लखनऊ की बदलती ज़िंदगी और बढ़ता ई-वेस्ट:तकनीक की सुविधा और पर्यावरण की चुनौती

शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
27-01-2026 09:24 AM
लखनऊ की बदलती ज़िंदगी और बढ़ता ई-वेस्ट:तकनीक की सुविधा और पर्यावरण की चुनौती

लखनऊवासियों, तेज़ी से बदलती तकनीक और बढ़ते डिजिटल उपयोग ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है - इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, यानी ई-वेस्ट (e-waste)। पुराने मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, बैटरियाँ और घरेलू उपकरण आज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं और इनके बेकार हो जाने के बाद उनका सही तरीके से निपटान न होना एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है। भारत के अन्य शहरों की तरह लखनऊ भी इस बढ़ते ई-वेस्ट संकट से अछूता नहीं है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
आज इस लेख में हम भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या को समझेंगे। इसके बाद जानेंगे कि ई-वेस्ट के साथ कितनी कीमती धातुएँ नष्ट हो रही हैं। फिर हम उन शहरों पर नज़र डालेंगे जहाँ सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। आगे, इसके पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही, ई-वेस्ट के विभिन्न प्रकारों को समझेंगे और अंत में भारत में इसके पुनर्चक्रण की प्रक्रिया पर विस्तार से बात करेंगे।

भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या
भारत आज दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट उत्पादकों में गिना जाने लगा है और हर साल लाखों टन ई-वेस्ट उत्पन्न कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में इस कचरे की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग और उनके जीवनकाल का लगातार कम होते जाना है। मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टीवी और घरेलू उपकरण अब जल्दी पुराने हो जाते हैं, जिससे कचरे की समस्या और गंभीर होती जा रही है। तेज़ी से शहरीकरण कर रहे शहरों में भी यह स्थिति साफ़ दिखाई देती है। यहाँ बढ़ती आबादी, डिजिटल निर्भरता और आधुनिक जीवनशैली के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे ई-वेस्ट की मात्रा में भी निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। अब यह समस्या केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्यम आकार के शहरों में भी ई-वेस्ट का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के साथ नष्ट हो रही कीमती धातुएँ
इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का सही ढंग से पुनर्चक्रण न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके साथ कई बहुमूल्य धातुएँ भी बेकार चली जाती हैं। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, एल्युमिनियम (aluminum) और प्लास्टिक जैसी कीमती सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिनका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। भारत में हर साल ई-वेस्ट के ज़रिये अरबों रुपये मूल्य की ये धातुएँ नष्ट हो जाती हैं, जो सीधे-सीधे आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं। इसके अलावा, जब ये धातुएँ पुनः प्राप्त नहीं की जातीं, तो नई धातुओं की आपूर्ति के लिए खनन गतिविधियाँ बढ़ानी पड़ती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचता है।

भारत में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाले शहर
भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सबसे अधिक उत्पादन बड़े शहरी केंद्रों में देखा जाता है। विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर जैसे शहर ई-वेस्ट उत्पादन में सबसे आगे हैं। इन शहरों में आईटी उद्योग, कॉर्पोरेट कार्यालयों की अधिक संख्या और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापक उपयोग इसकी प्रमुख वजह है। हालाँकि, यह समस्या केवल इन महानगरों तक सीमित नहीं रही है। शहरों में भी जैसे-जैसे तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ई-वेस्ट की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में छोटे और मध्यम शहरों को भी इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा।

इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का अनुचित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसमें मौजूद भारी धातुएँ - जैसे सीसा, पारा और कैडमियम (Cadmium) - मिट्टी और जल स्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित कर सकती हैं। इससे कृषि भूमि की उर्वरता घटती है और पीने के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। यदि ई-वेस्ट को जलाया जाए या अनधिकृत तरीकों से नष्ट किया जाए, तो डाइऑक्सिन (Dioxin) और फ्यूरान (Furan) जैसी विषैली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं। इन रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से तंत्रिका तंत्र, गुर्दे, लीवर और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के विभिन्न प्रकार और उनके स्रोत
इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट केवल मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। इसमें बड़े घरेलू उपकरण - जैसे फ्रिज, वॉशिंग मशीन और ओवन (oven) - के साथ-साथ स्पीकर्स, साउंड सिस्टम (sound system), मेडिकल उपकरण, एलईडी लाइटें (LED lights), बैटरियाँ, वायरिंग, सौर ऊर्जा प्रणालियाँ और यहाँ तक कि बच्चों के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने भी शामिल हैं। इन सभी उपकरणों में कई उपयोगी लेकिन खतरनाक सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिन्हें यदि सामान्य कचरे के साथ फेंक दिया जाए, तो वे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। इसलिए इनका अलग से संग्रह और निपटान बेहद आवश्यक है।

भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया
भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले, ई-वेस्ट का संग्रह और परिवहन किया जाता है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को विशेष केंद्रों तक पहुँचाया जाता है। इसके बाद श्रेडिंग (shredding), छंटाई और पृथक्करण की प्रक्रिया से प्लास्टिक, धातु और कांच जैसी सामग्रियों को अलग-अलग किया जाता है। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद प्राप्त कच्चा माल दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जाता है और उसे नई इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या अन्य उत्पादों के निर्माण में लगाया जा सकता है। इस तरह का संगठित और वैज्ञानिक पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरण की रक्षा करता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित होता है और संसाधनों के संरक्षण में मदद करता है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/22zk6j4e   
https://tinyurl.com/2xn3hr8w  
https://tinyurl.com/3u29w34s  
https://tinyurl.com/ykkjz2cz 

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