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मेरठवासियों, आजकल हम सबकी थाली में जो रोटियाँ, सब्ज़ियाँ, नमकीन, बिस्कुट और पैक्ड फूड पहुँच रहे हैं, वे पहले की तरह बिल्कुल साधारण नहीं रह गए हैं। हमारे आसपास की खेती, अनाज और खाद्य उद्योग में विज्ञान इतनी तेजी से बदला है कि अब बीज भी प्राकृतिक रूप में नहीं, बल्कि संशोधित और वैज्ञानिक तकनीकों से तैयार किए जाते हैं। ऐसे में ग्लूटेन (gluten), जीएमओ फूड्स (GMO foods) और संशोधित अनाज को लेकर लोगों के मन में सवाल और शंकाएँ लगातार बढ़ रही हैं - क्या ये हमारी सेहत के लिए सुरक्षित हैं? क्या इनसे दूर रहना चाहिए? या फिर ये आधुनिक जरूरतों का हिस्सा हैं?
इस लेख में हम सबसे पहले समझेंगे कि आनुवंशिक संशोधन का उद्देश्य क्या होता है और क्यों दुनिया भर में जीएम फसलों का उपयोग बढ़ रहा है। इसके बाद, हम जानेंगे कि जीएम फूड्स से जुड़े स्वास्थ्य विवाद कितने सही हैं और वैज्ञानिक शोध इसके बारे में क्या कहते हैं। फिर हम ग्लूटेन को सरल शब्दों में समझेंगे - यह शरीर में क्या करता है और कई लोग इससे संवेदनशील क्यों हो जाते हैं। आगे, हम सीलिएक (Celiac) रोग और आधुनिक दौर में बढ़ती ग्लूटेन असहिष्णुता पर बात करेंगे। इसके बाद, हम यह देखेंगे कि हाई-प्रोसेस्ड (high-processed) खाद्य और संशोधित ग्लूटेन किस तरह छिपे हुए जोखिम पैदा करते हैं। अंत में, हम जानेंगे कि उपभोक्ता के रूप में आप कैसे सुरक्षित रह सकते हैं और अपने आहार में बेहतर विकल्प कैसे चुन सकते हैं।
खाद्य पदार्थों में आनुवंशिक संशोधन: उद्देश्य, फायदे और बढ़ता वैश्विक उपयोग
आनुवंशिक संशोधन (Genetic Modification) का मूल उद्देश्य दुनिया की बढ़ती आबादी के लिए अधिक सुरक्षित, पौष्टिक और टिकाऊ भोजन उपलब्ध कराना है। जब वैज्ञानिक किसी फसल में नया जीन जोड़ते हैं, तो वे उसे अधिक सहनशक्ति, रोग-प्रतिरोध और तेज़ विकास जैसी विशेषताएँ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ फसलों में ऐसा जीन डाला जाता है जो उन्हें कीटनाशकों के बिना भी कीटों से लड़ने की क्षमता देता है, जिससे किसानों का खर्च कम होता है और पर्यावरण पर रसायनों का दबाव घटता है। इसी तरह, कई जीएमओ किस्में कम पानी में भी उग जाती हैं, जो बदलते जलवायु के दौर में बेहद महत्वपूर्ण है। मक्का, सोयाबीन, टमाटर, कपास और आलू जैसी फसलें आज दुनिया के कई देशों में लाखों किसानों के लिए वरदान साबित हो रही हैं, क्योंकि इनमें उत्पादन अधिक और नुकसान कम होता है। हालांकि, उपभोक्ता पक्ष पर जीएमओ को लेकर भावनाएँ अब भी मिश्रित हैं—कुछ लोग इसे भविष्य की आवश्यकता मानते हैं, जबकि कुछ संभावित जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सतर्क रुख अपनाते हैं। इसीलिए, यह मुद्दा वैज्ञानिक, सामाजिक और व्यक्तिगत—तीनों स्तरों पर एक चलती बहस बन चुका है।

जीएम खाद्य पदार्थों से जुड़े प्रमुख स्वास्थ्य विवाद और वैज्ञानिक प्रमाण
जीएम खाद्य पदार्थों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है - क्या ये हमारे स्वास्थ्य के लिए वास्तव में सुरक्षित हैं? कई शोध बताते हैं कि आज बाजार में आने वाले जीएमओ उत्पाद सैकड़ों स्तर के परीक्षणों से गुजरते हैं, जिनमें एलर्जी, विषाक्तता, पोषक गुणवत्ता और दीर्घकालिक प्रभाव जैसी चीज़ों की जाँच शामिल होती है। फिर भी, कुछ अध्ययन यह संकेत देते हैं कि कुछ जीएमओ किस्मों में एलर्जी (allergy) पैदा करने वाले प्रोटीन की संभावना बढ़ सकती है, या लंबे समय में ये प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। सोशल मीडिया (social media) पर जीएम फूड्स को कैंसर से जोड़ने वाली बहसें भी खूब फैलती हैं, जबकि वैज्ञानिक रूप से अभी तक इस दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। असल चिंता यह है कि उपभोक्ताओं को अक्सर ठीक से बताया ही नहीं जाता कि वे जो खाद्य खरीद रहे हैं, उसमें जीएमओ है या नहीं - और यही पारदर्शिता की कमी बड़े विवादों को जन्म देती है। इसलिए, स्वास्थ्य बहस का केंद्र सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि सूचना का अधिकार और कंपनियों की ईमानदार लेबलिंग है।

ग्लूटेन क्या है और यह मानव शरीर में कैसे प्रतिक्रिया करता है?
ग्लूटेन गेहूँ, राई और जौ में पाया जाने वाला एक लचीला, चिपचिपा और बेहद अनोखा प्रोटीन समूह है, जो आटे को फूला हुआ, आकारदार और बेकिंग के लिए उपयुक्त बनाता है। यही कारण है कि रोटी, ब्रेड, पिज़्ज़ा, पास्ता और केक - ये सभी ग्लूटेन की गुणों पर निर्भर करते हैं। अधिकांश लोगों के लिए ग्लूटेन किसी भी तरह से हानिकारक नहीं होता - यह आसानी से पच जाता है और शरीर इसे सामान्य भोजन की तरह ही स्वीकार करता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके शरीर में ग्लूटेन पहुँचते ही सूजन, पेट फूलना, गैस, सिरदर्द, थकान या त्वचा की समस्याएँ दिखाई देने लगती हैं। कुछ मामलों में शरीर ग्लूटेन को खतरे की तरह पहचानने लगता है, और आंतें सूजने लगती हैं। आजकल लोग अपने पाचन, गट हेल्थ (gut health) और माइक्रोबायोम (microbiome) के प्रति पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो चुके हैं - इसी वजह से ग्लूटेन के प्रभाव को लेकर बातचीत भी बढ़ रही है। कई लोग बताते हैं कि ग्लूटेन कम करने से उन्हें हल्कापन, ऊर्जा और मानसिक स्पष्टता बेहतर महसूस होती है।

ग्लूटेन असहिष्णुता, सीलिएक रोग और आधुनिक दौर में बढ़ती संवेदनशीलता
सीलिएक रोग एक गंभीर और जीवनभर के लिए रहने वाली ऑटोइम्यून स्थिति है, जिसमें शरीर गलती से ग्लूटेन पर हमला करने लगता है और आंतों की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती रहती हैं। ऐसे मरीजों को पूरी तरह और सख्ती से ग्लूटेन-मुक्त भोजन का पालन करना पड़ता है। लेकिन आज सिर्फ सीलिएक ही मुद्दा नहीं है - ग्लूटेन असहिष्णुता और गैर-सीलिएक ग्लूटेन संवेदनशीलता दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। लोग बार-बार पेट की समस्याएँ, थकान और मानसिक धुंध (brain fog) जैसी समस्याओं के कारण ग्लूटेन की जाँच करवा रहे हैं। वैज्ञानिक इसका कारण कई आधुनिक जीवनशैली कारकों में खोज रहे हैं - जैसे अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन, आधुनिक गेहूँ की बड़ी हाइब्रिड (hybrid) किस्में, फाइबर की कमी, एंटीबायोटिक (antibiotic) दवाओं का बढ़ता उपयोग, और हमारी आंतों में अच्छे बैक्टीरिया का कम होना। इसके अलावा आज की ब्रेड, पास्ता और बेकरी उत्पाद पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रोसेस्ड हो गए हैं - इससे शरीर का ग्लूटेन के प्रति व्यवहार भी बदल जाता है। यही वजह है कि ग्लूटेन असहिष्णुता सिर्फ रोग नहीं, बल्कि एक बढ़ती स्वास्थ्य प्रवृत्ति बन चुकी है।

संशोधित ग्लूटेन, हाई-प्रोसेस्ड खाद्य और छिपे हुए जोखिम
आज के औद्योगिक खाद्य उद्योग में सिर्फ प्राकृतिक ग्लूटेन नहीं, बल्कि “संशोधित”, “अतिरिक्त”, या “वाइटल ग्लूटेन” (vital gluten) का भी बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। यह ग्लूटेन ब्रेड को ज़्यादा फूला हुआ, अधिक टिकाऊ और लंबे समय तक ताज़ा दिखाने के लिए डाला जाता है। लेकिन इस अतिरिक्त प्रोसेसिंग से ग्लूटेन की संरचना बदल जाती है, और यही कई लोगों के लिए पाचन समस्याओं का कारण बन सकता है। पैक्ड स्नैक्स, तली-भुनी चीज़ें, इंस्टेंट नूडल्स (instant noodles), मैदा-आधारित उत्पाद और फास्ट फूड के साथ शरीर में सूजन बढ़ने लगती है। जब खाना अत्यधिक प्रोसेस्ड होता है, तो उसमें उपस्थित फाइबर, विटामिन और खनिज भी बहुत हद तक नष्ट हो जाते हैं - और हमें सिर्फ “कैलोरी” (calorie) मिलती है, पोषण नहीं। यही कारण है कि दादी-नानी वाले समय की रोटियाँ आज के ब्रेड या पिज़्ज़ा की तुलना में कहीं ज़्यादा आसानी से पच जाती थीं। आधुनिक आहार का यह बदलाव हमारे पाचन तंत्र पर धीरे-धीरे असर डाल रहा है।
उपभोक्ता सुरक्षा: ग्लूटेन व जीएमओ से बचने के व्यावहारिक और प्रमाणिक उपाय
यदि आप अपने खान-पान को लेकर सतर्क रहना चाहते हैं, तो यह बिल्कुल कठिन नहीं - बस थोड़ी जागरूकता की ज़रूरत है। सबसे महत्वपूर्ण कदम है - पैक्ड खाद्य पदार्थों के लेबल पढ़ना। “बायोइंजिनियर्ड” (Bioengineered), “जीऍम् इंग्रीडिएंट्स” (GM Ingredients), “वाइटल ग्लूटेन”, "मॉडीफाइड व्हीट स्टार्च" (Modified Wheat Starch) जैसे शब्द तुरंत संकेत देते हैं कि उत्पाद में ग्लूटेन या जीएम तत्व मौजूद हो सकते हैं। कोशिश करें कि अनाज, दालें और आटा स्थानीय किसानों या विश्वसनीय छोटे मिलों से खरीदें, क्योंकि इनमें रसायन और प्रोसेसिंग दोनों कम होती हैं। यदि आपको ग्लूटेन संवेदनशीलता का संदेह है, तो कुछ हफ्तों तक ग्लूटेन कम कर देखें - आपका शरीर खुद बताएगा कि उसे क्या सूट कर रहा है। ऑर्गेनिक (organic) या न्यूनतम संसाधित विकल्प भी मददगार हो सकते हैं, भले ही उनकी कीमत थोड़ी अधिक हो। खाने का सबसे सरल नियम यही है: जितना प्राकृतिक, उतना सुरक्षित। और अंत में, हमेशा यह ध्यान में रखें कि हर शरीर अलग होता है - इसलिए दूसरों के अनुभवों के बजाय अपने शरीर की प्रतिक्रिया को समझना सबसे महत्वपूर्ण है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/mvj9mc78
https://tinyurl.com/zzbwkj
https://tinyurl.com/2k692u9j
https://tinyurl.com/383x8m25
https://tinyurl.com/3dyp5jy6
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