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जौनपुरवासियों, नया साल नई संभावनाओं का संकेत देता है, और खेतों-बाग़ों में अंकुरित होता हर बीज हमें सिखाता है कि जीवन प्रकृति में कैसे जन्म लेता और आगे बढ़ता है। पौधों को बढ़ते देखना हमेशा संतोष देने वाला अनुभव रहा है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटा बीज आखिर कैसे पूरा पेड़ बन जाता है? पौधे कैसे अपनी अगली पीढ़ी तैयार करते हैं और धरती पर हरा-भरा जीवन कैसे कायम रहता है? इसी अद्भुत रहस्य को समझने के लिए आज हम एक ऐसी वैज्ञानिक यात्रा पर चलेंगे जो प्रकृति की गहराइयों से जुड़ी है - पौधों में प्रजनन की प्रक्रिया से। यह विषय न केवल छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए, बल्कि उन सभी लोगों के लिए भी उपयोगी है जो प्रकृति और कृषि को समझना चाहते हैं, खासकर जौनपुर जैसे शहर के लिए जहाँ खेती और हरा - भरा पर्यावरण हमारी पहचान है।
इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से पौधों में प्रजनन की भूमिका और आवश्यकता को समझेंगे। इसके बाद हम जानेंगे कि लैंगिक प्रजनन फूल वाले और बिना फूल वाले पौधों में कैसे होता है और यह आनुवंशिक विविधता में कैसे योगदान देता है। फिर हम अलैंगिक प्रजनन और क्लोनों (clones) के निर्माण की प्रक्रिया पर ध्यान देंगे और देखेंगे कि यह तेजी से पौधों की संख्या बढ़ाने में कैसे सहायक है। आगे हम वानस्पतिक प्रसार की प्रमुख विधियाँ - जैसे कंद, घनकंद, प्रकंद और भूस्तारी - को वास्तविक उदाहरणों के साथ विस्तार से समझेंगे। अंत में, हम बीज द्वारा प्रजनन और अंकुरण की पूरी यात्रा पर चर्चा करेंगे, जिसमें एक छोटा बीज मिट्टी में जीवन पाकर एक नया पौधा बन जाता है।

पौधों में प्रजनन क्या है और यह क्यों आवश्यक है?
पौधों में प्रजनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पौधे अपने समान नए पौधे उत्पन्न करते हैं, जिससे उनकी प्रजाति निरंतर बनी रहती है। यदि पौधे प्रजनन न करें, तो समय के साथ सभी पेड़-पौधे विलुप्त हो सकते हैं, जिससे न केवल भूमि पर वनस्पति समाप्त होगी बल्कि जानवरों, मनुष्यों और सूक्ष्मजीवों सहित पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन टूट जाएगा। पौधे पृथ्वी के प्राथमिक उत्पादक हैं - वे भोजन श्रृंखला की नींव हैं और प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन (oxygen) का निर्माण करते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन को जीवित रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रजनन के माध्यम से पौधे बढ़ती आबादी की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने में भी योगदान देते हैं, क्योंकि फल, अनाज, दालें और सब्जियाँ इन्हीं से प्राप्त होती हैं। इसके अलावा, लकड़ी, गोंद, कागज, रबर, औषधियाँ और वस्त्रों जैसी हजारों आवश्यक वस्तुएँ भी पौधों से ही मिलती हैं। इस प्रकार प्रजनन का उद्देश्य केवल संतति उत्पन्न करना ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जैव विविधता, पर्यावरणीय स्थिरता और प्राकृतिक संसाधनों की निरंतरता को बनाए रखना भी है।
लैंगिक प्रजनन: फूल वाले और बिना फूल वाले पौधों में प्रक्रिया
लैंगिक प्रजनन पौधों में एक जटिल और वैज्ञानिक रूप से अत्यंत विकसित प्रक्रिया है, जिसमें नर और मादा युग्मकों के संयोग से एक नए पौधे का निर्माण होता है। फूल वाले पौधों में यह प्रक्रिया फूल के माध्यम से होती है, जिसमें पुंकेसर परागकण प्रदान करता है और वर्तिका मादा भाग के रूप में निषेचन के लिए तैयार रहती है। जब हवा, कीट, तितली, भंवरा या पक्षी परागकणों को वर्तिकाग्र तक पहुँचाते हैं तो परागनलिका निर्मित होकर अंडाशय में स्थित अंडाणु से मिलती है, जिससे भ्रूण बनता है और धीरे-धीरे बीज विकसित होता है। वहीं बिना फूल वाले पौधों जैसे फर्न (fern), शैवाल और ब्रायोफाइट्स (bryophytes) में बीज नहीं होते, बल्कि सूक्ष्म बीजाणु उत्पन्न होते हैं जो हवा या पानी के माध्यम से फैलकर अनुकूल वातावरण मिलने पर नए पौधों में बदल जाते हैं। लैंगिक प्रजनन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पौधों में आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है, जिससे पौधे बदलती जलवायु, रोगों और पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम होते हैं।

अलैंगिक प्रजनन और क्लोनों का निर्माण
अलैंगिक प्रजनन पौधों में एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें नर और मादा कोशिकाओं के मिलन की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि पौधे के किसी भाग - जैसे जड़, तना, पत्ती या शाखा - से ही नया पौधा विकसित हो जाता है। इस विधि में बनने वाली संतति माता पौधे के समान होती है, इसलिए इन्हें क्लोन कहा जाता है। यह प्रजनन विधि प्राकृतिक परिस्थितियों में भी होती है, लेकिन कृषि और वानस्पतिक विज्ञान में इसे बड़े पैमाने पर इसलिए अपनाया जाता है क्योंकि इससे कम समय में बड़ी संख्या में पौधे तैयार किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, आलू, गन्ना और केले जैसे पौधे प्रायः अलैंगिक प्रजनन द्वारा उगाए जाते हैं ताकि उत्पादन अधिक और समान गुणवत्ता वाला हो। हालांकि, इसका एक बड़ा नुकसान भी है - चूँकि आनुवंशिक विविधता नहीं होती, इसलिए यदि किसी रोग या कीट ने एक पौधे को प्रभावित किया तो सभी समान पौधों के नष्ट होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके बावजूद प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रहने और तेजी से विकास करने की क्षमता के कारण यह पौधों में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रजनन पद्धति मानी जाती है।

वानस्पतिक प्रसार की प्रमुख विधियाँ और वास्तविक उदाहरण
अलैंगिक प्रजनन का सबसे प्रभावशाली और व्यापक रूप से उपयोग होने वाला रूप है वानस्पतिक प्रसार, जिसमें पौधों की जड़, तना, पत्ती या कली के भाग से नया पौधा विकसित होता है। यह विधि प्राकृतिक रूप से भी होती है और मनुष्यों द्वारा नियंत्रित रूप से भी, इसलिए यह कृषि, बागवानी और व्यावसायिक पौध उत्पादन का आधार है। वानस्पतिक प्रसार की कई विधियाँ हैं -
क्योंकि इस प्रक्रिया में पौधे बहुत तेजी से बढ़ते हैं और गुणवत्ता समान रहती है, इसलिए किसान अधिक उपज, बागवानी में सजावटी पौधों के विकास, और औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं।
बीज द्वारा प्रजनन: परागण से बीज निर्माण तक
बीज द्वारा प्रजनन पौधों की सबसे सामान्य और व्यापक प्रजनन विधि है, जिसके अंतर्गत बीज उत्पन्न होकर नई पौध तैयार होती है। यह संपूर्ण प्रक्रिया तीन चरणों में विभाजित होती है - परागण, निषेचन और बीज निर्माण। परागण के दौरान परागकण पुंकेसर से वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, जो हवा, पानी, कीटों और जानवरों की सहायता से संभव होता है। इसके बाद निषेचन होता है जिसमें अंडाणु और परागकण का मिलन होता है और भ्रूण का निर्माण होता है। भ्रूण धीरे-धीरे परिपक्व होकर बीज का रूप लेता है और जब बीज पूरी तरह विकसित होकर सूख जाता है, तो वह माता पौधे से अलग होकर फैलाव की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है। बीजों का फैलाव अत्यंत रोचक है - हवा रूई और घास के बीजों को उड़ाकर ले जाती है, जल नारियल जैसे पौधों को दूर-दूर तक ले जाता है, जबकि पक्षी और जानवर फल खाकर बीजों को नए स्थानों पर पहुंचाते हैं। इस पद्धति के माध्यम से पौधे पृथ्वी के विभिन्न भागों में फैलते हैं और नई प्रजातियों के विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

अंकुरण: बीज से नए पौधे बनने की शुरुआत
अंकुरण वह प्रक्रिया है जिसके दौरान निष्क्रिय और सूखा बीज पुनः सक्रिय होकर एक नए पौधे का निर्माण करता है। जब बीज मिट्टी में गिरकर नमी प्राप्त करता है, तो वह पानी सोखकर फूल जाता है और उसके भीतर मौजूद एंजाइम (enzyme) सक्रिय हो जाते हैं। एंजाइम सूखे बीज में संग्रहित भोजन को विघटित करके ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे भ्रूण विकसित होना प्रारंभ करता है। अंकुरण के दौरान सबसे पहले मूलक (root) विकसित होकर मिट्टी में गहराई तक पहुँचता है, जिससे पौधे को स्थिरता और पानी मिलता है। इसके बाद कली (shoot) ऊपर की ओर बढ़ती है और पत्तियाँ विकसित होकर सूर्य के प्रकाश की सहायता से प्रकाश संश्लेषण शुरू करती हैं। यहीं से पौधा बाहरी पोषण पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं भोजन बनाना शुरू कर देता है। अंकुरण पौधे के जीवन चक्र की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है, क्योंकि इसी क्षण से बीज एक नयी स्वतंत्र पहचान और जीवन यात्रा प्राप्त करता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/54vf5h2d
https://tinyurl.com/ux4m46wa
https://tinyurl.com/yc8nfyfk
https://tinyurl.com/zfhvm8bb
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