समय - सीमा 270
मानव और उनकी इंद्रियाँ 1079
मानव और उनके आविष्कार 846
भूगोल 254
जीव-जंतु 319
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है।
आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।

भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्रा
प्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया।
मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षण
मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।
मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव
16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है।
यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास
1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Govanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।
भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्व
भारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है।
पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं
आधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/5xbrztaf
https://tinyurl.com/yhyj6byk
https://tinyurl.com/5cvy7pxu
A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.
B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.
C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.
D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.
E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.