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जब भी हम शाहजहाँपुर का ज़िक्र करते हैं, तो अक्सर हमारे ज़हन में मुग़ल काल की इमारतें या आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले शहीदों की तस्वीरें ही आती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ज़िले की मिट्टी के नीचे इतिहास की एक ऐसी परत दबी है, जो हमें किताबों में लिखे इतिहास से हज़ारों साल पीछे ले जाती है?
रामगंगा, गर्रा और देवहा जैसी नदियों की गोद में बसे इस इलाक़े में इंसानी बसावट का सिलसिला बेहद प्राचीन है। पुरातात्विक साक्ष्य और निगोही में मिले अवशेषों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि जब दुनिया की बड़ी-बड़ी सभ्यताएँ आकार ले रही थीं, ठीक उसी वक़्त शाहजहाँपुर की नदियों के किनारे आदि-मानव अपनी बस्तियाँ बसा रहे थे।

आदिमानवों ने इसी इलाक़े को क्यों चुना?
शाहजहाँपुर का भौगोलिक परिवेश ही इसकी प्राचीन सभ्यता की असली पूँजी है। यह ज़िला गंगा के विशाल मैदान का हिस्सा है और हिमालय की तराई के दक्षिण में स्थित है। यहाँ की ज़मीन नदियों द्वारा बहाकर लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से बनी है। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि उस दौर के इंसानों ने बसने के लिए इस उपजाऊ क्षेत्र को इसलिए चुना क्योंकि यह उनके लिए सुरक्षित था और यहाँ संसाधनों की कोई कमी नहीं थी।
अगर हम इतिहास में थोड़ा और पीछे जाएँ, तो मध्य पाषाण काल यानी 'मेसोलिथिक' (Mesolithic) युग में यहाँ का नज़ारा बिल्कुल अलग था। उस समय गंगा के मैदानी इलाक़ों में इंसानों के छोटे-छोटे समूह रहते थे। ये लोग स्थायी घरों के बजाय एक घुमंतू जीवन जीते थे। खुदाई में मिले अवशेष बताते हैं कि उस दौर में शिकार और मछली पकड़ना ही उनकी ज़िंदगी का मुख्य सहारा था। उस समय का इंसान पत्थर के अत्यंत सूक्ष्म औज़ारों (Microliths) का इस्तेमाल करता था, जो आकार में भले ही छोटे थे लेकिन उनकी धार बहुत तेज़ होती थी।
रामगंगा नदी का तंत्र यहाँ के पूरे वातावरण को प्राणवायु देता है। रामगंगा के साथ गर्रा और देवहा जैसी सहायक नदियाँ इस मैदानी इलाक़े में टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर बहती हैं। जानकारों का मानना है कि प्राचीन काल में जब मानसूनी बाढ़ आती थी, तो ये नदियाँ अपने किनारों पर उपजाऊ मिट्टी की परत छोड़ जाती थीं। इन्हीं नदियों के प्राकृतिक और ऊँचे टीलों पर शुरुआती इंसानों ने जीवन की नींव रखी और अपनी बस्तियाँ बसानी शुरू कीं।
जैसे-जैसे वक़्त बीता, शाहजहाँपुर के इंसानों ने शिकार से आगे बढ़कर खेती-बाड़ी और पशुपालन की तरफ़ क़दम बढ़ाए। क़रीब 3,000 ईसा पूर्व के आसपास, यह इलाक़ा 'गेरूवर्णी मृदभांड' (Ochre Coloured Pottery - OCP) संस्कृति का गवाह बना। यह ताम्रपाषाण काल (Copper Age) का वह दौर था जब इंसान ने मिट्टी के बर्तनों को गेरुए रंग से सजाना और ताँबे का इस्तेमाल करना सीख लिया था। ऐतिहासिक शोध इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि इस संस्कृति के विकास में शाहजहाँपुर एक बहुत ही अहम कड़ी है।
शाहजहाँपुर के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव निगोही (Nigohi) क्षेत्र की खोज से आया। शोधकर्ताओं ने यहाँ मिले अवशेषों को क़रीब 2400 ईसा पूर्व (आज से 4,400 साल पुराना) का बताया है। निगोही में मिली चीज़ों में ताँबे के औज़ार और OCP शैली के बर्तन शामिल हैं। यह खोज पुष्टि करती है कि शाहजहाँपुर का यह हिस्सा उस समय के बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। ताँबे की वस्तुओं की प्राप्ति यह इशारा करती है कि यहाँ के लोग अत्यंत कुशल कारीगर थे।
वैज्ञानिक नज़रिए से देखें, तो यहाँ इतना पुराना इतिहास इसलिए सुरक्षित रहा क्योंकि यहाँ की मिट्टी 'क्वार्टरनरी एलुवियम' (Quarternary Alluvium) श्रेणी की है। नदियों के पुराने रास्तों (Palaeochannels) के पास अक्सर ऐसे ऐतिहासिक ख़ज़ाने मिलते हैं। जानकारों का मानना है कि OCP संस्कृति के लोग जानबूझकर ऐसी जगहों पर बसते थे, जहाँ उन्हें खेती के लिए पानी और बर्तन बनाने के लिए उम्दा मिट्टी आसानी से मिल सके।
क्या वे धातु-शिल्प (Metallurgy) में माहिर थे?
ताम्रपाषाण काल में शाहजहाँपुर का समाज सिर्फ़ खेती-किसानी तक सीमित नहीं था। यहाँ ताँबे के हथियारों और औज़ारों का मिलना इस बात का सबूत है कि वे लोग धातु-विज्ञान में काफ़ी आगे निकल चुके थे। पुरातत्व विभाग के साक्ष्य बताते हैं कि इन जगहों पर अक्सर ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, तलवारें और मानवाकृतियाँ (Anthropomorphic Figures) मिलती हैं, जो उनकी उन्नत तकनीक को दर्शाती हैं।
कुल मिलाकर, शाहजहाँपुर का इतिहास सिर्फ़ राजाओं और नवाबों की कहानियों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ों में वह ताम्रयुगीन सभ्यता बसी है, जिसने गंगा-रामगंगा के इस उपजाऊ इलाक़े को अपनी कर्मभूमि बनाया। निगोही की खोज तो बस एक शुरुआत है, अभी इस मिट्टी के सीने में बहुत कुछ दफ़्न है जिसे जानना बाक़ी है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2axvf5da
https://tinyurl.com/29mj4lae
https://tinyurl.com/27rvpmb8
https://tinyurl.com/2blp4rud
https://tinyurl.com/2xlll84o
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