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जौनपुरवासियों, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लगातार बदलते दौर में एक ऐसा आधुनिक व्यवसाय तेजी से उभरकर सामने आया है, जिसकी चर्चा आज देशभर में हो रही है - झींगा पालन उद्योग। देश के कई राज्यों में झींगा पालन ने किसानों की आय परंपरागत खेती की तुलना में कई गुना बढ़ाई है, और उत्तर प्रदेश के मथुरा और हाथरस ज़िले प्रमुख झींगा उत्पादक क्षेत्र बन गए हैं। ऐसे में जौनपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों के किसानों के सामने एक बड़ा अवसर उभर रहा है - कम उपयोग वाली ज़मीन, खारे पानी वाले क्षेत्रों और आधुनिक तकनीक के संयोजन से झींगा पालन आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास, रोजगार और किसान समृद्धि का मजबूत साधन बन सकता है। इसलिए इस व्यवसाय को समझना जौनपुर के किसानों, युवाओं और निवेशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि आने वाला समय ऐसी आधुनिक खेती का है जो कम ज़मीन में ज़्यादा लाभ दे सके।
आज के इस लेख में हम झींगा पालन से जुड़े पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल तरीके से समझेंगे। सबसे पहले हम जानेंगे कि मथुरा और हाथरस मॉडल के तहत उत्तर प्रदेश में झींगा पालन की वर्तमान स्थिति क्या है और कैसे लोग रोजगार पा रहे हैं। इसके बाद झींगा पालन की प्रक्रिया, पानी व तापमान की आवश्यक शर्तें और प्रमुख चुनौतियों को समझेंगे। फिर हम लागत, उत्पादन क्षमता और किसानों को होने वाले आर्थिक लाभ का विस्तृत विश्लेषण देखेंगे। हम जानेंगे कि क्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा आने वाले समय में भारत के सबसे बड़े झींगा उत्पादन केंद्र बन सकते हैं। और अंत में भारत के शीर्ष उत्पादन राज्यों और इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए आवश्यक लागत व उपकरणों की जानकारी प्राप्त करेंगे।
उत्तर प्रदेश में झींगा पालन उद्योग की वर्तमान स्थिति — मथुरा और हाथरस मॉडल
उत्तर प्रदेश में झींगा पालन की शुरुआत मथुरा और हाथरस जिलों से हुई, जहाँ भूजल में स्वाभाविक रूप से पाई जाने वाली अधिक लवणता ने समुद्री प्रजाति वाइटलेग प्रॉन (Whiteleg Prawn) के पालन को संभव बनाया। इस मॉडल की सफलता के पीछे पीएमएसएसवाई (PMMSY) योजना के माध्यम से किसानों को दिया गया प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता, लैब परीक्षण सुविधाएँ और मत्स्य विशेषज्ञों का सहयोग अहम भूमिका निभा रहे हैं। कई किसानों ने परंपरागत फसल की तुलना में झींगा पालन से कई गुना अधिक आय प्राप्त की, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार में वृद्धि हुई और युवाओं के पलायन में कमी आई। सफल परिणाम देखकर अब अलीगढ़, आगरा, कासगंज, फिरोजाबाद, बदायूं और बुलंदशहर सहित अन्य जिलों में भी इसका तेजी से विस्तार हो रहा है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत अवसर प्रस्तुत करता है।

झींगा पालन की प्रक्रिया, आवश्यक शर्तें और प्रमुख चुनौतियाँ
झींगा पालन एक वैज्ञानिक और सावधानीपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें 10-25 पीपीटी (PPT) लवणता वाला खारा पानी, 28-32°C तापमान, नियंत्रित गहराई वाला तालाब, पानी में पर्याप्त ऑक्सीजन और स्वच्छता अत्यंत आवश्यक होते हैं। तालाब बनाने के बाद उसकी कीचड़ परत का उपचार, पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच, सही घनत्व में बीज छोड़ना, फीड (feed) और प्रोबायोटिक्स (probiotics) का उचित उपयोग तथा एरेटर (aerator) की मदद से ऑक्सीजन बनाए रखना उत्पादन सफलता की कुंजी है। हालांकि, झींगों में रोग फैलने का जोखिम, गुणवत्तापूर्ण बीज और फीड की समय पर उपलब्धता, जल प्रदूषण, पानी के तापमान में उतार-चढ़ाव और पर्यावरणीय परिवर्तन इस उद्योग के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। इसलिए निरंतर निगरानी और विशेषज्ञ मार्गदर्शन झींगा पालन में अनिवार्य माना जाता है।
उत्पादन क्षमता, लागत और किसानों को होने वाला आर्थिक लाभ
एक एकड़ के अच्छी तरह प्रबंधित तालाब में 2.5-3.5 टन तक झींगा उत्पादन किया जा सकता है और बाजार में इसकी कीमत आमतौर पर ₹350 से ₹600 प्रति किलो तक मिलती है, जिससे कुल आय उल्लेखनीय रहती है। उत्पादन शुरू करने के लिए तालाब निर्माण, वाइटलेग प्रॉन बीज, प्रोबायोटिक्स, फीड, बिजली-डीज़ल खर्च और श्रम मिलाकर प्रति एकड़ लगभग ₹5-6 लाख का निवेश आता है। यदि प्रबंधन सही तरीके से किया जाए तो एक चक्र में ही ₹4-7 लाख तक शुद्ध लाभ संभव है, जबकि एक वर्ष में दो चक्र चलाने पर यह लाभ दोगुना भी हो सकता है। कम भूमि और कम पानी में उच्च आय होने के कारण झींगा पालन किसानों के लिए परंपरागत खेती के अत्यधिक आकर्षक विकल्प के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
क्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा भविष्य में भारत के झींगा पालन केंद्र बन सकते हैं
उत्तर प्रदेश और हरियाणा दोनों राज्यों में ऐसे खारे और अनुपयोगी भूभाग की बड़ी मात्रा पाई जाती है जिस पर अनाज की खेती संभव नहीं है, लेकिन झींगा पालन के लिए यह भूमि अत्यंत उपयुक्त है। सरकार द्वारा ₹576 करोड़ की मत्स्य विस्तार योजना, प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रोत्साहन अनुदान और वैज्ञानिक संस्थानों की भागीदारी ने किसानों के आत्मविश्वास को और मजबूत किया है। कई जिलों में विशेषज्ञ लैब, बीज उत्पादन इकाइयाँ, शीतगृहो और तकनीकी केंद्र स्थापित किए जाने से भविष्य में बड़े पैमाने पर उत्पादन, निर्यात और प्रोसेसिंग उद्योग विकसित होंगे। यदि यही प्रगति बनी रही तो आने वाले दशकों में उत्तर प्रदेश और हरियाणा देश के प्रमुख झींगा पालन और निर्यात हब बन सकते हैं।

भारत में झींगा उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य और उनका राष्ट्रीय योगदान
भारत आज वैश्विक झींगा निर्यात के सबसे बड़े देशों में शामिल है और राष्ट्रीय स्तर पर आंध्र प्रदेश झींगा उत्पादन में पहले स्थान पर है, उसके बाद पश्चिम बंगाल, गुजरात, तमिलनाडु और ओडिशा का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। इन राज्यों में उन्नत तकनीक, वैज्ञानिक प्रबंधन और बड़े पैमाने की खेती के कारण भारत विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति बनाए हुए है। हाल ही में झींगा प्रसंस्करण और निर्यात उद्योग के विस्तार ने किसानों की आय और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा दिया है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में तेजी से बढ़ रहे उत्पादन से अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले वर्षों में भारत न सिर्फ ऑर्डर पूरा करेगा बल्कि वैश्विक मांग को दिशा देने वाला प्रमुख उत्पादक देश बन सकता है।
भारत में झींगा पालन शुरू करने की औसत लागत और आवश्यक उपकरणों का विवरण
झींगा पालन शुरू करने के लिए तालाब निर्माण और प्लास्टिक लाइनिंग (plastic lining), एरेटर (aerator), पानी पंप, मोटर, ऑक्सीजन मशीन (oxygen machine), जनरेटर (generator), झींगा बीज (सीड), फीड, चूना, नमक, विटामिन और प्रोबायोटिक्स जैसे उपकरण व सामग्री की आवश्यकता होती है, जिनकी कुल लागत प्रति एकड़ लगभग ₹5-6 लाख आती है। उत्पादन के दौरान नियमित फीड प्रबंधन, ऑक्सीजन स्तर की निगरानी, पानी की जाँच और विशेषज्ञ सलाह पालन की सफलता सुनिश्चित करते हैं। यद्यपि प्रारंभिक निवेश अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन आरओआई (ROI) यानी निवेश पर लाभ काफी तेज होता है और सफल प्रबंधन के साथ वार्षिक आय परंपरागत खेती से कई गुना अधिक हो सकती है। यही कारण है कि देशभर के किसान इस आधुनिक मत्स्य उद्योग की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/5253thtd
https://tinyurl.com/35afhc5t
https://tinyurl.com/45nnrny9
https://tinyurl.com/2peexmrn
https://tinyurl.com/5n8c6u6h
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