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हर साल मानसून के दौरान मेरठ भारी बारिश और जलभराव की गंभीर समस्या से जूझता है। तेज़ और अचानक होने वाली वर्षा कुछ ही घंटों में सड़कों, गलियों और बाज़ारों को पानी में डुबो देती है। इससे आम लोगों का दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, स्कूल और दफ़्तर जाने में कठिनाई होती है, गाड़ियों का ट्रैफ़िक (traffic) घंटों तक जाम में फँस जाता है और पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है। बारिश का पानी अक्सर नालियों के गंदे पानी के साथ मिलकर घरों और दुकानों में घुस जाता है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे और आर्थिक नुकसान दोनों बढ़ जाते हैं। मौसम के इस बदलते मिज़ाज के कारण अब हल्की-सी बारिश भी कई इलाकों में जलभराव और असुविधा का कारण बन रही है, जिससे मेरठ के लोगों के लिए मानसून एक राहत के बजाय चिंता का मौसम बनता जा रहा है।
इस लेख में हम शहरी मानसूनी जलभराव से जुड़े पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि मानसूनी वर्षा और बदलते मौसम के कारण शहरी बाढ़ की घटनाएँ कैसे बढ़ी हैं। फिर, हम देखेंगे कि शहरी जल निकासी प्रणालियाँ किन तकनीकी और संरचनात्मक कमजोरियों से जूझ रही हैं। इसके बाद, हम पढ़ेंगे कि किस प्रकार से शहरों में प्राकृतिक जल स्रोतों और बहाव पथों पर अतिक्रमण हुआ है। आगे, हम विश्लेषण करेंगे कि शहरी बाढ़ के समाधान में नीतियों और प्रशासन की क्या विफलताएँ रही हैं। अंत में, हम जानेंगे कि किन व्यावहारिक उपायों से इस संकट का समाधान किया जा सकता है, जैसे रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (Rainwater Harvesting), हरित स्थानों का विस्तार और टिकाऊ ढाँचागत योजनाएँ।
शहरी जलभराव और बाढ़: मानसूनी वर्षा का प्रभाव और बदलते मौसम की भूमिका
पिछले कुछ वर्षों में मानसून की प्रकृति बदलती जा रही है, यह अब केवल ऋतु नहीं रही, बल्कि एक अनिश्चित चुनौती बन चुकी है। भारत के अधिकांश शहरों में जून से सितंबर तक भारी वर्षा होती है, लेकिन अब यह बारिश पहले से कहीं अधिक तीव्र और अनियमित हो गई है। मौसम विभाग के आँकड़े बताते हैं कि कम समय में बहुत अधिक वर्षा (cloudburst-like conditions) अब एक सामान्य बात बन चुकी है। इस अचानक आई वर्षा से जब शहरों की सड़कों पर पानी जमा होता है, तो जन-जीवन एकदम रुक सा जाता है, स्कूल बंद, ऑफिस (office) देर से खुलते हैं, और आम आदमी घंटों तक ट्रैफिक में फँसा रहता है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन इस असंतुलन के पीछे सबसे बड़े कारक हैं। आईपीसीसी (IPCC) की रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि 1950 के बाद से देश के कई हिस्सों में वर्षा का पैटर्न (pattern) चरम की ओर बढ़ा है, या तो बहुत अधिक वर्षा होती है, या बिलकुल नहीं। इसका असर सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है; यह जीवन की रफ्तार, आर्थिक गतिविधियों और स्वास्थ्य सेवाओं तक को प्रभावित करता है। यह बदलता मौसम एक चेतावनी है कि अगर हमने अपनी शहरी योजनाओं को मौसम के हिसाब से ढालना शुरू नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में शहरों का मानसून और भी खतरनाक रूप ले सकता है।
शहरों की जल निकासी प्रणालियों की असफलता: तकनीकी और संरचनात्मक कमियाँ
जब शहरों में बाढ़ आती है, तो सबसे पहले सवाल उठता है, "नाली का पानी सड़क पर क्यों आ गया?" इसका जवाब हमारी दशकों पुरानी, असमर्थ जल निकासी व्यवस्था में छिपा है। अधिकतर भारतीय शहरों की ड्रेनेज (drainage) प्रणाली औपनिवेशिक काल की है या फिर अस्थायी रूप से बनाई गई है। इन नालियों की क्षमता उस समय की जनसंख्या और वर्षा के स्तर को ध्यान में रखकर तय की गई थी, लेकिन आज की स्थिति एकदम अलग है, जनसंख्या कई गुना बढ़ चुकी है, वर्षा तीव्र हो गई है, और ज़मीन का अधिकांश हिस्सा कंक्रीट (concrete) से ढँक चुका है। तूफानी जल निकासी प्रणाली (stormwater drains) का उद्देश्य होता है वर्षा जल को जल्द से जल्द बहाव के प्राकृतिक मार्गों तक पहुँचाना, लेकिन आज नालियों में पानी से ज़्यादा प्लास्टिक (plastic), मलबा और कचरा बहता है। सीपीएचईईओ (CPHEEO) द्वारा निर्धारित मानक भी अब समय के साथ अप्रासंगिक हो गए हैं, वे महज 2-3 साल की बाढ़ संभावना को ध्यान में रखते हैं, जबकि अब हमें 10-20 साल की चरम घटनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए। जब एक पूरी कॉलोनी दो फीट पानी में डूब जाती है, तो वह केवल एक 'इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) की नाकामी' नहीं रहती, वह लोगों की ज़िंदगी और सुरक्षा पर सीधा आघात होती है।
प्राकृतिक जल स्रोतों पर अतिक्रमण और भूमि उपयोग की विसंगतियाँ
शहरों का फैलाव अब क्षैतिज और ऊर्ध्व दोनों दिशाओं में हो रहा है, लेकिन इस विकास की कीमत हमारे पारंपरिक जल संसाधनों को चुकानी पड़ रही है। नाले जो कभी बरसाती जल के प्रवाह के लिए थे, अब सीवर (sewer) बन चुके हैं; झीलें जो भूजल को रिचार्ज (recharge) करती थीं, अब पार्किंग (parking) स्थल या हाउसिंग सोसाइटी (housing society) में बदल गई हैं। जल बहाव पथों को पक्का कर देना और नदियों के किनारे मॉल (mall) या फ्लाईओवर (flyover) बना देना एक ऐसा शहरी अपराध है जिसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई जैसे शहरों में बाढ़ की हर साल दोहराई जाने वाली त्रासदी का कारण यही है, प्राकृतिक जल निकायों पर अतिक्रमण। 2015 की चेन्नई बाढ़ याद कीजिए - जिसमें आईआईटी मद्रास (IIT Madras) और तमाम हाई-टेक इंडस्ट्रियल पार्क्स (High-Tech Industrial Parks) एक झील के पुराने कैचमेंट (catchment) क्षेत्र में बने थे, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया। भूमि उपयोग की विसंगतियाँ तब और घातक हो जाती हैं जब मास्टर प्लान (master plan) में जल निकासी या रिचार्ज ज़ोन (recharge zone) को लेकर कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं होता। इसीलिए अब ज़रूरत है कि हम शहरी विकास को केवल इमारतों और सड़कों की भाषा में नहीं, बल्कि जल और जीवन के संदर्भ में भी समझें।
शहरी बाढ़ प्रबंधन में नीति और प्रशासनिक विफलताएँ
जब तक नीति और प्रशासनिक ढाँचा समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेता, तब तक किसी भी तकनीकी समाधान का असर सीमित ही रहता है। भारत में शहरी बाढ़ को अभी भी 'आपदा' की श्रेणी में रखा जाता है, न कि एक 'प्रबंधन की आवश्यकता' के रूप में देखा जाता है। न तो हमारे पास कोई ठोस राष्ट्रीय नीति है, न ही कोई ऐसा फ्रेमवर्क (framework) जो राज्य या नगर निगम स्तर पर लागू किया जा सके। परिणामस्वरूप, बाढ़ आने के बाद तो राहत की गाड़ियाँ दौड़ती हैं, लेकिन उससे पहले नाली साफ कराने या जल निकासी की योजना बनाने के लिए कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं होती। अमृत (AMRUT), स्मार्ट सिटी मिशन (Smart City Mission) या स्वच्छ भारत जैसे कार्यक्रमों में शहरी बाढ़ के लिए समर्पित मॉड्यूल (modules) या फंडिंग (funding) बहुत सीमित है। ड्रेनेज प्रोजेक्ट (drainage project) अक्सर ठेकेदारी, भ्रष्टाचार और अस्थायी हलों के शिकार हो जाते हैं। योजनाएँ बनती हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन न के बराबर होता है, और जब तक किसी बड़े शहर में कोई बड़ी बाढ़ नहीं आ जाती, तब तक इस मुद्दे पर कोई राष्ट्रीय विमर्श भी नहीं होता। यह एक सिस्टम (system) की चूक है, जिसे ठीक करने के लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टि, दोनों की आवश्यकता है।
समाधान के लिए सुझाव: हरित उपाय, वर्षा जल संचयन और टिकाऊ ढाँचागत योजनाएँ
इस संकट का समाधान जटिल ज़रूर है, लेकिन असंभव नहीं। हमें शहरों को 'फ्लड-रेजिस्टेंट' (Flood-Resistant) बनाने के लिए केवल नालियाँ चौड़ी करने की नहीं, सोच को व्यापक करने की ज़रूरत है। सबसे पहले तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि शहरों को वर्षा जल को "तेज़ी से निकालने" के बजाय "स्थायी रूप से सोखने" में सक्षम बनाना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि हर शहर में वर्षा जल संचयन अनिवार्य किया जाए, और उसका सही ढंग से अनुपालन हो। सड़कों के किनारे झरझरे फुटपाथ (footpath), ग्रीन बेल्ट (green belt), और पार्क जैसे स्थल न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि वे पानी को ज़मीन में जाने में मदद करते हैं। भवन निर्माण के दौरान प्लिंथ स्तर (plinth level) को सड़क से ऊपर रखने, और तहखानों की डिज़ाइन (design) में जल रिसाव से सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे नियम लागू करने चाहिए। न्यूयॉर्क (New York, USA) के 'बायोस्वेल्स' (bioswales), सिंगापुर के 'एबीसी वॉटर्स प्रोग्राम' (ABC Waters Programme) और टोक्यो (Tokyo, Japan) की भूमिगत जल-रिसाव सुरंगों जैसे मॉडल हमारे लिए प्रेरणा हो सकते हैं। इन उपायों को अपनाकर हम शहरों को ऐसी जगह बना सकते हैं जहाँ बारिश एक आपदा नहीं, एक अवसर बन जाए, हरियाली बढ़ाने, भूजल संचित करने और पर्यावरण के साथ सामंजस्य बैठाने का।
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