क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर को कभी 'शिराज़-ए-हिंद' यानी भारत का शिराज़ कहा जाता था? यह उपाधि इसे मध्यकाल में शर्की राजवंश के शासन के दौरान इसकी फलती-फूलती फ़ारसी संस्कृति, साहित्य और वास्तुकला के कारण मिली थी। जौनपुर की इस सांस्कृतिक प्रमुखता और विद्वता के क्षेत्र में इसके अमूल्य योगदान की तुलना फ़ारस (ईरान) के प्रसिद्ध शहर शिराज़ से की जाती थी। लेकिन इस गहरे सांस्कृतिक जुड़ाव को पूरी तरह से समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटकर प्राचीन ईरान, वहां के महान विचारक ज़राथुस्त्र और 'ईरान' शब्द की उत्पत्ति के दिलचस्प सफर को समझना होगा।
ज़राथुस्त्र कौन थे और उन्होंने प्राचीन ईरानी दर्शन को कैसे आकार दिया?
ज़राथुस्त्र (Zarathustra - जिन्हें पारसी धर्म का आध्यात्मिक संस्थापक माना जाता है) एक प्राचीन ईरानी धार्मिक सुधारक थे, जिन्होंने उस समय के ईरानी धर्म की मान्यताओं को एक नई चुनौती दी थी। सबसे पुराने पारसी धर्मग्रंथों 'गाथा' में उन्हें एक उपदेशक और कवि-पैगंबर के रूप में वर्णित किया गया है। उनके जन्म और काल को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग राय मौजूद है; कुछ विद्वान भाषाई और सामाजिक-सांस्कृतिक साक्ष्यों के आधार पर यह मानते हैं कि उनका काल दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के आसपास था, जबकि पारंपरिक रूप से इसे सातवीं और छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। उनके नाम का अर्थ संभवतः "वह जो ऊंटों का प्रबंधन करता है" से जुड़ा हुआ है।

पारसी परंपरा के अनुसार, ज़राथुस्त्र को कम उम्र से ही एक पुजारी के रूप में प्रशिक्षित किया गया था और लगभग तीस वर्ष की आयु में उन्हें एक ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी ज्ञान के ज़रिए उन्होंने 'अहुरा मज़्दा' (बुद्धिमान ईश्वर) और सत्य (अशा) बनाम धोखे (द्रुज) के द्वैतवाद को पहचाना। उनके दर्शन ने मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा और अपने कर्मों के प्रति व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी पर बहुत ज़ोर दिया। ज़राथुस्त्र का मानना था कि इंसान को सही या गलत चुनने की पूरी आज़ादी है, और यह अहुरा मज़्दा का कोई सीधा आदेश नहीं है। उन्होंने अपने अनुयायियों को अच्छे विचारों, अच्छे शब्दों और अच्छे कार्यों के माध्यम से सत्य के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी। पारसी धर्म अंततः छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ग्रेटर ईरान (Greater Iran) का सबसे प्रमुख धर्म बन गया और सातवीं शताब्दी ईस्वी तक इसे ससानिद साम्राज्य के दौरान आधिकारिक मान्यता प्राप्त रही। ज़राथुस्त्र के दर्शन का प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके लौकिक द्वैतवाद और व्यक्तिगत नैतिकता की अवधारणाओं ने बाद में यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्मों को भी किसी न किसी रूप में गहराई से प्रभावित किया।
'ईरान' शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
जिस फ़ारसी संस्कृति ने बाद में भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित किया, उस 'ईरान' शब्द का इतिहास भी बेहद समृद्ध है। 'ईरान' शब्द की उत्पत्ति सीधे तौर पर तीसरी शताब्दी के मध्य फ़ारसी शब्द 'एरान' से हुई है, जिसका शुरुआती अर्थ "आर्यों का" था। समय के साथ इसने एक भौगोलिक अर्थ ले लिया, जो उस पूरी भूमि को दर्शाता था जहां आर्य निवास करते थे। भौगोलिक और जातीय दोनों ही पैमानों पर, 'एरान' को 'अनेरान' (यानी गैर-ईरान या गैर-आर्य) से बिल्कुल अलग माना जाता था। सबसे पहले इस शब्द का प्रयोग अर्दशीर प्रथम (Ardashir I - दो सौ चौबीस से दो सौ बयालीस ईस्वी) के शिलालेखों में मिलता है, जहां इस राजा ने स्वयं को "आर्यों के राजाओं का राजा" कहा था। उनके बेटे और उत्तराधिकारी शापुर प्रथम ने इस उपाधि का और विस्तार किया और खुद को "ईरानियों और गैर-ईरानियों के राजाओं का राजा" घोषित किया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उनके साम्राज्य में काकेशस जैसे कई ऐसे क्षेत्र भी शामिल थे जहां मुख्य रूप से गैर-ईरानी लोग निवास करते थे।
इस्लामी युग की शुरुआत में अरबी भाषी खलीफ़ाओं के बीच 'एरान' शब्द का कोई विशेष चलन नहीं था, क्योंकि वे पश्चिमी ईरान के लिए 'अल-अजम' और 'अल-फुर्स' (फ़ारस) जैसे अरबी शब्दों का प्रयोग करना ज़्यादा पसंद करते थे। लेकिन आठवीं शताब्दी के मध्य में अब्बासी खलीफ़ाओं के उदय के साथ ही ईरानी पहचान का एक नया पुनरुद्धार शुरू हुआ। नौवीं और दसवीं शताब्दी में ताहिरिद (Tahirid), सफ़्फ़ारिद (Saffarid) और सामनिद (Samanid) जैसे कई राजवंशों ने खुद को "ईरानी" के रूप में पहचाना। सफ़वी राजवंश (1501 से 1736) के दौरान शासकों ने फिर से अपने लिए "शाहंशाह-ए-ईरान" (ईरान के राजाओं का राजा) की उपाधि धारण की। सदियों के इस ऐतिहासिक सफर के बाद, अंततः उन्नीस सौ पैंतीस में पश्चिमी दुनिया में भी इस देश के लिए 'ईरान' नाम का आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल होने लगा और इसने फ़ारस सहित अन्य सभी पुराने नामों की जगह हमेशा के लिए ले ली।
मध्यकालीन भारत में जौनपुर को 'शिराज़-ए-हिंद' क्यों कहा जाता था?
फ़ारस की इसी महान सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत का अक्स मध्यकालीन भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित जौनपुर शहर में देखने को मिला। जौनपुर की स्थापना की कहानी केवल संस्कृति की नहीं, बल्कि सैन्य रणनीति और राजनीतिक आवश्यकता की भी है। 1369 में सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक (Firoz Shah Tughlaq) ने गोमती नदी के तट पर इस नए शहर को स्थापित करने का रणनीतिक निर्णय लिया। यह शहर विद्रोही बंगाल सल्तनत के खिलाफ दिल्ली का एक मज़बूत गढ़ बनाने के इरादे से बसाया गया था। मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई जौना खान के नाम पर बसे इस शहर को उपजाऊ कृषि भूमि, व्यापार के लिए सुविधाजनक नदी मार्ग और पूर्वी व्यापार मार्गों पर नियंत्रण का एक ज़बरदस्त प्राकृतिक लाभ मिला।
इस शहर का असली परिवर्तन तब शुरू हुआ जब 1394 में मलिक सरवर नामक नियुक्त गवर्नर ने कमज़ोर होती दिल्ली सल्तनत से अपनी पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसी साहसिक कदम के साथ शर्की सल्तनत की नींव पड़ी, जिसने जौनपुर को अभूतपूर्व सांस्कृतिक और स्थापत्य ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इस शर्की शासन के तहत ही जौनपुर वास्तव में 'शिराज़-ए-हिंद' के रूप में मशहूर हुआ। यह उपाधि केवल एक रस्मी नाम नहीं थी, बल्कि यह इस्लामी शिक्षा, संस्कृति और कलात्मक उत्पादन के एक विशाल केंद्र के रूप में जौनपुर की वास्तविक और ज़मीनी उपलब्धि को दर्शाती थी। सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक द्वारा स्थापित यह शहर पूरे क्षेत्र और भारत में इस्लामी कला और ज्ञान का एक प्रमुख केंद्र बन गया था।
जौनपुर की वास्तुकला और सूफी संस्कृति ने इसे एक सांस्कृतिक केंद्र कैसे बनाया?
शर्की शासकों के संरक्षण में जौनपुर वास्तुकला के नवाचार की एक महान प्रयोगशाला बन गया, जिसमें इंडो-इस्लामिक परंपराओं का स्थानीय भारतीय विशेषताओं के साथ एक बेहतरीन और अनोखा मिश्रण देखने को मिला। इब्राहिम शाह शर्की (Ibrahim Shah Sharqi) के शासनकाल में निर्मित अटाला मस्जिद इस शर्की वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट और शानदार उदाहरण है। प्राचीन अटाला देवी मंदिर के स्थान पर बनी यह मस्जिद अपनी 'शर्की मेहराब' (arch) के लिए जानी जाती है। ये मेहराब अपने नुकीले आकार और जटिल ज्यामितीय पैटर्न से सजे थे, जिन्होंने जौनपुर की वास्तुकला को अन्य समकालीन इस्लामी केंद्रों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट बना दिया। इसी तरह, लाल दरवाज़ा मस्जिद में तिमुरिद वास्तुकला के स्पष्ट प्रभाव दिखाई देते हैं, जो मध्य एशिया के साथ जौनपुर के गहरे सांस्कृतिक संबंधों को प्रमाणित करते हैं। लाल बलुआ पत्थर से बनी इस मस्जिद की जटिल टाइल का काम, उत्कृष्ट सुलेख (Calligraphy) और ज्यामितीय पैटर्न उस समय के सबसे महान इस्लामी केंद्रों की कला को सीधी टक्कर देते थे।

पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत में जौनपुर ने पूरे इस्लामी जगत के नामी विद्वानों, कवियों, संगीतकारों और सूफी संतों को अपनी ओर आकर्षित किया। सूफीवाद को यहां विशेष रूप से उपजाऊ ज़मीन मिली, और शर्की शासकों के संरक्षण में रहस्यवादी परंपराएं रूढ़िवादी इस्लामी प्रथाओं के साथ-साथ खूब फली-फूलीं। सूफी संतों के इसी आध्यात्मिक प्रभाव से साहित्य और कला में भी ज़बरदस्त निखार आया; सूफी कविताएं स्थानीय भाषाओं के साथ-साथ फ़ारसी और अरबी में भी रची जाने लगीं। जौनपुर का शाही दरबार शास्त्रीय भारतीय संगीत के विकास के लिए भी बेहद प्रसिद्ध हुआ। यहां के संगीतकारों ने फ़ारसी, मध्य एशियाई और स्थानीय भारतीय तत्वों को मिलाकर नई रागों और संगीत रचनाओं का प्रयोग किया, जिसने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्रमिक विकास में एक बहुत बड़ा योगदान दिया।
जौनपुर का यह सुनहरा युग अंततः चौदह सौ उनासी (1479) में तब समाप्त हुआ जब दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने एक लंबी घेराबंदी के बाद शहर पर अपना कब्ज़ा कर लिया। इसके साथ ही शर्की सल्तनत का दुखद अंत हो गया और कई कुशल शिल्पकार व महान विद्वान अन्य दरबारों में पलायन कर गए। मुग़ल शासन के दौरान, विशेषकर सम्राट अकबर के समय में, शहर की रणनीतिक और सांस्कृतिक महत्ता को पहचानते हुए कुछ पुनर्निर्माण कार्य अवश्य हुए, लेकिन यह शहर अपना पुराना क्षेत्रीय दबदबा पूरी तरह से वापस नहीं पा सका। आज भी अटाला मस्जिद और लाल दरवाज़ा मस्जिद जैसी शानदार इमारतें जौनपुर के उसी मध्यकालीन गौरव की याद दिलाती हैं, और यह साबित करती हैं कि कैसे एक क्षेत्रीय केंद्र भी सही परिस्थितियों में अभूतपूर्व सांस्कृतिक और स्थापत्य ऊंचाइयों को छू सकता है।
संदर्भ
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2. https://tinyurl.com/23mqseh5
3. https://tinyurl.com/2dbp7dht
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