जौनपुरवासियों, शर्की वंश और जौनपुर सल्तनत का इतिहास आपके शहर की पहचान, संस्कृति और गौरव का वह अध्याय है जिसने इस धरती को “शिराज़-ए-हिंद” की उपाधि दिलाई। यह वह दौर था जब जौनपुर सिर्फ एक राजधानी नहीं, बल्कि उत्तर भारत का ज्ञान-केंद्र, कला-केंद्र और स्थापत्य नवाचारों का उभरता हुआ ध्रुव बन चुका था। शर्की शासकों ने यहाँ ऐसी असाधारण विरासत स्थापित की, जिसमें अटाला और जामी जैसी विशाल मस्जिदें, विद्वानों से भरे मदरसे, सुलेख से जड़े हुए पुस्तकालय, और एक अनुशासित मुद्रा व्यवस्था-सभी ने मिलकर जौनपुर को सभ्यता के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया। इस लेख के माध्यम से जब हम शर्की वंश की परतें खोलते हैं, तो यह केवल इतिहास का अध्ययन नहीं होता, बल्कि जौनपुर की उस आत्मा को महसूस करना होता है, जिसने इस शहर को संस्कृति, शक्ति और ज्ञान का अनमोल संगम बनाया।
आज हम सबसे पहले समझेंगे कि शर्की वंश और जौनपुर सल्तनत की स्थापना किन ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुई और मलिक सरवर ने इस नए राज्य की नींव कैसे रखी। इसके बाद, हम जौनपुर की प्रसिद्ध शर्की वास्तुकला - अटाला मस्जिद, जामी मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद जैसी अनोखी इमारतों - का अध्ययन करेंगे और जानेंगे कि यह शैली क्यों अद्वितीय मानी जाती है। फिर, हम शर्की वंश द्वारा जारी सोने, चाँदी, ताँबे और बिलोन के विविध सिक्कों की विशेषताओं को देखेंगे और समझेंगे कि ये मुद्राएँ आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से कितनी महत्वपूर्ण थीं। अंत में, हम जौनपुरी टंके, हुसैन शाह के अंतिम सिक्कों और अन्य भारतीय सल्तनतों के सिक्कों से उनकी तुलना करके यह जानेंगे कि शर्की मुद्रा-संस्कृति इतिहास में इतनी प्रतिष्ठित क्यों मानी जाती है।
शर्की वंश और जौनपुर सल्तनत की स्थापना का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
जौनपुर सल्तनत का उदय 1394 ई. में उस समय हुआ जब उत्तर भारत राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। तुगलक वंश की केंद्रीय शक्ति कमजोर पड़ रही थी और दिल्ली की सत्ता लगातार विद्रोहों व उत्तराधिकार संघर्षों से जूझ रही थी। ऐसे परिदृश्य में ख्वाजा-ए-जहाँ मलिक सरवर, जो मूलतः एक हिजड़ा (यूनीक) प्रशासक थे, तेज़ी से उभरते हुए एक प्रभावशाली नेता बने। दिल्ली की कमजोर होती पकड़ ने उन्हें अवसर दिया कि वे गंगा-गोमती के दोआब क्षेत्र में एक स्वतंत्र सल्तनत स्थापित करें और जौनपुर को उसकी राजधानी घोषित करें। यह नई सल्तनत केवल सत्ता का प्रतिफल नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक स्वतंत्रता, सैन्य कौशल, सांस्कृतिक निवेश और क्षेत्रीय पहचान की पुनर्स्थापना का संकेत थी। 1394 से लेकर 1479 तक शर्की वंश के शासकों - मुबारक शाह, इब्राहीम शाह, महमूद शाह, मुहम्मद शाह और अंततः हुसैन शाह - ने जौनपुर को "शिराज़-ए-हिंद" बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस काल को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का समय नहीं, बल्कि एक ऐसी नई सभ्यता के उदय का चिन्ह माना जाता है जिसने कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में गहरा प्रभाव डाला।

जौनपुर में शर्की वंश का वास्तुकला योगदान और सांस्कृतिक विरासत
शर्की वंश का नाम लेते ही जौनपुर की विशिष्ट वास्तुकला सबसे पहले सामने आती है, विशेषकर अटाला मस्जिद, जो स्थानीय पत्थरों से बनी हुई विशालता और कलात्मक कुशलता का बेजोड़ उदाहरण है। शर्की शैली की खासियत थी - ऊँचे और गहरे मेहराब, साफ-तराशे हुए पत्थरों की अश्लर मेसनरी (ashler masonry), ज्यामितीय पैटर्न, और स्थानीय हस्तकला का इस्लामी सौंदर्यशास्त्र के साथ अनोखा संगम। इस शैली में भारतीय और मध्य-एशियाई प्रभावों का सुंदर मिश्रण दिखाई देता है, जिसकी झलक जामी मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद और कनैल बाग जैसे धार्मिक - सांस्कृतिक स्थलों में स्पष्ट मिलती है। शर्की शासन ने जौनपुर को न केवल स्थापत्य का केंद्र बनाया, बल्कि शिक्षा और सूफी-परंपरा का एक ऐसा मजबूत गढ़ बनाया जहाँ मदरसों, पुस्तकालयों और विद्वानों का विशेष सम्मान था। इस काल की इमारतों को देखने पर स्पष्ट महसूस होता है कि शर्की शासक केवल राजा नहीं थे, बल्कि सौंदर्य, संस्कृति और ज्ञान के संरक्षक भी थे। जौनपुर आज भी अपनी शर्की विरासत पर गर्व करता है, जो शहर की पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

शर्की वंश द्वारा जारी किए गए सिक्कों की विविधता और उनका महत्व
शर्की वंश की मुद्रा व्यवस्था अत्यंत उन्नत, सुव्यवस्थित और कलात्मक थी, जो इस बात का प्रमाण है कि सल्तनत आर्थिक रूप से कितनी परिपक्व थी। शर्कियों ने सोने के टंके, चाँदी के सिक्के, ताँबे के फॉल्स और बिलोन (मिश्रधातु) सिक्के जारी किए, जिनका प्रयोग प्रशासन, व्यापार, धार्मिक संस्थानों और स्थानीय मंडियों में व्यापक रूप से होता था। इन सिक्कों पर अरबी-फारसी लिपि में लिखे गए शिलालेख अत्यंत सुलेखपूर्ण और संतुलित होते थे, जिनमें तुग़रा शैली की सुंदर घुमावदार लाइनें शासक की वैधता और सत्ता की औपचारिक घोषणा करती थीं। कई सिक्कों पर कुरानिक आयतें और अंश भी अंकित मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि मुद्रा केवल आर्थिक साधन नहीं थी, बल्कि धार्मिक आस्था और शासकीय प्रतिष्ठा का प्रतीक भी थी। शर्की सिक्कों की धातु शुद्धता, वजन की एकरूपता और डिज़ाइन की स्थिरता यह दिखाती है कि सल्तनत ने आर्थिक प्रणाली को बहुत गंभीरता और अनुशासन के साथ संचालित किया। आज भी शर्की सिक्के भारतीय नुमिस्मैटिक्स (Numismatics) में महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री के रूप में देखे जाते हैं।

मलिक सरवर से हुसैन शाह तक विभिन्न शासकों के सिक्का–प्रचलन का विकास
शर्की वंश के छह प्रमुख शासकों ने अपने-अपने शासनकाल में मुद्रा-व्यवस्था में क्रमिक परिवर्तन किए जो सल्तनत की राजनीतिक दिशा और आर्थिक महत्वाकांक्षा को साफ़ दर्शाते हैं। मलिक सरवर ने शुरुआती सिक्कों में स्वतंत्र सत्ता का संदेश प्रमुखता से अंकित किया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि अब जौनपुर दिल्ली से अलग एक स्वतंत्र इकाई है। मुबारक शाह ने सिक्कों को अधिक स्थिर डिज़ाइन के साथ जारी किया, और प्रशासनिक मजबूती को दर्शाने वाले शिलालेखों का उपयोग बढ़ाया। इब्राहीम शाह शर्की, जिन्हें अक्सर शर्की वंश का सबसे प्रभावशाली शासक माना जाता है, ने बड़ी संख्या में सिक्के जारी किए, जिनमें आर्थिक स्थिरता और व्यापारिक प्रसार की झलक दिखाई देती है। उनके बाद आने वाले महमूद शाह और मुहम्मद शाह ने सुलेख कला को और परिष्कृत किया और धार्मिक भावों से भरे कई शिलालेखों को मुद्रा पर स्थान दिया। अंतिम शासक हुसैन शाह शर्की के सिक्कों में सत्ता-संघर्ष और राजनीतिक दबाव की झलक मिलती है, क्योंकि यह वह दौर था जब दिल्ली का लोदी वंश जौनपुर को अपने अधीन करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा था। इस प्रकार, शर्की सिक्कों का विकास उनके शासनकाल की उतार-चढ़ाव भरी राजनीतिक कहानी को भी बयान करता है।
जौनपुर टंका: वजन, धातु, शिलालेख और राजनीतिक संदेश
शर्की वंश की सबसे प्रतिष्ठित मुद्रा था - जौनपुरी सोने का टंका, जिसका वजन लगभग 11.8-11.9 ग्राम होता था। यह टंका अपनी शुद्धता, सौंदर्य और संतुलित शिलालेखों के कारण उत्तरी भारत में एक विशेष प्रतिष्ठा रखता था। टंके पर अरबी लिपि में अंकित शासक का नाम और अल्लाह की सत्ता का स्वीकृति संदेश केवल धार्मिक विश्वास का संकेत नहीं था, बल्कि राजनीतिक वैधता का भी मजबूत साधन था। कुछ टंकों पर पाया जाने वाला शब्द “फ़ि-ज़माँ” यह दर्शाता है कि यह सिक्का सही समय और शासकीय आदेश के अनुरूप जारी किया गया है - जो मुद्रा के व्यवस्थित प्रशासन की पुष्टि करता है। जौनपुर टंका क्षेत्रीय व्यापार के लिए अत्यंत विश्वसनीय माना जाता था, और कई व्यापारी इसे दिल्ली तथा बंगाल की मुद्राओं जितना सम्मान देते थे। इस कारण जौनपुर सल्तनत, भले ही राजनीतिक रूप से एक सीमित क्षेत्र में फैली थी, आर्थिक रूप से एक स्थिर मुद्रा-शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
हुसैन शाह के सिक्कों का राजनीतिक महत्व और उनके शासन का अंतिम दौर
हुसैन शाह शर्की का शासनकाल जौनपुर सल्तनत का सबसे संघर्षपूर्ण चरण था, जिसमें लोदी वंश के साथ लगातार युद्ध और कूटनीतिक तनाव बना रहा। इस अस्थिर राजनीतिक माहौल का सीधा प्रभाव उनके सिक्कों पर दिखाई देता है। हुसैन शाह द्वारा जारी किए गए सिक्कों में सूक्ष्म किन्तु सशक्त शिलालेख अंकित होते थे, जिनका उद्देश्य जनता को यह विश्वास दिलाना था कि शर्की शासन वैध, स्थिर और अल्लाह की इच्छा से संचालित है। इस दौर के सिक्कों की डिज़ाइन अपेक्षाकृत पारंपरिक थी, परंतु शिलालेखों में दृढ़ता और संघर्ष की मानसिकता स्पष्ट महसूस होती है। यह वह समय था जब शर्की सिक्के मात्र आर्थिक लेन-देन का साधन नहीं थे, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक भी थे। हालांकि अंततः 1479 में जौनपुर सल्तनत लोदी वंश के अधीन हो गई, परंतु हुसैन शाह के अंतिम सिक्के यह प्रमाणित करते हैं कि शर्की शासन ने अंत तक अपनी पहचान, अपनी मुद्रा-व्यवस्था और अपने गौरव को संरक्षित रखने का भरपूर प्रयास किया।
भारत के अन्य सल्तनत वंशों के सिक्कों की तुलना और उनका ऐतिहासिक महत्व
जब हम शर्की सिक्कों की तुलना तुगलक, विजयनगर, दक्कन, मदुरा सुल्तानत या रज़िया सुल्तान जैसी अन्य सल्तनतों की मुद्राओं से करते हैं, तो शर्की सिक्कों की विशिष्टता और अधिक स्पष्ट हो जाती है। तुगलक सिक्के जहाँ प्रयोगधर्मी और कई बार अस्थिर आर्थिक नीतियों से प्रभावित होते थे, वहीं विजयनगर के सिक्के धार्मिक प्रतीकों और देवताओं की छवियों से भरे होते थे। दक्कन सुल्तानतों के सिक्कों में स्थानीयता और फारसी शैली का मिश्रण मिलता है। इसके विपरीत, शर्की सिक्के संतुलित, सरल, साफ-सुथरी लिपि और सटीक राजनीतिक संदेश के लिए जाने जाते हैं। वे अत्यधिक सजावट की बजाय स्थिरता, स्पष्ट संदेश और धातु की प्रमाणिकता पर ध्यान देते हैं। यही कारण है कि शर्की मुद्रा को हमेशा एक सुसंगत, अनुशासित और प्रभावशाली प्रणाली के रूप में देखा जाता है। शर्की सिक्कों का महत्व आज भी नुमिस्मैटिक अध्ययन में उतना ही है, क्योंकि वे उस दौर की राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रामाणिक दर्पण प्रस्तुत करते हैं।
संदर्भ -
https://tinyurl.com/yck8vj5b
https://tinyurl.com/3sezsdnt
https://tinyurl.com/34a55bxn
https://tinyurl.com/44nhaj2d
https://tinyurl.com/fmknhxwx
https://tinyurl.com/nkthckaa
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