लखनऊ में बसंत पंचमी: ऋतुओं का उत्सव और पीले रंग की सांस्कृतिक कहानी

विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
23-01-2026 09:20 AM
लखनऊ में बसंत पंचमी: ऋतुओं का उत्सव और पीले रंग की सांस्कृतिक कहानी

लखनऊवासियों, जैसे ही माघ माह की पंचमी आती है, शहर की फ़िज़ाओं में एक अलग ही उल्लास घुल जाता है। ठंड की विदाई और हल्की गर्माहट के साथ बसंत पंचमी का आगमन लखनऊ में सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और आस्था का सुंदर संगम बन जाता है। इस दिन सरसों के पीले फूल, खिलती फसलें और सुहावना मौसम यह संकेत देते हैं कि बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी है। यही वजह है कि लखनऊ में बसंत पंचमी को पूरे श्रद्धा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जाता है।
आज इस लेख में हम जानेंगे कि बसंत पंचमी का समय और ऋतु परिवर्तन से क्या संबंध है। इसके बाद सरस्वती पूजा के धार्मिक महत्व को समझेंगे। फिर पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर चर्चा करेंगे। आगे, भारत और पड़ोसी देशों में मनाए जाने वाले बसंत पंचमी के विविध रूपों को जानेंगे। साथ ही, पीले रंग के महत्व, पारंपरिक व्यंजनों और इस पर्व से जुड़ी सामाजिक परंपराओं को क्रमबद्ध रूप से समझेंगे।

बसंत पंचमी का पर्व: समय, ऋतु परिवर्तन और सांस्कृतिक महत्व
बसंत पंचमी हर वर्ष माघ माह की पंचमी तिथि को मनाई जाती है और इसे बसंत ऋतु के औपचारिक आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस समय मौसम में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगता है—कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे विदा लेने लगती है और वातावरण में हल्की गर्माहट के साथ नई ऊर्जा का संचार होता है। लखनऊ जैसे उत्तर भारतीय शहरों में यह बदलाव प्रकृति के रंगों में साफ़ झलकता है, जहाँ खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं, पेड़-पौधों में नई कोपलें फूटने लगती हैं और चारों ओर जीवन का उत्साह महसूस होता है।
सांस्कृतिक दृष्टि से बसंत पंचमी केवल एक ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन में नई शुरुआत, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन को होली जैसे बड़े पर्व की तैयारियों की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है, जिससे यह त्योहार भारतीय सांस्कृतिक कैलेंडर में विशेष स्थान रखता है।

सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी का धार्मिक महत्व
बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाने की परंपरा भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है। देवी सरस्वती को ज्ञान, संगीत, कला और बुद्धि की देवी माना जाता है, इसलिए यह दिन विशेष रूप से शिक्षा और रचनात्मकता से जुड़ा हुआ है। लखनऊ में इस अवसर पर विद्यालयों, कॉलेजों, पुस्तकालयों और घरों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है, जहाँ विद्यार्थी और शिक्षक देवी से विद्या, विवेक और सफलता का आशीर्वाद माँगते हैं।
यह मान्यता गहराई से जुड़ी हुई है कि बसंत पंचमी के दिन की गई पूजा से ज्ञान का प्रकाश जीवन में स्थायी रूप से बना रहता है। इसी विश्वास के चलते कई परिवार इस दिन बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत करते हैं, जिससे यह पर्व शिक्षा और संस्कारों से गहरे रूप में जुड़ जाता है।

बसंत पंचमी से जुड़े पौराणिक संदर्भ और ऐतिहासिक कथाएँ
हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन ज्ञान और कला की देवी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। कुछ कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, जिससे यह तिथि और भी पवित्र मानी जाती है।
इसके अलावा, बसंत ऋतु को प्रेम और उल्लास की ऋतु कहा जाता है, इसलिए इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा का भी वर्णन मिलता है। इन पौराणिक कथाओं ने बसंत पंचमी को केवल धार्मिक पर्व तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भावनात्मक, सांस्कृतिक और मानवीय संवेदनाओं से भी जोड़ दिया है।

भारत और पड़ोसी देशों में बसंत पंचमी के विविध रूप
भारत के विभिन्न राज्यों में बसंत पंचमी अलग-अलग रूपों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं यह पतंगों के त्योहार के रूप में प्रसिद्ध है, तो कहीं इसे संगीत, नृत्य और फूलों के माध्यम से मनाया जाता है। लखनऊ सहित उत्तर भारत में सरस्वती पूजा और पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा विशेष रूप से देखने को मिलती है।
भारत के बाहर भी इस पर्व का प्रभाव दिखाई देता है। नेपाल और बांग्लादेश में इसे श्रद्धा और धार्मिक आस्था के साथ मनाया जाता है, जबकि इंडोनेशिया के बाली द्वीप में इसे सरस्वती के महान दिन के रूप में जाना जाता है। यह विविधताएँ दर्शाती हैं कि बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का वैश्विक प्रतीक भी है।

बसंत पंचमी में पीले रंग का प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक महत्व
बसंत पंचमी पर पीले रंग का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह रंग सरसों के फूलों, सूर्य के प्रकाश और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी सरस्वती का प्रिय रंग भी पीला है, इसलिए इस दिन लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं और अपने आसपास पीले रंग की सजावट करते हैं।
लखनऊ में भी बसंत पंचमी के अवसर पर पीले परिधानों, सजावट और व्यंजनों का विशेष महत्व देखने को मिलता है। सांस्कृतिक रूप से पीला रंग शांति, समृद्धि, आशा और सकारात्मक सोच का प्रतीक है, जो बसंत पंचमी की भावना के साथ पूरी तरह सामंजस्य रखता है।

बसंत पंचमी के पारंपरिक व्यंजन और क्षेत्रीय खानपान
बसंत पंचमी पर बनने वाले पारंपरिक व्यंजन इस पर्व की पहचान को और भी गहरा बना देते हैं। पीले चावल, खिचड़ी, बूंदी, खीर और मालपुआ जैसे व्यंजन इस दिन विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। कई घरों में केसरिया शीरा भी बनाया जाता है, जिसे देवी सरस्वती को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
लखनऊ जैसे शहर में, जहाँ खानपान की समृद्ध परंपरा रही है, बसंत पंचमी के अवसर पर पारंपरिक मिठाइयों और व्यंजनों का स्वाद इस पर्व को और भी विशेष बना देता है। यह भोजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा होता है।

File:Maharaja Ranjit Singh holding court outside near the Golden Temple in Amritsar with everyone dressed in Basant (yellow).jpg
अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास दरबार लगाते हुए महाराजा रणजीत सिंह, सभी लोग बसंत (पीले) वस्त्र पहने हुए।

बसंत पंचमी से जुड़ी सामाजिक परंपराएँ और शुभ कार्य
बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ दिन माना जाता है और इस दिन कई सामाजिक व धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है। पवित्र नदियों में स्नान, मेलों का आयोजन और धार्मिक कार्यक्रम इस दिन की विशेष पहचान हैं। लखनऊ में भी विभिन्न स्थानों पर सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं।
यह दिन नए कार्य की शुरुआत, विवाह, गृह प्रवेश और बच्चों की शिक्षा आरंभ करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। कई परिवार इस दिन बच्चों को उनके पहले अक्षर लिखवाते हैं या संगीत शिक्षा की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार बसंत पंचमी समाज को आस्था, परंपरा और नए आरंभ का संदेश देने वाला पर्व बन जाती है।

संदर्भ:
https://tinyurl.com/4ukfkmzf 
https://bit.ly/3rWL07r 
https://bit.ly/2LWryIK 
https://bit.ly/3anD9d8
https://tinyurl.com/57sk6xjp 

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