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भारत एक ऐसा देश है जहाँ की भौगोलिक बनावट और जलवायु में अत्यधिक विविधता देखने को मिलती है। पहाड़ों से लेकर मैदानों, पठारों और तटीय क्षेत्रों तक फैला यह देश मिट्टियों की अनेक किस्मों का घर है। यही विविधता भारतीय कृषि को मज़बूत आधार प्रदान करती है, क्योंकि अलग-अलग मिट्टियाँ अलग-अलग फ़सलों के लिए उपयुक्त होती हैं। खेती की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि किस क्षेत्र में किस प्रकार की मृदा पाई जाती है और उसमें कौन-सी फ़सल उगाई जाए।
आज इस लेख में हम भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टियों की विविधता को समझेंगे। साथ ही, यह जानेंगे कि जलोढ़, लाल, काली, रेगिस्तानी और लैटराइट (laterite) जैसी मिट्टियाँ कृषि को कैसे प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, खरीफ़ और रबी फ़सलों की बुवाई के समय, उनके लिए उपयुक्त मिट्टी और आदर्श परिस्थितियों पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।

भारत में मृदा की विविधता और आईसीएआर (ICAR) द्वारा किया गया वर्गीकरण
भारत की जलवायु और भौगोलिक संरचना में अत्यधिक विविधता पाई जाती है, जिसके कारण देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टियाँ विकसित हुई हैं। कहीं अधिक वर्षा होती है, तो कहीं शुष्क परिस्थितियाँ पाई जाती हैं, और कहीं नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी मिलती है। इन्हीं भौगोलिक व जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मिट्टियों को आठ प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है। इस वर्गीकरण में जलोढ़, काली, लाल, रेगिस्तानी, लैटराइट, वन एवं पर्वतीय, क्षारीय-लवणीय तथा पीट अथवा दलदली मृदा शामिल हैं। यह वैज्ञानिक वर्गीकरण केवल मिट्टी के प्रकार बताने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों और कृषि विशेषज्ञों को यह समझने में भी मदद करता है कि किसी विशेष मिट्टी में कौन-सी फ़सल बेहतर उपज दे सकती है और मिट्टी के पोषण स्तर को कैसे संतुलित रखा जा सकता है।
जलोढ़ मृदा: उत्तर भारत की कृषि की रीढ़
जलोढ़ मृदा का निर्माण नदियों द्वारा लाई गई सिल्ट, गाद और महीन कणों से होता है, जो समय के साथ मैदानों में जमा होकर उपजाऊ भूमि का रूप ले लेते हैं। यह मिट्टी मुख्य रूप से सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली के मैदानी क्षेत्रों और कई डेल्टा (delta) क्षेत्रों में पाई जाती है। अपनी बनावट के कारण यह नमी को संतुलित रूप से बनाए रखती है और पौधों की जड़ों को पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध कराती है। रासायनिक दृष्टि से जलोढ़ मिट्टी में पोटाश (potash) और फ़ॉस्फ़ोरिक एसिड (phosphoric acid) पर्याप्त मात्रा में होते हैं, हालाँकि इसमें नाइट्रोजन (nitrogen) की कमी देखी जाती है। इसके बावजूद, इसकी प्राकृतिक उर्वरता इसे कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी बनाती है। इसी मिट्टी में धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का, जूट, तिलहन, सब्ज़ियाँ और विभिन्न प्रकार के फल बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं, जिससे देश की बड़ी आबादी का जीवनयापन संभव हो पाता है।

लाल और काली मृदा: रासायनिक संरचना और फ़सल उपयुक्तता
लाल मृदा का निर्माण प्राचीन ग्रेनाइट (granite) चट्टानों के अपक्षय से होता है और इसका लाल रंग इसमें मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) की वजह से दिखाई देता है। यह मिट्टी आयरन और पोटाश से भरपूर होती है, लेकिन नाइट्रोजन, चूना और ह्यूमस (humus) की मात्रा इसमें अपेक्षाकृत कम होती है। यही कारण है कि प्राकृतिक रूप से यह मिट्टी कम उपजाऊ मानी जाती है, लेकिन उचित सिंचाई, खाद और उर्वरकों के प्रयोग से इसमें अच्छी पैदावार ली जा सकती है। इस मिट्टी में धान, बाजरा, दालें, कपास और गन्ना जैसी फ़सलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं। दूसरी ओर, काली मृदा अपनी चिकनी बनावट और नमी को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता के लिए जानी जाती है। यह मिट्टी गीली अवस्था में फैलती है और सूखने पर दरारें बनाती है, जिससे मिट्टी में वायु का संचार बना रहता है। इसमें लौह और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जबकि नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ोरस की कमी रहती है। कपास की खेती के लिए यह मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त मानी जाती है, इसी कारण इसे “ब्लैक कॉटन सॉयल” (black cotton soil) भी कहा जाता है। इसके अलावा गेहूँ, ज्वार, बाजरा और तिलहन की खेती भी इसमें अच्छे परिणाम देती है।
रेगिस्तानी और लैटराइट मृदा: सीमाएँ, चुनौतियाँ और कृषि संभावनाएँ
रेगिस्तानी मृदा शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। इस मिट्टी में रेत और बजरी की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण इसमें नमी और जैविक पदार्थों की भारी कमी रहती है। पानी को रोकने की क्षमता कम होने के कारण यह मिट्टी स्वाभाविक रूप से कृषि के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती। हालाँकि, सिंचाई सुविधाओं के विकास के बाद इन क्षेत्रों में भी खेती संभव हुई है और यहाँ बाजरा, दालें, ग्वार और चारा फ़सलें उगाई जाने लगी हैं। लैटराइट मृदा मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्रों की विशेषता है। अधिक वर्षा के कारण इसमें से चूना और सिलिका (silica) बह जाते हैं, जिससे मिट्टी में लौह और ऐल्यूमीनियम (aluminium) की मात्रा बढ़ जाती है। यह मिट्टी नाइट्रोजन और पोटाश की कमी से ग्रस्त होती है, फिर भी उचित कृषि प्रबंधन अपनाकर इसमें धान, रागी, गन्ना और काजू जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में इसका उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में भी किया जाता है।

खरीफ़ और रबी फ़सलें: बुवाई का समय और मिट्टी की भूमिका
खरीफ़ फ़सलें मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर होती हैं और इनकी बुवाई सामान्यतः जुलाई से अक्टूबर के बीच की जाती है। इन फ़सलों को बढ़ने के लिए पर्याप्त वर्षा और गर्म तापमान की आवश्यकता होती है। धान, मक्का, बाजरा, रागी, सोयाबीन और मूँगफली खरीफ़ फ़सलों के प्रमुख उदाहरण हैं। इनके लिए उर्वर, अच्छी जल निकासी वाली जलोढ़ या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी पानी और पोषक तत्वों को संतुलित रूप से बनाए रखती है। इसके विपरीत, रबी फ़सलें मानसून समाप्त होने के बाद सर्दियों में बोई जाती हैं और गर्मियों की शुरुआत में काटी जाती हैं। गेहूँ, जौ, सरसों, चना और अलसी रबी फ़सलों में शामिल हैं। इन फ़सलों के लिए अपेक्षाकृत ठंडा और शुष्क मौसम अनुकूल होता है, और चिकनी दोमट से लेकर मंझली काली मिट्टी इनमें अच्छी पैदावार देने में सहायक होती है।

खरीफ़ और रबी फ़सलों के लिए आदर्श मिट्टी की आवश्यकताएँ
रबी फ़सलों के लिए ऐसी मिट्टी आवश्यक होती है जिसमें अच्छी जल निकासी हो, मध्यम उर्वरता बनी रहे और नमी संतुलित रूप से उपलब्ध हो। भारी और जलभराव वाली मिट्टियाँ रबी फ़सलों के लिए अनुकूल नहीं मानी जातीं, क्योंकि इससे फ़सल की जड़ें प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी ओर, खरीफ़ फ़सलों के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो, पानी को रोकने की क्षमता अच्छी हो और मिट्टी का पीएच (pH) स्तर संतुलित बना रहे। यदि किसान मिट्टी के प्रकार को सही ढंग से पहचानकर उसी के अनुसार फ़सल का चयन करें, तो न केवल फ़सल उत्पादन में वृद्धि होती है, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता भी बनी रहती है, जिससे भविष्य की खेती भी सुरक्षित रहती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/5e6kw4js
https://tinyurl.com/57vpdh2a
https://tinyurl.com/7hpre3v5
https://tinyurl.com/5ctjztdn
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