मणिपुर के लोंगपी काली मिट्टी बर्तन हैं एक उदाहरण, आधुनिक युग में पारंपरिक शिल्प के सम्मान का
हम जानते ही हैं कि, हमारा भारत देश शिल्प कला में दुनिया में अग्रसर है। क्या आप जानते हैं कि, मणिपुर के नुंगबी खुल्लन गांव के तांगखुल नागा लोग, कई सदियों से हाथ से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। माना जाता है कि, ये ‘लोंगपी मिट्टी बर्तन’, जिन्हें नुंगबी मिट्टी के बर्तन के नाम से भी जाना जाता है, नवपाषाण काल (10,000 ईसा पूर्व) से ही चलन में है। उखरुल जिले के नुंगबी गांव में 400 घर हैं, और लगभग 200 कारीगर आज भी इस शिल्प का अभ्यास कर रहे हैं। मुख्य कुम्हार और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ता - माचिहान सासा, तांगखुल जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, और उनके काम ने इधर की मिट्टी के बर्तनों को वैश्विक पहचान दिलाई है।पत्थर-मिट्टी के साधारण बर्तन बनाने के लिए, अगर मिट्टी को पत्थर के साथ मिलाया जाए, तो आग में गर्म करने पर वह फूट जाएगा। परंतु, तांगखुल लोगों ने इस शिल्प में महारत हासिल की है, और लोंगपी बर्तनों का भंडारण के साथ-साथ, उच्च तापमान पर खाना पकाने के लिए भी सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।हाथ से आकार दिए गए इन बर्तनों को पॉलिश किया जाता है, धूप में सुखाया जाता है, और फिर अलाव में जलाया जाता है। इससे उनका रंग काला या भूरा, और धातु जैसा दिखने लगता है। परंपरागत रूप से, हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों का उपयोग स्थानीय स्तर पर, मैतेई, माओ नागा, कोम, पाओमी, जैसे कुछ अन्य समुदायों द्वारा भी किया जाता था। अब मणिपुर के बाहर भी इनकी अच्छी मांग है, क्योंकि लोंगपी बर्तनों में पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट माना जाता है। नुंगबी में, उनका उपयोग चावल से बीयर बनाने, मसालों तथा पानी के भंडारण, और खाना पकाने के लिए किया जाता है।पहले, यह शिल्प दो गांवों – नुंगबी और लोंगपी काजुई में प्रचलित था, परंतु आज, नुंगबी खुल्लन एकमात्र कुम्हार गांव बना है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, लेकिन पुरुष कारीगरों की संख्या महिला कुम्हारों से अधिक है। लोंगपी शिल्प को मूल रूप से ‘लोरी हैमलेई’ कहा जाता था, जिसका अर्थ शाही मिट्टी के बर्तन था। तब, केवल अमीर लोग ही इसे खरीद सकते थे। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, और निर्माण काम कई महीनों तक चलता है। क्योंकि, कारीगर स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार काम करते हैं।https://sceh.net/ मिट्टी को तीन दिनों तक सुखाने के बाद, ओखली और मूसल का उपयोग करके इसका महीन पाउडर बनाया जाता है, और फिर बांस की छलनी से इसे छान लिया जाता है। सरपेंटाइन या जहरमोहरा पत्थर, इन बर्तनों में प्रयुक्त होने वाला एक अन्य प्रमुख घटक है, जिसे स्थानीय रूप से 'लेशोनलुंग' कहा जाता है। मैग्नीशियम से भरपूर होने के कारण, इसका रंग नीला, हरा या काला होता है। इस पत्थर को काफुंग्रिम पहाड़ी से निकाला जाता है, जो इस गांव से लगभग 30 मिनट की पैदल दूरी पर है। कुम्हार इसे शुष्क मौसम में एकत्र करते हैं, क्योंकि तब इसे ले जाना और साफ करना आसान होता है। फिर, इस पत्थर का भी पाउडर बनाया जाता है।इसके बाद, एक निश्चित अनुपात में छनी हुई मिट्टी का पाउडर, पत्थर का पाउडर, और पानी मिलाया जाता है, ताकि उचित बर्तन बन सकें। फिर, मिश्रण को नरम और लचीला होने तक गूंधा जाता है। बर्तन का मूल मॉडल प्राप्त करने के लिए सांचे, स्लैब और अन्य विभिन्न उपकरणों का उपयोग करके, इस सामग्री को उसमें लगाया जाता है।अगले दिन, इसे बांस के चप्पू और धागे का उपयोग करके हाथों से आकार दिया जाता है, जबकि बांस की छड़ी की मदद से ही, इनका समतलन भी किया जाता है। अंत में, वांछित आकार प्राप्त होने तक इसे सुधारा जाता है, जिसके बाद बाहरी सतह को बांस की छड़ी से खुरच कर चिकना किया जाता है। बर्तनों को दो से तीन दिनों तक सुखाया जाता है। बाद में बर्तनों को चमकाने के लिए, चिकने ठोस पत्थरों या जानवरों की हड्डियों का उपयोग किया जाता है। इसके बाद, उन्हें फिर से पॉलिश किया जाता है। पॉलिशिंग जितनी अच्छी होगी, उत्पाद उतना ही चमकदार और चिकना होगा। अंत में, बर्तनों को पांच से सात घंटों तक 1200 डिग्री सेल्सियस पर आग में पकाया जाता है।आग से निकालने के बाद, जब बर्तन गर्म होते हैं, तभी उन्हें माची चीज़ (चिरोना पेड़) की ताजी पत्तियों से साफ और पॉलिश किया जाता है। इस प्रकार, पत्तियों से चमकाने के दौरान बर्तन का रंग, काला या भूरा निर्धारित होता है। यह अंतिम चरण है, जिसके बाद बर्तन उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं।अधिकांश अन्य मिट्टी के बर्तनों के विपरीत, लोंगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया काफी श्रम-गहन है, और पूरी तरह से हाथों से की जाती है। साथ ही, इसका काला रंग भी प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इसमें कोई रसायन या पेंट की भूमिका नहीं होती। मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में किसी भी रसायन, मशीन या पहियों का उपयोग नहीं किया जाता है। कुछ बर्तन निर्माण कार्यशालाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया हस्तनिर्मित है। लोंगपी उत्पाद किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, और उत्पाद पूरी तरह से अपघटनीय हैं।2007 में, दिल्ली में लोंगपी शिल्पकार - मैथ्यू सासा द्वारा शुरू की गई ‘मैथ्यू सासा क्राफ्ट’, और सितंबर 2015 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा शुरू की गई यूएसटीटीएडी जैसी पहलें, इस शिल्प को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं। मैथ्यू सासा, जिन्होंने कारीगरों को प्रशिक्षित करने और इस शिल्प को लोकप्रिय बनाने के लिए मैथ्यू सासा क्राफ्ट की स्थापना की, माचिहान सासा के पुत्र हैं। मैथ्यू सासा की पहल, राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी और वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मेलों में भागीदारी ने, पूरे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोंगपी मिट्टी के बर्तनों की लोकप्रियता और बिक्री को बढ़ावा दिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/3jjx3e34 2. https://tinyurl.com/c3sa9zed 3. https://tinyurl.com/m5v7x4p6 4. https://tinyurl.com/2v6c7njn 5. https://tinyurl.com/2htx3nev 6. https://tinyurl.com/panmpw5k 7. https://tinyurl.com/4dz4k5c3
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
राग रामदासी मल्हार: अनूठे स्वर-विन्यास से सजा वर्षा ऋतु का विशिष्ट राग
अगर मल्हार राग-परिवार के अपेक्षाकृत कम प्रस्तुत किए जाने वाले रागों की बात की जाए, तो राग रामदासी मल्हार अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़े मल्हार अंग की मधुरता को अपने अनूठे स्वर-विन्यास के साथ प्रस्तुत करता है। यद्यपि इसकी प्रस्तुतियाँ मियाँ की मल्हार या मेघ मल्हार की तुलना में कम सुनने को मिलती हैं, फिर भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इसे एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली राग माना जाता है।https://sceh.net/ रामदासी मल्हार अपनी गंभीर, संतुलित और भावपूर्ण प्रकृति के लिए जाना जाता है। इसकी रचना में मल्हार के विशिष्ट स्वरांगों के साथ ऐसे स्वर-प्रयोग मिलते हैं, जो इसे अन्य मल्हार रागों से अलग पहचान देते हैं। आलाप, बंदिश और तानों के माध्यम से कलाकार इस राग के विभिन्न भावों को विस्तार देते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति में नई कल्पनाशीलता और संगीतात्मक सौंदर्य उभरकर सामने आता है।इस राग की विविध प्रस्तुतियाँ इसकी गहराई और अभिव्यक्ति को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। पंडित वेंकटेश कुमार की गायकी में रामदासी मल्हार का गंभीर और विस्तृत स्वरूप सुनाई देता है। पंडिता पद्मा तलवलकर अपनी सधी हुई शैली में इसकी कोमलता और भाव-संपन्नता को प्रस्तुत करती हैं, जबकि उस्ताद अमीर ख़ाँ की प्रस्तुति राग की विलंबित विस्तार शैली और सूक्ष्म स्वर-विन्यास का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।यदि आप मल्हार राग-परिवार के कम परिचित लेकिन अत्यंत समृद्ध रागों का अनुभव करना चाहते हैं, तो राग रामदासी मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट शुरुआत हैं। इनमें वर्षा ऋतु का सौंदर्य, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गहराई और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर संगम सुनाई देता है।संदर्भ -https://tinyurl.com/32tr7655https://tinyurl.com/553dyhr6https://tinyurl.com/5ywpp8nmhttps://tinyurl.com/yjz9b4m8
तितलियाँ और कीट
विलुप्ति की कगार पर 'कैसर-ए-हिंद', क्या हम बचा पाएंगे हिमालय की इस उड़ती हुई विरासत को?
शाहजहाँपुर के प्रकृति प्रेमियों और पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि हमारे देश के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में एक ऐसी तितली पाई जाती है जिसे 'कैसर-ए-हिंद' (Kaiser-i-Hind) कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम तेइनोपालपस इम्पेरियालिस (Teinopalpus imperialis) है। 'कैसर-ए-हिंद' का शाब्दिक अर्थ है 'भारत का सम्राट'। यह नाम इसे इसकी दुर्लभता और इसके पंखों पर मौजूद राजसी गहरे हरे और चमकदार पीले रंगों के कारण दिया गया है। यह भारत की सबसे दुर्लभ और संरक्षित तितलियों में से एक है, जिसे इसकी शाही भव्यता के कारण यह गौरवशाली नाम मिला है।यह तितली कहाँ पाई जाती है?कैसर-ए-हिंद मुख्य रूप से पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में दिखाई देती है। भारत में यह अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, असम, मणिपुर और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इसके अलावा यह नेपाल, भूटान, उत्तरी म्यांमार, वियतनाम और चीन के सिचुआन प्रांत में भी देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक उच्च-ऊंचाई वाली प्रजाति है जो आमतौर पर समुद्र तल से 6,000 से 10,000 फीट की ऊंचाई पर घने जंगलों वाले पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।कैसी है इसकी शारीरिक संरचना?इस तितली की बनावट बेहद अनूठी होती है। नर कैसर-ए-हिंद के पिछले पंखों पर चमकीले पीले रंग का एक पैच होता है, जबकि मादा आकार में नर से बड़ी होती है और उसके पंखों पर धूसर (Grey) रंग के बड़े निशान होते हैं। इसके पंखों की हरी चमक वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रही है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसके स्केल की त्रि-आयामी (3D) फोटोनिक संरचना के कारण यह हरा रंग इतना आकर्षक दिखाई देता है।https://sceh.net/ इसकी जीवनशैली और प्रजनन चक्र क्या है?कैसर-ए-हिंद की उड़ान बहुत तेज और शक्तिशाली होती है। यह अक्सर पेड़ों की ऊपरी शाखाओं (Tree-top level) पर उड़ती है और केवल तेज सुबह की धूप होने पर ही नीचे की वनस्पतियों पर उतरती है। इसके विपरीत, मादाएं अक्सर बादल छाए रहने या बारिश के मौसम में भी उड़ती देखी गई हैं। इनका प्रजनन चक्र काफी विशिष्ट होता है। इसके लार्वा मुख्य रूप से 'मैगनोलिया कैंपबेली' (Magnolia campbellii) नामक पौधे पर पलते हैं। मादा तितली पत्तों के निचले हिस्से में बैंगनी-लाल रंग के गोल अंडे देती है।क्या हैं इसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे?अपनी सुंदरता और दुर्लभता के कारण यह तितली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करों और संग्रहकर्ताओं (Collectors) के निशाने पर रहती है। हालांकि इसे भारतीय कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है, लेकिन अवैध शिकार अब भी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती खेती (झूम खेती), सड़कों का निर्माण और बस्तियों के बसने के कारण जंगलों की कटाई हो रही है। इस 'स्नो ड्रॉट' और वनों के विनाश के कारण इसके भोजन और प्रजनन के लिए जरूरी पौधे (मैग्नोलिया परिवार) कम होते जा रहे हैं।संरक्षण क्यों है अनिवार्य?अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में इसे 'राज्य तितली' के रूप में अपनाया है, जो इसके संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह प्रजाति उच्च-ऊंचाई वाले वनों के स्वास्थ्य का संकेत देने वाली 'कीस्टोन प्रजाति' मानी जाती है। यदि हम कैसर-ए-हिंद को बचाते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से हम हिमालय के उस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचा रहे होते हैं, जिस पर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता निर्भर करती है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2beawaw6 2. https://tinyurl.com/2aouqchs 3. https://tinyurl.com/2cjjjp6f 4. https://tinyurl.com/25oqwtbk
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
आखिर क्यों सेमीकंडक्टर को 'नया तेल' कहा जा रहा है?
आज के डिजिटल युग में, एक मनुष्य के नाखून के बराबर क्षेत्र में समाए छोटे से सेमीकंडक्टर चिप के भीतर अरबों ट्रांजिस्टर मौजूद हो सकते हैं। यह तथ्य सुनने में किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन यही आधुनिक तकनीक की वास्तविकता है। सेमीकंडक्टर चिप्स आज हमारे स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर, वाहनों और यहाँ तक कि घरेलू उपकरणों के 'दिमाग' के रूप में कार्य करते हैं। इनके बिना हमारी डिजिटल दुनिया थम सकती है। यही कारण है कि आज भारत अपनी 'सेमीकंडक्टर मिशन' के ज़रिए इस वैश्विक रेस में मज़बूती से कदम रख रहा है।सेमीकंडक्टर चिप्स क्या हैं और ये हमारे जीवन में क्यों महत्वपूर्ण हैं?सेमीकंडक्टर या अर्धचालक एक ऐसी सामग्री है जिसकी विद्युत चालकता (electrical conductivity) एक सुचालक (जैसे तांबा) और एक कुचालक (जैसे कांच) के बीच की होती है। विकिपीडिया के अनुसार, सिलिकॉन सबसे आम अर्धचालक सामग्री है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाने के लिए किया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि डोपिंग (अशुद्धियों को मिलाना) के ज़रिए इनकी चालकता को बदला और नियंत्रित किया जा सकता है।https://sceh.net/ ये छोटी सी चिप्स बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं। जब हम अपने फ़ोन पर कोई ऐप खोलते हैं या कंप्यूटर पर कोई फाइल सेव करते हैं, तो ये चिप्स ही उन निर्देशों को प्रोसेस करती हैं। आईबीईएफ (IBEF) के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर की अपरिहार्य भूमिका के कारण इन्हें अक्सर 'नया तेल' कहा जाता है।इनकी शुरुआत कैसे हुई और यह तकनीक कैसे विकसित हुई?सेमीकंडक्टर तकनीक का इतिहास 19वीं शताब्दी से शुरू होता है, लेकिन असली क्रांति 20वीं सदी के मध्य में आई। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, 1947-48 में बेल लेबोरेटरीज में अमेरिकी भौतिक विज्ञानी जॉन बर्दीन, वाल्टर ब्रेटन और विलियम शॉकली ने पहले ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया था। यह आविष्कार वैक्यूम ट्यूबों का एक छोटा, कम बिजली खपत वाला और अधिक विश्वसनीय विकल्प साबित हुआ।इसके बाद 1958 में जैक किल्बी ने पहला वर्किंग इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) प्रदर्शित किया और 1959 में रॉबर्ट नॉयस ने पहला 'मोनोलिथिक' आईसी चिप विकसित किया। इन आविष्कारों ने इलेक्ट्रॉनिक्स के लघुकरण (miniaturization) का रास्ता खोल दिया। मूर के नियम (Moore’s Law) के अनुसार, हर दो साल में एक चिप पर ट्रांजिस्टर की संख्या लगभग दोगुनी होती गई, जिससे चिप्स की गति लाखों गुना बढ़ गई और उनकी लागत कम होती गई।चिप बनाने की वैश्विक रेस में कौन आगे है?दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का निर्माण वर्तमान में कुछ ही दिग्गजों के हाथों में है। टीएसएमसी (TSMC - Taiwan Semiconductor Manufacturing Company) वर्तमान में दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का लगभग 90% हिस्सा बनाती है। एनवीडिया (Nvidia), एप्पल (Apple), टेस्ला (Tesla) और एएमडी (AMD) जैसी बड़ी कंपनियाँ अपनी चिप्स के लिए टीएसएमसी की निर्माण तकनीक पर निर्भर हैं। टीएसएमसी के संस्थापक मॉरिस चांग, जिन्हें ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग का 'गॉडफादर' कहा जाता है, का मानना है कि उनकी कंपनी उन्नत प्रक्रिया तकनीक और कुशल निर्माण के कारण अगले कुछ वर्षों तक अपनी बढ़त बनाए रखेगी।टीएसएमसी के अलावा, इंटेल (Intel) और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (Samsung) भी इस रेस के प्रमुख खिलाड़ी हैं। ये कंपनियाँ भारी अनुसंधान और विकास (R&D), अत्याधुनिक 'फैब्स' (Fabs) और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था (economies of scale) के कारण दूसरों से आगे हैं। उन्नत चिप्स के लिए 'अल्ट्रा-वायलेट लिथोग्राफी' और परमाणु-स्तर की इंजीनियरिंग की ज़रूरत होती है, जिसे वर्तमान में दुनिया की बहुत कम कंपनियाँ सफलतापूर्वक कर पाती हैं।टीएसएमसी (TSMC - Taiwan Semiconductor Manufacturing Company)भारत इस क्षेत्र में कहाँ खड़ा है?वर्तमान में, भारत अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। इसका मुख्य कारण देश में 'सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन' सुविधाओं का अभाव रहा है। हालाँकि, अब यह स्थिति तेज़ी से बदल रही है। भारत सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' विज़न के तहत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने के लिए भारी निवेश और नीतिगत प्रोत्साहन दिए हैं।टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स इस दिशा में सबसे बड़ा नाम बनकर उभरा है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की पीएसएमसी (PSMC) के साथ साझेदारी की है और गुजरात के धोलेरा में भारत का पहला एआई-सक्षम 300mm (12 इंच) फैब (Fab) स्थापित कर रहा है। यहाँ प्रति माह 50,000 वेफर्स बनाने की योजना है, जो एनालॉग और लॉजिक आईसी चिप्स का निर्माण करेंगे। यह प्लांट ऑटोमोटिव, कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज और वायरलेस कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों की ज़रूरतों को पूरा करेगा।इसके अतिरिक्त, माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) गुजरात के साणंद में लगभग 22,516 करोड़ रुपये के निवेश के साथ एक एटीएमपी (ATMP - Assembly, Testing, Marking, and Packaging) सुविधा स्थापित कर रही है। वहीं, टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (TSAT) असम के मोरीगांव में एक ओसैट (OSAT) सुविधा शुरू कर रहा है।भारत को इस क्षेत्र में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बावजूद, भारत के सामने कई कठिन चुनौतियाँ हैं। सबसे पहली चुनौती भारी पूंजी निवेश की है। एक सिंगल फैब बनाने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। दूसरी चुनौती अत्याधुनिक तकनीक का हस्तांतरण है। उन्नत चिप निर्माण के लिए गहरी विशेषज्ञता और वैश्विक दिग्गजों के भरोसे की ज़रूरत होती है।इसके अलावा, अत्यधिक शुद्ध पानी की विशाल मात्रा, निर्बाध बिजली आपूर्ति और एक बहुत ही कुशल कार्यबल (जैसे वीएलएसआई डिज़ाइनर और प्रोसेस इंजीनियर) की आवश्यकता होती है। आईबीईएफ की रिपोर्ट के अनुसार, आपूर्ति श्रृंखला और फैब्रिकेशन तकनीक में मौजूदा कमियों के कारण भारत को अभी भी हाई-एंड चिप्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।भविष्य की राह क्या है और सरकार क्या कदम उठा रही है?भारत इन कमियों को दूर करने के लिए 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (ISM) के ज़रिए सक्रिय कदम उठा रहा है। फरवरी 2026 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'ISM 2.0' की घोषणा की है। इस नए मिशन का उद्देश्य केवल चिप्स बनाना ही नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री और पूर्ण 'इंडियन आईपी' (Indian IP) विकसित करना भी है।सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के परिव्यय को बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया है। इसके अलावा, उद्योग के नेतृत्व वाले अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ताकि एक कुशल वर्कफोर्स तैयार किया जा सके। धोलेरा और साणंद जैसे क्षेत्रों को अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ तैयार किया जा रहा है ताकि वे वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर सकें।विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 तक भारत के पास अपनी खुद की ऑपरेशनल एटीएमपी और ओसैट सुविधाएँ होंगी, और फैब्रिकेशन प्लांट का काम भी काफी आगे बढ़ चुका होगा। यह न केवल रोज़गार के लाखों अवसर पैदा करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में एक विश्वसनीय खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।संदर्भ1. https://tinyurl.com/ns7o5vr 2. https://tinyurl.com/ttv5w88 3. https://tinyurl.com/ctprjx5 4. https://tinyurl.com/2dhsn6xs 5. https://tinyurl.com/22cn2twf 6. https://tinyurl.com/2arpppx3 7. https://tinyurl.com/2bqno4k7 8. https://tinyurl.com/2cqkgute 9. https://tinyurl.com/2d4wdft9 10. https://tinyurl.com/2983ffgh 11. https://tinyurl.com/29tvvsb8
दृष्टि III - कला/सौंदर्य
शाहजहांपुर, आज पढ़ते हैं कि कला की कौन सी अवधारणाएं हस्तशिल्पों को अनूठा बनाती हैं
शाहजहांपुर, आज हम समझेंगे कि कला क्या है। फिर, हम पेंटिंग और मूर्तिकला जैसे कला रूपों का पता लगाएंगे। बाद में, हम देखेंगे कि कला किस प्रकार रचनात्मकता और अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करती है। हम यह भी समझेंगे कि, शिल्प क्या है, और इसमें हाथ से उपयोगी वस्तुएं कैसे बनाई जाती हैं। हम लकड़ी, धातु, कपड़ा, कांच और मिट्टी जैसे विभिन्न प्रकार के शिल्पों का भी पता लगाएंगे। जबकि लेख के अंत में, हम उद्देश्य और उपयोग में कला एवं शिल्पों में मौजूद अंतर को समझेंगे।कला, एक दृश्य वस्तु या अनुभव है, जो कौशल या कल्पना की अभिव्यक्ति के माध्यम से सचेत रूप से बनाया जाता है। कला में पेंटिंग, मूर्तिकला, प्रिंटमेकिंग, चित्रांकन, सजावटी कला और फोटोग्राफी जैसी विविध मीडिया शामिल हैं।लियोनार्डो दा विंची द्वारा बनाई गई मोना लिसा की पेंटिंगविभिन्न दृश्य कलाएं, एक तरफ सौंदर्यवादी उद्देश्यों से लेकर, दूसरी तरफ उपयोगितावादी उद्देश्यों को समाए होती हैं। उद्देश्य की ऐसी ध्रुवता, आमतौर पर कला में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों, रूपांकनो, कलाकार या कारीगर में परिलक्षित होती है। कारीगर को ऐसे व्यक्ति के रूप में समझा जाता है, जो उपयोगितावादी तत्व पर अधिक ध्यान देता है। कला के एक रूप में भी, व्यापक रूप से भिन्न उद्देश्य हो सकते हैं। इस प्रकार एक कुम्हार या बुनकर, एक अत्यधिक कार्यात्मक वस्तु बना सकता है, जो सुंदर होती है, या केवल प्रशंसा से परे कोई उद्देश्य नहीं रखती है।https://sceh.net/ इसके अलावा, कला को कलाकार की आंतरिक स्थिति को प्रतिबिंबित करने के लिए भी आयोजित किया जाता है। इसे आंतरिक स्थिति की बाहरी अभिव्यक्ति माना जा सकता है। साथ ही, बाहरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करने वाली कला को मनुष्य के आंतरिक जीवन की अभिव्यक्ति की कला द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। "संगीत भावना व्यक्त करता है", का अर्थ यह हो सकता है कि, संगीतकार ने संगीत लिखते समय मानवीय भावना व्यक्त की है, या जब संगीत सुना जाता है तो वह मानवीय भावना को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार, कला का निर्माण, किसी माध्यम में तत्वों का एक नया संयोजन लाना है, जैसे कि - संगीत में स्वर, साहित्य में शब्द, कैनवास पर पेंट, आदि। जबकि, ‘सृजन’ पूर्व-मौजूदा सामग्रियों या तत्वों का पुन: निर्माण है।शिल्प, कला का एक विशेष रूप है। शिल्प व्यापार एक ऐसा व्यवसाय है, जिसके लिए विशेष कौशल और ज्ञान की आवश्यकता होती है। ऐतिहासिक अर्थ में, यह शब्द आम तौर पर वस्तुओं के छोटे पैमाने पर उत्पादन, या उनके उत्पादन और रखरखाव में लगे लोगों पर लागू होता है।कोई शिल्प, अक्सर कार्यात्मक होता है, जो दैनिक जीवन में सौंदर्य अपील और व्यावहारिक उपयोगिता के मिश्रण के रूप में कार्य करता है। कार्यात्मक शिल्प, चीनी मिट्टी की चीज़ें, कपड़ा और लकड़ी के उत्पादों जैसी हस्तनिर्मित वस्तुएं होती हैं। ये शिल्प, केवल सजावट के बजाय विशेष उपयोग के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। इस प्रकार, ये शिल्प हमारे द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं के साथ एक स्पर्शपूर्ण और व्यक्तिगत संबंध प्रदान करते हुए हमारी दिनचर्या को सुशोभित करती हैं। दैनिक जीवन में कार्यात्मक शिल्प के सामान्य उदाहरण निम्नलिखित हैं -1. बर्तन और चीनी मिट्टी की चीज़ें: मग, कटोरे, परोसने की थाली और प्लेट सहित हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तन, शायद सबसे आम कार्यात्मक शिल्प हैं।2. कपड़ा कला: हस्तनिर्मित रजाई, बुने हुए स्वेटर, बुने हुए गलीचे और कढ़ाई वाले कपड़े, सजावटी कलात्मकता का प्रदर्शन करते हुए गर्मी, आराम और उपयोगिता प्रदान करते हैं।3. फर्नीचर और लकड़ी का काम: नक्काशीदार फर्नीचर, स्टूल, अलमारियां और रसोई के उपकरण (जैसे चम्मच और कटिंग बोर्ड) दैनिक व्यावहारिक जरूरतों के साथ कुशल तकनीकों को जोड़ते हैं।4. घरेलू सामान: भंडारण के लिए हाथ से बुनी हुई टोकरियां, टेबल सामान, कोस्टर (Coaster), और कस्टम चित्र फ़्रेम, वैयक्तिकृत शैली जोड़ते हुए, स्थानों को व्यवस्थित करने में मदद करते हैं।5. पहनने योग्य कलाएं: आभूषण, चमड़े के हैंडबैग और हस्तनिर्मित बेल्ट फैशन शिल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हमारे पहनावे और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के लिए व्यावहारिक हैं।इसके अलावा, विभिन्न प्रकार के शिल्प निम्नलिखित हैं -1. लकड़ी शिल्पलकड़ी के शिल्प में, कार्यात्मक और सजावटी वस्तुओं को बनाने के लिए लकड़ी को आकार देना, नक्काशी करना और संयोजन शामिल है। यह मानव द्वारा प्रचलित शिल्प के सबसे पुराने रूपों में से एक है। कारीगर, उद्देश्य और डिज़ाइन के आधार पर विभिन्न प्रकार की लकड़ी का उपयोग करते हैं। सामान्य लकड़ी उत्पादों में फर्नीचर, खिलौने, मूर्तियां और सजावटी पैनल शामिल हैं। लकड़ी की वस्तुओं की सुंदरता और स्थायित्व को बढ़ाने के लिए नक्काशी, मोड़, पॉलिशिंग और जुड़ाव जैसी तकनीकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।2. धातु शिल्पधातु शिल्प से तात्पर्य लोहे, तांबे, पीतल और चांदी जैसे धातुओं का उपयोग करके वस्तुओं को आकार देने और डिजाइन करने की कला से है। इसमें कौशल और सटीकता की आवश्यकता होती है, क्योंकि धातुओं को अक्सर गर्म किया जाता है, और वांछित रूपों में ढाला जाता है। इस शिल्प का उपयोग आमतौर पर गहने, बर्तन, उपकरण और कलात्मक मूर्तियां बनाने के लिए किया जाता है। सरल और जटिल डिज़ाइन बनाने के लिए इसमें फोर्जिंग, कास्टिंग, उत्कीर्णन और वेल्डिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।3. कपड़ा शिल्पकपड़ा शिल्प कपास, ऊन और रेशम जैसे रेशों का उपयोग करके कपड़े बनाने और सजाने पर केंद्रित है। इसमें बुनाई, कढ़ाई, और रंगाई जैसी गतिविधियों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। कपड़ा शिल्प कपड़े, घरेलू साज-सज्जा और सजावटी सामान बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हाथ से बुनाई, ब्लॉक प्रिंटिंग और सिलाई जैसी तकनीकें कपड़े में सांस्कृतिक और कलात्मक मूल्य जोड़ती हैं।4. कांच शिल्पकांच शिल्प में कांच को उच्च तापमान पर गर्म करना शामिल है, जब तक कि यह नरम और ढालने योग्य न हो जाए। इससे कारीगरों को इसे विभिन्न वस्तुओं का आकार देने की अनुमति मिलती है। इस शिल्प का उपयोग फूलदान, बोतलें, आभूषण और रंगीन कांच की कलाकृतियां बनाने के लिए किया जाता है। आमतौर पर इसमें ढलाई और काटने जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। कांच शिल्प में अक्सर रंगीन और नाजुक टुकड़े बनाए जाते हैं, जो कार्यात्मक और सजावटी होते हैं।5. मिट्टी शिल्पमिट्टी शिल्प, जिसे मिट्टी के बर्तन के रूप में भी जाना जाता है, प्राकृतिक मिट्टी को विभिन्न आकारों में ढालने, सुखाने और भट्टी में जलाकर सख्त करने से संबंधित है। इसका उपयोग बर्तन, कटोरे, टाइलें और सजावटी सामान बनाने के लिए किया जाता है। यह शिल्प हाथ से या कुम्हार के चक्र की सहायता से किया जा सकता है। मोल्डिंग, आकार देने, ग्लेज़िंग और फायरिंग जैसी तकनीकें अंतिम उत्पाद को मजबूती और एक चिकना रूप देती हैं, जिससे यह उपयोगी और कलात्मक बन जाता है।शिल्प और कला दोनों रचनात्मकता के रूप हैं; हालांकि, उनमें कई अंतर हैं। कला मुख्य रूप से कार्य का एक व्यक्तिगत रूप है, जो कलाकार के विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है। कई कलाकार, बिना किसी भुगतान के कला का उत्पादन करते हैं, और कलाकृति बेचने की उम्मीद भी नहीं रखते हैं। यहां तक कि जब कोई पेंटिंग या मूर्तिकला बनाई जाती है, तब भी कलाकार उच्च स्तर का रचनात्मक नियंत्रण और स्वतंत्रता बरकरार रखता है।इसके विपरीत, शिल्प, कार्य का ऐसा रूप है, जिसके लिए शिल्पकार को भुगतान प्राप्त होता है। इसका परिणाम, हमेशा एक ठोस रूप या वस्तु होता है। ऐतिहासिक रूप से, शिल्प को चित्रकला या मूर्तिकला जैसी कलाओं की तुलना में रचनात्मकता का निचला रूप माना जाता था। शिल्पकार, परंपरागत रूप से ऐसी वस्तुएं बनाते थे, जिनका घरेलू कार्य होता था। इसी कारण, शिल्पकारों को श्रमिक वर्ग माना जाता था, जबकि कलाकार अक्सर उच्च समाज के दायरे में गिने जाते थे।संदर्भ1. https://tinyurl.com/38vvjcwx 2. https://tinyurl.com/5xyj6mrj 3. https://tinyurl.com/46z6x473 4. https://tinyurl.com/hcam8xj8
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
एआई के दौर में खतरे में आपकी निजता, क्या हमेशा के लिए इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है आपका डेटा?
शाहजहांपुर हो या दुनिया का कोई अन्य कोना, आज हर किसी के हाथ में मौजूद स्मार्टफोन पर तेज़ी से संदेश पहुंचाने वाले प्लेटफॉर्म की कहानी एक छोटे से हॉस्टल के कमरे से शुरू हुई थी। साल 2004 में 19 साल के मार्क ज़करबर्ग ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अपने हॉस्टल के कमरे से 'द फेसबुक' (The Facebook) नाम के एक नेटवर्क की शुरुआत की थी। जो चीज एक कॉलेज नेटवर्किंग साइट के रूप में शुरू हुई थी, वह तेजी से दुनिया भर में फैल गई और 2004 के अंत तक इसके दस लाख सक्रिय उपयोगकर्ता हो गए थे। साल 2005 में इस कंपनी को “पेपाल” (PayPal) के सह-संस्थापक पीटर थील से अपना पहला बड़ा निवेश मिला और इसका नाम 'द फेसबुक' से बदलकर 'फेसबुक' कर दिया गया। साल 2008 तक इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या दस करोड़ को पार कर गई। इसके बाद कंपनी ने 2012 में इंस्टाग्राम को एक अरब डॉलर में और 2014 में वॉट्सऐप को खरीदकर अपना साम्राज्य और बड़ा कर लिया।https://sceh.net/ अक्टूबर 2021 में कंपनी ने अपना नाम फेसबुक से बदलकर 'मेटा' रख लिया, जो सोशल मीडिया से आगे बढ़कर 'मेटावर्स' यानी एक आभासी दुनिया के निर्माण के उनके नजरिए को दर्शाता था। शुरुआती झटकों के बाद, 2026 की शुरुआत तक मेटा 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के बाजार पूंजीकरण के साथ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बन चुकी है। 2024 की पहली तिमाही तक 3.24 अरब लोग हर दिन फेसबुक, वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम या मैसेंजर में से कम से कम एक ऐप का इस्तेमाल कर रहे थे, जिसका मतलब है कि दुनिया के 70 प्रतिशत से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हर दिन मेटा से जुड़े हुए हैं। भारत में वॉट्सऐप के 50 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। जो कंपनी कभी सिर्फ लोगों को जोड़ने का काम करती थी, वह अब ओपन-वेट्स एआई इकोसिस्टम की निर्माता बन चुकी है।क्या आपका हर क्लिक और लोकेशन, कंपनी के सर्वर में खामोशी से दर्ज़ हो रहा है?जब आप अपना अकाउंट बनाते हैं तो मेटा को आपका नाम, जन्मतिथि, ईमेल पता और वॉट्सऐप इस्तेमाल करने पर फोन नंबर मिल जाता है। लेकिन यह विशाल कंपनी सिर्फ आपके द्वारा दी गई जानकारी तक सीमित नहीं है। मेटा आपके द्वारा अपलोड की गई तस्वीरों के मेटाडेटा से आपकी लोकेशन तक का पता लगा लेती है। इसके अलावा, यह कंपनी तकनीकी डेटा भी इकट्ठा करती है, जैसे कि आपके फोन का ब्रांड, ऑपरेटिंग सिस्टम, इंस्टॉल किए गए ऐप, वाई-फाई, ब्लूटूथ, सेल टावर सिग्नल और आईपी एड्रेस। इन सबके जरिए फेसबुक यह भी जान लेता है कि आप किसके साथ रहते हैं।चौंकाने वाली बात यह है कि अगर आपका फेसबुक पर अकाउंट नहीं भी है, तब भी कंपनी आपको ट्रैक कर सकती है। इंटरनेट ब्राउज़ करते समय जिन वेबसाइटों पर 'फेसबुक पिक्सल' या सोशल एपीआई लगा होता है, वे आपके उस साइट पर जाने का डेटा सीधे फेसबुक को भेज देती हैं। इसके अलावा, जब लोग अपने फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट फेसबुक पर अपलोड करते हैं, तो आपका नंबर भी बिना आपकी मर्जी के उनके पास पहुंच जाता है। यूरोपीय संघ में 'जीडीपीआर' जैसे सख्त कानून हैं जो राजनीतिक झुकाव और स्वास्थ्य जैसी निजी जानकारी की सुरक्षा करते हैं। लेकिन अमेरिका और कई अन्य देशों में जहां निजता के कड़े कानून नहीं हैं, वहां कंपनी इस विस्तृत डेटा का इस्तेमाल यूजर्स को प्रभावित करने और उन्हें बहुत ही सटीक विज्ञापन दिखाने के लिए करती है। क्या आपकी सार्वजनिक तस्वीरें और पोस्ट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ईंधन बन रही हैं?मेटा की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रणनीति में 'लामा' (एलएलएएमए) मॉडल एक मुख्य हिस्सा बन चुका है। पहले यह दावा किया जाता था कि लामा मॉडल को फेसबुक के हर प्रकार के डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है, लेकिन मेटा ने इससे इनकार किया है। मेटा के पुराने मॉडल लामा 2 को पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटासेट, जैसे कॉमन क्रॉल और विकिपीडिया पर प्रशिक्षित किया गया था, और उसमें कंपनी के प्लेटफॉर्म का कोई उपयोगकर्ता डेटा नहीं था। लेकिन लामा 3 और लामा 4 के साथ मेटा ने अपनी रणनीति बदल दी। मेटा ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि लामा 3 को प्रशिक्षित करने के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम की सार्वजनिक रूप से साझा की गई पोस्ट का इस्तेमाल किया गया है।कंपनी के अनुसार, इस प्रशिक्षण में केवल सार्वजनिक पोस्ट, टिप्पणियां और सार्वजनिक रूप से देखे जा सकने वाले चित्र शामिल हैं, जो इंटरनेट पर किसी के भी देखने के लिए उपलब्ध हैं। मेटा ने स्पष्ट किया है कि डायरेक्ट मैसेज (निजी संदेश) या निजी प्रोफाइल जानकारी जैसे डेटा का इस्तेमाल इसमें नहीं किया जाता है। मार्क ज़करबर्ग ने खुद एक अर्निंग्स कॉल में बताया कि मेटा के पास मौजूद सार्वजनिक फेसबुक और इंस्टाग्राम डेटा की मात्रा इंटरनेट के सबसे बड़े डेटाबेस 'कॉमन क्रॉल' से भी ज्यादा है। यह विशाल डेटा मेटा को क्षेत्रीय भाषा, आम बोलचाल के लहजे और सांस्कृतिक बातचीत को समझने में एक बड़ी बढ़त देता है। लामा 4 के प्रशिक्षण में अरबों तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है, जो एआई को टेक्स्ट और दृश्य दोनों को समझने में सक्षम बनाता है। क्या सोशल मीडिया कंपनी अब पूरी तरह से एआई कंपनी में तब्दील हो चुकी है?साल 2026 तक मेटा प्लेटफॉर्म्स ने सोशल नेटवर्किंग कंपनी से खुद को एक बुनियादी 'एआई-फर्स्ट' उपयोगिता के रूप में पूरी तरह से बदल लिया है। कंपनी का 'रियलिटी लैब्स' विभाग भले ही 2025 में 19.2 अरब डॉलर के घाटे में रहा हो, लेकिन कंपनी का मानना है कि यह भविष्य के कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म का प्रवेश द्वार है। मेटा का 'लामा 4' मॉडल जिसे 'बेहेमोथ' कहा जाता है, इस समय एआई की दुनिया में एक मानक बन चुका है और लाखों डेवलपर्स इसका उपयोग कर रहे हैं। 'लामा 5' पर अभी काम चल रहा है जो वीडियो को भी मूल रूप से समझ सकेगा।मेटा अब सिर्फ फोन की स्क्रीन तक सीमित नहीं है। हार्डवेयर के मोर्चे पर कंपनी के 'रे-बैन मेटा स्मार्ट ग्लासेस' ने बाजार में तहलका मचा दिया है और अकेले 2025 में इसके 70 लाख यूनिट बिके हैं। ये चश्मे 'मेटा एआई' नाम के वॉयस-एक्टिवेटेड असिस्टेंट का मुख्य जरिया बन गए हैं। साल 2026 के इस दौर को 'एजेंटिक एआई' का दौर कहा जा रहा है, जहां एआई सिर्फ सवालों के जवाब नहीं देता, बल्कि आपके लिए काम भी करता है, जैसे यात्रा की बुकिंग करना या विज्ञापन अभियान चलाना। अपनी तकनीक को ओपन-सोर्स (मुफ्त में उपलब्ध) करके मेटा चाहती है कि उसका एआई मॉडल ही दुनिया भर में भविष्य का मुख्य ढांचा बन जाए। क्या एआई के इस दौर में आपके डेटा की निजता हमेशा के लिए खतरे में है?मेटा द्वारा एआई प्रशिक्षण के लिए डेटा के उपयोग को लेकर गंभीर चिंताएं भी पैदा हो रही हैं। मेटा ने 27 मई 2025 से फेसबुक और इंस्टाग्राम के सार्वजनिक पोस्ट, तस्वीरें, वीडियो और कैप्शन को अपनी एआई के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वॉट्सऐप के निजी चैट 'एंड-टू-एंड' एन्क्रिप्टेड होते हैं, इसलिए कंपनी उनका इस्तेमाल नहीं कर सकती, लेकिन अगर आप वॉट्सऐप के अंदर 'मेटा एआई' बोट से बात करते हैं, तो उस बातचीत को सार्वजनिक मानकर एआई को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।इस डेटा उपयोग के बड़े खतरे हैं। एक बार जब आपका डेटा एआई को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल हो जाता है, तो उसे वहां से वापस निकालना या मिटाना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, मेटा इस डेटा के जरिए उपयोगकर्ताओं की पसंद और व्यवहार का गहराई से विश्लेषण करके और अधिक लक्षित विज्ञापन दिखा सकती है। हालांकि आप फेसबुक और इंस्टाग्राम की प्राइवेसी सेटिंग्स में जाकर 'राइट ऑफ ऑब्जेक्शन' (आपत्ति का अधिकार) फॉर्म भरकर अपने डेटा को एआई ट्रेनिंग में जाने से रोक सकते हैं, लेकिन यह सिर्फ आगे के डेटा के लिए लागू होगा। अगर आप समय सीमा के बाद आपत्ति जताते हैं, तो पहले से प्रशिक्षित डेटा को कभी पलटा नहीं जा सकेगा। यह स्पष्ट है कि आज के डिजिटल युग में अपनी निजता की रक्षा करना खुद उपयोगकर्ता की जिम्मेदारी बन गया है।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2d3kt26a2. https://tinyurl.com/2b7tnzbg3. https://tinyurl.com/24vdzptr4. https://tinyurl.com/29rjrm745. https://tinyurl.com/27z4vuvq
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
उरुग्वे की विश्व कप कहानी और फुटबॉल इतिहास के यादगार पल
उरुग्वे फुटबॉल इतिहास की सबसे सफल राष्ट्रीय टीमों में से एक रही है। वर्ष 1930 में जब पहला फीफा विश्व कप आयोजित हुआ, तब उरुग्वे ने मेज़बान देश के रूप में अर्जेंटीना को 4-2 से हराकर इतिहास का पहला विश्व कप अपने नाम किया। उस समय उरुग्वे को दुनिया की सबसे मजबूत फुटबॉल टीमों में गिना जाता था।https://sceh.net/ इसके बाद 1950 विश्व कप में उरुग्वे ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। ब्राज़ील में खेले गए टूर्नामेंट के निर्णायक मुकाबले में उसने मेज़बान और प्रबल दावेदार ब्राज़ील को 2-1 से हरा दिया। लगभग दो लाख दर्शकों के सामने मिली इस जीत को "माराकानाज़ो" के नाम से जाना जाता है और यह आज भी खेल इतिहास के सबसे बड़े उलटफेरों में गिनी जाती है।उरुग्वे का नाम 2010 विश्व कप में भी एक विवादास्पद लेकिन यादगार घटना के कारण चर्चा में रहा। क्वार्टर फाइनल में घाना के खिलाफ मैच के अंतिम क्षणों में लुइज़ सुआरेज़ (Luis Suárez) ने गोल लाइन पर खड़े होकर अपने हाथों से निश्चित गोल को रोक दिया। इसके लिए उन्हें लाल कार्ड मिला, लेकिन घाना पेनल्टी का फायदा नहीं उठा सका। बाद में उरुग्वे ने पेनल्टी शूटआउट जीतकर सेमीफाइनल में जगह बनाई। यह घटना आज भी विश्व कप इतिहास के सबसे चर्चित पलों में से एक मानी जाती है।संदर्भ -https://tinyurl.com/yw294zajhttps://tinyurl.com/2xhcdvnh https://tinyurl.com/mwtukbv4 https://tinyurl.com/y2uvyh5u
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
जानिए, भारत में उत्पन्न हुए कबड्डी खेल को ग्रामीण खेल से वैश्विक पहचान कैसे मिली?
शाहजहांपुर, चलिए आज कबड्डी के इतिहास को समझते हैं, और देखते हैं कि, यह एक प्राचीन भारतीय खेल के रूप में कैसे उत्पन्न हुआ। फिर हम यह पता लगाएंगे कि, कबड्डी को एक ग्रामीण खेल से वैश्विक पहचान कैसे मिली? आगे, हम कबड्डी के नियम और खेल पर नजर डालेंगे। फिर हम अंतरराष्ट्रीय कबड्डी में भारत के प्रभुत्व की जांच करेंगे। अंत में, हम देखेंगे कि, स्थानीय प्रतियोगिता और प्रशिक्षण के माध्यम से, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में इस खेल को कैसे बढ़ावा दिया जा रहा है।कबड्डी की शुरुआत, दरअसल इसके दर्ज इतिहास से पहले की है, जब शुरुआती मानवों को सुरक्षा के लिए एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता थी। यह अवधारणा 4,000 वर्ष से अधिक पुराने खेल कबड्डी में विकसित हुई, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी एथलेटिक गतिविधियों में से एक के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड दुर्लभ होने के बावजूद भी, कबड्डी खेल का विकास स्पष्ट है, जो एक साधारण खोज से एक रणनीतिक प्रयास में परिवर्तन को चिह्नित करता है।किंवदंती है कि, कबड्डी की शुरुआत बच्चों के किसी का पीछा करने और उसे हाथ लगाने के मधुर व्यवहार से हुई। एक प्रचलित धारणा, इस खेल का उगम दक्षिण भारत में तमिलनाडु के अयार आदिवासी लोगों से बताती है। कबड्डी खेल, दक्षिण एशिया के इतिहास और संस्कृति के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। इस खेल की जड़ें मुल्लाई नामक स्थान से है, और यह जल्लीकट्टू खेल के समान है। प्राचीन काल में सदुगुडु नाम से जाना जाने वाला एक खेल, कबड्डी से मिलता जुलता था।भारत ने इस खेल को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1920 के दशक में संगठित कबड्डी प्रतियोगिताओं का उदय हुआ, जिसकी परिणति 1938 में भारतीय ओलंपिक खेलों में कबड्डी को शामिल करने के रूप में हुई। 1950 में अखिल भारतीय कबड्डी महासंघ की स्थापना ने, इस खेल को औपचारिक रूप दिया। इस प्रकार, कबड्डी गांव के मनोरंजन से, एक वैध अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बदल गई।1990 तक, कबड्डी को एशियाई खेलों में शामिल किया गया, जो इसकी बढ़ती वैश्विक अपील का संकेत था। बीसवीं सदी में कबड्डी की लोकप्रियता भारत की सीमाओं से परे बढ़ गई, और 1972 में बांग्लादेश ने भी इसे अपने राष्ट्रीय खेल के रूप में मान्यता दी।https://sceh.net/ कबड्डी की वैश्विक पहुंच का विस्तार आज भी जारी है। इस खेल को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय खेल समारोहों में प्रदर्शित किया गया है, और ‘कबड्डी विश्व कप’ एक महत्वपूर्ण आयोजन बन गया है। हालांकि, ओलंपिक खेलों में कबड्डी को शामिल करने के प्रयास चल रहे हैं। कबड्डी की वैश्विक मान्यता ने न केवल इसकी लोकप्रियता को बढ़ाया है, बल्कि खिलाड़ियों के लिए नए अवसर भी खोले हैं।दरअसल, कबड्डी के नियमों के अनुसार, एक मैच की शुरुआत एक संघ द्वारा दूसरे संघ के मैदान में रेड (Raid) डालने से होती है। रेड डालने वाला खिलाड़ी - रेडर, कबड्डी शब्द का उच्चारण करते हुए, दूसरे संघ के मैदान में प्रवेश करता है। रेडर का उद्देश्य, जितना संभव हो उतने विपक्षी खिलाड़ियों, अर्थात एंटी (Anti) या डिफेंडर (Defender) को टैग करना या छूना होता है। इस दौरान, एक सांस के साथ ही उसे अपनी स्थिति जारी रखते हुए, मध्य रेखा को पार करके अपने मैदान में लौटना होता है।इस बीच, एंटी या डिफेंडर, रेडर से निपटकर या उसे कोर्ट से बाहर धकेलकर, उसे अपने मैदान हिस्से में लौटने से रोकने की कोशिश करते हैं। संघ बारी-बारी से एक-दूसरे पर रेड डालते हैं, और समय समाप्त होने पर अधिक अंक प्राप्त करने वाला संघ मैच जीत जाता है। 2014 में ‘प्रो कबड्डी’ के आगमन के बाद, खेल को अधिक आकर्षक बनाने के लिए इसके नियमों में कुछ बदलाव किए गए। उदाहरण के लिए, प्रो कबड्डी में प्रत्येक रेड पर 30 सेकंड की समय सीमा होती है। लगातार तीन खाली रेड के परिणामस्वरूप, रेडर आउट हो जाता है, और विपक्षी संघ एक अंक अर्जित करता है।हमारे लिए गर्व की बात है कि, 1972 में स्थापित, ‘एमेच्योर कबड्डी फेडरेशन ऑफ इंडिया (Amateur Kabaddi Federation of India)’ द्वारा शासित, भारतीय पुरुष कबड्डी संघ, इतिहास में सबसे सफल राष्ट्रीय कबड्डी संघ है। इसने एशियाई खेलों के नौ संस्करणों में से आठ संस्करणों में स्वर्ण पदक हासिल किए हैं। भारत ने 2004, 2007 और 2016 में तीनों कबड्डी विश्व कप भी जीते हैं। भारत का यह प्रभुत्व, इस खेल की गहरी सांस्कृतिक जड़ों, कबड्डी फेडरेशन ऑफ इंडिया के माध्यम से संरचित कोचिंग और 2014 के बाद से प्रो कबड्डी लीग द्वारा समर्थित प्रतिभाओं पर बना है। राकेश कुमार, अनुप कुमार और अजय ठाकुर जैसे खिलाड़ियों ने संघ की विरासत को आकार दिया है। जबकि, पवन सहरावत और प्रदीप नरवाल जैसे मौजूदा खिलाड़ी भारत की सर्वोच्चता बनाए हुए हैं।प्रो कबड्डी लीगअब तो, प्रो कबड्डी लीग की नोएडा स्थित शाखा – यू पी योद्धाज़ ने, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश कबड्डी लीग के साथ, एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है। इस प्रकार, राज्य में प्राथमिक स्तर की कबड्डी प्रतिभाओं को उजागर करने के लिए, एक राज्यव्यापी लीग के रूप में संघ ने पहली बार प्रवेश किया।उत्तर प्रदेश की शाखा होने के नाते, हमारा यह कर्तव्य है कि, हम क्षेत्र के प्रतिभाशाली युवाओं का समर्थन करें, उनके खेल को विकसित करने और उसे एक पेशा बनाने के लिए सही मंच खोजें। पिछले कुछ वर्षों में, हमारे राज्य से नितेश कुमार, सुमित और सुरेंद्र गिल जैसे कुछ प्रतिभाशाली युवा सामने आए हैं। और हम जानते ही हैं कि, भारत के सबसे बड़े और सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के रूप में, उत्तर प्रदेश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2fahff5s 2. https://tinyurl.com/yd9xt6by 3. https://tinyurl.com/y88uvr6b 4. https://tinyurl.com/38ke55a4 5. https://tinyurl.com/r7xyf4j9
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
प्राचीन युनान से विश्व भर तक, एरिस्टोटल ने ज्ञान की अवधारणा को किस प्रकार किया प्रभावित?
आज, हम जानेंगे कि एरिस्टोटल (Aristotle) कौन थे, और ज्ञान के अध्ययन में उनका क्या योगदान था। फिर, हम यह पता लगाएंगे कि उन्होंने ज्ञान को तर्क, विज्ञान और नैतिकता जैसे क्षेत्रों में कैसे वर्गीकृत किया। आगे, हम देखेंगे कि उन्होंने ज्ञान की नींव के रूप में अवलोकन तर्क और अनुभव पर कैसे जोर दिया। हम यह भी पढ़ेंगे कि उनके विचारों ने विभिन्न संस्कृतियों में शिक्षा की परंपराओं को कैसे प्रभावित किया। जबकि लेख के अंत में, हम समझेंगे कि ज्ञान के प्रति एरिस्टोटल का दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक क्यों है।विश्व विख्यात यूनानी दार्शनिक एरिस्टोटल, कुछ वर्षों के लिए एथेंस (Athens) शहर में थे। उन्होंने इस शहर की सीमा के ठीक बाहर, एक व्यायामशाला में अपना स्कूल स्थापित किया था, जिसे लिसेयुम (Lyceum) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने वहां एक पुस्तकालय भी बनाया, और प्रतिभाशाली अनुसंधान उन्मुखी छात्रों के एक समूह को शिक्षित किया। लिसेयुम, किसी अकादमी की तरह एक निजी क्लब मात्र नहीं था, बल्कि, वहां कई व्याख्यान आम जनता के लिए खुले थे और निःशुल्क होते थे।प्राणीशास्त्रीय ग्रंथों को छोड़कर, एरिस्टोटल के अधिकांश कार्य संभवतः उनके एथेंस के प्रवास से संबंधित हैं। परंतु, उनके कार्यों के कालानुक्रमिक क्रम के बारे में कोई निश्चितता नहीं है। यह संभव है कि, भौतिकी, तत्वमीमांसा, मनोविज्ञान, नैतिकता और राजनीति पर मुख्य ग्रंथ फिर से लिखे और अद्यतन किए गए थे। एरिस्टोटल का प्रत्येक प्रस्ताव, विचारों और ऊर्जा से भरपूर है, लेकिन, उनका गद्य स्पष्ट और सुरुचिपूर्ण नहीं है। हालांकि, वे व्यवस्थित हैं। एरिस्टोटल ने लिसेयुम में काम करते दौरान, बौद्धिक अनुशासन की धारणा का आविष्कार भी किया था।https://sceh.net/ दरअसल, एरिस्टोटल ने विज्ञान को तीन प्रकारों में विभाजित किया: उत्पादक, व्यावहारिक और सैद्धांतिक। जिस विज्ञान में कोई उत्पाद हैं, वह उत्पादक विज्ञान है। उनमें अभियांत्रिकी और वास्तुकला के साथ, रणनीति और बयानबाजी जैसे अनुशासन शामिल हैं। क्योंकि यहां उत्पाद महत्वपूर्ण हैं, जैसे कि - युद्ध के मैदान पर या अदालतों में जीत। व्यावहारिक विज्ञान या विशेष रूप से नैतिकता और राजनीति, व्यवहार का मार्गदर्शन करते हैं। जबकि सैद्धांतिक विज्ञान, यानी भौतिकी, गणित और धर्मशास्त्र में हमारे लिए जानकारी और समझ दी गई है।इसके अलावा, एरिस्टोटल ने "अनिश्चित विज्ञान" और "ठोस विज्ञान" के बीच अंतर किया है। यह अंतर अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों की परिवर्तनशीलता और स्थिरता पर प्रकाश डालता है।1. अनिश्चित विज्ञानअनिश्चित विज्ञान, मानव व्यवहार और सामाजिक कारकों से प्रभावित होता है। चूंकि मानव व्यवहार अक्सर परिवर्तनशील और अप्रत्याशित होता है, इस विज्ञान में प्राकृतिक विज्ञान में पाई जाने वाली सटीकता का अभाव है। इसके उदाहरणों में नैतिकता, राजनीति और अर्थशास्त्र हैं। हालांकि ये क्षेत्र मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, उनके निष्कर्ष अधिक निश्चित नहीं होते हैं, और व्याख्या के लिए अधिक खुले होते हैं।2. ठोस विज्ञानठोस विज्ञान, भौतिक दुनिया और उसके प्राकृतिक नियमों से संबंधित हैं। ये विज्ञान, जैसे कि - भौतिकी और जीव विज्ञान, अधिक स्थिर और पूर्वानुमानित हैं, क्योंकि वे अवलोकनीय घटनाओं पर आधारित हैं। ये घटनाएं सुसंगत पैटर्न का पालन करती हैं। उदाहरण के लिए, गुरुत्वाकर्षण के नियम मानवीय क्रिया या विश्वास की परवाह किए बिना, सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं।विज्ञान में अनुभवजन्य अवलोकन महत्वपूर्ण होता है। परंतु एरिस्टोटल ने, वैज्ञानिक जांच में तार्किक तर्क के महत्व पर भी जोर दिया। उनका मानना था कि, प्राकृतिक दुनिया के अंतर्निहित सिद्धांतों को उजागर करने हेतु, हमारी टिप्पणियों को तार्किक रूप से व्यवस्थित और विश्लेषित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस प्रक्रिया में सहायता के लिए, तर्क की एक प्रणाली विकसित की, जिसे सिलोगिस्टिक तर्क (Syllogistic logic) के रूप में जाना जाता है। सिलोगिज्म एक ‘तार्किक तर्क’ है, जो दो या दो से अधिक स्थितियों के आधार पर निष्कर्ष निकालने हेतु, निगमनात्मक तर्क का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए:स्थिति 1: सभी मनुष्य नश्वर हैं।स्थिति 2: सुकरात एक मनुष्य हैं।निष्कर्ष: इसलिए, सुकरात नश्वर है।तर्क की इस प्रणाली ने वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया को औपचारिक बनाने में मदद की, और यह सुनिश्चित किया कि, निष्कर्ष ठोस तर्क पर आधारित हों। अच्छे तर्क पर ज़ोर देना, एरिस्टोटल की अन्य जांचों के लिए पृष्ठभूमि के रूप में कार्य करता है। अपने प्राकृतिक दर्शन में वे सामान्य और कारणात्मक दावे करने के लिए, तर्क को अवलोकन के साथ जोड़ते हैं।एरिस्टोटल के विचारों को सबसे पहले, सीरिया (Syria) के एडेसा (Edessa) और एंटिओक (Antioch) जैसे अध्ययन केंद्रों में संरक्षण प्राप्त हुआ। वहां विद्वानों ने, ईसाई धर्मशास्त्रीय बहसों के लिए एक संरचनात्मक ढांचा प्रदान करने के लिए उनके तार्किक कार्य पर ध्यान केंद्रित किया। कुछ लोगों ने ग्रीक ग्रंथों का सिरिएक भाषा में अनुवाद भी किया। इससे एरिस्टोटल की पद्धति बीजान्टिन युग (Byzantine era) से इस्लामी स्वर्ण युग तक प्रसारित हुई।लिसेयुम बाद में, जब अब्बासिद खलीफा ने बगदाद में संस्थान स्थापित किए, तब एरिस्टोटल के विचार अरबी बौद्धिक संस्कृति की आधारशिला बन गए। उसी समय, इब्न सिना ने उनके विचारों को एक सुसंगत व विशाल दार्शनिक प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने इसमें भेद भी पेश किए, जो भविष्य की विश्वविद्यालय शिक्षा में मानक बन गए। दूसरी ओर, इब्न रुश्द ने दर्शन और इस्लाम के बीच की दूरी को पाटने हेतु, एरिस्टोटल के तर्कों का इस्तेमाल किया। उनकी रचनाएं अतः, सभी धर्मनिरपेक्ष ज्ञान के लिए एक पद्धति बन गई।साथ ही, कुछ यहूदी विद्वानों ने, अरबी संस्कृति के भीतर विकसित होते हुए, अपने स्वयं के धार्मिक दर्शन को परिष्कृत करने के लिए एरिस्टोटल के विचारों का उपयोग किया। इस प्रकार, उनसे संबंधित हिब्रू साहित्य भी उभरा, जिससे एक सघन एवं स्तरित शैक्षिक परंपरा का निर्माण हुआ।अंततः, एरिस्टोटल इन अरबी और यहूदी ग्रंथों के अनुवाद के माध्यम से पश्चिमी यूरोप में प्रसिद्ध हुए। तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक, उनके दार्शनिक ग्रंथों को पेरिस विश्वविद्यालय (Paris University) के कला संकाय में पढ़ना अनिवार्य हो गया था। उन्हें ईसाई सिद्धांत में इतनी गहराई से एकीकृत किया गया कि, उनके विचार कैथोलिक चर्च का आधिकारिक दार्शनिक ढांचा बन गए। इससे कठोर तार्किक विश्लेषण और बहस पर आधारित शिक्षा की एक मानकीकृत "शैक्षिक" पद्धति विकसित हुई।दरअसल, एरिस्टोटल द्वारा किया गया विज्ञान का वर्गीकरण तथा अनिश्चित और ठोस विज्ञान के बीच अंतर, इस बात को प्रभावित करता है कि हम अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों को कैसे देखते हैं। जबकि अब हमारे पास अवलोकन और विश्लेषण के लिए अधिक उन्नत उपकरण और तकनीकें हैं, एरिस्टोटल के मूलभूत सिद्धांत आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/ct8kmjaj 2. https://tinyurl.com/5n8b3h58 3. https://tinyurl.com/485v939f 4. https://tinyurl.com/r4us74vt 5. https://tinyurl.com/yavyr2e9
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
पश्चिमी देशों का दबदबा खत्म करने वाले ब्रिक्स की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है?
क्या आप जानते हैं कि आज एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय समूह उभर चुका है जो दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है? यह समूह कोई और नहीं बल्कि 'ब्रिक्स' (BRICS) है, जिसने पिछले दो दशकों में एक प्रमुख राजनीतिक ताक़त के रूप में अपनी पहचान बनाई है। इस समूह का जन्म अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती देने और विकासशील देशों को एक नया विकल्प प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ था। हाल ही में इस समूह का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, जिसने इसकी ताक़त को तो बढ़ाया ही है, लेकिन साथ ही इसके भीतर कुछ नए कूटनीतिक विवादों को भी जन्म दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि ब्रिक्स क्या है, यह कैसे काम करता है और दुनिया के भविष्य के लिए इसके क्या मायने हैं। ब्रिक्स क्या है और वर्तमान में कौन से देश इसका हिस्सा हैं?ब्रिक्स एक अनौपचारिक समूह है जो मुख्य रूप से 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों) के लिए एक राजनीतिक और कूटनीतिक समन्वय मंच के रूप में कार्य करता है। वर्तमान में यह ग्यारह देशों का एक मज़बूत समूह बन चुका है। इसके पाँच मूल सदस्य ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। इसके अलावा वर्ष दो हज़ार चौबीस-पच्चीस में इसमें छह नए सदस्यों को शामिल किया गया है, जिनके नाम मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात हैं। सदस्य देशों के अलावा, इस समूह ने एक 'पार्टनर देश' (साझेदार देश) की श्रेणी भी बनाई है। वर्ष दो हज़ार चौबीस के कज़ान शिखर सम्मेलन में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज़्बेकिस्तान को साझीदार देश घोषित किया गया। इसके तुरंत बाद वियतनाम को भी दसवें साझीदार देश के रूप में आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिया गया, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में गहराई से जुड़ा एक अहम एशियाई देश है। ब्रिक्स में निर्णय आम सहमति के आधार पर लिए जाते हैं और इसके सदस्य देश सभी बैठकों में भाग लेते हैं।उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विचार से ब्रिक्स का निर्माण कैसे हुआ और यह कैसे आगे बढ़ा?ब्रिक्स की शुरुआत महज़ एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। वर्ष दो हज़ार एक में गोल्डमैन सैक्स निवेश बैंक के एक अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की तेज़ आर्थिक वृद्धि को देखते हुए 'ब्रिक' शब्द गढ़ा था। उनका मानना था कि इन देशों का विकास भविष्य में अमीर देशों के समूह जी-सात को कड़ी चुनौती देगा। इस विचार को ज़मीनी हक़ीक़त में बदलने की शुरुआत रूस ने की, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी ताक़तों के ख़िलाफ़ एक समानांतर शक्ति खड़ी करने के लिए इन चारों देशों की बैठक बुलाई। ब्रिक की पहली मंत्री स्तरीय बैठक वर्ष दो हज़ार छह में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई थी। इसके बाद वर्ष दो हज़ार नौ में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों का पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। वर्ष दो हज़ार ग्यारह में चीन के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका को भी इस समूह में शामिल कर लिया गया, जिसके बाद इस समूह का नाम 'ब्रिक' से बदलकर 'ब्रिक्स' हो गया। https://sceh.net/ इस समूह को बनाने का मुख्य कारण क्या था और यह वैश्विक व्यवस्था में कैसे बदलाव लाना चाहता है?ब्रिक्स का गठन इस बुनियादी सोच पर आधारित था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर पश्चिमी ताक़तों का एकाधिकार हो चुका है और ये संस्थाएं अब विकासशील देशों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही हैं। ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार लाना है ताकि उनकी वैधता और प्रभावशीलता बढ़ सके। विशेष रूप से वर्ष दो हज़ार आठ के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इन देशों ने महसूस किया कि अंतरराष्ट्रीय शासन प्रणाली में उभरते हुए देशों को उनकी आर्थिक ताक़त के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा था कि ब्रेटन वुड्स प्रणाली (जिसके तहत विश्व बैंक और आईएमएफ बने थे) अमीर देशों द्वारा अमीर देशों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई थी, और इसमें अफ़्रीकी देशों की कोई भागीदारी नहीं थी। इसी पश्चिमी आधिपत्य और वित्तीय असंतुलन को ख़त्म करने के लिए ब्रिक्स देशों ने एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने का बीड़ा उठाया। 2024 ब्रिक्स शिखर सम्मेलनसदस्य देशों के बीच वैश्विक व्यापार और आर्थिक सहयोग में इसकी क्या भूमिका है?ब्रिक्स देशों ने पश्चिमी वित्तीय प्रणाली पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को कम करना ब्रिक्स का एक प्रमुख एजेंडा रहा है, क्योंकि डॉलर पर निर्भरता के कारण इन देशों को पश्चिमी प्रतिबंधों का ख़तरा बना रहता है। इस दिशा में 'डी-डॉलरीकरण' को बढ़ावा देते हुए स्थानीय मुद्राओं, ख़ासकर चीन की मुद्रा रेनमिन्बी, में व्यापार बढ़ाया जा रहा है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा तो ब्रिक्स देशों के लिए एक साझा मुद्रा बनाने की भी पुरज़ोर वकालत कर चुके हैं। विश्व बैंक और आईएमएफ के विकल्प के तौर पर ब्रिक्स ने 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (एनडीबी) और 'कंटिंजेंट रिज़र्व अरेंजमेंट' (सीआरए) की स्थापना की है। न्यू डेवलपमेंट बैंक मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन और सामाजिक विकास जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ऋण मुहैया कराता है और इसका लक्ष्य अपने कुल प्रोजेक्ट्स का चालीस प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन से निपटने में लगाना है। हालाँकि एनडीबी का आकार अभी विश्व बैंक से बहुत छोटा है, लेकिन यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूत करने में एक अहम हथियार साबित हो रहा है। ब्रिक्स देशों का नक्शाब्रिक्स का हालिया विस्तार कैसे हो रहा है और वैश्विक प्रभाव के लिए इसके क्या मायने हैं?हाल के वर्षों में ब्रिक्स का आकर्षण तेज़ी से बढ़ा है। वर्ष दो हज़ार तेईस के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के दौरान छह नए देशों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। इनमें से अर्जेंटीना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि वहाँ के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने कम्युनिस्ट देशों के साथ गठबंधन न करने और पश्चिमी देशों के साथ नज़दीकियां बढ़ाने का फ़ैसला किया था। लेकिन अन्य देशों के जुड़ने से अब इस समूह में अरब जगत की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं (सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात) और उप-सहारा अफ़्रीका की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (इथियोपिया) शामिल हो गई हैं। हालाँकि इस विस्तार के साथ ही समूह के भीतर गुटबाज़ी और विवाद भी बढ़ने लगे हैं। चीन और भारत के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद और 'ग्लोबल साउथ' का नेता बनने की होड़ एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले के कारण भी समूह के सामने कूटनीतिक मुश्किलें खड़ी हुई हैं।आने वाला समय ब्रिक्स के लिए चुनौतियों से भरा है। जुलाई दो हज़ार पच्चीस में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में हुई शिखर सम्मेलन से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किनारा कर लिया था। शी जिनपिंग ने अपनी अनुपस्थिति का कारण व्यस्त कार्यक्रम बताया, जबकि पुतिन अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी गिरफ़्तारी वारंट के कारण सम्मेलन में नहीं जा रहे थे। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिक्स को लेकर सख़्त रवैया अपनाते हुए कहा है कि "ब्रिक्स मर चुका है" और उन्होंने डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिश करने वाले ब्रिक्स देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी भी दीै। इन तमाम आंतरिक मतभेदों और बाहरी दबावों के बावजूद, वर्ष दो हज़ार चौबीस में तीस से अधिक देशों ने इस समूह में शामिल होने के लिए आवेदन किया था, जिनमें अज़रबैजान, मलेशिया और तुर्की जैसे देश शामिल हैं। यह स्पष्ट दर्शाता है कि पश्चिमी एकाधिकार के ख़िलाफ़ एक नए बहुध्रुवीय विश्व की चाहत अभी भी ज़िंदा है और ब्रिक्स इसका सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/28ksdgux2. https://tinyurl.com/y35mvnzm3. https://tinyurl.com/2awxslf94. https://tinyurl.com/2y6lasrm5. https://tinyurl.com/2652hmcn
प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
मध्यकालीन दिल्ली का बेजोड़ विवरण:हिंदी महाकाव्य पृथ्वीराज रासो व् फ़ारसी ग्रंथ नूह सिफिर में
क्या आप जानते हैं कि जिस दिल्ली को आज हम भारत के दिल के रूप में पहचानते हैं, उसके इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब उसके 20 अलग-अलग नाम हुआ करते थे? महान कवि अमीर खुसरो ने इसी शहर के बारे में लिखा था कि यहाँ की वास्तुकला और कुतुब मीनार इतनी भव्य हैं कि वे सीधे "तारों से हाथ मिलाती हैं"। यह कोई साधारण शहर नहीं है, बल्कि यह वह ज़मीन है जिसे कभी 'इंद्रप्रस्थ' तो कभी 'योगिनीपुर' कहा गया। आज के इस लेख में हम इतिहास के उन्हीं पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे कि कैसे मध्यकालीन भारत (1000 ईस्वी से 1450 ईस्वी) के दौरान बसाई गई यह छोटी सी बस्ती आज की आधुनिक राजधानी में तब्दील हो गई। आइए, 'पृथ्वीराज रासो' की ऐतिहासिक पंक्तियों और सूफी संत अमीर खुसरो की नज़रों से इस शहर के इस बेमिसाल सफर को विस्तार से समझें। 'पृथ्वीराज रासो' क्या है और यह मध्यकालीन इतिहास का सबसे अहम दस्तावेज़ क्यों माना जाता है?हिंदी साहित्य के मध्यकालीन दौर में लिखा गया 'पृथ्वीराज रासो' भारत के सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्यों में से एक माना जाता है। यह महाकाव्य 12वीं शताब्दी के महान राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान तृतीय के जीवन और उनकी वीरतापूर्ण लोककथाओं का विस्तृत वर्णन करता है, जिन्होंने अजमेर और दिल्ली पर शासन किया था। इस महाकाव्य की रचना चंद बरदाई ने की थी, जो न केवल राजा पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे, बल्कि उनके बहुत अच्छे मित्र और सलाहकार भी थे। इस ऐतिहासिक ग्रंथ को कुल 69 अध्यायों में बाँटा गया है, जिन्हें 'समय' कहा जाता है।शुरुआती दौर में यह ग्रंथ केवल मौखिक परंपरा (सुनाने और याद रखने) के रूप में ही जीवित था, लेकिन 18वीं शताब्दी में इसे देवनागरी लिपि और ब्रजभाषा में उकेरा गया। बाद में 19वीं शताब्दी में पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या द्वारा इसके संपूर्ण संकलन पर आधारित मुद्रित संस्करण (Printed Editions) प्रकाशित किए गए। इस ग्रंथ में इतिहास और काल्पनिक किंवदंतियों का एक अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है, जो हमें उस दौर के समाज और दिल्ली के शुरुआती स्वरूप को समझने में बहुत मदद करता है। प्राचीन काल के इंद्रप्रस्थ से लेकर मध्यकालीन 'ढिल्ली' तक का सफर कैसे तय हुआ?'पृथ्वीराज रासो' में दिल्ली की प्राचीन बस्तियों के बारे में बेहद चौंकाने वाली जानकारियाँ दी गई हैं। इस महाकाव्य में इस जगह के बीस अलग-अलग नामों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें जुग्गिनीपुर, जोग नायर, योगिनीपुर, इंद्रप्रस्थ, इंद्रप्रस्थय, इंद्रप्रस्थपुर, ढिल्ली, ढिल्लिया, ढिल्लरी, दिल्ली, दिल्लीपुर, दिल्लीधरा, दिल्लीपुरम, दिल्लीपति, दिल्लीदेसी, दिल्लीनगर, दिल्ली वासा, ढिल्लियादेस, ढिल्लेसा और दिल्लीनरेसा शामिल हैं।ग्रंथ के 'आदि पर्व' (समय 1) की शुरुआत यमुना नदी के तट पर निगम बोध घाट के पास 'दिली' नामक जगह पर बीसलदेव (धुंधा) के आगमन और दिल्ली की बस्ती बसने के साथ होती है। इसे एक पवित्र मंडल के रूप में वर्णित किया गया है जहाँ कई मंदिर मौजूद थे। इसी के पास निगम बोध के निकट एक योगिनी की गुफा और 'सारंगवापल' नामक एक जलाशय का भी ज़िक्र किया गया है। ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि दिल्ली के पास 'बहिलवन' नामक एक जंगल हुआ करता था, जो संभवतः थानेश्वर में था। कहानी में भविष्यवाणी की गई थी कि दिल्ली को सोमेश्वर के पुत्र (पृथ्वीराज) द्वारा सुशोभित किया जाएगा, जिनका जन्म बहिलवन में रहने के लिए ही हुआ था। महाकाव्य बताता है कि जुग्गिनीपुर वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ पृथ्वीराज चौहान का राज्याभिषेक बिल्कुल महाभारत के राजा युधिष्ठिर की तरह ही किया गया था। 'दिल्ली-किल्ली कथा' क्या है और इसके पीछे की ऐतिहासिक घटना क्या बयां करती है?दिल्ली की बुनियाद को समझने के लिए 'पृथ्वीराज रासो' के तीसरे अध्याय (समय 3) में वर्णित 'दिल्ली-किल्ली कथा' एक बेहद महत्वपूर्ण लोककथा है। यह कथा हमें बताती है कि कैसे अनंगपाल ने निगम बोध के पास एक नई बस्ती बसाई थी। इस जगह को एक सुरक्षित और शक्तिशाली केंद्र बनाने की कोशिश की गई थी। लेकिन इतिहास हमेशा एक सा नहीं रहता। इस कथा के अनुसार, गहरवाल राजवंश के राजा विजयपाल (विजयचंद्र) ने जब इस क्षेत्र पर एक बड़ा हमला किया, तो अनंगपाल की इस बस्ती को भारी नुकसान पहुँचा। इस भयंकर आक्रमण के बाद, इस बस्ती को छोड़ना पड़ा और अपना मुक्काम (ठिकाना) कालिंदी के उत्तर की ओर स्थानांतरित करना पड़ा। यह लोककथा इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि मध्यकालीन दौर में यह क्षेत्र किस तरह लगातार युद्धों, उथल-पुथल और सत्ता के बदलाव का गवाह बन रहा था, जिसने इसकी भौगोलिक और राजनीतिक पहचान को पूरी तरह बदल कर रख दिया। अमीर खुसरो कौन थे और उन्होंने दिल्ली को 'धरती का स्वर्ग' क्यों करार दिया था?मध्यकालीन भारत के सबसे महान विद्वानों में से एक अमीर खुसरो का जन्म 1253 ईस्वी में पटियाली (जो कि वर्तमान कासगंज ज़िले में है) में हुआ था। तुर्की मूल के अमीर खुसरो के भीतर रहस्यवाद (सूफीवाद), गहरी विद्वता, इतिहास की समझ, संगीत और कविता का एक बेजोड़ संगम देखने को मिलता है। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के पाँच अलग-अलग सुल्तानों के दरबार में एक फ़ारसी भाषा के कवि के रूप में अपनी सेवाएँ दी थीं।उन्होंने सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के लिए 'नूह सिफिर' (अर्थात नौ सफ़र) नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा था। इस ग्रंथ के 'तीसरे सिफिर' में उन्होंने 'हिंद' (भारत) और यहाँ के लोगों, उनकी भाषाओं, ब्राह्मणवादी ज्ञान और विद्या, यहाँ की कलाओं और विज्ञान, यहाँ के पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और यहाँ की सुखद जलवायु का इतना अद्भुत वर्णन किया है कि इसे सचमुच "धरती का स्वर्ग" (पैराडाइज़ ऑन अर्थ) करार दिया है। अमीर खुसरो के लिए दिल्ली उनका सबसे प्रिय और चहेता शहर था। उन्होंने बड़े गर्व से लिखा था कि उस समय की दिल्ली, इस्लामी दुनिया के सबसे महान और बड़े केंद्रों जैसे बगदाद, काहिरा, खुरासान और बुखारा को भी कड़ी टक्कर दे सकती थी। कुतुब मीनार को 'तारों से हाथ मिलाने वाला' क्यों कहा गया और शहर की वास्तुकला कैसी थी?अमीर खुसरो केवल दिल्ली की संस्कृति के दीवाने नहीं थे, बल्कि वे यहाँ की परिष्कृत भाषा और भव्य वास्तुकला (आर्किटेक्चर) के भी मुरीद थे। उन्होंने अपने लेखों में दिल्ली की आलीशान इमारतों का ख़ास ज़िक्र किया है, जिनमें 'क़स्र-ए-नौ' (नया महल) और 'क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' सबसे प्रमुख हैं। कुतुब मीनार की ऊँचाई और उसकी भव्यता से प्रभावित होकर अमीर खुसरो ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से लिखा था कि यह मीनार "तारों से हाथ मिलाती है"।इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय कारीगरों की तारीफ़ में यह भी जोड़ा कि दिल्ली में जो शिल्प कौशल और वास्तुकला मौजूद है, वह पूरी अरब या फ़ारसी दुनिया में बनाई गई किसी भी इमारत से कहीं ज़्यादा उत्कृष्ट और बेहतर है। उनका यह नज़रिया दिखाता है कि उस दौर की दिल्ली केवल एक राजनीतिक राजधानी नहीं थी, बल्कि यह ज्ञान, कला और अद्भुत वास्तुकला का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बन चुकी थी जिसकी चमक दूर-दूर तक फैली हुई थी। सदियों का सफर तय करके पुरानी 'ढिल्ली' आधुनिक भारत की 'नई दिल्ली' कैसे बन गई?समय का पहिया घूमता रहा और मध्यकालीन सल्तनतों और साम्राज्यों का दौर ख़त्म होने के बाद अंग्रेज़ों का शासन भारत पर काबिज़ हुआ। एक लंबे समय तक भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी। लेकिन दिल्ली का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व हमेशा से ही बहुत ख़ास रहा था। इसी अहमियत को समझते हुए, दिसंबर 1911 में अंग्रेज़ों ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाने का ऐतिहासिक फैसला किया।https://www.indeur.com/राजधानी को दिल्ली स्थानांतरित करने के लिए और एक सुनियोजित शहर बसाने के मक़सद से 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894' (लैंड एक्विजिशन एक्ट) के तहत ज़मीन अधिग्रहित की गई। इसके बाद एक नए शहर की रूपरेखा तैयार की गई जिसे हम आज आधुनिक 'नई दिल्ली' के रूप में जानते हैं। यह वही ज़मीन है जिसने प्राचीन इंद्रप्रस्थ के किस्से सुने, अनंगपाल के दौर की उथल-पुथल देखी, अमीर खुसरो की सूफी कविताएँ सुनीं और फिर एक आधुनिक वैश्विक राजधानी के रूप में खुद को स्थापित किया। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2db8ylrr2. https://tinyurl.com/2yvsv9d23. https://tinyurl.com/2a2cm5ck4. https://tinyurl.com/28rcsze85. https://tinyurl.com/2bodq49s
तितलियाँ और कीट
तितलियाँ कैसे बताती हैं कि पर्यावरण कितना स्वस्थ और संतुलित है
तितलियाँ केवल सुंदर दिखने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि वे एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण संकेत भी मानी जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी क्षेत्र में तितलियों की अच्छी संख्या यह दर्शाती है कि वहाँ का वातावरण स्वच्छ है, पौधों की विविधता बनी हुई है और प्रकृति का संतुलन ठीक तरह से काम कर रहा है।https://www.indeur.com/तितलियाँ पर्यावरण में होने वाले छोटे छोटे बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। तापमान में बदलाव, प्रदूषण, जंगलों की कटाई या भोजन देने वाले पौधों की कमी का असर सबसे पहले तितलियों पर दिखाई देता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक तितलियों को “प्राकृतिक संकेतक” के रूप में देखते हैं।जहाँ तितलियाँ अधिक दिखाई देती हैं, वहाँ मधुमक्खियों, लेडीबर्ड जैसे अन्य लाभकारी कीट भी अच्छी संख्या में पाए जाते हैं। यह जैव विविधता, पौधों के परागण, प्राकृतिक संतुलन और खेती को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती है।इस तरह तितलियाँ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ातीं, बल्कि वे हमें यह भी बताती हैं कि हमारा पर्यावरण कितना स्वस्थ और संतुलित है।संदर्भ:https://tinyurl.com/yck2rkxyhttps://tinyurl.com/3tdynpjkhttps://tinyurl.com/4m6e7bs3
मिट्टी के बर्तन से काँच व आभूषण तक
27-07-2026 09:24 AM • Shahjahanpur-Hindi
मणिपुर के लोंगपी काली मिट्टी बर्तन हैं एक उदाहरण, आधुनिक युग में पारंपरिक शिल्प के सम्मान का
हम जानते ही हैं कि, हमारा भारत देश शिल्प कला में दुनिया में अग्रसर है। क्या आप जानते हैं कि, मणिपुर के नुंगबी खुल्लन गांव के तांगखुल नागा लोग, कई सदियों से हाथ से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। माना जाता है कि, ये ‘लोंगपी मिट्टी बर्तन’, जिन्हें नुंगबी मिट्टी के बर्तन के नाम से भी जाना जाता है, नवपाषाण काल (10,000 ईसा पूर्व) से ही चलन में है। उखरुल जिले के नुंगबी गांव में 400 घर हैं, और लगभग 200 कारीगर आज भी इस शिल्प का अभ्यास कर रहे हैं। मुख्य कुम्हार और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ता - माचिहान सासा, तांगखुल जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, और उनके काम ने इधर की मिट्टी के बर्तनों को वैश्विक पहचान दिलाई है।
पत्थर-मिट्टी के साधारण बर्तन बनाने के लिए, अगर मिट्टी को पत्थर के साथ मिलाया जाए, तो आग में गर्म करने पर वह फूट जाएगा। परंतु, तांगखुल लोगों ने इस शिल्प में महारत हासिल की है, और लोंगपी बर्तनों का भंडारण के साथ-साथ, उच्च तापमान पर खाना पकाने के लिए भी सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।
हाथ से आकार दिए गए इन बर्तनों को पॉलिश किया जाता है, धूप में सुखाया जाता है, और फिर अलाव में जलाया जाता है। इससे उनका रंग काला या भूरा, और धातु जैसा दिखने लगता है। परंपरागत रूप से, हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों का उपयोग स्थानीय स्तर पर, मैतेई, माओ नागा, कोम, पाओमी, जैसे कुछ अन्य समुदायों द्वारा भी किया जाता था। अब मणिपुर के बाहर भी इनकी अच्छी मांग है, क्योंकि लोंगपी बर्तनों में पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट माना जाता है। नुंगबी में, उनका उपयोग चावल से बीयर बनाने, मसालों तथा पानी के भंडारण, और खाना पकाने के लिए किया जाता है।
पहले, यह शिल्प दो गांवों – नुंगबी और लोंगपी काजुई में प्रचलित था, परंतु आज, नुंगबी खुल्लन एकमात्र कुम्हार गांव बना है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, लेकिन पुरुष कारीगरों की संख्या महिला कुम्हारों से अधिक है। लोंगपी शिल्प को मूल रूप से ‘लोरी हैमलेई’ कहा जाता था, जिसका अर्थ शाही मिट्टी के बर्तन था। तब, केवल अमीर लोग ही इसे खरीद सकते थे। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, और निर्माण काम कई महीनों तक चलता है। क्योंकि, कारीगर स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार काम करते हैं।
मिट्टी को तीन दिनों तक सुखाने के बाद, ओखली और मूसल का उपयोग करके इसका महीन पाउडर बनाया जाता है, और फिर बांस की छलनी से इसे छान लिया जाता है। सरपेंटाइन या जहरमोहरा पत्थर, इन बर्तनों में प्रयुक्त होने वाला एक अन्य प्रमुख घटक है, जिसे स्थानीय रूप से 'लेशोनलुंग' कहा जाता है। मैग्नीशियम से भरपूर होने के कारण, इसका रंग नीला, हरा या काला होता है। इस पत्थर को काफुंग्रिम पहाड़ी से निकाला जाता है, जो इस गांव से लगभग 30 मिनट की पैदल दूरी पर है। कुम्हार इसे शुष्क मौसम में एकत्र करते हैं, क्योंकि तब इसे ले जाना और साफ करना आसान होता है। फिर, इस पत्थर का भी पाउडर बनाया जाता है।
इसके बाद, एक निश्चित अनुपात में छनी हुई मिट्टी का पाउडर, पत्थर का पाउडर, और पानी मिलाया जाता है, ताकि उचित बर्तन बन सकें। फिर, मिश्रण को नरम और लचीला होने तक गूंधा जाता है। बर्तन का मूल मॉडल प्राप्त करने के लिए सांचे, स्लैब और अन्य विभिन्न उपकरणों का उपयोग करके, इस सामग्री को उसमें लगाया जाता है।
अगले दिन, इसे बांस के चप्पू और धागे का उपयोग करके हाथों से आकार दिया जाता है, जबकि बांस की छड़ी की मदद से ही, इनका समतलन भी किया जाता है। अंत में, वांछित आकार प्राप्त होने तक इसे सुधारा जाता है, जिसके बाद बाहरी सतह को बांस की छड़ी से खुरच कर चिकना किया जाता है। बर्तनों को दो से तीन दिनों तक सुखाया जाता है। बाद में बर्तनों को चमकाने के लिए, चिकने ठोस पत्थरों या जानवरों की हड्डियों का उपयोग किया जाता है। इसके बाद, उन्हें फिर से पॉलिश किया जाता है। पॉलिशिंग जितनी अच्छी होगी, उत्पाद उतना ही चमकदार और चिकना होगा। अंत में, बर्तनों को पांच से सात घंटों तक 1200 डिग्री सेल्सियस पर आग में पकाया जाता है।
आग से निकालने के बाद, जब बर्तन गर्म होते हैं, तभी उन्हें माची चीज़ (चिरोना पेड़) की ताजी पत्तियों से साफ और पॉलिश किया जाता है। इस प्रकार, पत्तियों से चमकाने के दौरान बर्तन का रंग, काला या भूरा निर्धारित होता है। यह अंतिम चरण है, जिसके बाद बर्तन उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं।
अधिकांश अन्य मिट्टी के बर्तनों के विपरीत, लोंगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया काफी श्रम-गहन है, और पूरी तरह से हाथों से की जाती है। साथ ही, इसका काला रंग भी प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इसमें कोई रसायन या पेंट की भूमिका नहीं होती। मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में किसी भी रसायन, मशीन या पहियों का उपयोग नहीं किया जाता है। कुछ बर्तन निर्माण कार्यशालाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया हस्तनिर्मित है। लोंगपी उत्पाद किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, और उत्पाद पूरी तरह से अपघटनीय हैं।
2007 में, दिल्ली में लोंगपी शिल्पकार - मैथ्यू सासा द्वारा शुरू की गई ‘मैथ्यू सासा क्राफ्ट’, और सितंबर 2015 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा शुरू की गई यूएसटीटीएडी जैसी पहलें, इस शिल्प को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं। मैथ्यू सासा, जिन्होंने कारीगरों को प्रशिक्षित करने और इस शिल्प को लोकप्रिय बनाने के लिए मैथ्यू सासा क्राफ्ट की स्थापना की, माचिहान सासा के पुत्र हैं। मैथ्यू सासा की पहल, राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी और वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मेलों में भागीदारी ने, पूरे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोंगपी मिट्टी के बर्तनों की लोकप्रियता और बिक्री को बढ़ावा दिया है।
राग रामदासी मल्हार: अनूठे स्वर-विन्यास से सजा वर्षा ऋतु का विशिष्ट राग
अगर मल्हार राग-परिवार के अपेक्षाकृत कम प्रस्तुत किए जाने वाले रागों की बात की जाए, तो राग रामदासी मल्हार अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़े मल्हार अंग की मधुरता को अपने अनूठे स्वर-विन्यास के साथ प्रस्तुत करता है। यद्यपि इसकी प्रस्तुतियाँ मियाँ की मल्हार या मेघ मल्हार की तुलना में कम सुनने को मिलती हैं, फिर भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इसे एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली राग माना जाता है।
रामदासी मल्हार अपनी गंभीर, संतुलित और भावपूर्ण प्रकृति के लिए जाना जाता है। इसकी रचना में मल्हार के विशिष्ट स्वरांगों के साथ ऐसे स्वर-प्रयोग मिलते हैं, जो इसे अन्य मल्हार रागों से अलग पहचान देते हैं। आलाप, बंदिश और तानों के माध्यम से कलाकार इस राग के विभिन्न भावों को विस्तार देते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति में नई कल्पनाशीलता और संगीतात्मक सौंदर्य उभरकर सामने आता है।
इस राग की विविध प्रस्तुतियाँ इसकी गहराई और अभिव्यक्ति को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। पंडित वेंकटेश कुमार की गायकी में रामदासी मल्हार का गंभीर और विस्तृत स्वरूप सुनाई देता है। पंडिता पद्मा तलवलकर अपनी सधी हुई शैली में इसकी कोमलता और भाव-संपन्नता को प्रस्तुत करती हैं, जबकि उस्ताद अमीर ख़ाँ की प्रस्तुति राग की विलंबित विस्तार शैली और सूक्ष्म स्वर-विन्यास का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।
यदि आप मल्हार राग-परिवार के कम परिचित लेकिन अत्यंत समृद्ध रागों का अनुभव करना चाहते हैं, तो राग रामदासी मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट शुरुआत हैं। इनमें वर्षा ऋतु का सौंदर्य, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गहराई और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर संगम सुनाई देता है।
विलुप्ति की कगार पर 'कैसर-ए-हिंद', क्या हम बचा पाएंगे हिमालय की इस उड़ती हुई विरासत को?
शाहजहाँपुर के प्रकृति प्रेमियों और पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि हमारे देश के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में एक ऐसी तितली पाई जाती है जिसे 'कैसर-ए-हिंद' (Kaiser-i-Hind) कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम तेइनोपालपस इम्पेरियालिस (Teinopalpus imperialis) है। 'कैसर-ए-हिंद' का शाब्दिक अर्थ है 'भारत का सम्राट'। यह नाम इसे इसकी दुर्लभता और इसके पंखों पर मौजूद राजसी गहरे हरे और चमकदार पीले रंगों के कारण दिया गया है। यह भारत की सबसे दुर्लभ और संरक्षित तितलियों में से एक है, जिसे इसकी शाही भव्यता के कारण यह गौरवशाली नाम मिला है।
यह तितली कहाँ पाई जाती है? कैसर-ए-हिंद मुख्य रूप से पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में दिखाई देती है। भारत में यह अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, असम, मणिपुर और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इसके अलावा यह नेपाल, भूटान, उत्तरी म्यांमार, वियतनाम और चीन के सिचुआन प्रांत में भी देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक उच्च-ऊंचाई वाली प्रजाति है जो आमतौर पर समुद्र तल से 6,000 से 10,000 फीट की ऊंचाई पर घने जंगलों वाले पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।
कैसी है इसकी शारीरिक संरचना? इस तितली की बनावट बेहद अनूठी होती है। नर कैसर-ए-हिंद के पिछले पंखों पर चमकीले पीले रंग का एक पैच होता है, जबकि मादा आकार में नर से बड़ी होती है और उसके पंखों पर धूसर (Grey) रंग के बड़े निशान होते हैं। इसके पंखों की हरी चमक वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रही है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसके स्केल की त्रि-आयामी (3D) फोटोनिक संरचना के कारण यह हरा रंग इतना आकर्षक दिखाई देता है।
इसकी जीवनशैली और प्रजनन चक्र क्या है? कैसर-ए-हिंद की उड़ान बहुत तेज और शक्तिशाली होती है। यह अक्सर पेड़ों की ऊपरी शाखाओं (Tree-top level) पर उड़ती है और केवल तेज सुबह की धूप होने पर ही नीचे की वनस्पतियों पर उतरती है। इसके विपरीत, मादाएं अक्सर बादल छाए रहने या बारिश के मौसम में भी उड़ती देखी गई हैं। इनका प्रजनन चक्र काफी विशिष्ट होता है। इसके लार्वा मुख्य रूप से 'मैगनोलिया कैंपबेली' (Magnolia campbellii) नामक पौधे पर पलते हैं। मादा तितली पत्तों के निचले हिस्से में बैंगनी-लाल रंग के गोल अंडे देती है।
क्या हैं इसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे? अपनी सुंदरता और दुर्लभता के कारण यह तितली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करों और संग्रहकर्ताओं (Collectors) के निशाने पर रहती है। हालांकि इसे भारतीय कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है, लेकिन अवैध शिकार अब भी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती खेती (झूम खेती), सड़कों का निर्माण और बस्तियों के बसने के कारण जंगलों की कटाई हो रही है। इस 'स्नो ड्रॉट' और वनों के विनाश के कारण इसके भोजन और प्रजनन के लिए जरूरी पौधे (मैग्नोलिया परिवार) कम होते जा रहे हैं।
संरक्षण क्यों है अनिवार्य? अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में इसे 'राज्य तितली' के रूप में अपनाया है, जो इसके संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह प्रजाति उच्च-ऊंचाई वाले वनों के स्वास्थ्य का संकेत देने वाली 'कीस्टोन प्रजाति' मानी जाती है। यदि हम कैसर-ए-हिंद को बचाते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से हम हिमालय के उस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचा रहे होते हैं, जिस पर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता निर्भर करती है।
आखिर क्यों सेमीकंडक्टर को 'नया तेल' कहा जा रहा है?
आज के डिजिटल युग में, एक मनुष्य के नाखून के बराबर क्षेत्र में समाए छोटे से सेमीकंडक्टर चिप के भीतर अरबों ट्रांजिस्टर मौजूद हो सकते हैं। यह तथ्य सुनने में किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन यही आधुनिक तकनीक की वास्तविकता है। सेमीकंडक्टर चिप्स आज हमारे स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर, वाहनों और यहाँ तक कि घरेलू उपकरणों के 'दिमाग' के रूप में कार्य करते हैं। इनके बिना हमारी डिजिटल दुनिया थम सकती है। यही कारण है कि आज भारत अपनी 'सेमीकंडक्टर मिशन' के ज़रिए इस वैश्विक रेस में मज़बूती से कदम रख रहा है।
सेमीकंडक्टर चिप्स क्या हैं और ये हमारे जीवन में क्यों महत्वपूर्ण हैं? सेमीकंडक्टर या अर्धचालक एक ऐसी सामग्री है जिसकी विद्युत चालकता (electrical conductivity) एक सुचालक (जैसे तांबा) और एक कुचालक (जैसे कांच) के बीच की होती है। विकिपीडिया के अनुसार, सिलिकॉन सबसे आम अर्धचालक सामग्री है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाने के लिए किया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि डोपिंग (अशुद्धियों को मिलाना) के ज़रिए इनकी चालकता को बदला और नियंत्रित किया जा सकता है।
ये छोटी सी चिप्स बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं। जब हम अपने फ़ोन पर कोई ऐप खोलते हैं या कंप्यूटर पर कोई फाइल सेव करते हैं, तो ये चिप्स ही उन निर्देशों को प्रोसेस करती हैं। आईबीईएफ (IBEF) के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर की अपरिहार्य भूमिका के कारण इन्हें अक्सर 'नया तेल' कहा जाता है।
इनकी शुरुआत कैसे हुई और यह तकनीक कैसे विकसित हुई? सेमीकंडक्टर तकनीक का इतिहास 19वीं शताब्दी से शुरू होता है, लेकिन असली क्रांति 20वीं सदी के मध्य में आई। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, 1947-48 में बेल लेबोरेटरीज में अमेरिकी भौतिक विज्ञानी जॉन बर्दीन, वाल्टर ब्रेटन और विलियम शॉकली ने पहले ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया था। यह आविष्कार वैक्यूम ट्यूबों का एक छोटा, कम बिजली खपत वाला और अधिक विश्वसनीय विकल्प साबित हुआ।
इसके बाद 1958 में जैक किल्बी ने पहला वर्किंग इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) प्रदर्शित किया और 1959 में रॉबर्ट नॉयस ने पहला 'मोनोलिथिक' आईसी चिप विकसित किया। इन आविष्कारों ने इलेक्ट्रॉनिक्स के लघुकरण (miniaturization) का रास्ता खोल दिया। मूर के नियम (Moore’s Law) के अनुसार, हर दो साल में एक चिप पर ट्रांजिस्टर की संख्या लगभग दोगुनी होती गई, जिससे चिप्स की गति लाखों गुना बढ़ गई और उनकी लागत कम होती गई।
चिप बनाने की वैश्विक रेस में कौन आगे है? दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का निर्माण वर्तमान में कुछ ही दिग्गजों के हाथों में है। टीएसएमसी (TSMC - Taiwan Semiconductor Manufacturing Company) वर्तमान में दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का लगभग 90% हिस्सा बनाती है। एनवीडिया (Nvidia), एप्पल (Apple), टेस्ला (Tesla) और एएमडी (AMD) जैसी बड़ी कंपनियाँ अपनी चिप्स के लिए टीएसएमसी की निर्माण तकनीक पर निर्भर हैं। टीएसएमसी के संस्थापक मॉरिस चांग, जिन्हें ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग का 'गॉडफादर' कहा जाता है, का मानना है कि उनकी कंपनी उन्नत प्रक्रिया तकनीक और कुशल निर्माण के कारण अगले कुछ वर्षों तक अपनी बढ़त बनाए रखेगी।
टीएसएमसी के अलावा, इंटेल (Intel) और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (Samsung) भी इस रेस के प्रमुख खिलाड़ी हैं। ये कंपनियाँ भारी अनुसंधान और विकास (R&D), अत्याधुनिक 'फैब्स' (Fabs) और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था (economies of scale) के कारण दूसरों से आगे हैं। उन्नत चिप्स के लिए 'अल्ट्रा-वायलेट लिथोग्राफी' और परमाणु-स्तर की इंजीनियरिंग की ज़रूरत होती है, जिसे वर्तमान में दुनिया की बहुत कम कंपनियाँ सफलतापूर्वक कर पाती हैं।
भारत इस क्षेत्र में कहाँ खड़ा है? वर्तमान में, भारत अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। इसका मुख्य कारण देश में 'सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन' सुविधाओं का अभाव रहा है। हालाँकि, अब यह स्थिति तेज़ी से बदल रही है। भारत सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' विज़न के तहत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने के लिए भारी निवेश और नीतिगत प्रोत्साहन दिए हैं।
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स इस दिशा में सबसे बड़ा नाम बनकर उभरा है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की पीएसएमसी (PSMC) के साथ साझेदारी की है और गुजरात के धोलेरा में भारत का पहला एआई-सक्षम 300mm (12 इंच) फैब (Fab) स्थापित कर रहा है। यहाँ प्रति माह 50,000 वेफर्स बनाने की योजना है, जो एनालॉग और लॉजिक आईसी चिप्स का निर्माण करेंगे। यह प्लांट ऑटोमोटिव, कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज और वायरलेस कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों की ज़रूरतों को पूरा करेगा।
इसके अतिरिक्त, माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) गुजरात के साणंद में लगभग 22,516 करोड़ रुपये के निवेश के साथ एक एटीएमपी (ATMP - Assembly, Testing, Marking, and Packaging) सुविधा स्थापित कर रही है। वहीं, टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (TSAT) असम के मोरीगांव में एक ओसैट (OSAT) सुविधा शुरू कर रहा है।
भारत को इस क्षेत्र में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बावजूद, भारत के सामने कई कठिन चुनौतियाँ हैं। सबसे पहली चुनौती भारी पूंजी निवेश की है। एक सिंगल फैब बनाने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। दूसरी चुनौती अत्याधुनिक तकनीक का हस्तांतरण है। उन्नत चिप निर्माण के लिए गहरी विशेषज्ञता और वैश्विक दिग्गजों के भरोसे की ज़रूरत होती है।
इसके अलावा, अत्यधिक शुद्ध पानी की विशाल मात्रा, निर्बाध बिजली आपूर्ति और एक बहुत ही कुशल कार्यबल (जैसे वीएलएसआई डिज़ाइनर और प्रोसेस इंजीनियर) की आवश्यकता होती है। आईबीईएफ की रिपोर्ट के अनुसार, आपूर्ति श्रृंखला और फैब्रिकेशन तकनीक में मौजूदा कमियों के कारण भारत को अभी भी हाई-एंड चिप्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
भविष्य की राह क्या है और सरकार क्या कदम उठा रही है? भारत इन कमियों को दूर करने के लिए 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (ISM) के ज़रिए सक्रिय कदम उठा रहा है। फरवरी 2026 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'ISM 2.0' की घोषणा की है। इस नए मिशन का उद्देश्य केवल चिप्स बनाना ही नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री और पूर्ण 'इंडियन आईपी' (Indian IP) विकसित करना भी है।
सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के परिव्यय को बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया है। इसके अलावा, उद्योग के नेतृत्व वाले अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ताकि एक कुशल वर्कफोर्स तैयार किया जा सके। धोलेरा और साणंद जैसे क्षेत्रों को अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ तैयार किया जा रहा है ताकि वे वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 तक भारत के पास अपनी खुद की ऑपरेशनल एटीएमपी और ओसैट सुविधाएँ होंगी, और फैब्रिकेशन प्लांट का काम भी काफी आगे बढ़ चुका होगा। यह न केवल रोज़गार के लाखों अवसर पैदा करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में एक विश्वसनीय खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।
शाहजहांपुर, आज पढ़ते हैं कि कला की कौन सी अवधारणाएं हस्तशिल्पों को अनूठा बनाती हैं
शाहजहांपुर, आज हम समझेंगे कि कला क्या है। फिर, हम पेंटिंग और मूर्तिकला जैसे कला रूपों का पता लगाएंगे। बाद में, हम देखेंगे कि कला किस प्रकार रचनात्मकता और अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करती है। हम यह भी समझेंगे कि, शिल्प क्या है, और इसमें हाथ से उपयोगी वस्तुएं कैसे बनाई जाती हैं। हम लकड़ी, धातु, कपड़ा, कांच और मिट्टी जैसे विभिन्न प्रकार के शिल्पों का भी पता लगाएंगे। जबकि लेख के अंत में, हम उद्देश्य और उपयोग में कला एवं शिल्पों में मौजूद अंतर को समझेंगे।
कला, एक दृश्य वस्तु या अनुभव है, जो कौशल या कल्पना की अभिव्यक्ति के माध्यम से सचेत रूप से बनाया जाता है। कला में पेंटिंग, मूर्तिकला, प्रिंटमेकिंग, चित्रांकन, सजावटी कला और फोटोग्राफी जैसी विविध मीडिया शामिल हैं।
लियोनार्डो दा विंची द्वारा बनाई गई मोना लिसा की पेंटिंग
विभिन्न दृश्य कलाएं, एक तरफ सौंदर्यवादी उद्देश्यों से लेकर, दूसरी तरफ उपयोगितावादी उद्देश्यों को समाए होती हैं। उद्देश्य की ऐसी ध्रुवता, आमतौर पर कला में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों, रूपांकनो, कलाकार या कारीगर में परिलक्षित होती है। कारीगर को ऐसे व्यक्ति के रूप में समझा जाता है, जो उपयोगितावादी तत्व पर अधिक ध्यान देता है। कला के एक रूप में भी, व्यापक रूप से भिन्न उद्देश्य हो सकते हैं। इस प्रकार एक कुम्हार या बुनकर, एक अत्यधिक कार्यात्मक वस्तु बना सकता है, जो सुंदर होती है, या केवल प्रशंसा से परे कोई उद्देश्य नहीं रखती है।
इसके अलावा, कला को कलाकार की आंतरिक स्थिति को प्रतिबिंबित करने के लिए भी आयोजित किया जाता है। इसे आंतरिक स्थिति की बाहरी अभिव्यक्ति माना जा सकता है। साथ ही, बाहरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करने वाली कला को मनुष्य के आंतरिक जीवन की अभिव्यक्ति की कला द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। "संगीत भावना व्यक्त करता है", का अर्थ यह हो सकता है कि, संगीतकार ने संगीत लिखते समय मानवीय भावना व्यक्त की है, या जब संगीत सुना जाता है तो वह मानवीय भावना को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार, कला का निर्माण, किसी माध्यम में तत्वों का एक नया संयोजन लाना है, जैसे कि - संगीत में स्वर, साहित्य में शब्द, कैनवास पर पेंट, आदि। जबकि, ‘सृजन’ पूर्व-मौजूदा सामग्रियों या तत्वों का पुन: निर्माण है।
शिल्प, कला का एक विशेष रूप है। शिल्प व्यापार एक ऐसा व्यवसाय है, जिसके लिए विशेष कौशल और ज्ञान की आवश्यकता होती है। ऐतिहासिक अर्थ में, यह शब्द आम तौर पर वस्तुओं के छोटे पैमाने पर उत्पादन, या उनके उत्पादन और रखरखाव में लगे लोगों पर लागू होता है।
कोई शिल्प, अक्सर कार्यात्मक होता है, जो दैनिक जीवन में सौंदर्य अपील और व्यावहारिक उपयोगिता के मिश्रण के रूप में कार्य करता है। कार्यात्मक शिल्प, चीनी मिट्टी की चीज़ें, कपड़ा और लकड़ी के उत्पादों जैसी हस्तनिर्मित वस्तुएं होती हैं। ये शिल्प, केवल सजावट के बजाय विशेष उपयोग के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। इस प्रकार, ये शिल्प हमारे द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं के साथ एक स्पर्शपूर्ण और व्यक्तिगत संबंध प्रदान करते हुए हमारी दिनचर्या को सुशोभित करती हैं। दैनिक जीवन में कार्यात्मक शिल्प के सामान्य उदाहरण निम्नलिखित हैं -
1. बर्तन और चीनी मिट्टी की चीज़ें: मग, कटोरे, परोसने की थाली और प्लेट सहित हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तन, शायद सबसे आम कार्यात्मक शिल्प हैं।
2. कपड़ा कला: हस्तनिर्मित रजाई, बुने हुए स्वेटर, बुने हुए गलीचे और कढ़ाई वाले कपड़े, सजावटी कलात्मकता का प्रदर्शन करते हुए गर्मी, आराम और उपयोगिता प्रदान करते हैं।
3. फर्नीचर और लकड़ी का काम: नक्काशीदार फर्नीचर, स्टूल, अलमारियां और रसोई के उपकरण (जैसे चम्मच और कटिंग बोर्ड) दैनिक व्यावहारिक जरूरतों के साथ कुशल तकनीकों को जोड़ते हैं।
4. घरेलू सामान: भंडारण के लिए हाथ से बुनी हुई टोकरियां, टेबल सामान, कोस्टर (Coaster), और कस्टम चित्र फ़्रेम, वैयक्तिकृत शैली जोड़ते हुए, स्थानों को व्यवस्थित करने में मदद करते हैं।
5. पहनने योग्य कलाएं: आभूषण, चमड़े के हैंडबैग और हस्तनिर्मित बेल्ट फैशन शिल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हमारे पहनावे और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के लिए व्यावहारिक हैं।
इसके अलावा, विभिन्न प्रकार के शिल्प निम्नलिखित हैं -
1. लकड़ी शिल्प
लकड़ी के शिल्प में, कार्यात्मक और सजावटी वस्तुओं को बनाने के लिए लकड़ी को आकार देना, नक्काशी करना और संयोजन शामिल है। यह मानव द्वारा प्रचलित शिल्प के सबसे पुराने रूपों में से एक है। कारीगर, उद्देश्य और डिज़ाइन के आधार पर विभिन्न प्रकार की लकड़ी का उपयोग करते हैं। सामान्य लकड़ी उत्पादों में फर्नीचर, खिलौने, मूर्तियां और सजावटी पैनल शामिल हैं। लकड़ी की वस्तुओं की सुंदरता और स्थायित्व को बढ़ाने के लिए नक्काशी, मोड़, पॉलिशिंग और जुड़ाव जैसी तकनीकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
2. धातु शिल्प
धातु शिल्प से तात्पर्य लोहे, तांबे, पीतल और चांदी जैसे धातुओं का उपयोग करके वस्तुओं को आकार देने और डिजाइन करने की कला से है। इसमें कौशल और सटीकता की आवश्यकता होती है, क्योंकि धातुओं को अक्सर गर्म किया जाता है, और वांछित रूपों में ढाला जाता है। इस शिल्प का उपयोग आमतौर पर गहने, बर्तन, उपकरण और कलात्मक मूर्तियां बनाने के लिए किया जाता है। सरल और जटिल डिज़ाइन बनाने के लिए इसमें फोर्जिंग, कास्टिंग, उत्कीर्णन और वेल्डिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
3. कपड़ा शिल्प
कपड़ा शिल्प कपास, ऊन और रेशम जैसे रेशों का उपयोग करके कपड़े बनाने और सजाने पर केंद्रित है। इसमें बुनाई, कढ़ाई, और रंगाई जैसी गतिविधियों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। कपड़ा शिल्प कपड़े, घरेलू साज-सज्जा और सजावटी सामान बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हाथ से बुनाई, ब्लॉक प्रिंटिंग और सिलाई जैसी तकनीकें कपड़े में सांस्कृतिक और कलात्मक मूल्य जोड़ती हैं।
4. कांच शिल्प
कांच शिल्प में कांच को उच्च तापमान पर गर्म करना शामिल है, जब तक कि यह नरम और ढालने योग्य न हो जाए। इससे कारीगरों को इसे विभिन्न वस्तुओं का आकार देने की अनुमति मिलती है। इस शिल्प का उपयोग फूलदान, बोतलें, आभूषण और रंगीन कांच की कलाकृतियां बनाने के लिए किया जाता है। आमतौर पर इसमें ढलाई और काटने जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। कांच शिल्प में अक्सर रंगीन और नाजुक टुकड़े बनाए जाते हैं, जो कार्यात्मक और सजावटी होते हैं।
5. मिट्टी शिल्प
मिट्टी शिल्प, जिसे मिट्टी के बर्तन के रूप में भी जाना जाता है, प्राकृतिक मिट्टी को विभिन्न आकारों में ढालने, सुखाने और भट्टी में जलाकर सख्त करने से संबंधित है। इसका उपयोग बर्तन, कटोरे, टाइलें और सजावटी सामान बनाने के लिए किया जाता है। यह शिल्प हाथ से या कुम्हार के चक्र की सहायता से किया जा सकता है। मोल्डिंग, आकार देने, ग्लेज़िंग और फायरिंग जैसी तकनीकें अंतिम उत्पाद को मजबूती और एक चिकना रूप देती हैं, जिससे यह उपयोगी और कलात्मक बन जाता है।
शिल्प और कला दोनों रचनात्मकता के रूप हैं; हालांकि, उनमें कई अंतर हैं। कला मुख्य रूप से कार्य का एक व्यक्तिगत रूप है, जो कलाकार के विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है। कई कलाकार, बिना किसी भुगतान के कला का उत्पादन करते हैं, और कलाकृति बेचने की उम्मीद भी नहीं रखते हैं। यहां तक कि जब कोई पेंटिंग या मूर्तिकला बनाई जाती है, तब भी कलाकार उच्च स्तर का रचनात्मक नियंत्रण और स्वतंत्रता बरकरार रखता है।
इसके विपरीत, शिल्प, कार्य का ऐसा रूप है, जिसके लिए शिल्पकार को भुगतान प्राप्त होता है। इसका परिणाम, हमेशा एक ठोस रूप या वस्तु होता है। ऐतिहासिक रूप से, शिल्प को चित्रकला या मूर्तिकला जैसी कलाओं की तुलना में रचनात्मकता का निचला रूप माना जाता था। शिल्पकार, परंपरागत रूप से ऐसी वस्तुएं बनाते थे, जिनका घरेलू कार्य होता था। इसी कारण, शिल्पकारों को श्रमिक वर्ग माना जाता था, जबकि कलाकार अक्सर उच्च समाज के दायरे में गिने जाते थे।
एआई के दौर में खतरे में आपकी निजता, क्या हमेशा के लिए इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है आपका डेटा?
शाहजहांपुर हो या दुनिया का कोई अन्य कोना, आज हर किसी के हाथ में मौजूद स्मार्टफोन पर तेज़ी से संदेश पहुंचाने वाले प्लेटफॉर्म की कहानी एक छोटे से हॉस्टल के कमरे से शुरू हुई थी। साल 2004 में 19 साल के मार्क ज़करबर्ग ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अपने हॉस्टल के कमरे से 'द फेसबुक' (The Facebook) नाम के एक नेटवर्क की शुरुआत की थी। जो चीज एक कॉलेज नेटवर्किंग साइट के रूप में शुरू हुई थी, वह तेजी से दुनिया भर में फैल गई और 2004 के अंत तक इसके दस लाख सक्रिय उपयोगकर्ता हो गए थे। साल 2005 में इस कंपनी को “पेपाल” (PayPal) के सह-संस्थापक पीटर थील से अपना पहला बड़ा निवेश मिला और इसका नाम 'द फेसबुक' से बदलकर 'फेसबुक' कर दिया गया। साल 2008 तक इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या दस करोड़ को पार कर गई। इसके बाद कंपनी ने 2012 में इंस्टाग्राम को एक अरब डॉलर में और 2014 में वॉट्सऐप को खरीदकर अपना साम्राज्य और बड़ा कर लिया।
अक्टूबर 2021 में कंपनी ने अपना नाम फेसबुक से बदलकर 'मेटा' रख लिया, जो सोशल मीडिया से आगे बढ़कर 'मेटावर्स' यानी एक आभासी दुनिया के निर्माण के उनके नजरिए को दर्शाता था। शुरुआती झटकों के बाद, 2026 की शुरुआत तक मेटा 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के बाजार पूंजीकरण के साथ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बन चुकी है। 2024 की पहली तिमाही तक 3.24 अरब लोग हर दिन फेसबुक, वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम या मैसेंजर में से कम से कम एक ऐप का इस्तेमाल कर रहे थे, जिसका मतलब है कि दुनिया के 70 प्रतिशत से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हर दिन मेटा से जुड़े हुए हैं। भारत में वॉट्सऐप के 50 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। जो कंपनी कभी सिर्फ लोगों को जोड़ने का काम करती थी, वह अब ओपन-वेट्स एआई इकोसिस्टम की निर्माता बन चुकी है।
क्या आपका हर क्लिक और लोकेशन, कंपनी के सर्वर में खामोशी से दर्ज़ हो रहा है? जब आप अपना अकाउंट बनाते हैं तो मेटा को आपका नाम, जन्मतिथि, ईमेल पता और वॉट्सऐप इस्तेमाल करने पर फोन नंबर मिल जाता है। लेकिन यह विशाल कंपनी सिर्फ आपके द्वारा दी गई जानकारी तक सीमित नहीं है। मेटा आपके द्वारा अपलोड की गई तस्वीरों के मेटाडेटा से आपकी लोकेशन तक का पता लगा लेती है। इसके अलावा, यह कंपनी तकनीकी डेटा भी इकट्ठा करती है, जैसे कि आपके फोन का ब्रांड, ऑपरेटिंग सिस्टम, इंस्टॉल किए गए ऐप, वाई-फाई, ब्लूटूथ, सेल टावर सिग्नल और आईपी एड्रेस। इन सबके जरिए फेसबुक यह भी जान लेता है कि आप किसके साथ रहते हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि अगर आपका फेसबुक पर अकाउंट नहीं भी है, तब भी कंपनी आपको ट्रैक कर सकती है। इंटरनेट ब्राउज़ करते समय जिन वेबसाइटों पर 'फेसबुक पिक्सल' या सोशल एपीआई लगा होता है, वे आपके उस साइट पर जाने का डेटा सीधे फेसबुक को भेज देती हैं। इसके अलावा, जब लोग अपने फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट फेसबुक पर अपलोड करते हैं, तो आपका नंबर भी बिना आपकी मर्जी के उनके पास पहुंच जाता है। यूरोपीय संघ में 'जीडीपीआर' जैसे सख्त कानून हैं जो राजनीतिक झुकाव और स्वास्थ्य जैसी निजी जानकारी की सुरक्षा करते हैं। लेकिन अमेरिका और कई अन्य देशों में जहां निजता के कड़े कानून नहीं हैं, वहां कंपनी इस विस्तृत डेटा का इस्तेमाल यूजर्स को प्रभावित करने और उन्हें बहुत ही सटीक विज्ञापन दिखाने के लिए करती है।
क्या आपकी सार्वजनिक तस्वीरें और पोस्ट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ईंधन बन रही हैं? मेटा की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रणनीति में 'लामा' (एलएलएएमए) मॉडल एक मुख्य हिस्सा बन चुका है। पहले यह दावा किया जाता था कि लामा मॉडल को फेसबुक के हर प्रकार के डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है, लेकिन मेटा ने इससे इनकार किया है। मेटा के पुराने मॉडल लामा 2 को पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटासेट, जैसे कॉमन क्रॉल और विकिपीडिया पर प्रशिक्षित किया गया था, और उसमें कंपनी के प्लेटफॉर्म का कोई उपयोगकर्ता डेटा नहीं था। लेकिन लामा 3 और लामा 4 के साथ मेटा ने अपनी रणनीति बदल दी। मेटा ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि लामा 3 को प्रशिक्षित करने के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम की सार्वजनिक रूप से साझा की गई पोस्ट का इस्तेमाल किया गया है।
कंपनी के अनुसार, इस प्रशिक्षण में केवल सार्वजनिक पोस्ट, टिप्पणियां और सार्वजनिक रूप से देखे जा सकने वाले चित्र शामिल हैं, जो इंटरनेट पर किसी के भी देखने के लिए उपलब्ध हैं। मेटा ने स्पष्ट किया है कि डायरेक्ट मैसेज (निजी संदेश) या निजी प्रोफाइल जानकारी जैसे डेटा का इस्तेमाल इसमें नहीं किया जाता है। मार्क ज़करबर्ग ने खुद एक अर्निंग्स कॉल में बताया कि मेटा के पास मौजूद सार्वजनिक फेसबुक और इंस्टाग्राम डेटा की मात्रा इंटरनेट के सबसे बड़े डेटाबेस 'कॉमन क्रॉल' से भी ज्यादा है। यह विशाल डेटा मेटा को क्षेत्रीय भाषा, आम बोलचाल के लहजे और सांस्कृतिक बातचीत को समझने में एक बड़ी बढ़त देता है। लामा 4 के प्रशिक्षण में अरबों तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है, जो एआई को टेक्स्ट और दृश्य दोनों को समझने में सक्षम बनाता है।
क्या सोशल मीडिया कंपनी अब पूरी तरह से एआई कंपनी में तब्दील हो चुकी है? साल 2026 तक मेटा प्लेटफॉर्म्स ने सोशल नेटवर्किंग कंपनी से खुद को एक बुनियादी 'एआई-फर्स्ट' उपयोगिता के रूप में पूरी तरह से बदल लिया है। कंपनी का 'रियलिटी लैब्स' विभाग भले ही 2025 में 19.2 अरब डॉलर के घाटे में रहा हो, लेकिन कंपनी का मानना है कि यह भविष्य के कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म का प्रवेश द्वार है। मेटा का 'लामा 4' मॉडल जिसे 'बेहेमोथ' कहा जाता है, इस समय एआई की दुनिया में एक मानक बन चुका है और लाखों डेवलपर्स इसका उपयोग कर रहे हैं। 'लामा 5' पर अभी काम चल रहा है जो वीडियो को भी मूल रूप से समझ सकेगा।
मेटा अब सिर्फ फोन की स्क्रीन तक सीमित नहीं है। हार्डवेयर के मोर्चे पर कंपनी के 'रे-बैन मेटा स्मार्ट ग्लासेस' ने बाजार में तहलका मचा दिया है और अकेले 2025 में इसके 70 लाख यूनिट बिके हैं। ये चश्मे 'मेटा एआई' नाम के वॉयस-एक्टिवेटेड असिस्टेंट का मुख्य जरिया बन गए हैं। साल 2026 के इस दौर को 'एजेंटिक एआई' का दौर कहा जा रहा है, जहां एआई सिर्फ सवालों के जवाब नहीं देता, बल्कि आपके लिए काम भी करता है, जैसे यात्रा की बुकिंग करना या विज्ञापन अभियान चलाना। अपनी तकनीक को ओपन-सोर्स (मुफ्त में उपलब्ध) करके मेटा चाहती है कि उसका एआई मॉडल ही दुनिया भर में भविष्य का मुख्य ढांचा बन जाए।
क्या एआई के इस दौर में आपके डेटा की निजता हमेशा के लिए खतरे में है? मेटा द्वारा एआई प्रशिक्षण के लिए डेटा के उपयोग को लेकर गंभीर चिंताएं भी पैदा हो रही हैं। मेटा ने 27 मई 2025 से फेसबुक और इंस्टाग्राम के सार्वजनिक पोस्ट, तस्वीरें, वीडियो और कैप्शन को अपनी एआई के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वॉट्सऐप के निजी चैट 'एंड-टू-एंड' एन्क्रिप्टेड होते हैं, इसलिए कंपनी उनका इस्तेमाल नहीं कर सकती, लेकिन अगर आप वॉट्सऐप के अंदर 'मेटा एआई' बोट से बात करते हैं, तो उस बातचीत को सार्वजनिक मानकर एआई को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस डेटा उपयोग के बड़े खतरे हैं। एक बार जब आपका डेटा एआई को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल हो जाता है, तो उसे वहां से वापस निकालना या मिटाना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, मेटा इस डेटा के जरिए उपयोगकर्ताओं की पसंद और व्यवहार का गहराई से विश्लेषण करके और अधिक लक्षित विज्ञापन दिखा सकती है। हालांकि आप फेसबुक और इंस्टाग्राम की प्राइवेसी सेटिंग्स में जाकर 'राइट ऑफ ऑब्जेक्शन' (आपत्ति का अधिकार) फॉर्म भरकर अपने डेटा को एआई ट्रेनिंग में जाने से रोक सकते हैं, लेकिन यह सिर्फ आगे के डेटा के लिए लागू होगा। अगर आप समय सीमा के बाद आपत्ति जताते हैं, तो पहले से प्रशिक्षित डेटा को कभी पलटा नहीं जा सकेगा। यह स्पष्ट है कि आज के डिजिटल युग में अपनी निजता की रक्षा करना खुद उपयोगकर्ता की जिम्मेदारी बन गया है।
उरुग्वे की विश्व कप कहानी और फुटबॉल इतिहास के यादगार पल
उरुग्वे फुटबॉल इतिहास की सबसे सफल राष्ट्रीय टीमों में से एक रही है। वर्ष 1930 में जब पहला फीफा विश्व कप आयोजित हुआ, तब उरुग्वे ने मेज़बान देश के रूप में अर्जेंटीना को 4-2 से हराकर इतिहास का पहला विश्व कप अपने नाम किया। उस समय उरुग्वे को दुनिया की सबसे मजबूत फुटबॉल टीमों में गिना जाता था।
इसके बाद 1950 विश्व कप में उरुग्वे ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। ब्राज़ील में खेले गए टूर्नामेंट के निर्णायक मुकाबले में उसने मेज़बान और प्रबल दावेदार ब्राज़ील को 2-1 से हरा दिया। लगभग दो लाख दर्शकों के सामने मिली इस जीत को "माराकानाज़ो" के नाम से जाना जाता है और यह आज भी खेल इतिहास के सबसे बड़े उलटफेरों में गिनी जाती है।
उरुग्वे का नाम 2010 विश्व कप में भी एक विवादास्पद लेकिन यादगार घटना के कारण चर्चा में रहा। क्वार्टर फाइनल में घाना के खिलाफ मैच के अंतिम क्षणों में लुइज़ सुआरेज़ (Luis Suárez) ने गोल लाइन पर खड़े होकर अपने हाथों से निश्चित गोल को रोक दिया। इसके लिए उन्हें लाल कार्ड मिला, लेकिन घाना पेनल्टी का फायदा नहीं उठा सका। बाद में उरुग्वे ने पेनल्टी शूटआउट जीतकर सेमीफाइनल में जगह बनाई। यह घटना आज भी विश्व कप इतिहास के सबसे चर्चित पलों में से एक मानी जाती है।
जानिए, भारत में उत्पन्न हुए कबड्डी खेल को ग्रामीण खेल से वैश्विक पहचान कैसे मिली?
शाहजहांपुर, चलिए आज कबड्डी के इतिहास को समझते हैं, और देखते हैं कि, यह एक प्राचीन भारतीय खेल के रूप में कैसे उत्पन्न हुआ। फिर हम यह पता लगाएंगे कि, कबड्डी को एक ग्रामीण खेल से वैश्विक पहचान कैसे मिली? आगे, हम कबड्डी के नियम और खेल पर नजर डालेंगे। फिर हम अंतरराष्ट्रीय कबड्डी में भारत के प्रभुत्व की जांच करेंगे। अंत में, हम देखेंगे कि, स्थानीय प्रतियोगिता और प्रशिक्षण के माध्यम से, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में इस खेल को कैसे बढ़ावा दिया जा रहा है।
कबड्डी की शुरुआत, दरअसल इसके दर्ज इतिहास से पहले की है, जब शुरुआती मानवों को सुरक्षा के लिए एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता थी। यह अवधारणा 4,000 वर्ष से अधिक पुराने खेल कबड्डी में विकसित हुई, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी एथलेटिक गतिविधियों में से एक के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड दुर्लभ होने के बावजूद भी, कबड्डी खेल का विकास स्पष्ट है, जो एक साधारण खोज से एक रणनीतिक प्रयास में परिवर्तन को चिह्नित करता है।
किंवदंती है कि, कबड्डी की शुरुआत बच्चों के किसी का पीछा करने और उसे हाथ लगाने के मधुर व्यवहार से हुई। एक प्रचलित धारणा, इस खेल का उगम दक्षिण भारत में तमिलनाडु के अयार आदिवासी लोगों से बताती है। कबड्डी खेल, दक्षिण एशिया के इतिहास और संस्कृति के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। इस खेल की जड़ें मुल्लाई नामक स्थान से है, और यह जल्लीकट्टू खेल के समान है। प्राचीन काल में सदुगुडु नाम से जाना जाने वाला एक खेल, कबड्डी से मिलता जुलता था।
भारत ने इस खेल को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1920 के दशक में संगठित कबड्डी प्रतियोगिताओं का उदय हुआ, जिसकी परिणति 1938 में भारतीय ओलंपिक खेलों में कबड्डी को शामिल करने के रूप में हुई। 1950 में अखिल भारतीय कबड्डी महासंघ की स्थापना ने, इस खेल को औपचारिक रूप दिया। इस प्रकार, कबड्डी गांव के मनोरंजन से, एक वैध अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बदल गई।
1990 तक, कबड्डी को एशियाई खेलों में शामिल किया गया, जो इसकी बढ़ती वैश्विक अपील का संकेत था। बीसवीं सदी में कबड्डी की लोकप्रियता भारत की सीमाओं से परे बढ़ गई, और 1972 में बांग्लादेश ने भी इसे अपने राष्ट्रीय खेल के रूप में मान्यता दी।
कबड्डी की वैश्विक पहुंच का विस्तार आज भी जारी है। इस खेल को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय खेल समारोहों में प्रदर्शित किया गया है, और ‘कबड्डी विश्व कप’ एक महत्वपूर्ण आयोजन बन गया है। हालांकि, ओलंपिक खेलों में कबड्डी को शामिल करने के प्रयास चल रहे हैं। कबड्डी की वैश्विक मान्यता ने न केवल इसकी लोकप्रियता को बढ़ाया है, बल्कि खिलाड़ियों के लिए नए अवसर भी खोले हैं।
दरअसल, कबड्डी के नियमों के अनुसार, एक मैच की शुरुआत एक संघ द्वारा दूसरे संघ के मैदान में रेड (Raid) डालने से होती है। रेड डालने वाला खिलाड़ी - रेडर, कबड्डी शब्द का उच्चारण करते हुए, दूसरे संघ के मैदान में प्रवेश करता है। रेडर का उद्देश्य, जितना संभव हो उतने विपक्षी खिलाड़ियों, अर्थात एंटी (Anti) या डिफेंडर (Defender) को टैग करना या छूना होता है। इस दौरान, एक सांस के साथ ही उसे अपनी स्थिति जारी रखते हुए, मध्य रेखा को पार करके अपने मैदान में लौटना होता है।
इस बीच, एंटी या डिफेंडर, रेडर से निपटकर या उसे कोर्ट से बाहर धकेलकर, उसे अपने मैदान हिस्से में लौटने से रोकने की कोशिश करते हैं। संघ बारी-बारी से एक-दूसरे पर रेड डालते हैं, और समय समाप्त होने पर अधिक अंक प्राप्त करने वाला संघ मैच जीत जाता है। 2014 में ‘प्रो कबड्डी’ के आगमन के बाद, खेल को अधिक आकर्षक बनाने के लिए इसके नियमों में कुछ बदलाव किए गए। उदाहरण के लिए, प्रो कबड्डी में प्रत्येक रेड पर 30 सेकंड की समय सीमा होती है। लगातार तीन खाली रेड के परिणामस्वरूप, रेडर आउट हो जाता है, और विपक्षी संघ एक अंक अर्जित करता है।
हमारे लिए गर्व की बात है कि, 1972 में स्थापित, ‘एमेच्योर कबड्डी फेडरेशन ऑफ इंडिया (Amateur Kabaddi Federation of India)’ द्वारा शासित, भारतीय पुरुष कबड्डी संघ, इतिहास में सबसे सफल राष्ट्रीय कबड्डी संघ है। इसने एशियाई खेलों के नौ संस्करणों में से आठ संस्करणों में स्वर्ण पदक हासिल किए हैं। भारत ने 2004, 2007 और 2016 में तीनों कबड्डी विश्व कप भी जीते हैं। भारत का यह प्रभुत्व, इस खेल की गहरी सांस्कृतिक जड़ों, कबड्डी फेडरेशन ऑफ इंडिया के माध्यम से संरचित कोचिंग और 2014 के बाद से प्रो कबड्डी लीग द्वारा समर्थित प्रतिभाओं पर बना है। राकेश कुमार, अनुप कुमार और अजय ठाकुर जैसे खिलाड़ियों ने संघ की विरासत को आकार दिया है। जबकि, पवन सहरावत और प्रदीप नरवाल जैसे मौजूदा खिलाड़ी भारत की सर्वोच्चता बनाए हुए हैं।
प्रो कबड्डी लीग
अब तो, प्रो कबड्डी लीग की नोएडा स्थित शाखा – यू पी योद्धाज़ ने, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश कबड्डी लीग के साथ, एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है। इस प्रकार, राज्य में प्राथमिक स्तर की कबड्डी प्रतिभाओं को उजागर करने के लिए, एक राज्यव्यापी लीग के रूप में संघ ने पहली बार प्रवेश किया।
उत्तर प्रदेश की शाखा होने के नाते, हमारा यह कर्तव्य है कि, हम क्षेत्र के प्रतिभाशाली युवाओं का समर्थन करें, उनके खेल को विकसित करने और उसे एक पेशा बनाने के लिए सही मंच खोजें। पिछले कुछ वर्षों में, हमारे राज्य से नितेश कुमार, सुमित और सुरेंद्र गिल जैसे कुछ प्रतिभाशाली युवा सामने आए हैं। और हम जानते ही हैं कि, भारत के सबसे बड़े और सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के रूप में, उत्तर प्रदेश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।
प्राचीन युनान से विश्व भर तक, एरिस्टोटल ने ज्ञान की अवधारणा को किस प्रकार किया प्रभावित?
आज, हम जानेंगे कि एरिस्टोटल (Aristotle) कौन थे, और ज्ञान के अध्ययन में उनका क्या योगदान था। फिर, हम यह पता लगाएंगे कि उन्होंने ज्ञान को तर्क, विज्ञान और नैतिकता जैसे क्षेत्रों में कैसे वर्गीकृत किया। आगे, हम देखेंगे कि उन्होंने ज्ञान की नींव के रूप में अवलोकन तर्क और अनुभव पर कैसे जोर दिया। हम यह भी पढ़ेंगे कि उनके विचारों ने विभिन्न संस्कृतियों में शिक्षा की परंपराओं को कैसे प्रभावित किया। जबकि लेख के अंत में, हम समझेंगे कि ज्ञान के प्रति एरिस्टोटल का दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक क्यों है।
विश्व विख्यात यूनानी दार्शनिक एरिस्टोटल, कुछ वर्षों के लिए एथेंस (Athens) शहर में थे। उन्होंने इस शहर की सीमा के ठीक बाहर, एक व्यायामशाला में अपना स्कूल स्थापित किया था, जिसे लिसेयुम (Lyceum) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने वहां एक पुस्तकालय भी बनाया, और प्रतिभाशाली अनुसंधान उन्मुखी छात्रों के एक समूह को शिक्षित किया। लिसेयुम, किसी अकादमी की तरह एक निजी क्लब मात्र नहीं था, बल्कि, वहां कई व्याख्यान आम जनता के लिए खुले थे और निःशुल्क होते थे।
प्राणीशास्त्रीय ग्रंथों को छोड़कर, एरिस्टोटल के अधिकांश कार्य संभवतः उनके एथेंस के प्रवास से संबंधित हैं। परंतु, उनके कार्यों के कालानुक्रमिक क्रम के बारे में कोई निश्चितता नहीं है। यह संभव है कि, भौतिकी, तत्वमीमांसा, मनोविज्ञान, नैतिकता और राजनीति पर मुख्य ग्रंथ फिर से लिखे और अद्यतन किए गए थे। एरिस्टोटल का प्रत्येक प्रस्ताव, विचारों और ऊर्जा से भरपूर है, लेकिन, उनका गद्य स्पष्ट और सुरुचिपूर्ण नहीं है। हालांकि, वे व्यवस्थित हैं। एरिस्टोटल ने लिसेयुम में काम करते दौरान, बौद्धिक अनुशासन की धारणा का आविष्कार भी किया था।
दरअसल, एरिस्टोटल ने विज्ञान को तीन प्रकारों में विभाजित किया: उत्पादक, व्यावहारिक और सैद्धांतिक। जिस विज्ञान में कोई उत्पाद हैं, वह उत्पादक विज्ञान है। उनमें अभियांत्रिकी और वास्तुकला के साथ, रणनीति और बयानबाजी जैसे अनुशासन शामिल हैं। क्योंकि यहां उत्पाद महत्वपूर्ण हैं, जैसे कि - युद्ध के मैदान पर या अदालतों में जीत। व्यावहारिक विज्ञान या विशेष रूप से नैतिकता और राजनीति, व्यवहार का मार्गदर्शन करते हैं। जबकि सैद्धांतिक विज्ञान, यानी भौतिकी, गणित और धर्मशास्त्र में हमारे लिए जानकारी और समझ दी गई है।
इसके अलावा, एरिस्टोटल ने "अनिश्चित विज्ञान" और "ठोस विज्ञान" के बीच अंतर किया है। यह अंतर अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों की परिवर्तनशीलता और स्थिरता पर प्रकाश डालता है।
1. अनिश्चित विज्ञान
अनिश्चित विज्ञान, मानव व्यवहार और सामाजिक कारकों से प्रभावित होता है। चूंकि मानव व्यवहार अक्सर परिवर्तनशील और अप्रत्याशित होता है, इस विज्ञान में प्राकृतिक विज्ञान में पाई जाने वाली सटीकता का अभाव है। इसके उदाहरणों में नैतिकता, राजनीति और अर्थशास्त्र हैं। हालांकि ये क्षेत्र मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, उनके निष्कर्ष अधिक निश्चित नहीं होते हैं, और व्याख्या के लिए अधिक खुले होते हैं।
2. ठोस विज्ञान
ठोस विज्ञान, भौतिक दुनिया और उसके प्राकृतिक नियमों से संबंधित हैं। ये विज्ञान, जैसे कि - भौतिकी और जीव विज्ञान, अधिक स्थिर और पूर्वानुमानित हैं, क्योंकि वे अवलोकनीय घटनाओं पर आधारित हैं। ये घटनाएं सुसंगत पैटर्न का पालन करती हैं। उदाहरण के लिए, गुरुत्वाकर्षण के नियम मानवीय क्रिया या विश्वास की परवाह किए बिना, सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं।
विज्ञान में अनुभवजन्य अवलोकन महत्वपूर्ण होता है। परंतु एरिस्टोटल ने, वैज्ञानिक जांच में तार्किक तर्क के महत्व पर भी जोर दिया। उनका मानना था कि, प्राकृतिक दुनिया के अंतर्निहित सिद्धांतों को उजागर करने हेतु, हमारी टिप्पणियों को तार्किक रूप से व्यवस्थित और विश्लेषित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस प्रक्रिया में सहायता के लिए, तर्क की एक प्रणाली विकसित की, जिसे सिलोगिस्टिक तर्क (Syllogistic logic) के रूप में जाना जाता है। सिलोगिज्म एक ‘तार्किक तर्क’ है, जो दो या दो से अधिक स्थितियों के आधार पर निष्कर्ष निकालने हेतु, निगमनात्मक तर्क का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए:
स्थिति 1: सभी मनुष्य नश्वर हैं।
स्थिति 2: सुकरात एक मनुष्य हैं।
निष्कर्ष: इसलिए, सुकरात नश्वर है।
तर्क की इस प्रणाली ने वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया को औपचारिक बनाने में मदद की, और यह सुनिश्चित किया कि, निष्कर्ष ठोस तर्क पर आधारित हों। अच्छे तर्क पर ज़ोर देना, एरिस्टोटल की अन्य जांचों के लिए पृष्ठभूमि के रूप में कार्य करता है। अपने प्राकृतिक दर्शन में वे सामान्य और कारणात्मक दावे करने के लिए, तर्क को अवलोकन के साथ जोड़ते हैं।
एरिस्टोटल के विचारों को सबसे पहले, सीरिया (Syria) के एडेसा (Edessa) और एंटिओक (Antioch) जैसे अध्ययन केंद्रों में संरक्षण प्राप्त हुआ। वहां विद्वानों ने, ईसाई धर्मशास्त्रीय बहसों के लिए एक संरचनात्मक ढांचा प्रदान करने के लिए उनके तार्किक कार्य पर ध्यान केंद्रित किया। कुछ लोगों ने ग्रीक ग्रंथों का सिरिएक भाषा में अनुवाद भी किया। इससे एरिस्टोटल की पद्धति बीजान्टिन युग (Byzantine era) से इस्लामी स्वर्ण युग तक प्रसारित हुई।
लिसेयुम
बाद में, जब अब्बासिद खलीफा ने बगदाद में संस्थान स्थापित किए, तब एरिस्टोटल के विचार अरबी बौद्धिक संस्कृति की आधारशिला बन गए। उसी समय, इब्न सिना ने उनके विचारों को एक सुसंगत व विशाल दार्शनिक प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने इसमें भेद भी पेश किए, जो भविष्य की विश्वविद्यालय शिक्षा में मानक बन गए। दूसरी ओर, इब्न रुश्द ने दर्शन और इस्लाम के बीच की दूरी को पाटने हेतु, एरिस्टोटल के तर्कों का इस्तेमाल किया। उनकी रचनाएं अतः, सभी धर्मनिरपेक्ष ज्ञान के लिए एक पद्धति बन गई।
साथ ही, कुछ यहूदी विद्वानों ने, अरबी संस्कृति के भीतर विकसित होते हुए, अपने स्वयं के धार्मिक दर्शन को परिष्कृत करने के लिए एरिस्टोटल के विचारों का उपयोग किया। इस प्रकार, उनसे संबंधित हिब्रू साहित्य भी उभरा, जिससे एक सघन एवं स्तरित शैक्षिक परंपरा का निर्माण हुआ।
अंततः, एरिस्टोटल इन अरबी और यहूदी ग्रंथों के अनुवाद के माध्यम से पश्चिमी यूरोप में प्रसिद्ध हुए। तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक, उनके दार्शनिक ग्रंथों को पेरिस विश्वविद्यालय (Paris University) के कला संकाय में पढ़ना अनिवार्य हो गया था। उन्हें ईसाई सिद्धांत में इतनी गहराई से एकीकृत किया गया कि, उनके विचार कैथोलिक चर्च का आधिकारिक दार्शनिक ढांचा बन गए। इससे कठोर तार्किक विश्लेषण और बहस पर आधारित शिक्षा की एक मानकीकृत "शैक्षिक" पद्धति विकसित हुई।
दरअसल, एरिस्टोटल द्वारा किया गया विज्ञान का वर्गीकरण तथा अनिश्चित और ठोस विज्ञान के बीच अंतर, इस बात को प्रभावित करता है कि हम अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों को कैसे देखते हैं। जबकि अब हमारे पास अवलोकन और विश्लेषण के लिए अधिक उन्नत उपकरण और तकनीकें हैं, एरिस्टोटल के मूलभूत सिद्धांत आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
पश्चिमी देशों का दबदबा खत्म करने वाले ब्रिक्स की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है?
क्या आप जानते हैं कि आज एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय समूह उभर चुका है जो दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है? यह समूह कोई और नहीं बल्कि 'ब्रिक्स' (BRICS) है, जिसने पिछले दो दशकों में एक प्रमुख राजनीतिक ताक़त के रूप में अपनी पहचान बनाई है। इस समूह का जन्म अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती देने और विकासशील देशों को एक नया विकल्प प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ था। हाल ही में इस समूह का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, जिसने इसकी ताक़त को तो बढ़ाया ही है, लेकिन साथ ही इसके भीतर कुछ नए कूटनीतिक विवादों को भी जन्म दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि ब्रिक्स क्या है, यह कैसे काम करता है और दुनिया के भविष्य के लिए इसके क्या मायने हैं।
ब्रिक्स क्या है और वर्तमान में कौन से देश इसका हिस्सा हैं? ब्रिक्स एक अनौपचारिक समूह है जो मुख्य रूप से 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों) के लिए एक राजनीतिक और कूटनीतिक समन्वय मंच के रूप में कार्य करता है। वर्तमान में यह ग्यारह देशों का एक मज़बूत समूह बन चुका है। इसके पाँच मूल सदस्य ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। इसके अलावा वर्ष दो हज़ार चौबीस-पच्चीस में इसमें छह नए सदस्यों को शामिल किया गया है, जिनके नाम मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात हैं। सदस्य देशों के अलावा, इस समूह ने एक 'पार्टनर देश' (साझेदार देश) की श्रेणी भी बनाई है। वर्ष दो हज़ार चौबीस के कज़ान शिखर सम्मेलन में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज़्बेकिस्तान को साझीदार देश घोषित किया गया। इसके तुरंत बाद वियतनाम को भी दसवें साझीदार देश के रूप में आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिया गया, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में गहराई से जुड़ा एक अहम एशियाई देश है। ब्रिक्स में निर्णय आम सहमति के आधार पर लिए जाते हैं और इसके सदस्य देश सभी बैठकों में भाग लेते हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विचार से ब्रिक्स का निर्माण कैसे हुआ और यह कैसे आगे बढ़ा? ब्रिक्स की शुरुआत महज़ एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। वर्ष दो हज़ार एक में गोल्डमैन सैक्स निवेश बैंक के एक अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की तेज़ आर्थिक वृद्धि को देखते हुए 'ब्रिक' शब्द गढ़ा था। उनका मानना था कि इन देशों का विकास भविष्य में अमीर देशों के समूह जी-सात को कड़ी चुनौती देगा। इस विचार को ज़मीनी हक़ीक़त में बदलने की शुरुआत रूस ने की, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी ताक़तों के ख़िलाफ़ एक समानांतर शक्ति खड़ी करने के लिए इन चारों देशों की बैठक बुलाई। ब्रिक की पहली मंत्री स्तरीय बैठक वर्ष दो हज़ार छह में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई थी। इसके बाद वर्ष दो हज़ार नौ में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों का पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। वर्ष दो हज़ार ग्यारह में चीन के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका को भी इस समूह में शामिल कर लिया गया, जिसके बाद इस समूह का नाम 'ब्रिक' से बदलकर 'ब्रिक्स' हो गया।
इस समूह को बनाने का मुख्य कारण क्या था और यह वैश्विक व्यवस्था में कैसे बदलाव लाना चाहता है? ब्रिक्स का गठन इस बुनियादी सोच पर आधारित था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर पश्चिमी ताक़तों का एकाधिकार हो चुका है और ये संस्थाएं अब विकासशील देशों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही हैं। ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार लाना है ताकि उनकी वैधता और प्रभावशीलता बढ़ सके। विशेष रूप से वर्ष दो हज़ार आठ के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इन देशों ने महसूस किया कि अंतरराष्ट्रीय शासन प्रणाली में उभरते हुए देशों को उनकी आर्थिक ताक़त के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा था कि ब्रेटन वुड्स प्रणाली (जिसके तहत विश्व बैंक और आईएमएफ बने थे) अमीर देशों द्वारा अमीर देशों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई थी, और इसमें अफ़्रीकी देशों की कोई भागीदारी नहीं थी। इसी पश्चिमी आधिपत्य और वित्तीय असंतुलन को ख़त्म करने के लिए ब्रिक्स देशों ने एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने का बीड़ा उठाया।
2024 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
सदस्य देशों के बीच वैश्विक व्यापार और आर्थिक सहयोग में इसकी क्या भूमिका है? ब्रिक्स देशों ने पश्चिमी वित्तीय प्रणाली पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को कम करना ब्रिक्स का एक प्रमुख एजेंडा रहा है, क्योंकि डॉलर पर निर्भरता के कारण इन देशों को पश्चिमी प्रतिबंधों का ख़तरा बना रहता है। इस दिशा में 'डी-डॉलरीकरण' को बढ़ावा देते हुए स्थानीय मुद्राओं, ख़ासकर चीन की मुद्रा रेनमिन्बी, में व्यापार बढ़ाया जा रहा है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा तो ब्रिक्स देशों के लिए एक साझा मुद्रा बनाने की भी पुरज़ोर वकालत कर चुके हैं। विश्व बैंक और आईएमएफ के विकल्प के तौर पर ब्रिक्स ने 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (एनडीबी) और 'कंटिंजेंट रिज़र्व अरेंजमेंट' (सीआरए) की स्थापना की है। न्यू डेवलपमेंट बैंक मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन और सामाजिक विकास जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ऋण मुहैया कराता है और इसका लक्ष्य अपने कुल प्रोजेक्ट्स का चालीस प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन से निपटने में लगाना है। हालाँकि एनडीबी का आकार अभी विश्व बैंक से बहुत छोटा है, लेकिन यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूत करने में एक अहम हथियार साबित हो रहा है।
ब्रिक्स देशों का नक्शा
ब्रिक्स का हालिया विस्तार कैसे हो रहा है और वैश्विक प्रभाव के लिए इसके क्या मायने हैं? हाल के वर्षों में ब्रिक्स का आकर्षण तेज़ी से बढ़ा है। वर्ष दो हज़ार तेईस के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के दौरान छह नए देशों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। इनमें से अर्जेंटीना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि वहाँ के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने कम्युनिस्ट देशों के साथ गठबंधन न करने और पश्चिमी देशों के साथ नज़दीकियां बढ़ाने का फ़ैसला किया था। लेकिन अन्य देशों के जुड़ने से अब इस समूह में अरब जगत की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं (सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात) और उप-सहारा अफ़्रीका की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (इथियोपिया) शामिल हो गई हैं। हालाँकि इस विस्तार के साथ ही समूह के भीतर गुटबाज़ी और विवाद भी बढ़ने लगे हैं। चीन और भारत के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद और 'ग्लोबल साउथ' का नेता बनने की होड़ एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले के कारण भी समूह के सामने कूटनीतिक मुश्किलें खड़ी हुई हैं।
आने वाला समय ब्रिक्स के लिए चुनौतियों से भरा है। जुलाई दो हज़ार पच्चीस में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में हुई शिखर सम्मेलन से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किनारा कर लिया था। शी जिनपिंग ने अपनी अनुपस्थिति का कारण व्यस्त कार्यक्रम बताया, जबकि पुतिन अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी गिरफ़्तारी वारंट के कारण सम्मेलन में नहीं जा रहे थे। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिक्स को लेकर सख़्त रवैया अपनाते हुए कहा है कि "ब्रिक्स मर चुका है" और उन्होंने डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिश करने वाले ब्रिक्स देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी भी दीै। इन तमाम आंतरिक मतभेदों और बाहरी दबावों के बावजूद, वर्ष दो हज़ार चौबीस में तीस से अधिक देशों ने इस समूह में शामिल होने के लिए आवेदन किया था, जिनमें अज़रबैजान, मलेशिया और तुर्की जैसे देश शामिल हैं। यह स्पष्ट दर्शाता है कि पश्चिमी एकाधिकार के ख़िलाफ़ एक नए बहुध्रुवीय विश्व की चाहत अभी भी ज़िंदा है और ब्रिक्स इसका सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है।
मध्यकालीन दिल्ली का बेजोड़ विवरण:हिंदी महाकाव्य पृथ्वीराज रासो व् फ़ारसी ग्रंथ नूह सिफिर में
क्या आप जानते हैं कि जिस दिल्ली को आज हम भारत के दिल के रूप में पहचानते हैं, उसके इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब उसके 20 अलग-अलग नाम हुआ करते थे? महान कवि अमीर खुसरो ने इसी शहर के बारे में लिखा था कि यहाँ की वास्तुकला और कुतुब मीनार इतनी भव्य हैं कि वे सीधे "तारों से हाथ मिलाती हैं"। यह कोई साधारण शहर नहीं है, बल्कि यह वह ज़मीन है जिसे कभी 'इंद्रप्रस्थ' तो कभी 'योगिनीपुर' कहा गया। आज के इस लेख में हम इतिहास के उन्हीं पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे कि कैसे मध्यकालीन भारत (1000 ईस्वी से 1450 ईस्वी) के दौरान बसाई गई यह छोटी सी बस्ती आज की आधुनिक राजधानी में तब्दील हो गई। आइए, 'पृथ्वीराज रासो' की ऐतिहासिक पंक्तियों और सूफी संत अमीर खुसरो की नज़रों से इस शहर के इस बेमिसाल सफर को विस्तार से समझें।
'पृथ्वीराज रासो' क्या है और यह मध्यकालीन इतिहास का सबसे अहम दस्तावेज़ क्यों माना जाता है? हिंदी साहित्य के मध्यकालीन दौर में लिखा गया 'पृथ्वीराज रासो' भारत के सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्यों में से एक माना जाता है। यह महाकाव्य 12वीं शताब्दी के महान राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान तृतीय के जीवन और उनकी वीरतापूर्ण लोककथाओं का विस्तृत वर्णन करता है, जिन्होंने अजमेर और दिल्ली पर शासन किया था। इस महाकाव्य की रचना चंद बरदाई ने की थी, जो न केवल राजा पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे, बल्कि उनके बहुत अच्छे मित्र और सलाहकार भी थे। इस ऐतिहासिक ग्रंथ को कुल 69 अध्यायों में बाँटा गया है, जिन्हें 'समय' कहा जाता है।
शुरुआती दौर में यह ग्रंथ केवल मौखिक परंपरा (सुनाने और याद रखने) के रूप में ही जीवित था, लेकिन 18वीं शताब्दी में इसे देवनागरी लिपि और ब्रजभाषा में उकेरा गया। बाद में 19वीं शताब्दी में पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या द्वारा इसके संपूर्ण संकलन पर आधारित मुद्रित संस्करण (Printed Editions) प्रकाशित किए गए। इस ग्रंथ में इतिहास और काल्पनिक किंवदंतियों का एक अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है, जो हमें उस दौर के समाज और दिल्ली के शुरुआती स्वरूप को समझने में बहुत मदद करता है।
प्राचीन काल के इंद्रप्रस्थ से लेकर मध्यकालीन 'ढिल्ली' तक का सफर कैसे तय हुआ? 'पृथ्वीराज रासो' में दिल्ली की प्राचीन बस्तियों के बारे में बेहद चौंकाने वाली जानकारियाँ दी गई हैं। इस महाकाव्य में इस जगह के बीस अलग-अलग नामों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें जुग्गिनीपुर, जोग नायर, योगिनीपुर, इंद्रप्रस्थ, इंद्रप्रस्थय, इंद्रप्रस्थपुर, ढिल्ली, ढिल्लिया, ढिल्लरी, दिल्ली, दिल्लीपुर, दिल्लीधरा, दिल्लीपुरम, दिल्लीपति, दिल्लीदेसी, दिल्लीनगर, दिल्ली वासा, ढिल्लियादेस, ढिल्लेसा और दिल्लीनरेसा शामिल हैं।
ग्रंथ के 'आदि पर्व' (समय 1) की शुरुआत यमुना नदी के तट पर निगम बोध घाट के पास 'दिली' नामक जगह पर बीसलदेव (धुंधा) के आगमन और दिल्ली की बस्ती बसने के साथ होती है। इसे एक पवित्र मंडल के रूप में वर्णित किया गया है जहाँ कई मंदिर मौजूद थे। इसी के पास निगम बोध के निकट एक योगिनी की गुफा और 'सारंगवापल' नामक एक जलाशय का भी ज़िक्र किया गया है। ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि दिल्ली के पास 'बहिलवन' नामक एक जंगल हुआ करता था, जो संभवतः थानेश्वर में था। कहानी में भविष्यवाणी की गई थी कि दिल्ली को सोमेश्वर के पुत्र (पृथ्वीराज) द्वारा सुशोभित किया जाएगा, जिनका जन्म बहिलवन में रहने के लिए ही हुआ था। महाकाव्य बताता है कि जुग्गिनीपुर वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ पृथ्वीराज चौहान का राज्याभिषेक बिल्कुल महाभारत के राजा युधिष्ठिर की तरह ही किया गया था।
'दिल्ली-किल्ली कथा' क्या है और इसके पीछे की ऐतिहासिक घटना क्या बयां करती है? दिल्ली की बुनियाद को समझने के लिए 'पृथ्वीराज रासो' के तीसरे अध्याय (समय 3) में वर्णित 'दिल्ली-किल्ली कथा' एक बेहद महत्वपूर्ण लोककथा है। यह कथा हमें बताती है कि कैसे अनंगपाल ने निगम बोध के पास एक नई बस्ती बसाई थी। इस जगह को एक सुरक्षित और शक्तिशाली केंद्र बनाने की कोशिश की गई थी। लेकिन इतिहास हमेशा एक सा नहीं रहता। इस कथा के अनुसार, गहरवाल राजवंश के राजा विजयपाल (विजयचंद्र) ने जब इस क्षेत्र पर एक बड़ा हमला किया, तो अनंगपाल की इस बस्ती को भारी नुकसान पहुँचा। इस भयंकर आक्रमण के बाद, इस बस्ती को छोड़ना पड़ा और अपना मुक्काम (ठिकाना) कालिंदी के उत्तर की ओर स्थानांतरित करना पड़ा। यह लोककथा इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि मध्यकालीन दौर में यह क्षेत्र किस तरह लगातार युद्धों, उथल-पुथल और सत्ता के बदलाव का गवाह बन रहा था, जिसने इसकी भौगोलिक और राजनीतिक पहचान को पूरी तरह बदल कर रख दिया।
अमीर खुसरो कौन थे और उन्होंने दिल्ली को 'धरती का स्वर्ग' क्यों करार दिया था? मध्यकालीन भारत के सबसे महान विद्वानों में से एक अमीर खुसरो का जन्म 1253 ईस्वी में पटियाली (जो कि वर्तमान कासगंज ज़िले में है) में हुआ था। तुर्की मूल के अमीर खुसरो के भीतर रहस्यवाद (सूफीवाद), गहरी विद्वता, इतिहास की समझ, संगीत और कविता का एक बेजोड़ संगम देखने को मिलता है। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के पाँच अलग-अलग सुल्तानों के दरबार में एक फ़ारसी भाषा के कवि के रूप में अपनी सेवाएँ दी थीं।
उन्होंने सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के लिए 'नूह सिफिर' (अर्थात नौ सफ़र) नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा था। इस ग्रंथ के 'तीसरे सिफिर' में उन्होंने 'हिंद' (भारत) और यहाँ के लोगों, उनकी भाषाओं, ब्राह्मणवादी ज्ञान और विद्या, यहाँ की कलाओं और विज्ञान, यहाँ के पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और यहाँ की सुखद जलवायु का इतना अद्भुत वर्णन किया है कि इसे सचमुच "धरती का स्वर्ग" (पैराडाइज़ ऑन अर्थ) करार दिया है। अमीर खुसरो के लिए दिल्ली उनका सबसे प्रिय और चहेता शहर था। उन्होंने बड़े गर्व से लिखा था कि उस समय की दिल्ली, इस्लामी दुनिया के सबसे महान और बड़े केंद्रों जैसे बगदाद, काहिरा, खुरासान और बुखारा को भी कड़ी टक्कर दे सकती थी।
कुतुब मीनार को 'तारों से हाथ मिलाने वाला' क्यों कहा गया और शहर की वास्तुकला कैसी थी? अमीर खुसरो केवल दिल्ली की संस्कृति के दीवाने नहीं थे, बल्कि वे यहाँ की परिष्कृत भाषा और भव्य वास्तुकला (आर्किटेक्चर) के भी मुरीद थे। उन्होंने अपने लेखों में दिल्ली की आलीशान इमारतों का ख़ास ज़िक्र किया है, जिनमें 'क़स्र-ए-नौ' (नया महल) और 'क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' सबसे प्रमुख हैं। कुतुब मीनार की ऊँचाई और उसकी भव्यता से प्रभावित होकर अमीर खुसरो ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से लिखा था कि यह मीनार "तारों से हाथ मिलाती है"।
इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय कारीगरों की तारीफ़ में यह भी जोड़ा कि दिल्ली में जो शिल्प कौशल और वास्तुकला मौजूद है, वह पूरी अरब या फ़ारसी दुनिया में बनाई गई किसी भी इमारत से कहीं ज़्यादा उत्कृष्ट और बेहतर है। उनका यह नज़रिया दिखाता है कि उस दौर की दिल्ली केवल एक राजनीतिक राजधानी नहीं थी, बल्कि यह ज्ञान, कला और अद्भुत वास्तुकला का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बन चुकी थी जिसकी चमक दूर-दूर तक फैली हुई थी।
सदियों का सफर तय करके पुरानी 'ढिल्ली' आधुनिक भारत की 'नई दिल्ली' कैसे बन गई? समय का पहिया घूमता रहा और मध्यकालीन सल्तनतों और साम्राज्यों का दौर ख़त्म होने के बाद अंग्रेज़ों का शासन भारत पर काबिज़ हुआ। एक लंबे समय तक भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी। लेकिन दिल्ली का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व हमेशा से ही बहुत ख़ास रहा था। इसी अहमियत को समझते हुए, दिसंबर 1911 में अंग्रेज़ों ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाने का ऐतिहासिक फैसला किया।
राजधानी को दिल्ली स्थानांतरित करने के लिए और एक सुनियोजित शहर बसाने के मक़सद से 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894' (लैंड एक्विजिशन एक्ट) के तहत ज़मीन अधिग्रहित की गई। इसके बाद एक नए शहर की रूपरेखा तैयार की गई जिसे हम आज आधुनिक 'नई दिल्ली' के रूप में जानते हैं। यह वही ज़मीन है जिसने प्राचीन इंद्रप्रस्थ के किस्से सुने, अनंगपाल के दौर की उथल-पुथल देखी, अमीर खुसरो की सूफी कविताएँ सुनीं और फिर एक आधुनिक वैश्विक राजधानी के रूप में खुद को स्थापित किया।
तितलियाँ कैसे बताती हैं कि पर्यावरण कितना स्वस्थ और संतुलित है
तितलियाँ केवल सुंदर दिखने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि वे एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण संकेत भी मानी जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी क्षेत्र में तितलियों की अच्छी संख्या यह दर्शाती है कि वहाँ का वातावरण स्वच्छ है, पौधों की विविधता बनी हुई है और प्रकृति का संतुलन ठीक तरह से काम कर रहा है।
तितलियाँ पर्यावरण में होने वाले छोटे छोटे बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। तापमान में बदलाव, प्रदूषण, जंगलों की कटाई या भोजन देने वाले पौधों की कमी का असर सबसे पहले तितलियों पर दिखाई देता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक तितलियों को “प्राकृतिक संकेतक” के रूप में देखते हैं।
जहाँ तितलियाँ अधिक दिखाई देती हैं, वहाँ मधुमक्खियों, लेडीबर्ड जैसे अन्य लाभकारी कीट भी अच्छी संख्या में पाए जाते हैं। यह जैव विविधता, पौधों के परागण, प्राकृतिक संतुलन और खेती को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती है।
इस तरह तितलियाँ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ातीं, बल्कि वे हमें यह भी बताती हैं कि हमारा पर्यावरण कितना स्वस्थ और संतुलित है।