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जौनपुरवासियों, जब भी हमारे शहर में किसी को अचानक चोट लगती है या हड्डी के दर्द की चिंता होती है, तो डॉक्टर अक्सर सबसे पहले एक्स-रे (X-Ray) कराने की सलाह देते हैं। यह सरल-सी सलाह हमें याद कराती है कि सौ से अधिक वर्षों पुरानी यह तकनीक आज भी हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। तो आइए आज जौनपुर की धरती से ही इस पूरी वैज्ञानिक यात्रा को समझने की कोशिश करते हैं, जिसमें हम एक्स-रे की शुरुआत, उसके विकास और आज एआई (A.I.) की मदद से उसके आधुनिक रूप को जानेंगे। इसके साथ ही, हम यह भी महसूस करेंगे कि इन बदलावों ने हमारे शहर में इलाज को कितना तेज़, भरोसेमंद और सुरक्षित बनाया है।
आज के इस लेख में हम चार बातों को क्रम से समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि एक्स-रे की खोज कैसे हुई और वैज्ञानिकों ने इस रहस्यमयी किरण को कैसे पहचाना। इसके बाद, हम एक्स-रे इमेजिंग के इतिहास में हुए प्रमुख विकासों की यात्रा पर चलेंगे। फिर हम यह समझेंगे कि एआई एक्स-रे छवियों के पैटर्न को कैसे पहचानता है और किस तरह यह डॉक्टरों की सहायता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अंत में, हम देखेंगे कि आज रेडियोलॉजी (Radiology) में एआई का सहयोग हमारे जैसे शहरों में इलाज को कैसे बेहतर बना रहा है।

एक्स-रे का आविष्कार कैसे हुआ
एक्स-रे तरंगें हमेशा से अस्तित्व में थीं, लेकिन 19वीं सदी के अंत तक वैज्ञानिकों ने इन अदृश्य तरंगों के महत्व को नहीं पहचाना था। इस खोज की नींव बहुत पहले 1785 में पड़ी, जब विलियम मॉर्गन (William Morgan) ने अपने प्रयोग के दौरान एक चमकीली हरी रोशनी देखी। उन्होंने इस अवलोकन को रॉयल सोसाइटी (Royal Society) के सामने रखा, लेकिन इसकी वास्तविक प्रकृति लंबे समय तक रहस्य बनी रही।इसके बाद 1800 के दशक के उत्तरार्ध में वैज्ञानिकों ने कैथोड किरणों और निर्वात नलियों पर काम करना शुरू किया। क्रुक्स नली (Crooks Hose) ने इलेक्ट्रॉनों (electrons) की गति और व्यवहार को समझने का रास्ता खोला। 1888 में फिलिप लेनार्ड (Philip Lennard) ने पाया कि कैथोड किरणें एल्यूमीनियम फॉइल (aluminum foil) पार कर सकती हैं और अंधेरे कमरे में रखी स्क्रीन को चमका सकती हैं। यह अवलोकन एक्स-रे की समझ की दिशा में एक बड़ा कदम था।कुछ वर्षों बाद 1895 में जर्मन वैज्ञानिक विल्हेम कॉनराड रॉन्टगन (Wilhelm Conrad Rontgen) ने यह समझने के लिए प्रयोग किया कि क्या कैथोड किरणें कांच से गुजर सकती हैं। उन्होंने देखा कि एक ढकी हुई नली के पास रखी स्क्रीन चमक रही है, जबकि वहाँ कोई सामान्य प्रकाश नहीं था। उन्होंने परिकल्पना की कि कोई नई किरण पैदा हो रही है, जो न सिर्फ़ कांच से बल्कि कागज़, लकड़ी और एल्यूमीनियम फॉइल से भी गुजर सकती है। रॉन्टगन ने अपनी पत्नी के हाथ का पहला एक्स-रे चित्र लिया, जिसमें उसकी हड्डियाँ और धातु की अंगूठी साफ़ दिखाई दे रही थी। इसी अद्भुत खोज के कारण उन्हें 1901 में भौतिकी का पहला नोबेल पुरस्कार मिला, जिसे उन्होंने अपने विश्वविद्यालय को दान कर दिया। यही वह क्षण था जिसने चिकित्सा की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।

इतिहास में एक्स-रे इमेजिंग का विकास
रॉन्टगन की खोज के बाद एक्स-रे इमेजिंग लगातार विकसित होती रही। वर्ष 1875 में क्रुक्स कैथोड रे (Crookes Cathode Ray) नली का आविष्कार हुआ, जिसने आगे के प्रयोगों को आधार दिया। 1895 में रॉन्टगन द्वारा एक्स-रे की खोज के बाद 1900 में थॉमस एडिसन (Thomas Edison) ने फ्लोरोस्कोपी (Fluoroscopy) विकसित की, जो वास्तविक समय में चिकित्सा प्रक्रियाओं को देखने में सहायक थी। 1913 में आधुनिक एक्स-रे नली का निर्माण हुआ और इसी वर्ष स्तन ऊतक का पहला समर्पित रेडियोग्राफ तैयार किया गया।1918 में एक्स-रे फिल्में आईं, जिससे जांच और स्पष्ट और आसान हो गई। 1930 के दशक में नैदानिक मैमोग्राफी और 1932 में पहली एक्स-रे टोमोग्राफी (Tomography) सामने आई। इसके बाद 1953 में सब्ट्रैक्शन इमेजिंग और 1980 में डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी (Subtraction Angiography) ने रेडियोलॉजी को और आधुनिक बनाया। 1983 में कंप्यूटेड रेडियोग्राफी (computed radiography) और 2000 के दशक में डिजिटल डिटेक्टरों (digital detectors) ने जांच की गति और सटीकता को और बढ़ा दिया। यह संपूर्ण विकास आज जौनपुर में मिलने वाले तेज़ और भरोसेमंद एक्स-रे परीक्षणों की नींव है, जिससे डॉक्टर बहुत कम समय में स्पष्ट निर्णय ले पाते हैं।
एआई के माध्यम से एक्स-रे पैटर्न की पहचान
आज एक्स-रे के आधुनिक स्वरूप में एआई यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। एआई मॉडल, विशेष रूप से कॉन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क, बड़ी संख्या में एक्स-रे छवियों पर प्रशिक्षित किए जाते हैं। इससे वे छवि में मौजूद पैटर्न को पहचानना सीखते हैं, जैसे कि फॉल्ट लाइन्स (fault lines), असामान्य आकृतियाँ या संभावित फ्रैक्चर। एआई छवि में उन क्षेत्रों को पहचान लेता है जहाँ समस्या होने की संभावना होती है। कई मॉडलों को मिलाकर तैयार किए गए एन्सेम्बल सिस्टम (Ensemble System) निर्णय की सटीकता को और बढ़ाते हैं। ध्यान तंत्र एआई को छवि के उचित हिस्सों पर केंद्रित रहने में मदद करता है, ताकि सूक्ष्म से सूक्ष्म फ्रैक्चर भी न छूटे। कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि एआई कभी-कभी विशेषज्ञ रेडियोलॉजिस्ट जितनी सटीकता प्राप्त कर सकता है। हालांकि यह पूरी तरह डॉक्टर का विकल्प नहीं है, बल्कि एक ऐसा सहयोगी है जो डॉक्टर के काम को आसान और तेज़ बनाता है। जौनपुर जैसे शहरों में, जहाँ तेज़ और सटीक जांच की आवश्यकता होती है, एआई एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

रेडियोलॉजी में एआई कैसे सहयोग कर रहा है
रेडियोलॉजी में एआई का उपयोग डॉक्टरों के लिए समय और सटीकता दोनों में मददगार साबित हुआ है। एआई मरीजों की स्थिति के आधार पर स्कैन की प्राथमिकता तय कर देता है, जिससे गंभीर मामलों का निदान पहले होता है। कई बार एआई मानव आंखों से भी अधिक सटीकता से असामान्यताओं को पहचान लेता है। एआई द्वारा अनुकूलित रेडियोलॉजी प्रक्रिया मरीजों और रेडियोग्राफरों को कम विकिरण के संपर्क में लाती है। रिपोर्ट निर्माण भी अब तेज़ और मानकीकृत हो चुका है, जिससे उपचार जल्द शुरू हो पाता है। इसके अलावा, छवि की गुणवत्ता में सुधार के कारण छोटे से छोटे बदलाव भी सामने आ जाते हैं, जिससे बीमारी को जल्दी पकड़कर इलाज समय पर किया जा सकता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/4kvfz7fx
https://tinyurl.com/3k5yfhrt
https://tinyurl.com/dn3d589f
https://tinyurl.com/yey6kzvd
https://tinyurl.com/yjexb5bh
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