विश्व हिंदी दिवस पर जानिए हिंदी और देवनागरी लिपि की ऐतिहासिक यात्रा और वैश्विक पहचान

ध्वनि II - भाषाएँ
10-01-2026 09:24 AM
विश्व हिंदी दिवस पर जानिए हिंदी और देवनागरी लिपि की ऐतिहासिक यात्रा और वैश्विक पहचान

भारत की भाषाई पहचान की बात की जाए तो हिंदी और उसकी देवनागरी लिपि स्वतः ही केंद्र में आ जाती हैं। हिंदी केवल दैनिक संवाद की भाषा नहीं है, बल्कि यह सदियों से विकसित होती आई सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक अनुभवों की जीवंत अभिव्यक्ति है। समय के प्रवाह में इस भाषा ने विभिन्न सभ्यताओं, शासनों और जनआंदोलनों के प्रभावों को आत्मसात करते हुए स्वयं को निरंतर समृद्ध किया है, जिसके कारण आज यह न केवल भारत में बल्कि विश्व के अनेक देशों में करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुकी है। हिंदी के साथ जुड़ी देवनागरी लिपि ने इसे एक स्पष्ट, वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया, जिसने ज्ञान, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में इसकी भूमिका को और मज़बूत बनाया। यही वैश्विक स्वीकार्यता और सांस्कृतिक महत्त्व हर वर्ष 10 जनवरी को मनाए जाने वाले विश्व हिंदी दिवस के माध्यम से रेखांकित होता है, जो हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने और उसके प्रचार-प्रसार का प्रतीक है।
इस लेख में हिंदी और देवनागरी लिपि की संपूर्ण यात्रा को समझने का प्रयास किया गया है। सबसे पहले हिंदी की उत्पत्ति और उसके ऐतिहासिक विकास पर चर्चा की जाएगी। इसके बाद मध्यकालीन भारत में फ़ारसी-अरबी प्रभाव और हिंदी-उर्दू के साझा इतिहास को समझा जाएगा। आगे देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, उसकी संरचना, लेखन प्रणाली और अंत में उसकी वैज्ञानिक व सांस्कृतिक विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा।

हिंदी भाषा की उत्पत्ति और ऐतिहासिक यात्रा
हिंदी भाषा की जड़ें प्राचीन भारत की भाषाओं में गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसका मूल स्रोत संस्कृत मानी जाती है, जो वैदिक और शास्त्रीय काल में ज्ञान, दर्शन और साहित्य की प्रमुख भाषा थी। समय के साथ-साथ संस्कृत से सरल जनभाषाओं का विकास हुआ, जिन्हें प्राकृत कहा गया। यही प्राकृत भाषाएँ आगे चलकर अपभ्रंश में परिवर्तित हुईं। अपभ्रंश से ही हिंदी के प्रारंभिक रूप ने जन्म लिया।
7वीं से 10वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में हिंदी का प्रारंभिक स्वरूप, जिसे पुरानी हिंदी कहा जाता है, धीरे-धीरे प्रचलन में आया। यह भाषा आम जनजीवन से जुड़ी थी और इसी कारण इसका विस्तार तेज़ी से हुआ। मध्यकाल तक आते-आते हिंदी ने क्षेत्रीय विविधताओं के साथ एक व्यापक पहचान बना ली, जिसने आगे चलकर आधुनिक हिंदी की नींव रखी।


मध्यकालीन भारत में हिंदी पर फ़ारसी–अरबी प्रभाव
मध्यकालीन भारत में राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का हिंदी भाषा पर गहरा प्रभाव पड़ा। दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल में फ़ारसी और अरबी भाषाएँ प्रशासन, न्याय और साहित्य की प्रमुख भाषाएँ थीं। इनके संपर्क में आने से हिंदी की शब्दावली, शैली और अभिव्यक्ति में बड़ा बदलाव आया।
इस काल में हिंदी ने फ़ारसी-अरबी शब्दों को आत्मसात किया, जिससे उसकी अभिव्यक्ति अधिक समृद्ध और प्रभावशाली बनी। आम बोलचाल से लेकर काव्य और गद्य तक, हिंदी ने नए मुहावरों और शब्दों के माध्यम से अपनी पहुँच को और व्यापक किया। यही वह दौर था जिसने हिंदी को एक लचीली और समावेशी भाषा के रूप में स्थापित किया।

हिंदी और उर्दू का साझा इतिहास और खड़ी बोली
हिंदी और उर्दू का इतिहास अलग-अलग नहीं, बल्कि साझा रहा है। दोनों भाषाओं का आधार दिल्ली और उसके आसपास की खड़ी बोली है। समय के साथ यह बोली ‘हिंदुस्तानी’ भाषा के रूप में पहचानी जाने लगी, जो आम जनता की संपर्क भाषा थी।
बाद में लिपि और शब्दावली के आधार पर अंतर स्पष्ट हुआ। देवनागरी लिपि और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से हिंदी विकसित हुई, जबकि फ़ारसी लिपि और अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ उर्दू का स्वरूप उभरा। इसके बावजूद दोनों भाषाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंध बना रहा। अमीर खुसरो, कबीर, रहीम जैसे कवियों की रचनाएँ इस साझा विरासत का प्रमाण हैं।


देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, विकास और ऐतिहासिक आधार
देवनागरी लिपि का इतिहास लगभग दो हज़ार वर्षों पुराना माना जाता है। इसकी उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से हुई, जो प्राचीन भारत की सबसे महत्वपूर्ण लिपियों में से एक थी। गुप्तकाल में इसके प्रारंभिक रूप दिखाई देने लगते हैं और समय के साथ इसके नियम स्पष्ट होते गए।
11वीं शताब्दी तक देवनागरी एक सुव्यवस्थित और मानकीकृत लिपि बन चुकी थी। यह केवल हिंदी तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्कृत, मराठी, नेपाली और कोंकणी जैसी भाषाओं की भी प्रमुख लिपि बनी। धार्मिक ग्रंथों, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में देवनागरी ने निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध की।

देवनागरी लिपि की संरचना और लेखन प्रणाली
देवनागरी लिपि की संरचना इसे अन्य लिपियों से अलग बनाती है। यह शब्दांश-आधारित लिपि है, जिसमें स्वर और व्यंजन मिलकर ध्वनि का निर्माण करते हैं। इसमें कुल 13 स्वर और 33 व्यंजन होते हैं, जो मात्राओं और हलंत के साथ मिलकर भाषा को स्पष्ट रूप देते हैं।
इस लिपि की सबसे पहचान योग्य विशेषता शिरोरेखा है, जो अक्षरों को जोड़कर शब्द का स्पष्ट रूप प्रस्तुत करती है। बाएँ से दाएँ लिखी जाने वाली यह लिपि पढ़ने और समझने में सहज है, जिससे साक्षरता और शिक्षा में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिक व सांस्कृतिक विशेषताएँ
देवनागरी को विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में गिना जाता है। इसमें उच्चारण और लेखन के बीच लगभग पूर्ण समानता होती है। हर व्यंजन के साथ अंतर्निहित स्वर ‘अ’ जुड़ा होता है, जिसे मात्राओं द्वारा बदला जा सकता है। ध्वनियों का क्रम कंठ, तालु, मूर्धा, दंत और ओष्ठ के आधार पर व्यवस्थित है, जो इसे तार्किक बनाता है।
सांस्कृतिक दृष्टि से देवनागरी केवल एक लेखन प्रणाली नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, दर्शन और साहित्य की संवाहक है। इसके संयुक्त व्यंजन, अनुनासिक चिह्न और ध्वन्यात्मक सटीकता इसे कला और विज्ञान दोनों का संगम बनाते हैं। यही कारण है कि देवनागरी लिपि आज भी भारतीय भाषाई पहचान की रीढ़ बनी हुई है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/mvw4x9xf 
https://tinyurl.com/yc33vyy6 
https://tinyurl.com/mr32e8k5 
https://tinyurl.com/3yyvwrb7 
https://tinyurl.com/yj7ubtav 

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