क्यों लखनऊ के लोग आज भी प्राकृतिक चावल पर भरोसा करते हैं, न कि जीएम चावल पर?

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03-01-2026 09:24 AM
क्यों लखनऊ के लोग आज भी प्राकृतिक चावल पर भरोसा करते हैं, न कि जीएम चावल पर?

लखनऊवासियों, हमारे शहर की पहचान सिर्फ उसकी तहज़ीब, नवाबी अंदाज़ और दिलकश इमारतों में ही नहीं, बल्कि हमारे खाने की नफ़ासत में भी बसती है। चाहे दाल-चावल की सादगी हो, बिरयानी की शान हो या घरों में बनती खिचड़ी की गर्माहट - चावल हमारे हर छोटे-बड़े पल का हिस्सा है। लेकिन शायद आपको यह जानकर हैरानी हो कि भारत में चावल की 40,000 से भी अधिक प्राकृतिक किस्में पाई जाती हैं। यानी हमारी थाली में आने वाला यह साधारण-सा दिखने वाला अनाज, वास्तव में भारत की कृषि परंपरा, इतिहास और जैव-विविधता की एक अनमोल धरोहर है। इसीलिए जब दुनिया के कई देश आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) चावल की ओर बढ़ रहे हैं, भारत ने इस राह पर कदम रखने से साफ़ मना कर दिया है। यह सिर्फ परंपरा को बचाने का फैसला नहीं, बल्कि विज्ञान, सुरक्षा, पर्यावरण और किसानों की जीवन-रेखा को ध्यान में रखकर लिया गया एक गंभीर निर्णय है।
आज हम इस लेख में चार महत्वपूर्ण पहलुओं को क्रमबद्ध तरीके से समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि भारत में चावल की विविधता कितनी विशाल है और यह हमारी खाद्य संस्कृति व कृषि परंपरा के लिए क्यों इतनी आवश्यक है। फिर, हम भारत की दस प्रमुख पारंपरिक चावल किस्मों के स्वाद, सुगंध और क्षेत्रीय महत्व को समझेंगे। इसके बाद, हम यह जानेंगे कि भारत ने जीएम (Genetically Modified) चावल पर प्रतिबंध क्यों लगाया और इससे जुड़ी जैव-सुरक्षा व पर्यावरणीय चिंताएँ क्या हैं। अंत में, हम दुनिया में जीएम चावल की स्थिति, गोल्डन राइस (Golden Rice) के विकास और उससे जुड़े विवादों पर नज़र डालेंगे, साथ ही यह भी समझेंगे कि भारत ने इसे स्वीकार क्यों नहीं किया।

भारत में चावल की विविधता: खाद्य संस्कृति और कृषि परंपरा का आधार
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जहाँ चावल की विविधता अपनी स्वयं की एक जीवित विरासत मानी जाती है। यहाँ पाई जाने वाली 40,000 से अधिक चावल की किस्में केवल वैज्ञानिक विविधता का उदाहरण नहीं, बल्कि यह दर्शाती हैं कि कैसे भारतीय समाज ने हजारों वर्षों में जलवायु, मिट्टी, संस्कृति और खानपान के अनुसार अनूठी चावल किस्में विकसित कीं। भारत का हर क्षेत्र अपनी विशेष चावल पहचान रखता है - उत्तर भारत में बासमती का सुगंधित आकर्षण, दक्षिण में सोना मसूरी की हल्की बनावट, पूर्वोत्तर में काले चावल का पोषण और पश्चिम में अम्बेमोहर की मीठी सुगंध। चावल भारत की प्रमुख ख़रीफ़ फ़सल है, जिसे मानसूनी वर्षा के सहयोग से देश के बड़े हिस्से में उगाया जाता है। हिमालय से लेकर तटीय क्षेत्रों तक, हर इलाके की जलवायु ने अपने-अपने तरीके से चावल को नए स्वरूप दिए। यही कारण है कि चावल केवल भोजन नहीं, बल्कि भारत की कृषि परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

भारत की दस प्रमुख पारंपरिक चावल किस्में और उनकी विशेषताएँ
भारत की प्राकृतिक चावल किस्में स्वाद, सुगंध, पोषण और बनावट में इतनी भिन्न हैं कि किसी भी राज्य का भोजन बिना उसकी स्थानीय चावल किस्म के अधूरा महसूस होता है।

  • बासमती चावल — लम्बे, पतले दाने और अनोखी सुगंध के कारण यह बिरयानी और पुलाव की आत्मा माना जाता है।
  • जैस्मीन चावल — हल्की मिठास और नरम बनावट इसे करी के साथ आदर्श विकल्प बनाती है।
  • लाल चावल — एंथोसायनिन (Anthocyanin) से भरपूर यह दक्षिण भारत में पोषणयुक्त भोजन का प्रमुख हिस्सा है।
  • मोगरा चावल — मध्य भारत की यह किस्म हल्की, नाज़ुक और स्वाद में अत्यंत सौम्य होती है।
  • ब्राउन चावल — चोकर परत सुरक्षित रहने से यह उच्च फाइबर, विटामिन और मिनरल का उत्कृष्ट स्रोत है।
  • काला चावल — ‘फोरबिडन राइस’ के नाम से प्रसिद्ध, यह एंटीऑक्सिडेंट (antioxidant) से भरपूर और बेहद पौष्टिक है।
  • सोना मसूरी — हल्की सुगंध और नरम बनावट वाली यह किस्म दक्षिण भारत के घरों में आम है।
  • अम्बेमोहर चावल — महाराष्ट्र की यह सुगंधित किस्म मिठाइयों और त्योहारों के व्यंजनों में खास उपयोग की जाती है।
  • काला जीरा चावल — बिरयानी के लिए पसंदीदा, इसका स्वाद हल्का नटी और बेहद अनूठा होता है।
  • बांस चावल — पूर्वोत्तर भारत का दुर्लभ और स्वादिष्ठ चावल, जिसकी सुगंध और बनावट विशेष पहचान रखती है।

ये सभी किस्में सदियों पुरानी प्राकृतिक चयन विधियों, पारंपरिक ज्ञान और स्थायी खेती का परिणाम हैं। भारत की चावल विविधता वैश्विक स्तर पर अद्वितीय मानी जाती है।

भारत में जीएम (Genetically Modified) चावल पर प्रतिबंध के मूल कारण
भारत सरकार ने आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) चावल की खेती, उत्पादन और निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है, और इसके कई वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है जैव-सुरक्षा का जोखिम - जीएम चावल की फसल यदि पारंपरिक किस्मों के संपर्क में आती है तो उनके जीन पूल में मिलावट की संभावना बढ़ जाती है, जिससे भारत की अमूल्य चावल विविधता स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। इसके अलावा, जीएम चावल के पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं हैं, जैसे मृदा स्वास्थ्य, स्थानीय जीवों और परागण तंत्र पर असर। उपभोक्ता स्वास्थ्य को लेकर भी चिंताएँ रही हैं, क्योंकि बदलते जीन वाली फसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर अभी भी शोध जारी है। भारत का वाणिज्य मंत्रालय स्पष्ट कह चुका है कि हमारा देश कोई भी जीएम चावल न उगाता है, न निर्यात करता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर संदेह न हो।

विश्व स्तर पर जीएम चावल की मंज़ूरी और वर्तमान स्थिति
दुनिया के कई देशों ने जीएम चावल के प्रयोग और अनुमोदन की ओर कदम बढ़ाए हैं, किंतु इनका व्यावसायिक उपयोग अब भी सीमित है। अमेरिका नेएलएलआरआईसीई60 ( LLRice60) और एलएलआरआईसीई62 (LLRice62) को मंज़ूरी दी, जिसके बाद कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको (Mexico) और कोलंबिया (Colombia) ने भी कुछ जीएम चावल किस्मों को अनुमोदन दिया। चीन ने भी एक जीएम चावल किस्म को जैव-सुरक्षा अनुमति प्रदान की थी, लेकिन स्थानीय किसानों और उपभोक्ताओं की चिंताओं को देखते हुए इसका व्यावसायीकरण रोक दिया गया। 2018 के बाद कई देशों ने कुछ जीएम किस्मों को “उपभोग हेतु सुरक्षित” बताया, लेकिन वास्तविक खेती और बाज़ार में उपलब्धता अब भी बहुत कम है। इसका कारण है उपभोक्ता असंतोष, पर्यावरणीय चुनौतियाँ और इस तकनीक के प्रति सावधानी।

गोल्डन राइस: निर्माण, उद्देश्य और वैज्ञानिक तकनीक
गोल्डन राइस दुनिया का सबसे प्रसिद्ध जीएम चावल है, जिसे विटामिन ए की कमी से लड़ने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। वैज्ञानिकों ने इसमें डैफ़ोडिल (Daffodil), बैक्टीरिया और बाद में मक्का से ऐसे जीन जोड़े जो बीटा-कैरोटीन बनाते हैं - यह वही रंगद्रव्य है जो गाजर को नारंगी रंग देता है, और यही चावल को सुनहरा रंग प्रदान करता है। 1999-2000 में गोल्डन राइस की पहली सफल जैव - संरचना तैयार हुई, जिसे एक बड़े वैज्ञानिक नवाचार के रूप में देखा गया। इसका उद्देश्य था गरीब और कुपोषित क्षेत्रों में विटामिन ए की कमी से होने वाली अंधता और रोगों को कम करना। वैज्ञानिक रूप से यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन वास्तविक दुनिया में इसके रास्ते में कई चुनौतियाँ आ खड़ी हुईं।

गोल्डन राइस से जुड़े विवाद और वैश्विक प्रतिक्रियाएँ
गोल्डन राइस को लेकर वैश्विक स्तर पर समर्थन और विरोध दोनों ही देखने को मिले। इसके समर्थकों का मानना है कि यह कुपोषण से लड़ने का सस्ता और प्रभावी समाधान हो सकता है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि -

  • यह पारंपरिक चावल किस्मों को दूषित कर सकता है,
  • इसके विकास और वितरण में लागत लाभ से अधिक है,
  • इसके पीछे कॉर्पोरेट हित भी जुड़े हो सकते हैं।

ग्रीनपीस (Greenpeace) जैसे संगठनों ने इसका आक्रामक विरोध किया, जिसके चलते कई देश गोल्डन राइस को अपनाने में हिचकिचाते रहे। फिर भी, 2021 में फ़िलिपींस (Philippines) पहला देश बना जिसने गोल्डन राइस की व्यावसायिक खेती को मंज़ूरी दी। 2023 तक कई देशों ने शोध संस्थान स्थापित किए, लेकिन अब भी गोल्डन राइस दुनिया में व्यापक स्तर पर अपनाया नहीं गया है।

भारत ने गोल्डन राइस को क्यों स्वीकार नहीं किया?
भारत ने विश्व की अपेक्षाओं से उलट गोल्डन राइस को अपनाने से मना किया है, और इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण हैं। भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है अपनी पारंपरिक चावल किस्मों की रक्षा, क्योंकि जीएम किस्मों के कारण जीन दूषण का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, भारतीय कृषि जैव विविधता पर आधारित है - यदि जीएम चावल पर्यावरण में अनियंत्रित रूप से फैल गया तो स्थानीय किस्मों और किसानों की आजीविका पर गंभीर खतरा आ सकता है। साथ ही, भारत की खाद्य संस्कृति में प्राकृतिकता और उपभोक्ता विश्वास बहुत महत्वपूर्ण हैं। सरकार मानती है कि विटामिन ए की कमी को आहार विविधता, फोर्टिफाइड (fortified) खाद्य पदार्थों और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से अधिक प्रभावी और सुरक्षित तरीके से दूर किया जा सकता है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/59adyaxc 
https://tinyurl.com/4nwnwjv7 
https://tinyurl.com/5e4ch8c9 
https://tinyurl.com/bdzj7zmk
https://tinyurl.com/42uwfmm4  

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