भारतीय साहित्य में आम जनजीवन, ग्रामीण यथार्थ, किसानों के शोषण और सामाजिक रूढ़ियों को जितनी संवेदनशीलता और गहराई से मुंशी प्रेमचंद ने चित्रित किया है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में विरले ही मिलता है। 31 जुलाई 1880 को बनारस से चार मील दूर लमही गाँव में जन्मे धनपतराय श्रीवास्तव को आज दुनिया 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम के सिपाही' के रूप में जानती है। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन घोर अभावों, पारिवारिक त्रासदियों और लगातार संघर्षों के बीच बीता। किंतु जीवन की भयंकर विषमताओं ने उनकी सृजनशीलता को दबाने के बजाय और अधिक धारदार बना दिया। उन्होंने समाज के वंचितों, गरीबों और उपेक्षितों की पीड़ा को केवल कागज़ पर उकेरा ही नहीं, बल्कि स्वयं उसे हर क्षण जिया भी।
धनपतराय का बचपन किन विषम परिस्थितियों और घोर अभावों में बीता?
प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन अत्यंत दुखद और संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में एक मामूली नौकर के रूप में कार्य करते थे। जब धनपतराय केवल आठ वर्ष के थे, तब उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया, जिसके कारण बालक धनपतराय मातृ-स्नेह से सर्वथा वंचित रह गए। घर में भयंकर गरीबी थी; न पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े थे और न ही खाने के लिए भरपेट भोजन। सौतेली माँ का कठोर और उपेक्षित व्यवहार बालक के संवेदनशील मन को भीतर तक कचोटता था, जिसकी टीस बाद में उनकी अनेक प्रसिद्ध कहानियों में पात्रों के माध्यम से परिलक्षित हुई।
जब वे केवल 15 वर्ष के थे और नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता ने बिना सोचे-समझे उनका विवाह एक उम्र में बड़ी और कटुभाषी कन्या से करा दिया। इस बेमेल विवाह से प्रेमचंद का वैवाहिक जीवन अत्यंत कष्टप्रद हो गया। विवाह के ठीक एक वर्ष बाद पिता का भी देहांत हो गया। अचानक 16 वर्ष के किशोर धनपतराय के कंधों पर पाँच सदस्यों—विमाता, उनके दो छोटे बच्चे, पत्नी और स्वयं—के भरण-पोषण का भारी बोझ आ गया। आर्थिक तंगी का यह आलम था कि उन्हें अपना कोट और व्यक्तिगत पुस्तकें तक बेचनी पड़ीं। वे गाँव से बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। आगे चलकर वकील बनने की तमन्ना थी, किंतु गरीबी ने सपने तोड़ दिए। स्कूल आने-जाने के खर्च से बचने के लिए उन्होंने एक वकील के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया, जहाँ उन्हें प्रतिमाह पाँच रुपये मिलते थे। इन पाँच रुपयों में से तीन रुपये वे गाँव में परिवार को भेजते थे और शेष दो रुपयों से महीने भर अभावों के बीच रहकर उन्होंने किसी प्रकार अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
पुस्तकें पढ़ने की दीवानगी ने कैसे एक सेल्स बॉय को महान लेखक बना दिया?
विषम परिस्थितियों के बावजूद साहित्य के प्रति प्रेमचंद का अनुराग कभी कम नहीं हुआ। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि वे किताबों की दुनिया में ही अपनी तन्हाई का सुकून ढूँढ़ने लगे। इसी शौक को पूरा करने के लिए उनकी पहली नौकरी एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर 'सेल्स बॉय' के रूप में हुई। वहाँ काम करने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि वे दुकान पर बैठकर बिना पैसे खर्च किए अधिक से अधिक उपन्यास पढ़ सकें। दो से तीन वर्षों के भीतर ही उन्होंने कितने ही उर्दू उपन्यास पढ़ डाले।
उपन्यास पढ़ने की उनकी दीवानगी इस हद तक थी कि एक उपन्यास पढ़ने के लिए उन्होंने एक तंबाकू विक्रेता से मित्रता कर ली और उसकी दुकान पर बैठकर प्रसिद्ध तिलिस्मी गाथा 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' पूरी पढ़ डाली। कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासकार रोनाल्ड (Ronald) की कृतियों के उर्दू अनुवाद पढ़ लिए थे। 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पहली व्यंग्यात्मक रचना 'मॉकरी' (Mockery) लिखी, जो उनके एक नाते के मामू (चाचा) पर केंद्रित थी, क्योंकि वे प्रेमचंद को किस्से-कहानियाँ पढ़ने पर डांटते थे। वर्ष 1894 में उन्होंने 'होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात' नामक नाटक लिखा। इसके बाद 1898 में ऐतिहासिक उपन्यास 'रूठी रानी' और 1902 में 'प्रेमा' तथा 1904-05 में 'हम खुर्मा व हम सवाब' उपन्यासों की रचना की, जिनमें विधवा-समस्या का सजीव चित्रण किया गया।
'सोज़े वतन' पर अंग्रेज़ों का पहरा और नवाब राय के 'प्रेमचंद' बनने की कहानी क्या है?
वर्ष 1905 में पारिवारिक कटुता के चलते पहली पत्नी मायके चली गई और कभी नहीं लौटी, यद्यपि प्रेमचंद वर्षों तक उन्हें खर्चा भेजते रहे। 1905 के अंत में उन्होंने एक बाल-विधवा शीवरानी देवी से दूसरा विवाह किया। इस विवाह के बाद उनके जीवन में कुछ आर्थिक स्थिरता आई और वे शिक्षा विभाग में स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए।

आरंभ में वे 'नवाब राय' के नाम से उर्दू में लिखते थे। वर्ष 1907 में उनका पाँच देशभक्तिपूर्ण कहानियों का ऐतिहासिक संग्रह 'सोज़े वतन' (वतन का दुख-दर्द) प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में स्वाधीनता और देशप्रेम की ऐसी प्रखर भावना थी कि अंग्रेज़ी हुकूमत सतर्क हो गई। अंग्रेज़ शासकों ने इसे खुली बगावत मानते हुए नवाब राय को तलब किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रेमचंद के सामने ही 'सोज़े वतन' की सभी उपलब्ध प्रतियों को आग के हवाले कर दिया और उन पर बिना पूर्व अनुमति के लिखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
सरकारी नौकरी और इस प्रशासनिक बंधन के कारण लेखन जारी रखना कठिन हो गया। तब प्रेमचंद ने अपने घनिष्ठ मित्र और 'ज़माना' पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम से परामर्श किया। मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें गुप्त रूप से 'प्रेमचंद' नाम से लिखने का बहुमूल्य सुझाव दिया। इसके बाद धनपतराय हमेशा के लिए 'प्रेमचंद' बन गए, और पाठकों ने आदरपूर्वक उनके नाम के आगे 'मुंशी' की मानद उपाधि जोड़ दी।
सरकारी नौकरी छोड़कर गांधीजी के आंदोलन में क्यों कूद पड़े थे प्रेमचंद?
प्रेमचंद केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। जब महात्मा गांधी ने 1920 के दशक में देशव्यापी असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने अपने बढ़ते हुए परिवार के भरण-पोषण की भारी चिंताओं के बावजूद अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर पद) से तत्काल त्यागपत्र दे दिया।
उनका स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र की आज़ादी के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा का बलिदान देना आवश्यक है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया और वाराणसी में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। जीवन की सार्थकता पर उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी प्रासंगिक है: "जीवन में सफल होने के लिए जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह शिक्षा है; केवल साक्षरता और डिग्रियाँ नहीं।"
'कफ़न' से लेकर 'गोदान' तक: प्रेमचंद की अमर कहानियों और उपन्यासों का क्या मर्म है?
प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में दर्जनों अमर उपन्यासों और 300 से अधिक कहानियों की रचना की, जो भारतीय समाज का दर्पण हैं:

सादगी, मानवीय करुणा और अनीश्वरवाद: प्रेमचंद के व्यक्तित्व का क्या रहस्य था?
मुंशी प्रेमचंद स्वभाव से अत्यंत सरल, हंसमुख और दिखावे से कोसों दूर रहने वाले व्यक्ति थे। वे सदैव ठेठ गंवई लिबास पहनते थे और जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना मुस्कुराते हुए करते थे। मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र में उन्होंने सूरदास का स्मरण करते हुए लिखा था: "हमारा काम तो खूब जी-तोड़ खेलना है... पटखनी खाने के बाद धूल झाड़कर खड़े हो जाना चाहिए और कहना चाहिए कि तुम जीते हम हारे, पर हम फिर लड़ेंगे।"
उनकी मानवीय करुणा का उदाहरण उनकी पत्नी शीवरानी देवी के संस्मरण से मिलता है। एक बार कड़ाके की ठंड में प्रेमचंद को गरम सूट बनवाने के लिए दो बार 40-40 रुपये दिए गए। उन्होंने दोनों बार वे रुपये अपनी सरस्वती प्रेस के भूखे मजदूरों में बाँट दिए। पत्नी के विरोध करने पर उन्होंने सहजता से कहा: "यह कहाँ का इंसाफ़ है कि हमारी प्रेस के मजदूर भूखे मरें और हम गरम सूट पहनकर घूमें।"
जीवन भर गरीबी, अन्याय और पीड़ितों की बेबसी देखने के कारण वे पारंपरिक ईश्वरवादी नहीं रह सके। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार को लिखा था कि "मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।" यहाँ तक कि मृत्यु से कुछ घंटे पूर्व भी उन्होंने कहा था कि "मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"
वर्ष 1936 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की। उचित इलाज और साधनों के अभाव में 8 अक्टूबर 1936 को यह महान ज्योतिपुंज सदा के लिए बुझ गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी शोषितों और वंचितों के अधिकारों की सबसे बुलंद आवाज़ बनी हुई है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2cn7wkkp
2. https://tinyurl.com/23p9s9r6
3. https://tinyurl.com/233x7ytw
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