लखनऊ, आज के लेख में हम महात्मा गांधीजी के शांति मॉडल (peace model) को जानेंगे, और हमारे समाज को आकार देने में इसकी सार्थकता को समझेंगे। फिर, हम उनकी अहिंसा की पद्धति को देखेंगे, जिसे ‘सत्याग्रह’ के नाम से जाना जाता है। बाद में हम समझेंगे कि, अहिंसा के माध्यम से शांति कैसे प्राप्त की जाती है, और इसका स्वराज के विचार से क्या संबंध है। हम इन विचारों की व्याख्या करने और उन्हें पश्चिमी दुनिया में प्रसारित करने में रिचर्ड ग्रेग (Richard Gregg) की भूमिका भी जानेंगे। अंत में हम देखेंगे कि, मार्टिन लूथर किंग जूनियर (Martin Luther King Jr) गांधीजी के अहिंसा के दर्शन से कैसे प्रभावित हुए थे।
माना जाता है कि, हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी, गौतम बुद्ध और ईसा मसीह के बाद दुनिया के सबसे महान शांति दूत हैं। उनकी शांति की अवधारणा अहिंसा, व्यक्तिवाद, आत्मबल और क्षमा पर केंद्रित है। गांधी जी का मानना था कि सच्ची ‘शांति’, केवल शांतिपूर्ण तरीकों से ही प्राप्त की जा सकती है। यह सिद्धांत भौतिक अहिंसा के साथ-साथ, अहिंसक संचार, आर्थिक प्रणालियों एवं जीवन शैली को भी शामिल करता है। यह सिद्धांत एक ऐसे समाज की वकालत करता है, जहां संघर्षों को आक्रामकता के बिना हल किया जाता है, और मतभेदों को बातचीत एवं समझ के साथ सुलझाया जाता है।

गांधीवादी दर्शन की एक अन्य आधारशिला ‘सर्वोदय’ है, जिसका अर्थ 'सभी का कल्याण’ है। यह अवधारणा सामाजिक न्याय और समानता के महत्व पर जोर देती है। यह अवधारणा ऐसे समाज की वकालत करती है, जहां हर व्यक्ति को उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बावजूद आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। दरअसल, इसका अर्थ गरीबी, असमानता और भेदभाव जैसे मुद्दों को संबोधित करना एवं यह सुनिश्चित करना है कि, संसाधनों को समान रूप से वितरित किया जाए, और समाज के वंचित लोगों का विकास किया जाए।शांति और सद्भाव के मार्ग पर चलने वाले राष्ट्रों के लिए, गांधीजी का विचार था किे, "शांति हथियारों के टकराव से नहीं, बल्कि बाधाओं के बावजूद भी निहत्थे राष्ट्रों द्वारा किए गए न्याय से आएगी।"
एक तरफ, ‘सत्याग्रह’ भी गांधीवाद का सार है। इसके माध्यम से गांधी जी ने दुनिया को एक नई भावना से परिचित कराया था। सत्याग्रह दो संस्कृत संज्ञाओं – ‘सत्य’ अर्थात सच और ‘अग्रह’ अर्थात किसी बात पर जोर देना, का एक यौगिक है। इस प्रकार सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ, सत्य के प्रति समर्पण, सत्य पर दृढ़ रहना और असत्य का सक्रिय लेकिन अहिंसक तरीके से विरोध करना है। चूंकि गांधीजी के लिए सत्य तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता अहिंसा (प्रेम) है, इसलिए सत्याग्रह का अर्थ अहिंसा का उपयोग करके सत्य की अटूट खोज करना है। सत्याग्रह को अक्सर ही अहिंसक प्रतिरोध के दर्शन के रूप में परिभाषित किया गया है। इसे भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व को समाप्त करने के लिए, महात्मा गांधी द्वारा प्रसिद्ध रूप से अपनाया गया था। यह एक नैतिक हथियार है, और इसमें शारीरिक बल की तुलना में आत्मिक बल पर अधिक जोर दिया जाता है। इसका उद्देश्य प्रेम और धैर्यपूर्वक पीड़ा के माध्यम से शत्रु पर विजय प्राप्त करना है। साथ ही, इसका मकसद अन्यायपूर्ण कानून पर जीत हासिल करना, तथा सत्ता को परिवर्तित एवं ठीक करना है। गांधीजी के अनुसार, सत्याग्रह पूरी तरह से सत्य पर आधारित आंदोलन है। यह हिंसा के हर रूप को प्रतिस्थापित करता है, फिर चाहे वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, परोक्ष और प्रकट, या फिर विचार, शब्द या कर्म में हो। सत्याग्रह हमें अच्छे से जीने के साथ-साथ अच्छे से मृत्यु पाने की कला भी सिखाता है। इससे प्रेम और अटल दृढ़ता आती है। इसका प्रशिक्षण उम्र और लिंग से परे, सभी के लिए है। तथा सबसे महत्वपूर्ण बात, इसका प्रशिक्षण शारीरिक न होकर मानसिक है।
गांधीजी के अनुसार एक-आयामी और एकतरफा बातचीत या प्रयासों से, कभी भी शांति हासिल नहीं की जा सकती। इसमें सामाजिक, जातीय, धार्मिक और राजनीतिक तत्वों के कई पहलू होते हैं। साथ ही, खराब स्थितियों को नियंत्रण में लाने और स्थिर करने के लिए उनसे निपटने के कई तरीके हैं। किसी खराब स्थिति की वास्तविक समस्या की पहचान की जानी चाहिए, और उसपर शांतिपूर्ण पर्याय ढूंढे जाने चाहिए। क्योंकि शांति सार्वभौमिक और शाश्वत होती है।
दूसरी ओर, गांधीजी की ‘स्वराज’ की अवधारणा आत्मनिर्भरता और स्वशासन के विचार में गहराई से निहित है। यह बाहरी नियंत्रण से मुक्ति की सरल धारणा से आगे जाकर, व्यक्तिगत और सामाजिक परिवर्तन के गहन पहलुओं को भी शामिल करता है। गांधीजी के अनुसार, सच्चे स्वराज को प्राप्त करने के लिए हमें स्वैच्छिक आत्म-बलिदान के माध्यम से, आत्म-अनुशासन में महारत हासिल करने और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
गांधीजी के लिए, आत्मनिर्भरता केवल एक आर्थिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक नैतिक सिद्धांत भी था। उनका मानना था कि, व्यक्तियों और समुदायों को बाहरी ताकतों पर निर्भर रहे बिना, अपना समर्थन करने में सक्षम होना चाहिए। अर्थात, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, खाद्य संप्रभुता और सादगी, ईमानदारी और कड़ी मेहनत जैसे व्यक्तिगत गुणों को विकसित करना ही स्वराज हो सकता है। वैसे तो राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक होती है, परंतु गांधीजी ने तर्क दिया कि, सच्चा स्वराज केवल स्वशासन के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसमें स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना, सहभागी लोकतंत्र, और प्राधिकार के दुरुपयोग का प्रतिरोध करना शामिल हैं। गांधीजी के स्वराज के दृष्टिकोण के लिए जाति, धर्म और शहरी-ग्रामीण अंतर जैसे विभिन्न विभाजनों से परे, सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता थी। उनका मानना था कि आत्मनिर्भरता और स्वशासन की सफलता के लिए एकता आवश्यक है। इसी से अंततः शांति स्थापित होगी।
क्या आप जानते हैं कि, गांधी जी के ये विचार पश्चिमी दुनिया में कैसे प्रसारित हुए? दरअसल, गांधीजी के मित्र और अनुयायी तथा अमेरिकी शांतिवादी रिचर्ड ग्रेग को इसका श्रेय दिया जा सकता है। ग्रेग अहिंसा की शक्ति के संबंध में, गांधीजी के संदेश को आगे बढ़ाने में एक प्रभावशाली व्यक्ति रहे हैं। ग्रेग ने गांधीजी के विचारों को इस तरह से समझाया कि, वे पश्चिमी दर्शकों को समझ में आ सके। उनकी पुस्तकों ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर की अहिंसक प्रतिरोध की समझ को भी प्रभावित किया था। फरवरी 1925 की शुरुआत में, ग्रेग गांधीजी के साबरमती आश्रम पहुंचे थे। उसी समय गांधीजी एक जेल से रिहा हुए थे, और ग्रेग के आने के कुछ दिनों बाद आश्रम में लौट आए। उस समय, दुनिया भर में शांतिवादी आंदोलन उभर रहा था। शांतिवादी आंदोलक वे हैं, जो शांतिपूर्ण प्रतिरोध के साथ देशज और अंतर्राष्ट्रीय हिंसा का सामना करने में विश्वास करते हैं। तब ग्रेग ने गांधीजी की अहिंसा की रणनीति के बारे में उनके साथ रहते हुए गहराई से सीखा। फिर उन्होंने एक महत्वपूर्ण पुस्तक – ‘द पावर ऑफ नॉनवॉइलेंस (The Power of Nonviolence)’ लिखी, जिसमें शांतिवाद को अधिक प्रभावी बनाने के बारे में मार्गदर्शन था। ग्रेग जानते थे कि, अहिंसा निष्क्रिय प्रतिरोध नहीं है, बल्कि यह एक सक्रिय योजनाबद्ध रणनीति है। अहिंसा के लिए गहन प्रशिक्षण, तथा शारीरिक और आध्यात्मिक मजबूती की भी आवश्यकता थी। कई शांतिवादियों के लिए, यह तत्व विवादास्पद और चौंकाने वाला था। लेकिन ग्रेग ने जोर देकर कहा कि, अहिंसक विरोध अपने आप में एक युद्ध का प्रतिनिधित्व करता है।

ग्रेग के अलावा, मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी गांधीजी के विचारों से अवगत थे। ग्रेग की पुस्तक - "द पावर ऑफ नॉनवॉइलेंस" ने उनके निष्क्रिय प्रतिरोध के बारे में सोचने के तरीके को, गहराई से प्रभावित किया। ग्रेग ने इन विचारों को ऐसे संदर्भ में रखा था, जो अमेरिकी नागरिक अधिकार संघर्ष के लिए अधिक उपयुक्त थे। इस अवधि के दौरान किए गए मार्टिन के लेखन में, ग्रेग द्वारा प्रस्तुत विषयों और दृष्टिकोणों के समान ही विषय थे। हालांकि मार्टिन ने यह अंतर बताया कि, अहिंसक प्रतिरोध कायरता नहीं, बल्कि एक बहादुरी भरा कार्य है, जिसके लिए महान प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
1957 तक, मार्टिन लूथर किंग जूनियर अहिंसक प्रत्यक्ष कार्रवाई के, उनके देश के सबसे प्रसिद्ध अभ्यासकर्ता थे। एक बार उन्होंने उन पाँच ग्रंथों के नाम बताए थे, जिनसे वे सबसे अधिक प्रभावित हुए थे। तब, उन्होंने गांधीजी की अपनी आत्मकथा – ‘द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ (The Story of My Experiments with Truth)’ का नाम लिया था। बाद में, 1959 में, मार्टिन ने ‘द पावर ऑफ नॉनवॉइलेंस’ के लिए प्रस्तावना भी लिखी, क्योंकि वे पहले से ही ग्रेग के काम से परिचित हो चुके थे।
संदर्भ
https://tinyurl.com/kprtebvv
https://tinyurl.com/4upfm2p4
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