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भारत में सोना केवल एक धातु नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपराओं, भावनाओं और विश्वासों से गहराई से जुड़ा हुआ है। जन्म से लेकर विवाह तक, त्योहारों से लेकर निवेश तक - सोने के आभूषण भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। लेकिन बदलते समय के साथ जहाँ एक ओर डिज़ाइन और तकनीक बदली है, वहीं उपभोक्ताओं के लिए शुद्धता और भरोसे का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। इसी संदर्भ में आज हम सोने के आभूषणों की सांस्कृतिक परंपरा से लेकर उनकी शुद्धता, बीआईएस हॉलमार्किंग (BIS Hallmarking) और भारत के स्वर्ण उद्योग की वर्तमान स्थिति तक, हर पहलू को सरल और स्पष्ट भाषा में समझेंगे।
आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से जानेंगे कि भारत में सोने का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व क्या रहा है। फिर हम यह समझेंगे कि सोने की शुद्धता कैरेट (carat) प्रणाली से कैसे मापी जाती है। इसके बाद बीआईएस हॉलमार्किंग की भूमिका और इसके अनिवार्य होने के कारणों पर चर्चा करेंगे। आगे हम बीआईएस हॉलमार्क के तीन प्रमुख चिन्हों को पहचानना सीखेंगे। इसके साथ ही सोने के आभूषण बनाने की पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों को समझेंगे। अंत में, हम भारत के स्वर्ण आभूषण उद्योग की वर्तमान स्थिति और उससे जुड़ी चुनौतियों पर नज़र डालेंगे।
भारत में सोने के आभूषणों का सांस्कृतिक महत्व और परंपरा
भारत में सोना केवल एक कीमती धातु नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और पारिवारिक भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ तत्व है। प्राचीन ग्रंथों, वेदों और पुराणों से लेकर पुरातात्विक खुदाइयों तक, हर जगह सोने की मौजूदगी इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है। विवाह में दुल्हन के आभूषण हों या जन्म, नामकरण, गृह प्रवेश और त्योहारों पर दिया जाने वाला उपहार - सोना हर शुभ अवसर का अभिन्न हिस्सा रहा है। सुनार समुदाय पीढ़ियों से इस कला को संजोए हुए है और उनके द्वारा बनाए गए आभूषण केवल पहनने की वस्तु नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली पारिवारिक धरोहर माने जाते हैं। भारतीय समाज में सोना भावनात्मक सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सम्मान का भी प्रतीक है।

सोने की शुद्धता कैसे मापी जाती है?—कैरेट प्रणाली की समझ
सोने की शुद्धता को समझने के लिए कैरेट प्रणाली सबसे महत्वपूर्ण पैमाना है। 24 कैरेट सोना सबसे शुद्ध माना जाता है, लेकिन अत्यधिक नरम होने के कारण इससे रोज़मर्रा के आभूषण बनाना व्यावहारिक नहीं होता। इसी कारण 22 कैरेट सोना सबसे अधिक प्रचलित है, क्योंकि इसमें शुद्धता और मजबूती का संतुलन होता है। 18 कैरेट सोने का उपयोग मुख्यतः हीरे और अन्य रत्नों जड़े आभूषणों में किया जाता है, क्योंकि यह डिज़ाइन को मजबूती देता है। वहीं 14 और 10 कैरेट सोना अधिक टिकाऊ और किफायती होता है, जिसे लंबे समय तक पहनने के लिए उपयुक्त माना जाता है। सही कैरेट का चयन व्यक्ति की ज़रूरत, बजट और आभूषण के उपयोग पर निर्भर करता है।

बीआईएस हॉलमार्किंग: सोने की शुद्धता की सरकारी गारंटी
बीआईएस हॉलमार्किंग उपभोक्ताओं के लिए विश्वास की मुहर है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि खरीदा गया सोना सरकारी मानकों के अनुरूप शुद्ध है। वर्ष 2021 से भारत में सोने के आभूषणों पर हॉलमार्किंग को अनिवार्य कर दिया गया, जिससे बाज़ार में पारदर्शिता आई और ग्राहकों को ठगी से बचाया जा सका। हॉलमार्किंग का मतलब है कि आभूषण की जांच किसी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में हुई है और उसकी शुद्धता प्रमाणित है। इससे न केवल ग्राहकों का भरोसा बढ़ता है, बल्कि ईमानदार जौहरियों को भी बाज़ार में पहचान मिलती है।

बीआईएस हॉलमार्क के तीन अनिवार्य चिन्ह और उनका अर्थ
बीआईएस हॉलमार्क वाले हर सोने के आभूषण पर तीन महत्वपूर्ण चिन्ह होते हैं, जो उसकी पहचान और विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं। पहला चिन्ह बीआईएस का मानक लोगो होता है, जो यह दर्शाता है कि आभूषण प्रमाणित है। दूसरा चिन्ह शुद्धता या कैरेट ग्रेड होता है, जैसे 22K916 या 18K750, जिससे सोने की वास्तविक मात्रा का पता चलता है। तीसरा चिन्ह एचयूआईडी (HUID) यानी छह अंकों का यूनिक पहचान नंबर होता है, जिसे ग्राहक बीआईएस केयर ऐप (BIS Care App) के माध्यम से आसानी से सत्यापित कर सकते हैं। ये तीनों चिन्ह मिलकर उपभोक्ता को पूरी जानकारी और मानसिक संतोष प्रदान करते हैं।
सोने के आभूषण बनाने की प्रमुख तकनीकें
सोने के आभूषणों की सुंदरता के पीछे कारीगरों की कला और तकनीकी दक्षता छिपी होती है। ढलाई तकनीक से जटिल और विस्तृत डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं, जिन्हें हाथ से बनाना कठिन होता है। गढ़ाई में हथौड़े और निहाई की मदद से सोने को आकार दिया जाता है, जिससे पारंपरिक डिज़ाइन उभरते हैं। सोल्डरिंग (soldering) के माध्यम से आभूषण के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ा जाता है, जबकि उत्कीर्णन से महीन नक्काशी और नामांकन किया जाता है। धातुतंतु अलंकरण और कणिकायन जैसी तकनीकें आभूषणों को बेहद नाज़ुक, कलात्मक और आकर्षक बनाती हैं, जिनमें कारीगर का वर्षों का अनुभव झलकता है।

भारत का स्वर्ण आभूषण उद्योग: वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
भारत का स्वर्ण आभूषण उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की एक मज़बूत रीढ़ है और यह लाखों लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार प्रदान करता है। हाल के वर्षों में यह उद्योग अधिक संगठित हुआ है और बड़े चेन स्टोर्स का प्रभाव बढ़ा है, जिससे उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प मिले हैं। हालांकि, छोटे और पारंपरिक जौहरियों को वित्तपोषण, बदलते नियमों के पालन और बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार द्वारा पारदर्शिता और नियमन के लिए उठाए गए कदम सकारात्मक हैं, लेकिन उनके साथ तालमेल बिठाना अभी भी कई कारोबारियों के लिए कठिन बना हुआ है। इसके बावजूद, यह उद्योग निरंतर बदलाव और नवाचार के साथ आगे बढ़ रहा है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/4xbdknyj
https://tinyurl.com/2sj2zt6t
https://tinyurl.com/2svxke4y
https://tinyurl.com/59azs6ha
https://tinyurl.com/yc32wxbc
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