तुकला तथा मूर्तिकला का क्या प्रभाव पड़ा? यूनानियों के आगमन से भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया, जिसे 'गांधार कला' (Gandhara Art) या ग्रीको-बौद्ध कला (Greco-Buddhist Art) कहा जाता है। गांधार क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान व अफ़गानिस्तान) में विकसित हुई इस कला शैली में भारतीय आध्यात्मिक विषयों को यूनानी यथार्थवादी (Realistic) शैली में प्रस्तुत किया गया।
गांधार कला में महात्मा बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियां यूनानी देवता अपोलो और ज़ीउस (Zeus) की भांति बनाई जाने लगीं। यूनानी मूर्तिकला के प्रभाव से बुद्ध की मूर्तियों में यथार्थवादी शारीरिक बनावट, घुंघराले बाल, सिर पर उष्णीष और कपड़ों की सुंदर सिलवटें (काइटन और हिमेटियन वस्त्र शैली) उकेरी गईं। इसके अलावा, भवनों और स्तूपों के निर्माण में यूनानी कुरिंथियन (Corinthian) स्तंभों, पत्तों की नक्काशी और ज्यामितीय डिजाइनों का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ।
उसी समय मथुरा कला केंद्र में भी यवन शासन के दौरान विशाल पत्थर की मूर्तियां बननी शुरू हुईं। मथुरा में यक्ष, नाग और अग्नि देव की विशालकाय आकृतियों में यूनानी शैली का प्रभाव देखा जा सकता है, जिसमें यक्ष मुदगरपाणि के हाथों में गदा और यूनानी नायक हरक्यूलिस (Heracles) जैसी शारीरिक सुडौलता दिखाई देती है।
बौद्ध धर्म के विकास और स्तूप निर्माण में हिंदू-यूनानी राजाओं की क्या भूमिका थी? हिन्द-यूनानी राजाओं ने बौद्ध धर्म को न केवल अपनाया बल्कि उसे राजकीय संरक्षण भी प्रदान किया। इनमें सबसे प्रमुख नाम सम्राट मेनांडर प्रथम का है, जिन्हें बौद्ध ग्रंथों में 'मिलिंद' कहा गया है। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ 'मिलिंदपन्हो' (मिलिंद के प्रश्न) में राजा मेनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच हुए दार्शनिक संवादों का विस्तृत वर्णन है।
मेनांडर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद कई बौद्ध स्तूपों और विहारों का निर्माण व विस्तार कराया। स्वात घाटी स्थित बुतकारा स्तूप (Butkara Stupa) के पुनरुद्धार और विस्तार में मेनांडर की मुख्य भूमिका रही है। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के शिंकोट (Shinkot) से प्राप्त एक धातु की मंजूषा (Casket) पर मेनांडर प्रथम का नाम उकेरा गया है, जिसमें बुद्ध के पवित्र अवशेष रखे गए थे। बौद्ध स्तूपों के भीतर अवशेष रखने वाले पत्थरों के पात्र (Reliquaries) सीधे तौर पर यूनानी पिक्सिस (Pyxis) बर्तनों से प्रेरित थे। बिमरन (Bimaran) मंजूषा जैसी कलाकृतियों में बुद्ध का चित्रण यूनानी मेहराबों के बीच किया गया है।
हिन्द-यूनानी नगर नियोजन और दैनिक जीवन की कलाकृतियों में कौन से यूनानी तत्व मिलते हैं? हिन्द-यूनानी शासकों ने भारत में कई व्यवस्थित नगरों की स्थापना की। तक्षशिला के निकट स्थित 'सिरकप' (Sirkap) और स्वात घाटी में स्थित 'बारिकोट' (Barikot) इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। सिरकप नगर का निर्माण यूनानी 'हिपोडामियन' (Hippodamian) ग्रिड-प्लान के आधार पर किया गया था, जहाँ एक मुख्य चौड़ी सड़क और उसके समकोण पर कटती हुई 15 गलियां बनाई गई थीं। इन नगरों के चारों ओर मजबूत रक्षात्मक दीवारें और बुर्ज बनाए गए थे।
उत्खनन में इन यूनानी नगरों से पत्थरों की गोल तश्तरियां (Stone Palettes) मिली हैं, जिन्हें कॉस्मेटिक या धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाता था। इन तश्तरियों पर यूनानी जलपरी, सिबेले (Cybele), हेलियोस (Helios) और यूनानी पौराणिक दृश्य उकेरे गए हैं। इसके अलावा, यूनानी शैली के अंगूठियों के पत्थर (Intaglio gems), कांच के पात्र और मोहरें भी मिली हैं जो यह दर्शाती हैं कि 600 BCE से 300 CE के बीच भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में यूनानी और भारतीय जीवनशैली का एक सुंदर सामंजस्य स्थापित हो चुका था।
नानी साम्राज्य केवल एक राजनीतिक दौर नहीं था, बल्कि यह दो महान विश्व सभ्यताओं के मिलन का अद्वितीय इतिहास था। यूनानियों की यथार्थवादी कला, मुद्रा निर्माण कला और नगर नियोजन ने भारत के कलात्मक परिदृश्य को एक नया आयाम दिया, जबकि भारत के वेदांत, बौद्ध धर्म और वैष्णव भक्ति ने यूनानी मन को गहराई से आंदोलित किया।
भाई-बहनों के प्यार वाले त्योहार पर जानें, जुड़वाँ बच्चों की व्यक्तिगतता को बढ़ावा देने के उपाय
रक्षाबंधन का त्योहार, भाई-बहनों के प्यार का प्रतीक है। इसके विपरीत, भाई-बहनों की प्रतिद्वंद्विता स्वाभाविक है, लेकिन जुड़वाँ बच्चों के साथ यह और बड़ी लग सकती है। वे अक्सर अपने माता-पिता के समय और ध्यान के लिए सीधी प्रतिस्पर्धा में होते हैं, और चूंकि वे समान विकासात्मक चरणों में होते हैं, समान आवश्यकताएं और इच्छाएं पैदा होती हैं। तुलना करना या होना, जुड़वाँ बच्चों की प्रतिद्वंद्विता का सबसे बड़ा कारण है। रिश्तेदार, शिक्षक, दोस्त और अजनबी स्वाभाविक रूप से जुड़वाँ बच्चों की तुलना करते हैं। यह कोई दुर्भावनापूर्ण बात नहीं है और केवल एक स्वाभाविक मानवीय व्यवहार है।
लेकिन जुड़वाँ बच्चों के लिए, किसी दूसरे व्यक्ति के मुकाबले लगातार आंके जाने का अनुभव, कभी-कभार संरचनात्मक रूप से उनके अस्तित्व के रूप में एक दबाव पैदा करता है। उदाहरण के लिए, उनके व्यक्तित्व बहुत अलग हो सकते हैं। एक जुड़वाँ अधिक बहिर्मुखी (extrovert) हो सकता है, जबकि दूसरा अधिक अंतर्मुखी (introvert) हो सकता है। यह अंतर, उनके रिश्ते में तनाव पैदा कर सकता है।
प्रतिद्वंद्विता की गतिशीलता जुड़वाँ बच्चों के प्रकार के अनुसार काफी भिन्न होती है। समरूप जुड़वाँ (आइडेंटिकल ट्विन्स - Identical Twins) बच्चों की तुलना उनके रूप-रंग और व्यक्तित्व पर की जाती है। समलैंगिक भ्रातृ जुड़वाँ (फ्रेटर्नल ट्विन्स - Fraternal Twins) बच्चों को अक्सर एक ही श्रेणी में रख दिया जाता है, भले ही उनमें किसी भी अन्य भाई-बहन की तुलना में कोई अधिक आनुवंशिक समानता न हो। इसके अलावा, लड़का-लड़की (भाई-बहन) की जुड़वाँ जोड़ी को उन विकासात्मक समय-सीमाओं पर तुलना का सामना करना पड़ता है, जो मेल नहीं खाती हैं। उदाहरण के लिए, लड़कियाँ आमतौर पर शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से तेजी से सुचिंतित होती हैं, जिससे उसका जुड़वाँ भाई खुद को हमेशा पीछे महसूस कर सकता है।
परिणामस्वरूप, जुड़वाँ बच्चों को अक्सर स्व-अस्तित्व की भावना महसूस नहीं होती है। माता-पिता, दूसरे लोगों को अपने जुड़वाँ बच्चों की तुलना करने से नहीं रोक सकते, लेकिन वे खुद ऐसा करने से बच सकते हैं। जब दूसरे ऐसा करते हैं, तो वे सौम्य तरीके से उनका ध्यान भटका सकते हैं। यह आवश्यक है क्योंकि, दोनों बच्चे दो अलग-अलग लोग हैं, और प्रत्येक अपने दम पर दिलचस्प है।
ईर्ष्या, एक आम और प्रबंधनीय भावना है। अधिकांश जुड़वाँ बच्चे किसी न किसी मोड़ पर, अपने भाई–बहन से ईर्ष्या का अनुभव करते हैं। अधिकांश बच्चे, इस रिश्ते को बिना किसी स्थायी नुकसान पहुँचाए, इससे निपटना सीख जाते हैं। परंतु, द्वेष करना कुछ अलग है। जुड़वाँ बच्चों में द्वेष, विशेषकर वर्षों की तुलना और महसूस की गई असमानता के बाद विकसित होता है। वास्तव में, यह घातक हो सकता है, और गलत टिप्पणियों, रिश्तों या अवसरों में नुकसान या शत्रुता में परिवर्तित हो सकता है। जो जुड़वाँ बच्चे गहरे द्वेष को अपने अंदर रखते हैं, वे अक्सर इसे खुद भी स्वीकार नहीं कर पाते।
अतः माता-पिता के लिए व्यावहारिक निष्कर्ष यह है कि यदि आपके जुड़वाँ बच्चे लड़ रहे हैं, तो केवल यह न पूछें कि वे किस बात पर लड़ रहे हैं, बल्कि यह पूछें कि यह लड़ाई उनपर क्या प्रभाव डाल रही है। कुछ जुड़वाँ बच्चों को लग सकता है कि वे अपने माता-पिता का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहे हैं। यह भावना खासकर शुरुआती वर्षों में आम है, जब उनको माता–पिता की बार-बार जरूरत होती हैं।
अगर, हम अपने परिचित जुड़वाँ बच्चों में प्यार चाहते हैं या उनके माता-पिता हैं, तो निम्नलिखित कुशल तरीकें मददगार हो सकते हैं।
1. व्यक्तिगतता को बढ़ावा दें और तुलना से बचें जुड़वाँ बच्चों के व्यक्तिगत गुणों को उजागर करना, तुलना से बचने का अच्छा तरीका है। जुड़वाँ बच्चों को अपने स्वयं के हितों और गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें। उदाहरण के लिए, यदि एक बच्चे को चित्रकारी करना पसंद है और दूसरे को संगीत पसंद है, तो दोनों बच्चों की व्यक्तिगत पसंद का समर्थन करें। इससे उन्हें आत्म-सम्मान और स्वायत्तता की भावना विकसित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, प्रत्येक बच्चे की अनूठी उपलब्धियों और गुणों का जश्न मनाएं।
2. स्पष्ट और सुसंगत सीमाएँ निर्धारित करें स्पष्ट नियमों और दिनचर्या को स्थापित करने से घर में संघर्ष को कम करने और निष्पक्षता को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। जुड़वाँ बच्चों को अक्सर तब प्रतिस्पर्धा की भावना महसूस होती है, जब उन्हें लगता है कि उनकी तुलना में दूसरे के साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है। प्रतिद्वंद्विता को कम करने के लिए, व्यवहार, अपेक्षाओं और अनुशासन को संभालने के तरीके में सुसंगत रहें। सुसंगत दिनचर्या और अपेक्षाएं होने से दोनों जुड़वाँ बच्चों को यह समझने में मदद मिलती है कि क्या स्वीकार्य है, उनसे क्या उम्मीद की जाती है, और एक-दूसरे की जगह और सामान का सम्मान करने का क्या महत्व है।
3. सहयोग को प्रोत्साहित करें जबकि प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है, जुड़वाँ बच्चों को सहयोग करना और एक संघ के रूप में एक साथ काम करना सिखाना, अधिक सकारात्मक रिश्ते को बढ़ावा दे सकता है। संघ आधारित गतिविधियाँ आपके जुड़वाँ बच्चों को प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे का समर्थन करने के मूल्य को देखने की अनुमति देती हैं। इसके अतिरिक्त, जब आप उनके सहयोग के क्षणों को देखते हैं, तो इस व्यवहार की प्रशंसा करें और उन्हें प्रोत्साहित करें। दूसरी ओर, उनके बीच यदि कोई असहमति उत्पन्न होती है, तो उन्हें इसे हल करने की प्रक्रिया के माध्यम से मार्गदर्शन करें। उन्हें अपनी भावनाओं को संप्रेषित करने और एक समाधान पर आने में उनकी मदद करें।
4. पक्षपात से बचें और निष्पक्ष रहें सुनिश्चित करें कि दोनों बच्चों को मूल्यवान महसूस हो और उनकी जरूरतें पूरी हों। यदि एक जुड़वाँ को किसी कार्य में अधिक सहायता की आवश्यकता है या उसकी कोई विशिष्ट आवश्यकता है, तो इस बात का ध्यान रखें कि आप अपना समय और ध्यान कैसे वितरित करते हैं। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि दोनों बच्चों को यह महसूस हो कि उन्हें आपके प्यार, ध्यान और समय का उचित हिस्सा मिल रहा है, तथा केवल किसी एक बच्चे की ही प्रशंसा नहीं हो रही है।
5. संघर्ष कौशल सिखाएं जुड़वाँ बच्चों को यह सिखाना कि अपने दम पर संघर्षों को कैसे हल किया जाए, एक आवश्यक जीवन कौशल है। जब कोई असहमति उत्पन्न होती है, तो केवल तभी हस्तक्षेप करें जब आवश्यक हो और इसे सीखने के अवसर के रूप रूप में उपयोग करें। स्वस्थ तरीके से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में उनकी मदद करना और शांत भाषा का उपयोग करके समझौते को प्रोत्साहित करना मददगार होता है।
6. प्रत्येक बच्चे को समान समय प्रदान करें जुड़वाँ बच्चे, अक्सर समान अनुभवों और पर्यावरण को साझा करते हैं, जिससे उपेक्षा या असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है। प्रत्येक बच्चे के साथ एक मजबूत बंधन को बढ़ावा देने और प्रतिद्वंद्विता को कम करने के लिए, प्रत्येक बच्चे के साथ समान क्षणों के लिए समय निकालें। इससे दोनों बच्चों को खास महसूस करने में मदद मिलती है और उनकी व्यक्तिगत जरूरतों का पोषण होता है।
7. धैर्यवान और सहानुभूतिपूर्ण बनें जुड़वाँ बच्चों के प्रति सहानुभूति का अभ्यास करें, तथा उनकी भावनाओं और निराशाओं को स्वीकार करें। जब एक बच्चा परेशान हो, तो उसकी चिंताओं को सुनें, उसकी भावनाओं को मान्य करें और आराम प्रदान करें। जैसे-जैसे आपके जुड़वाँ बड़े होंगे, संघर्ष को संभालने और अपनी भावनाओं को साझा करने की उनकी क्षमता में सुधार होगा।
8. बाहरी मदद कब लें?
यदि आपके जुड़वाँ बच्चों के बीच भाई-बहनों की प्रतिद्वंद्विता विशेष रूप से तीव्र हो जाती है या लगातार आक्रामकता का कारण बनती है, तो माता-पिता को किसी विशेषज्ञ से मार्गदर्शन लेना मददगार हो सकता है।
शाहजहाँपुर घराने की पहचान है सरोद,व पश्चिमी संगीत में लय और ऊर्जा का आधार हैं परकशन वाद्य
शाहजहाँपुर भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा के लिए जाना जाता है। यही नगर प्रसिद्ध शाहजहाँपुर घराने का उद्गम स्थल भी माना जाता है, जिसने सरोद वादन की परंपरा को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संगीत की यही विरासत हमें दुनिया की अन्य संगीत परंपराओं को जानने के लिए भी प्रेरित करती है। पश्चिमी संगीत में लय और ऊर्जा का आधार माने जाने वाले प्रमुख वाद्यों में ड्रम और अन्य तालवाद्यों (परकशन) का विशेष स्थान है।
ड्रम और अन्य तालवाद्य किसी भी संगीत रचना की लय, गति और ऊर्जा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ड्रम किट में बास ड्रम, स्नेयर, टॉम और झाँझ जैसे अनेक वाद्य शामिल होते हैं, जिनके संयोजन से विभिन्न प्रकार की तालें और प्रभाव उत्पन्न किए जाते हैं। जैज़, रॉक, पॉप, लोक और विश्व संगीत सहित लगभग हर संगीत शैली में परकशन वाद्यों का प्रयोग श्रोताओं को संगीत की लय से जोड़ने का कार्य करता है।
परकशन वादन की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। महान जैज़ ड्रमर बडी रिच (Buddy Rich) की प्रस्तुति उनकी अद्भुत गति, नियंत्रण और तकनीकी दक्षता का परिचय कराती है। वहीं स्टीव गैड (Steve Gadd) का वादन यह दर्शाता है कि सटीक लय और सहज अभिव्यक्ति किसी भी संगीत रचना को किस प्रकार नई ऊँचाई दे सकती है। भारतीय संदर्भ में मिकी हार्ट (Mickey Hart) और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन की संयुक्त प्रस्तुतियाँ यह दिखाती हैं कि पश्चिमी ड्रम और भारतीय तबला जैसी ताल परंपराएँ मिलकर भी एक अनूठा और आकर्षक संगीत अनुभव रच सकती हैं।
आज परकशन वाद्य केवल किसी एक देश या संगीत शैली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विश्वभर की संगीत परंपराओं को जोड़ने का माध्यम बन चुके हैं। अलग-अलग संस्कृतियों की लय जब एक साथ सुनाई देती है, तो संगीत की सार्वभौमिक भाषा और भी प्रभावशाली बन जाती है। यदि आप ताल, ऊर्जा और रचनात्मकता से भरपूर संगीत का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ परकशन वाद्यों की वैश्विक लोकप्रियता और उनकी विविध अभिव्यक्तियों का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।
दैनिक जीवन में मनोविज्ञान आपको कैसे सफल बना सकता है?
मनोविज्ञान आज हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका इतिहास जितना हम सोचते हैं, उससे कहीं अधिक पुराना और दिलचस्प है। यूं तो मनोविज्ञान का एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में जन्म 19वीं सदी के अंत में हुआ, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन मिस्र, यूनान, चीन, फारस और भारत के दर्शनशास्त्र से जुड़ी हुई हैं। 17वीं सदी में फ्रांसीसी दार्शनिक रेने देकार्त ने यह विचार प्रस्तुत किया था कि मन और शरीर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं जो एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। पहले के विचारक जहां मानव स्वभाव को समझने के लिए केवल तर्क और अवलोकन का सहारा लेते थे, वहीं आज का मनोविज्ञान वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित है।
मनोविज्ञान की शुरुआत एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में कैसे हुई? 19वीं सदी के मध्य में विल्हेम वुण्ट (Wilhelm Wundt) नामक एक जर्मन शरीर विज्ञानी ने प्रतिक्रिया समय की जांच के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान विधियों का उपयोग करना शुरू किया। उनकी पुस्तक ने शरीर विज्ञान और मानव विचार के बीच संबंधों को स्पष्ट किया। वर्ष 1879 में वुण्ट ने लीपज़िग (Leipzig) विश्वविद्यालय में दुनिया की पहली मनोविज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना की। इसी घटना को एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान की आधिकारिक शुरुआत माना जाता है। वुण्ट का मानना था कि मनोविज्ञान मानव चेतना का अध्ययन है। उनके एक प्रसिद्ध छात्र एडवर्ड बी टिचेनर (Edward B. Titchener) ने संरचनावाद की नींव रखी, जिसके अनुसार मानव चेतना को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जा सकता है।
इसी दौरान अमेरिका में भी मनोविज्ञान फल-फूल रहा था। विलियम जेम्स (William James) ने मनोविज्ञान की प्रसिद्ध पुस्तक लिखकर खुद को अमेरिकी मनोविज्ञान के जनक के रूप में स्थापित किया। उनके विचारों से प्रकार्यवाद का जन्म हुआ। प्रकार्यवाद इस बात पर केंद्रित था कि लोग अपने पर्यावरण में जीवित रहने के लिए व्यावहारिक रूप से कैसे व्यवहार करते हैं।
सिगमंड फ्रॉयड ने मानव मन के किन अनसुलझे रहस्यों को उजागर किया? 20वीं सदी की शुरुआत में ऑस्ट्रियाई न्यूरोलॉजिस्ट सिगमंड फ्रॉयड (Sigmund Freud) ने मनोविज्ञान की दिशा ही बदल दी। उन्होंने मनोविश्लेषण नामक एक नई पद्धति की खोज की, जिसने अचेतन मन के महत्व पर सबसे अधिक ज़ोर दिया। फ्रॉयड का मानना था कि हमारे बचपन के अनुभव और अचेतन इच्छाएं हमारे व्यक्तित्व और व्यवहार को आकार देती हैं।
फ्रॉयड ने यह सिद्ध किया कि मानसिक विकारों का कारण अक्सर वह अचेतन संघर्ष होता है जिसे हम समझ नहीं पाते। उन्होंने सपनों की व्याख्या को अचेतन मन तक पहुंचने का सबसे प्रामाणिक रास्ता बताया। उनके अनुसार सपने हमारी दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति का एक तरीका हैं। फ्रॉयड के मनोविश्लेषण सिद्धांत ने न केवल मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र को बल्कि कला, साहित्य और लोकप्रिय संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित किया।
कार्ल युंग के विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान ने क्या नए विचार दिए? स्विस मनोचिकित्सक कार्ल युंग (Carl Jung) ने विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान की स्थापना की। युंग शुरुआत में फ्रॉयड के करीबी सहयोगी थे, लेकिन बाद में वैचारिक मतभेदों के कारण दोनों के रास्ते अलग हो गए। युंग ने व्यक्तित्व को दो मुख्य प्रकारों में बांटा जिन्हें आज हम अंतर्मुखी और बहिर्मुखी के रूप में जानते हैं।
युंग का सबसे बड़ा योगदान सामूहिक अचेतन और मूलरूपों का सिद्धांत था। उनका मानना था कि कुछ यादें और विचार पूरी मानव जाति में समान रूप से पाए जाते हैं जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। युंग ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मनोविज्ञान और धर्म के बीच के संबंधों को समझने में बिताया। उन्होंने मध्य आयु वर्ग के लोगों की मनोचिकित्सा में भी अहम भूमिका निभाई और उन्हें अपने जीवन के अर्थ को फिर से खोजने में मदद की।
बी एफ स्किनर और व्यवहारवाद ने मनोविज्ञान को कैसे बदला? 20वीं सदी में ही मनोविज्ञान में एक नई विचारधारा का जन्म हुआ जिसे व्यवहारवाद कहा गया। इसका उद्देश्य मनोविज्ञान को एक पूर्ण वैज्ञानिक रूप देना था, इसलिए इसने केवल उस व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया जिसे स्पष्ट रूप से देखा और मापा जा सकता था।
रूसी शरीर विज्ञानी इवान पावलोव (Ivan Pavlov) ने कुत्तों पर किए गए अपने प्रयोगों से क्लासिकल कंडीशनिंग की खोज की। इसके बाद जॉन बी वाटसन (John B. Watson) ने व्यवहारवाद को मजबूती दी। लेकिन इसे सबसे अधिक प्रसिद्धि बी. एफ. स्किनर (B.F. Skinner) ने दिलाई। स्किनर ने ऑपरेंट कंडीशनिंग का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार किसी भी व्यवहार को पुरस्कार या दंड के माध्यम से बदला जा सकता है। उन्होंने जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए स्किनर बॉक्स का आविष्कार किया और शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रोग्राम्ड लर्निंग और टीचिंग मशीन जैसी अवधारणाएं पेश कीं।
आधुनिक मनोविज्ञान की प्रमुख शाखाएं कौन सी हैं? जैसे-जैसे मानव व्यवहार की समझ बढ़ती गई, मनोविज्ञान कई विशेष शाखाओं में बंटता चला गया। नैदानिक मनोविज्ञान मानसिक बीमारियों और असामान्य व्यवहार के निदान और उपचार पर केंद्रित है। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान इस बात का अध्ययन करता है कि लोग कैसे सोचते हैं, याद रखते हैं और निर्णय लेते हैं। विकासात्मक मनोविज्ञान जीवनभर मानव विकास और बदलाव को समझता है।
इसके अलावा शैक्षिक मनोविज्ञान छात्रों के सीखने के तरीकों और शिक्षा प्रणाली को सुधारने पर काम करता है। फोरेंसिक मनोविज्ञान कानून और न्याय प्रणाली में मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग करता है। औद्योगिक-संगठनात्मक मनोविज्ञान कार्यस्थलों पर कर्मचारियों की उत्पादकता और भलाई को बढ़ाने के लिए काम करता है। खेल मनोविज्ञान एथलीटों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके प्रदर्शन को बेहतर बनाने पर ध्यान देता है। स्वास्थ्य मनोविज्ञान यह देखता है कि जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करते हैं।
हमारे दैनिक जीवन में मनोविज्ञान का क्या महत्व है? मनोविज्ञान केवल अस्पतालों या किताबों तक सीमित नहीं है, यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि लोग वैसा व्यवहार क्यों करते हैं जैसा वे करते हैं। यह समझ हमारे व्यक्तिगत और व्यावसायिक रिश्तों में सहानुभूति और धैर्य लाती है।
मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मनोविज्ञान की भूमिका सबसे अहम है। यह हमें तनाव, चिंता और अवसाद जैसी भावनाओं को पहचानने और उनसे निपटने के तरीके सिखाता है। मनोविज्ञान हमारे संचार कौशल को भी निखारता है। यह हमें बॉडी लैंग्वेज समझने और अपनी बात को सही ढंग से रखने में मदद करता है। इसके अलावा, हमारे दैनिक निर्णय भी भावनाओं और पुरानी यादों से प्रभावित होते हैं। मनोविज्ञान हमें संतुलित और तर्कसंगत निर्णय लेना सिखाता है। कार्यस्थलों पर नेतृत्व क्षमता बढ़ाने से लेकर समाज की भलाई तक, मनोविज्ञान हर जगह लागू होता है।
मनोविज्ञान के इतिहास में महिलाओं का क्या योगदान रहा? इतिहास के पन्नों में अक्सर मनोविज्ञान के क्षेत्र में केवल पुरुषों के योगदान का ज़िक्र मिलता है, लेकिन शुरुआती दौर में तमाम चुनौतियों के बावजूद महिलाओं ने भी इस क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया है। मैरी व्हिटन काल्किन्स (Mary Whiton Calkins) ने हार्वर्ड में पढ़ाई की और वह अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (Psychological Association) की पहली महिला अध्यक्ष बनीं, हालांकि हार्वर्ड ने उन्हें केवल महिला होने के कारण डिग्री देने से मना कर दिया था। अन्ना फ्रॉयड (Anna Freud) ने बाल मनोविश्लेषण की नींव रखी और रक्षा तंत्र के कई सिद्धांतों को स्पष्ट किया। इसी तरह मैरी आइंसवर्थ ने बच्चों के विकास और उनके जुड़ाव को समझने में बहुत बड़ा योगदान दिया।
भारत में मनोविज्ञान के विकास में गिरींद्रशेखर बोस की क्या भूमिका रही? जब वैश्विक स्तर पर मनोविज्ञान अपनी जड़ें जमा रहा था, तब भारत में भी इसकी शुरुआत हो रही थी। डॉ गिरींद्रशेखर बोस ने भारत में मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया। उन्होंने पश्चिमी मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ और संस्कृति के अनुसार ढाला और समझा। डॉ बोस के प्रयासों ने ही भारत में मानसिक स्वास्थ्य और मानव व्यवहार के वैज्ञानिक अध्ययन की मजबूत नींव रखी, जिससे आज की पीढ़ी लाभान्वित हो रही है।
शाहजहाँपुर के राम प्रसाद बिस्मिल व् अशफाकउल्ला ख़ान:एकता की मिसाल रख हिलाई ब्रिटिश हुकूमत
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों के रक्त से लिखा गया है। जब भी देश के स्वतंत्रता संग्राम और सशस्त्र क्रांति का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। शाहजहाँपुर ने भारत माता को दो ऐसे महान सपूत दिए, जिन्होंने अपने शौर्य और बलिदान से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। ये दो नाम राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला ख़ान हैं। इन दोनों महान क्रांतिकारियों ने अपनी गहरी मित्रता और देशभक्ति से यह साबित कर दिया कि आज़ादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम एकता कितनी मज़बूत थी और देशप्रेम की वेदी पर प्राण न्यौछावर करने का जज़्बा कैसा होता है।
राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला ख़ान का प्रारंभिक जीवन कैसा था?
बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहाँपुर ज़िले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। अपनी युवा अवस्था में बिस्मिल ने, वर्ष 1875 में दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित किए गए आर्य समाज में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने एक प्रतिभाशाली लेखक और कवि के रूप में पहचान बनाई। जब उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादी और आर्य समाज के प्रचारक भाई परमानंद को दी गई मौत की सज़ा के बारे में पढ़ा, तो उनके भीतर पहली बार देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना पैदा हुई। सिर्फ 18 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पीड़ा को 'मेरा जन्म' नामक अत्यंत सशक्त कविता के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने 'राम', 'अज्ञात' और 'बिस्मिल' (जिसका अर्थ घायल या बेचैन होता है) जैसे उपनामों का उपयोग करते हुए हिंदी और उर्दू में कई रचनाएं लिखीं और वे बिस्मिल के नाम से ही देश भर में प्रसिद्ध हुए।
दूसरी ओर, अशफाकउल्ला ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 को शाहजहाँपुर में ही हुआ था। उनके पिता का नाम शफीक उल्लाह ख़ान और माता का नाम मजहूर-उन-निसा था। अशफाकउल्ला उस समय बड़े हो रहे थे जब देश में स्वतंत्रता की अलख जग चुकी थी। दोनों ही क्रांतिकारी शाहजहाँपुर की माटी से जुड़े थे और दोनों के भीतर देशप्रेम की गहरी भावना थी, जिसने उन्हें एक साथ ला खड़ा किया।
क्रांतिकारी विचारधारा और सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?
महात्मा गांधी ने जब देश में असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो उन्होंने भारतीयों से आग्रह किया कि वे सरकार को कर न दें और ब्रिटिश हुकूमत के साथ सहयोग न करें। लेकिन आंदोलन शुरू होने के लगभग 1.5 साल बाद, फरवरी 1922 में गोरखपुर में चौरी चौरा की घटना घटी। इस घटना में प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ पुलिस से भिड़ गई और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें लगभग 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा का कड़ा विरोध करते हुए, महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से देश के युवा बहुत निराश हुए और उनका मोहभंग हो गया। अशफाकउल्ला ख़ान और राम प्रसाद बिस्मिल भी इन्हीं युवाओं में से थे। बिस्मिल का कॉन्ग्रेस पार्टी की उदारवादी विचारधारा से मोहभंग हो गया था। वे गांधीवादी अहिंसक तरीकों के विपरीत स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी तरीकों में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि हिंसा और रक्तपात के बिना स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है। इसी विचारधारा के साथ, दोनों क्रांतिकारी एक-दूसरे के संपर्क में आए और सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना। इससे पहले बिस्मिल 'मातृवेदी' नामक एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना कर चुके थे और वर्ष 1918 के मैनपुरी षड्यंत्र में भी शामिल रहे थे।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) का गठन क्यों किया गया था? देश को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से, अक्टूबर 1924 में कानपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, जोगेश चंद्र चटर्जी और सचिन सान्याल ने मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) की स्थापना की। इसके बाद इसमें अशफाकउल्ला ख़ान भी प्रमुखता से जुड़ गए। मध्य 1920 के दशक में, इसी संगठन को पुनर्गठित करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) के रूप में भी जाना गया, जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवा समाजवादी विचारकों ने प्रमुख भूमिका निभाई।
इस संगठन का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक सरकार को उखाड़ फेंकना और उसके स्थान पर फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया (Federal Republic of United States of India) की स्थापना करना था, जिसका मूल सिद्धांत वयस्क मताधिकार होगा। वर्ष 1925 में, इस संगठन ने द रिवोल्यूशनरी (The Revolutionary) नामक एक घोषणापत्र प्रकाशित किया। इस घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया था कि इस गणराज्य के अंतिम संविधान को तब तैयार किया जाएगा जब भारत के प्रतिनिधियों के पास अपने निर्णय लेने की शक्ति होगी। साथ ही, इसका उद्देश्य मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करना था। रेलवे, परिवहन, खदानों और बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने का भी संकल्प लिया गया था।
घोषणापत्र में यह भी स्पष्ट किया गया था कि भारतीय क्रांतिकारी न तो आतंकवादी हैं और न ही अराजकतावादी। वे देश में अराजकता नहीं फैलाना चाहते। उनका उद्देश्य केवल आतंकवाद नहीं है, हालांकि वे प्रभावी प्रतिशोध के रूप में कभी-कभी इस तरीके का सहारा ले सकते हैं।
ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) को अंजाम कैसे दिया गया? हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की गतिविधियों और सशस्त्र क्रांति के लिए हथियारों की आवश्यकता थी, जिसके लिए भारी धन की ज़रूरत थी। इसके लिए संगठन ने ब्रिटिश खजाने को लूटने की योजना बनाई। 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला ख़ान, शचींद्रनाथ बख्शी, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त और केशव चक्रवर्ती सहित 10 युवा क्रांतिकारियों ने एक साहसिक डकैती को अंजाम दिया। यह घटना लखनऊ के पास काकोरी नामक गाँव में घटी।
उन्होंने नंबर 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन (Number 8 Down Passenger Train) को रोका, जो शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही थी। इस ट्रेन में ब्रिटिश हुकूमत का आधिकारिक खज़ाना (रेलवे का पैसा) ले जाया जा रहा था, जिसका उपयोग क्रांतिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को कमज़ोर करने के लिए करना चाहते थे। क्रांतिकारियों ने ट्रेन रोककर वह सारा खज़ाना लूट लिया। इस साहसिक घटना को काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) के नाम से जाना जाता है। इस घटना से संगठन को बहुत आवश्यक वित्तीय सहायता मिली, जिससे संगठन का विस्तार हुआ।
इस घटना की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने अब काकोरी और मलीहाबाद क्षेत्र के प्रसिद्ध दशहरी आमों का नाम बदलकर इस ऐतिहासिक घटना के सम्मान में काकोरी ब्रांड (Kakori Brand) कर दिया है।
गिरफ्तारी, मुकदमा और अंततः शहादत की कहानी क्या है? काकोरी ट्रेन एक्शन के एक महीने के भीतर ही संगठन के कई सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए। इस मामले में कुल 17 लोगों को जेल भेजा गया और 4 को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। राम प्रसाद बिस्मिल को सितंबर 1926 में गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन अशफाकउल्ला ख़ान कुछ समय तक फरार रहे। वे कुछ समय तक अपने घर से आधा मील दूर गन्ने के खेत में छिपे रहे। उसके बाद वे बिहार गए और फिर दिल्ली चले गए, जहाँ अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
काकोरी कांड का यह मुकदमा लगभग 1.5 साल तक चला। अप्रैल 1927 में मुकदमे का फैसला आया, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला ख़ान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई, जबकि अन्य को उम्रकैद की सज़ा दी गई। 19 दिसंबर, 1927 को इन वीर सपूतों को फाँसी दे दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में अपने प्राणों की आहुति दी, जबकि अशफाकउल्ला ख़ान ने फ़ैज़ाबाद में हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया। अशफाकउल्ला ख़ान को उनके पैतृक ज़िले शाहजहाँपुर में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
इन क्रांतिकारियों के बलिदान को आज भी पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने गोरखपुर में एक प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) का नाम महान स्वतंत्रता सेनानी अशफाकउल्ला ख़ान के नाम पर रखने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है। शाहजहाँपुर की भूमि हमेशा इस बात पर गर्व करेगी कि उसने आज़ादी की बलिवेदी पर अपने दो सबसे अनमोल रत्न न्यौछावर किए।
राइट ब्रदर्स से लेकर स्वदेशी तेजस तक, जरूर जानें विमानन का इतिहास, विज्ञान और सैन्य सफर
क्या आप जानते हैं कि, हवाई जहाज का पहला सच्चा संस्करण इंग्लैंड में सर जॉर्ज कैली (Sir George Caley) द्वारा बनाया गया था। उन्नीसवीं सदी तक निश्चित पंख और प्रोपेलेंट (Propellent) प्रणाली वाले विमान के डिजाइन नहीं थे। इसी समय, 1874 में फेलिक्स डू टेम्पल (Felix Du Temple) भाप से चलने वाले मोनोप्लेन (Monoplane) के साथ संचालित उड़ान का प्रयास करने वाले पहले व्यक्ति बने। किसी विमान में पहली निरंतर एवं नियंत्रित उड़ान, 1903 में राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) द्वारा हासिल की गई थी। 1905 फ़्लायर (Flyer), तीन-अक्ष नियंत्रण वाला पहला विमान था, और भविष्य के सभी विमानों का आधार बना।
1889 में लॉरेंस हार्ग्रेव (Lawrence Hargrave) ने रोटरी इंजन का आविष्कार किया, जो संचालित उड़ान के लिए एक बड़ा कदम था। संचालित उड़ान ने अधिक नियंत्रण और अधिक सीमा की अनुमति दी, और उड़ान को परिवहन का एक व्यवहार्य तरीका बना दिया। जल्द ही लोग विमानन का अध्ययन करने लगे। फिर कुछ वर्षों बाद, 1914 में इगोर सिकोरस्की (Igor Sikorsky) ने एक बड़ा चार इंजन वाला बाइ-प्लेन (Bi–plane) बनाया, जो एक पायलट और एक सह-पायलट के लिए दोहरे नियंत्रण, केबिन प्रकाश व्यवस्था, बिस्तर और शौचालय के साथ लंबी दूरी तक उड़ान भरने में सक्षम था। इसका उपयोग निजी और सैन्य भूमिकाओं के लिए किया जाता था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, सशस्त्र बलों के लिए हवा से हमला करने में सक्षम होना एक रोमांचक अवधारणा थी। 1914 तक, विमानों को काफी परिष्कृत किया गया था। जबकि, दूसरे विश्व युद्ध तक विमानों में हथियारों के रूप में भी काफी सुधार हो चुका था। तब लड़ाके और बमवर्षक विमान आम हो गए थे। विश्व युद्ध के बाद, ऐसे स्टील्थ विमान (Stealth Planes) बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिन्हें रडार द्वारा पहचाना नहीं जा सकता था। इसके अलावा, सुपरसोनिक विमान 1947 से महत्वपूर्ण बने हैं। लेकिन बेहतर डिजाइनों की बदौलत, अब सुपरसोनिक उड़ान में नए सिरे से दिलचस्पी बढ़ी है।
दरअसल, उड़ान हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए, एक हवाई जहाज चार बुनियादी वायुगतिकीय बलों के सावधानीपूर्वक संतुलन पर निर्भर करता है: लिफ्ट (Lift), वेट (Weight), थ्रस्ट (Thrust), और ड्रैग (Drag)। किसी विमान को सुचारू रूप से उड़ान भरने के लिए, इन बलों को संतुलित होना चाहिए।
1. थ्रस्ट: यह विमान के प्रोपेलर (Propeller) या जेट इंजन द्वारा उत्पन्न वायुगतिकीय बल है, जो आकाश में हवाई जहाज को आगे धकेलता या खींचता है।
2. ड्रैग: यह थ्रस्ट का विरोधी बल है। ड्रैग वह घर्षण और वायु प्रतिरोध है, जो वायुमंडल में उड़ते समय विमान को धीमा करने की कोशिश करता है। खिंचाव को कम करने और उच्च गति बनाए रखने के लिए, विमानों को वायुगतिकीय बनाया जाता है (जैसे कि, उड़ान भरने के बाद उनके लैंडिंग गियर को वापस लेना)। किसी विमान को आगे बढ़ने और उसकी गति बनाए रखने या बढ़ाने के लिए, थ्रस्ट, ड्रैग के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए।
3. वेट: यह हवाई जहाज के द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर लगने वाला बल है। भारी वाणिज्यिक विमानों में काफी वजन होता है, जो उन्हें पृथ्वी की ओर खींचता है।
4. लिफ्ट: यह ऊपर की ओर जाने वाला विरोधी बल है, जो वजन पर काबू पाता है, और हवाई जहाज को हवा में बनाए रखता है। विमान को ऊपर उठाने या उसकी ऊंचाई बनाए रखने के लिए, लिफ्ट, वजन के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए। लिफ्ट तभी मौजूद हो सकता है, जब किसी ठोस वस्तु और गतिशील तरल पदार्थ (वायु) के बीच गति में सापेक्ष अंतर हो। विमान का पंख आने वाले वायु प्रवाह को विभाजित करने के लिए एयरफ़ॉइल (Airfoil) के रूप में कार्य करता है।
एयरफ़ॉइल आकार और हवा की गति: विमानों के पंख को विशेष रूप से आकार दिया जाता है, और वह झुका हुआ होता है। इससे पंख के शीर्ष पर बहने वाली हवा का मार्ग संकीर्ण हो जाता है, जिससे वह नीचे से गुजरने वाली हवा की तुलना में तेज़ गति से बहती है।
बर्नौली का सिद्धांत (Bernoulli’s principle): द्रव गतिकी के अनुसार, जैसे-जैसे हवा की गति बढ़ती है, उसका दबाव कम हो जाता है। चूंकि पंख के ऊपर बहने वाली हवा तेजी से चलती है, यह पंख के नीचे धीमी गति से बहने वाली हवा की तुलना में कम दबाव डालती है। दबाव में यह अंतर ऊपर की ओर दबाव पैदा करता है, जिसे लिफ्ट के रूप में जाना जाता है।
आकाश में दिशा बदलने और संचालन करने के लिए, पायलट एयरफ़ोइल के आकार को बदलते हैं, और विशिष्ट नियंत्रण प्रणालियों का उपयोग करके, बलों के संतुलन को समायोजित करते हैं।
पूरे इतिहास में, वाणिज्यिक प्रौद्योगिकियां अक्सर सैन्य प्रगति से विकसित हुई हैं। हवाई जहाज के विकास में भी, यही नियम लागू होता है। उड़ान भरने की क्षमता का उपयोग, सबसे पहले खोज करने वाले विमानों को विकसित करने के लिए किया गया था। फिर, एक बार जब लोगों ने उन विमानों को मार गिराने की तकनीक विकसित कर ली, तो लड़ाकू विमान पेश किए गए। इस कारण, विमानों को हल्का, तेज़ और अधिक चुस्त बनाना पड़ा, जिससे राष्ट्रो को नवाचार करना पड़ा।
इससे अंततः ऐसे विमान तैयार हुए जो व्यावसायिक उपयोग के लिए पर्याप्त सुरक्षित और विश्वसनीय थे। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, पूरी दुनिया में वाणिज्यिक विमान सेवाएं उभरने लगीं। हवाई यात्रा में नवाचार का अगला बड़ा दौर 1940 के दशक में द्वितीय विश्व युद्ध के साथ हुआ। बोइंग (Boeing) विमान, जो पहले छोटे मेल वाहक और वाणिज्यिक विमान थे, तब सैन्य परिदृश्य में प्रवेश कर गए।
प्रथम विश्व युद्ध में पहले हवाई जहाजों का उपयोग किए जाने के बाद से, सैन्य विमानन ने एक लंबा सफर तय किया है। प्रोपेलर-चालित बाइप्लेन से लेकर गुप्त लड़ाकू विमानों तक, सैन्य विमानों की तकनीक पिछली शताब्दी में काफी विकसित हुई है। सैन्य वैमानिकी के शुरुआती दिनों में, विमान अपेक्षाकृत सरल मशीनें थीं। आम तौर पर, वे पिस्टन इंजन (Piston engine) द्वारा संचालित बाइप्लेन थे, और हवाई लड़ाई के लिए मशीन गन से लैस थे। ये विमान दुश्मन की गोलाबारी के प्रति संवेदनशील थे, और कम ऊंचाई पर ही उड़ सकते थे। हालांकि, वे खोज करने और जमीनी हमले की भूमिकाओं में अत्यधिक प्रभावी साबित हुए।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद अधिक शक्तिशाली इंजनों की शुरूआत और वायुगतिकी में प्रगति के कारण तेज और अधिक गतिशील विमानों का विकास हुआ। फिर, प्रोपेलर-चालित लड़ाकू विमान द्वितीय विश्व युद्ध में प्रमुख बन गए। ये विमान उच्च गति और ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम थे, तथा वे रडार और रॉकेट जैसी उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस थे।
1940 के दशक के अंत में जेट-संचालित विमानों के विकास ने सैन्य विमानन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया। जेट इंजन, पिस्टन इंजन की तुलना में अधिक शक्तिशाली और कुशल थे, जिससे विमान बहुत अधिक गति और ऊंचाई पर उड़ सकते थे। बाद में, 1980 के दशक में स्टील्थ तकनीक (Stealth technology) के विकास ने सैन्य विमानन में क्रांति ला दी। स्टील्थ तकनीक को रडार पर विमान का पता लगाना कठिन बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, और इसने अत्यधिक उन्नत लड़ाकू जेट के विकास की अनुमति दी। ये विमान उन्नत एवियोनिक्स (Avionics), सेंसर और हथियार प्रणालियों से लैस हैं, जो उन्हें दुनिया के सबसे सक्षम लड़ाकू विमानों में से एक बनाते हैं।
सैन्य विमान प्रौद्योगिकी के भविष्य में, यह संभावना है कि, विमान प्रौद्योगिकी का विकास जारी रहेगा, तथा प्रोपेलेंट, सामग्री और एवियोनिक्स में नई प्रगति के साथ और भी अधिक उन्नत लड़ाकू विमान तैयार होंगे। सैन्य विमान प्रौद्योगिकी का विकास, मानव जगत की सरलता और नवीनता का प्रमाण है, और यह सभी देशों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।
इसी का एक उदाहरण, हमारे देश का लड़ाकू विमान - एचएएल तेजस (HAL Tejas) है। यह एक भारतीय एकल इंजन, 4.5 जनरेशन, एवं डेल्टा विंग वाला बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान है, जिसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी द्वारा डिजाइन किया गया है। इसे भारतीय वायु सेना (आईएएफ) और भारतीय नौसेना के लिए, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा निर्मित किया गया है। इस विमान ने 2001 में अपनी पहली उड़ान भरी थी, और इसने 2015 में भारतीय वायुसेना के साथ सेवा में प्रवेश किया। यह विमान अपनी जेनरेशन के सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों में सबसे छोटा और हल्का है।
1980 के दशक में, भारतीय वायु सेना मिग-21 जैसे पुराने लड़ाकू विमानों का संचालन कर रही थी। मिग-21, 1963 से भारतीय वायुसेना का मुख्य आधार रहा है। फिर, 1983 में भारत सरकार ने भारतीय वायुसेना के पुराने बेड़े को बदलने के लिए एक नया हल्का लड़ाकू विमान विकसित करने के प्रारंभिक लक्ष्य के साथ लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (Light Combat Aircraft) कार्यक्रम की स्थापना की थी। इसी कार्यक्रम के चलते तेजस विमान का विकास किया गया।
मणिपुर के लोंगपी काली मिट्टी बर्तन हैं एक उदाहरण, आधुनिक युग में पारंपरिक शिल्प के सम्मान का
हम जानते ही हैं कि, हमारा भारत देश शिल्प कला में दुनिया में अग्रसर है। क्या आप जानते हैं कि, मणिपुर के नुंगबी खुल्लन गांव के तांगखुल नागा लोग, कई सदियों से हाथ से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। माना जाता है कि, ये ‘लोंगपी मिट्टी बर्तन’, जिन्हें नुंगबी मिट्टी के बर्तन के नाम से भी जाना जाता है, नवपाषाण काल (10,000 ईसा पूर्व) से ही चलन में है। उखरुल जिले के नुंगबी गांव में 400 घर हैं, और लगभग 200 कारीगर आज भी इस शिल्प का अभ्यास कर रहे हैं। मुख्य कुम्हार और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ता - माचिहान सासा, तांगखुल जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, और उनके काम ने इधर की मिट्टी के बर्तनों को वैश्विक पहचान दिलाई है।
पत्थर-मिट्टी के साधारण बर्तन बनाने के लिए, अगर मिट्टी को पत्थर के साथ मिलाया जाए, तो आग में गर्म करने पर वह फूट जाएगा। परंतु, तांगखुल लोगों ने इस शिल्प में महारत हासिल की है, और लोंगपी बर्तनों का भंडारण के साथ-साथ, उच्च तापमान पर खाना पकाने के लिए भी सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।
हाथ से आकार दिए गए इन बर्तनों को पॉलिश किया जाता है, धूप में सुखाया जाता है, और फिर अलाव में जलाया जाता है। इससे उनका रंग काला या भूरा, और धातु जैसा दिखने लगता है। परंपरागत रूप से, हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों का उपयोग स्थानीय स्तर पर, मैतेई, माओ नागा, कोम, पाओमी, जैसे कुछ अन्य समुदायों द्वारा भी किया जाता था। अब मणिपुर के बाहर भी इनकी अच्छी मांग है, क्योंकि लोंगपी बर्तनों में पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट माना जाता है। नुंगबी में, उनका उपयोग चावल से बीयर बनाने, मसालों तथा पानी के भंडारण, और खाना पकाने के लिए किया जाता है।
पहले, यह शिल्प दो गांवों – नुंगबी और लोंगपी काजुई में प्रचलित था, परंतु आज, नुंगबी खुल्लन एकमात्र कुम्हार गांव बना है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, लेकिन पुरुष कारीगरों की संख्या महिला कुम्हारों से अधिक है। लोंगपी शिल्प को मूल रूप से ‘लोरी हैमलेई’ कहा जाता था, जिसका अर्थ शाही मिट्टी के बर्तन था। तब, केवल अमीर लोग ही इसे खरीद सकते थे। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, और निर्माण काम कई महीनों तक चलता है। क्योंकि, कारीगर स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार काम करते हैं।
मिट्टी को तीन दिनों तक सुखाने के बाद, ओखली और मूसल का उपयोग करके इसका महीन पाउडर बनाया जाता है, और फिर बांस की छलनी से इसे छान लिया जाता है। सरपेंटाइन या जहरमोहरा पत्थर, इन बर्तनों में प्रयुक्त होने वाला एक अन्य प्रमुख घटक है, जिसे स्थानीय रूप से 'लेशोनलुंग' कहा जाता है। मैग्नीशियम से भरपूर होने के कारण, इसका रंग नीला, हरा या काला होता है। इस पत्थर को काफुंग्रिम पहाड़ी से निकाला जाता है, जो इस गांव से लगभग 30 मिनट की पैदल दूरी पर है। कुम्हार इसे शुष्क मौसम में एकत्र करते हैं, क्योंकि तब इसे ले जाना और साफ करना आसान होता है। फिर, इस पत्थर का भी पाउडर बनाया जाता है।
इसके बाद, एक निश्चित अनुपात में छनी हुई मिट्टी का पाउडर, पत्थर का पाउडर, और पानी मिलाया जाता है, ताकि उचित बर्तन बन सकें। फिर, मिश्रण को नरम और लचीला होने तक गूंधा जाता है। बर्तन का मूल मॉडल प्राप्त करने के लिए सांचे, स्लैब और अन्य विभिन्न उपकरणों का उपयोग करके, इस सामग्री को उसमें लगाया जाता है।
अगले दिन, इसे बांस के चप्पू और धागे का उपयोग करके हाथों से आकार दिया जाता है, जबकि बांस की छड़ी की मदद से ही, इनका समतलन भी किया जाता है। अंत में, वांछित आकार प्राप्त होने तक इसे सुधारा जाता है, जिसके बाद बाहरी सतह को बांस की छड़ी से खुरच कर चिकना किया जाता है। बर्तनों को दो से तीन दिनों तक सुखाया जाता है। बाद में बर्तनों को चमकाने के लिए, चिकने ठोस पत्थरों या जानवरों की हड्डियों का उपयोग किया जाता है। इसके बाद, उन्हें फिर से पॉलिश किया जाता है। पॉलिशिंग जितनी अच्छी होगी, उत्पाद उतना ही चमकदार और चिकना होगा। अंत में, बर्तनों को पांच से सात घंटों तक 1200 डिग्री सेल्सियस पर आग में पकाया जाता है।
आग से निकालने के बाद, जब बर्तन गर्म होते हैं, तभी उन्हें माची चीज़ (चिरोना पेड़) की ताजी पत्तियों से साफ और पॉलिश किया जाता है। इस प्रकार, पत्तियों से चमकाने के दौरान बर्तन का रंग, काला या भूरा निर्धारित होता है। यह अंतिम चरण है, जिसके बाद बर्तन उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं।
अधिकांश अन्य मिट्टी के बर्तनों के विपरीत, लोंगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया काफी श्रम-गहन है, और पूरी तरह से हाथों से की जाती है। साथ ही, इसका काला रंग भी प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इसमें कोई रसायन या पेंट की भूमिका नहीं होती। मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में किसी भी रसायन, मशीन या पहियों का उपयोग नहीं किया जाता है। कुछ बर्तन निर्माण कार्यशालाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया हस्तनिर्मित है। लोंगपी उत्पाद किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, और उत्पाद पूरी तरह से अपघटनीय हैं।
2007 में, दिल्ली में लोंगपी शिल्पकार - मैथ्यू सासा द्वारा शुरू की गई ‘मैथ्यू सासा क्राफ्ट’, और सितंबर 2015 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा शुरू की गई यूएसटीटीएडी जैसी पहलें, इस शिल्प को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं। मैथ्यू सासा, जिन्होंने कारीगरों को प्रशिक्षित करने और इस शिल्प को लोकप्रिय बनाने के लिए मैथ्यू सासा क्राफ्ट की स्थापना की, माचिहान सासा के पुत्र हैं। मैथ्यू सासा की पहल, राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी और वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मेलों में भागीदारी ने, पूरे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोंगपी मिट्टी के बर्तनों की लोकप्रियता और बिक्री को बढ़ावा दिया है।
राग रामदासी मल्हार: अनूठे स्वर-विन्यास से सजा वर्षा ऋतु का विशिष्ट राग
अगर मल्हार राग-परिवार के अपेक्षाकृत कम प्रस्तुत किए जाने वाले रागों की बात की जाए, तो राग रामदासी मल्हार अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़े मल्हार अंग की मधुरता को अपने अनूठे स्वर-विन्यास के साथ प्रस्तुत करता है। यद्यपि इसकी प्रस्तुतियाँ मियाँ की मल्हार या मेघ मल्हार की तुलना में कम सुनने को मिलती हैं, फिर भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इसे एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली राग माना जाता है।
रामदासी मल्हार अपनी गंभीर, संतुलित और भावपूर्ण प्रकृति के लिए जाना जाता है। इसकी रचना में मल्हार के विशिष्ट स्वरांगों के साथ ऐसे स्वर-प्रयोग मिलते हैं, जो इसे अन्य मल्हार रागों से अलग पहचान देते हैं। आलाप, बंदिश और तानों के माध्यम से कलाकार इस राग के विभिन्न भावों को विस्तार देते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति में नई कल्पनाशीलता और संगीतात्मक सौंदर्य उभरकर सामने आता है।
इस राग की विविध प्रस्तुतियाँ इसकी गहराई और अभिव्यक्ति को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। पंडित वेंकटेश कुमार की गायकी में रामदासी मल्हार का गंभीर और विस्तृत स्वरूप सुनाई देता है। पंडिता पद्मा तलवलकर अपनी सधी हुई शैली में इसकी कोमलता और भाव-संपन्नता को प्रस्तुत करती हैं, जबकि उस्ताद अमीर ख़ाँ की प्रस्तुति राग की विलंबित विस्तार शैली और सूक्ष्म स्वर-विन्यास का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।
यदि आप मल्हार राग-परिवार के कम परिचित लेकिन अत्यंत समृद्ध रागों का अनुभव करना चाहते हैं, तो राग रामदासी मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट शुरुआत हैं। इनमें वर्षा ऋतु का सौंदर्य, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गहराई और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर संगम सुनाई देता है।
विलुप्ति की कगार पर 'कैसर-ए-हिंद', क्या हम बचा पाएंगे हिमालय की इस उड़ती हुई विरासत को?
शाहजहाँपुर के प्रकृति प्रेमियों और पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि हमारे देश के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में एक ऐसी तितली पाई जाती है जिसे 'कैसर-ए-हिंद' (Kaiser-i-Hind) कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम तेइनोपालपस इम्पेरियालिस (Teinopalpus imperialis) है। 'कैसर-ए-हिंद' का शाब्दिक अर्थ है 'भारत का सम्राट'। यह नाम इसे इसकी दुर्लभता और इसके पंखों पर मौजूद राजसी गहरे हरे और चमकदार पीले रंगों के कारण दिया गया है। यह भारत की सबसे दुर्लभ और संरक्षित तितलियों में से एक है, जिसे इसकी शाही भव्यता के कारण यह गौरवशाली नाम मिला है।
यह तितली कहाँ पाई जाती है? कैसर-ए-हिंद मुख्य रूप से पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में दिखाई देती है। भारत में यह अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, असम, मणिपुर और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इसके अलावा यह नेपाल, भूटान, उत्तरी म्यांमार, वियतनाम और चीन के सिचुआन प्रांत में भी देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक उच्च-ऊंचाई वाली प्रजाति है जो आमतौर पर समुद्र तल से 6,000 से 10,000 फीट की ऊंचाई पर घने जंगलों वाले पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।
कैसी है इसकी शारीरिक संरचना? इस तितली की बनावट बेहद अनूठी होती है। नर कैसर-ए-हिंद के पिछले पंखों पर चमकीले पीले रंग का एक पैच होता है, जबकि मादा आकार में नर से बड़ी होती है और उसके पंखों पर धूसर (Grey) रंग के बड़े निशान होते हैं। इसके पंखों की हरी चमक वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रही है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसके स्केल की त्रि-आयामी (3D) फोटोनिक संरचना के कारण यह हरा रंग इतना आकर्षक दिखाई देता है।
इसकी जीवनशैली और प्रजनन चक्र क्या है? कैसर-ए-हिंद की उड़ान बहुत तेज और शक्तिशाली होती है। यह अक्सर पेड़ों की ऊपरी शाखाओं (Tree-top level) पर उड़ती है और केवल तेज सुबह की धूप होने पर ही नीचे की वनस्पतियों पर उतरती है। इसके विपरीत, मादाएं अक्सर बादल छाए रहने या बारिश के मौसम में भी उड़ती देखी गई हैं। इनका प्रजनन चक्र काफी विशिष्ट होता है। इसके लार्वा मुख्य रूप से 'मैगनोलिया कैंपबेली' (Magnolia campbellii) नामक पौधे पर पलते हैं। मादा तितली पत्तों के निचले हिस्से में बैंगनी-लाल रंग के गोल अंडे देती है।
क्या हैं इसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे? अपनी सुंदरता और दुर्लभता के कारण यह तितली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करों और संग्रहकर्ताओं (Collectors) के निशाने पर रहती है। हालांकि इसे भारतीय कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है, लेकिन अवैध शिकार अब भी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती खेती (झूम खेती), सड़कों का निर्माण और बस्तियों के बसने के कारण जंगलों की कटाई हो रही है। इस 'स्नो ड्रॉट' और वनों के विनाश के कारण इसके भोजन और प्रजनन के लिए जरूरी पौधे (मैग्नोलिया परिवार) कम होते जा रहे हैं।
संरक्षण क्यों है अनिवार्य? अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में इसे 'राज्य तितली' के रूप में अपनाया है, जो इसके संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह प्रजाति उच्च-ऊंचाई वाले वनों के स्वास्थ्य का संकेत देने वाली 'कीस्टोन प्रजाति' मानी जाती है। यदि हम कैसर-ए-हिंद को बचाते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से हम हिमालय के उस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचा रहे होते हैं, जिस पर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता निर्भर करती है।
आखिर क्यों सेमीकंडक्टर को 'नया तेल' कहा जा रहा है?
आज के डिजिटल युग में, एक मनुष्य के नाखून के बराबर क्षेत्र में समाए छोटे से सेमीकंडक्टर चिप के भीतर अरबों ट्रांजिस्टर मौजूद हो सकते हैं। यह तथ्य सुनने में किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन यही आधुनिक तकनीक की वास्तविकता है। सेमीकंडक्टर चिप्स आज हमारे स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर, वाहनों और यहाँ तक कि घरेलू उपकरणों के 'दिमाग' के रूप में कार्य करते हैं। इनके बिना हमारी डिजिटल दुनिया थम सकती है। यही कारण है कि आज भारत अपनी 'सेमीकंडक्टर मिशन' के ज़रिए इस वैश्विक रेस में मज़बूती से कदम रख रहा है।
सेमीकंडक्टर चिप्स क्या हैं और ये हमारे जीवन में क्यों महत्वपूर्ण हैं? सेमीकंडक्टर या अर्धचालक एक ऐसी सामग्री है जिसकी विद्युत चालकता (electrical conductivity) एक सुचालक (जैसे तांबा) और एक कुचालक (जैसे कांच) के बीच की होती है। विकिपीडिया के अनुसार, सिलिकॉन सबसे आम अर्धचालक सामग्री है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाने के लिए किया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि डोपिंग (अशुद्धियों को मिलाना) के ज़रिए इनकी चालकता को बदला और नियंत्रित किया जा सकता है।
ये छोटी सी चिप्स बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं। जब हम अपने फ़ोन पर कोई ऐप खोलते हैं या कंप्यूटर पर कोई फाइल सेव करते हैं, तो ये चिप्स ही उन निर्देशों को प्रोसेस करती हैं। आईबीईएफ (IBEF) के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर की अपरिहार्य भूमिका के कारण इन्हें अक्सर 'नया तेल' कहा जाता है।
इनकी शुरुआत कैसे हुई और यह तकनीक कैसे विकसित हुई? सेमीकंडक्टर तकनीक का इतिहास 19वीं शताब्दी से शुरू होता है, लेकिन असली क्रांति 20वीं सदी के मध्य में आई। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, 1947-48 में बेल लेबोरेटरीज में अमेरिकी भौतिक विज्ञानी जॉन बर्दीन, वाल्टर ब्रेटन और विलियम शॉकली ने पहले ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया था। यह आविष्कार वैक्यूम ट्यूबों का एक छोटा, कम बिजली खपत वाला और अधिक विश्वसनीय विकल्प साबित हुआ।
इसके बाद 1958 में जैक किल्बी ने पहला वर्किंग इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) प्रदर्शित किया और 1959 में रॉबर्ट नॉयस ने पहला 'मोनोलिथिक' आईसी चिप विकसित किया। इन आविष्कारों ने इलेक्ट्रॉनिक्स के लघुकरण (miniaturization) का रास्ता खोल दिया। मूर के नियम (Moore’s Law) के अनुसार, हर दो साल में एक चिप पर ट्रांजिस्टर की संख्या लगभग दोगुनी होती गई, जिससे चिप्स की गति लाखों गुना बढ़ गई और उनकी लागत कम होती गई।
चिप बनाने की वैश्विक रेस में कौन आगे है? दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का निर्माण वर्तमान में कुछ ही दिग्गजों के हाथों में है। टीएसएमसी (TSMC - Taiwan Semiconductor Manufacturing Company) वर्तमान में दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का लगभग 90% हिस्सा बनाती है। एनवीडिया (Nvidia), एप्पल (Apple), टेस्ला (Tesla) और एएमडी (AMD) जैसी बड़ी कंपनियाँ अपनी चिप्स के लिए टीएसएमसी की निर्माण तकनीक पर निर्भर हैं। टीएसएमसी के संस्थापक मॉरिस चांग, जिन्हें ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग का 'गॉडफादर' कहा जाता है, का मानना है कि उनकी कंपनी उन्नत प्रक्रिया तकनीक और कुशल निर्माण के कारण अगले कुछ वर्षों तक अपनी बढ़त बनाए रखेगी।
टीएसएमसी के अलावा, इंटेल (Intel) और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (Samsung) भी इस रेस के प्रमुख खिलाड़ी हैं। ये कंपनियाँ भारी अनुसंधान और विकास (R&D), अत्याधुनिक 'फैब्स' (Fabs) और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था (economies of scale) के कारण दूसरों से आगे हैं। उन्नत चिप्स के लिए 'अल्ट्रा-वायलेट लिथोग्राफी' और परमाणु-स्तर की इंजीनियरिंग की ज़रूरत होती है, जिसे वर्तमान में दुनिया की बहुत कम कंपनियाँ सफलतापूर्वक कर पाती हैं।
भारत इस क्षेत्र में कहाँ खड़ा है? वर्तमान में, भारत अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। इसका मुख्य कारण देश में 'सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन' सुविधाओं का अभाव रहा है। हालाँकि, अब यह स्थिति तेज़ी से बदल रही है। भारत सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' विज़न के तहत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने के लिए भारी निवेश और नीतिगत प्रोत्साहन दिए हैं।
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स इस दिशा में सबसे बड़ा नाम बनकर उभरा है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की पीएसएमसी (PSMC) के साथ साझेदारी की है और गुजरात के धोलेरा में भारत का पहला एआई-सक्षम 300mm (12 इंच) फैब (Fab) स्थापित कर रहा है। यहाँ प्रति माह 50,000 वेफर्स बनाने की योजना है, जो एनालॉग और लॉजिक आईसी चिप्स का निर्माण करेंगे। यह प्लांट ऑटोमोटिव, कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज और वायरलेस कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों की ज़रूरतों को पूरा करेगा।
इसके अतिरिक्त, माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) गुजरात के साणंद में लगभग 22,516 करोड़ रुपये के निवेश के साथ एक एटीएमपी (ATMP - Assembly, Testing, Marking, and Packaging) सुविधा स्थापित कर रही है। वहीं, टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (TSAT) असम के मोरीगांव में एक ओसैट (OSAT) सुविधा शुरू कर रहा है।
भारत को इस क्षेत्र में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बावजूद, भारत के सामने कई कठिन चुनौतियाँ हैं। सबसे पहली चुनौती भारी पूंजी निवेश की है। एक सिंगल फैब बनाने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। दूसरी चुनौती अत्याधुनिक तकनीक का हस्तांतरण है। उन्नत चिप निर्माण के लिए गहरी विशेषज्ञता और वैश्विक दिग्गजों के भरोसे की ज़रूरत होती है।
इसके अलावा, अत्यधिक शुद्ध पानी की विशाल मात्रा, निर्बाध बिजली आपूर्ति और एक बहुत ही कुशल कार्यबल (जैसे वीएलएसआई डिज़ाइनर और प्रोसेस इंजीनियर) की आवश्यकता होती है। आईबीईएफ की रिपोर्ट के अनुसार, आपूर्ति श्रृंखला और फैब्रिकेशन तकनीक में मौजूदा कमियों के कारण भारत को अभी भी हाई-एंड चिप्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
भविष्य की राह क्या है और सरकार क्या कदम उठा रही है? भारत इन कमियों को दूर करने के लिए 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (ISM) के ज़रिए सक्रिय कदम उठा रहा है। फरवरी 2026 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'ISM 2.0' की घोषणा की है। इस नए मिशन का उद्देश्य केवल चिप्स बनाना ही नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री और पूर्ण 'इंडियन आईपी' (Indian IP) विकसित करना भी है।
सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के परिव्यय को बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया है। इसके अलावा, उद्योग के नेतृत्व वाले अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ताकि एक कुशल वर्कफोर्स तैयार किया जा सके। धोलेरा और साणंद जैसे क्षेत्रों को अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ तैयार किया जा रहा है ताकि वे वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 तक भारत के पास अपनी खुद की ऑपरेशनल एटीएमपी और ओसैट सुविधाएँ होंगी, और फैब्रिकेशन प्लांट का काम भी काफी आगे बढ़ चुका होगा। यह न केवल रोज़गार के लाखों अवसर पैदा करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में एक विश्वसनीय खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।