महात्मा गांधी पुण्यतिथि विशेष: जौनपुर के लिए आज भी ज़रूरी है बापू की आज़ादी की सोच

विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
30-01-2026 09:27 AM
महात्मा गांधी पुण्यतिथि विशेष: जौनपुर के लिए आज भी ज़रूरी है बापू की आज़ादी की सोच

जौनपुरवासियों आज़ादी केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि एक जीवंत सोच है, जो हमारे वर्तमान जीवन से जुड़ी हुई है। जब भी भारत में स्वतंत्रता की चर्चा होती है, तो हमारे मन में सिर्फ़ अंग्रेज़ों से मुक्ति का दृश्य नहीं आता, बल्कि एक ऐसे समाज की तस्वीर उभरती है जहाँ हर व्यक्ति सम्मान, निर्भयता और समान अधिकारों के साथ जीवन जी सके। हर साल 30 जनवरी, महात्मा गांधी की पुण्यतिथि, हमें इसी सच्चाई की याद दिलाती है कि आज़ादी केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि इंसान की सोच, अभिव्यक्ति और जीवन जीने की स्वतंत्रता का विस्तार है।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता को महज़ राजनीतिक लक्ष्य नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक, नैतिक और व्यक्तिगत विकास से जोड़ा। उनका विश्वास था कि जब तक आम आदमी भीतर से स्वतंत्र नहीं होगा, तब तक कोई भी देश वास्तव में आज़ाद नहीं कहलाएगा। यही विचारधारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा देती रही और आज भी जौनपुर जैसे शहरों में रहने वाले लोगों को अपने अधिकार, कर्तव्य और आत्मसम्मान पर विचार करने की प्रेरणा देती है। गांधीजी की पुण्यतिथि हमें उनके त्याग, अहिंसा और सच्ची आज़ादी के मायनों को दोबारा समझने का अवसर देती है।
आज इस लेख में हम गांधीजी की आज़ादी की अवधारणा को चरणबद्ध तरीके से समझेंगे। सबसे पहले जानेंगे कि गांधीजी के अनुसार वास्तविक आज़ादी का सही अर्थ क्या था। फिर हम देखेंगे कि अभिव्यक्ति, धर्म और नागरिक स्वतंत्रता की गांधीवादी व्याख्या समाज को कैसे मज़बूत बनाती है। इसके बाद समझेंगे कि अहिंसा क्यों गांधीजी की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी ताक़त थी। आगे हम बात करेंगे स्वराज और आत्मनिर्भरता के गांधीवादी दृष्टिकोण की। और अंत में जानेंगे कि कैसे गांधीजी का सपना था कि आजादी गाँव, ग़रीब और अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

गांधीजी के अनुसार वास्तविक आज़ादी का सही अर्थ
महात्मा गांधी के लिए आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं थी। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता तब आती है, जब व्यक्ति बिना भय के सोच सके, बोल सके और सही-ग़लत के बीच स्वयं निर्णय ले सके। वे मानते थे कि अगर कोई समाज भीतर से डरा हुआ है, असमानता से भरा है और अपने अधिकारों को पहचान नहीं पाता, तो वह भले ही राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो, लेकिन असल में ग़ुलाम ही रहता है। गांधीजी ने कहा था कि स्वराज का अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि हर व्यक्ति में अन्याय का विरोध करने की क्षमता पैदा करना है। उनके लिए स्वतंत्रता का केंद्र सरकार नहीं, बल्कि आम इंसान था। वे चाहते थे कि हर नागरिक अपने आत्मसम्मान, नैतिक मूल्यों और ज़िम्मेदारियों के साथ जीवन जिए। यही वजह है कि गांधीजी की आज़ादी की परिभाषा सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता से गहराई से जुड़ी हुई थी।

अभिव्यक्ति, धर्म और नागरिक स्वतंत्रता की गांधीवादी व्याख्या
गांधीजी का मानना था कि किसी भी लोकतंत्र की मज़बूती नागरिक स्वतंत्रताओं पर टिकी होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा की स्वतंत्रता, संगठन बनाने का अधिकार और धर्म की आज़ादी समाज को जीवंत बनाते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह बिना डर के अपनी राय रख सके और सरकार से सवाल पूछ सके। धर्म की स्वतंत्रता भी गांधीजी के विचारों में बहुत अहम थी। उनके अनुसार हर व्यक्ति को अपने विश्वास, पूजा और विचार प्रकट करने का पूरा अधिकार होना चाहिए। वे धर्म को विभाजन नहीं, बल्कि मानवता से जोड़ने का माध्यम मानते थे। इसी तरह प्रेस की स्वतंत्रता भी उनके लिए आवश्यक थी, ताकि सच्चाई जनता तक पहुँच सके। गांधीजी मानते थे कि जब तक लोग स्वतंत्र रूप से बोल और लिख नहीं सकते, तब तक समाज में वास्तविक बदलाव संभव नहीं है।

अहिंसा: गांधीजी की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी ताक़त
गांधीजी की विचारधारा का सबसे मज़बूत स्तंभ अहिंसा था। उन्होंने हिंसा को आज़ादी का रास्ता नहीं माना। उनका विश्वास था कि हिंसक जीत केवल यह साबित करती है कि ताक़तवर जीत गया, लेकिन उससे न्याय स्थापित नहीं होता। इसके विपरीत अहिंसा हर व्यक्ति को संघर्ष का अवसर देती है। गांधीजी कहते थे कि अहिंसा कायरों का नहीं, बल्कि साहसी लोगों का हथियार है। अहिंसक आंदोलन में दुश्मनी नहीं होती, बल्कि अंत में विरोधी भी मित्र बन सकते हैं। उनके अनुसार सच्ची स्वतंत्रता वही है जो बिना रक्तपात के समाज को बदल दे। यही कारण है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दुनिया में नैतिक संघर्ष के रूप में देखा गया।

स्वराज और आत्मनिर्भरता का गांधीवादी दृष्टिकोण
गांधीजी स्वराज को केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन शैली मानते थे। वे चाहते थे कि भारत आत्मनिर्भर बने। इसी सोच से उन्होंने खादी, कुटीर उद्योग और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि अगर लोग अपनी ज़रूरतें खुद पूरी करेंगे, तो वे मानसिक रूप से भी स्वतंत्र बनेंगे। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का उद्देश्य केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि यह आत्मसम्मान और आत्मशक्ति से जुड़ा था। गांधीजी कहते थे कि सरकार से माँगने से उसकी शक्ति बढ़ती है, लेकिन खुद उत्पादन करने से व्यक्ति सशक्त बनता है। इस तरह स्वराज का अर्थ उनके लिए अपने जीवन पर स्वयं नियंत्रण रखना था।

गाँव, ग़रीब और अंतिम व्यक्ति तक आज़ादी पहुँचाने का सपना
गांधीजी का सबसे गहरा विचार यह था कि भारत तब तक स्वतंत्र नहीं होगा, जब तक आज़ादी सबसे ग़रीब झोपड़ी तक नहीं पहुँचेगी। उनके अनुसार राजधानी में सत्ता बदल जाना ही स्वराज नहीं है। असली स्वराज तब होगा, जब गाँव का आम इंसान भी सम्मान, रोज़गार और निर्भय जीवन पाएगा। वे कहते थे कि स्वतंत्रता का मतलब केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति नहीं, बल्कि हर प्रकार के शोषण से छुटकारा है। गांधीजी का सपना था कि हर व्यक्ति गरिमा और निडरता के साथ जिए। यही विचार आज भी हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी आज़ादी केवल क़ानूनी है या वास्तव में मानवीय भी।

संदर्भ
https://bit.ly/3UHzwnw 
https://bit.ly/2WqHX7L 
https://bit.ly/3Rj1jb1 
https://bit.ly/2CYyYne
https://tinyurl.com/bdstj8va 

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