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लखनऊवासियों, आपके शहर की पहचान सिर्फ नवाबी तहज़ीब, अदब और संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की चिकनकारी और ज़रदोज़ी कढ़ाई ने लखनऊ को दुनिया भर में एक अलग मुकाम दिलाया है। चौक की गलियों से लेकर अमीनाबाद के बाज़ारों तक, सुई और धागे से गढ़ी गई यह कला न केवल रोज़गार का साधन है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक आत्मा भी है। लखनऊ की कढ़ाई सदियों से शाही पहनावे, आम लोगों की ज़िंदगी और आधुनिक फैशन - तीनों का हिस्सा रही है। इस लेख में हम इसी समृद्ध परंपरा को समझने की कोशिश करेंगे, जहाँ इतिहास, कला और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।
आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से जानेंगे कि भारत का प्राचीन वस्त्र उद्योग कैसे सभ्यता से संस्कृति तक की यात्रा तय करता आया है। इसके बाद हम समझेंगे कि औपनिवेशिक दौर (colonial era) ने इस उद्योग को कैसे प्रभावित किया और स्वतंत्रता के बाद इसका पुनरुत्थान कैसे हुआ। फिर हम लखनऊ की विशेष भूमिका पर नज़र डालेंगे, जिसने चिकनकारी और ज़रदोज़ी कढ़ाई के ज़रिए शहर को “पूरब का स्वर्ण” की पहचान दिलाई। आगे हम चिकनकारी की मुगलकालीन उत्पत्ति से लेकर आधुनिक फैशन तक की यात्रा को समझेंगे और ज़रदोज़ी कढ़ाई के शाही इतिहास को जानेंगे। अंत में, हम यह भी देखेंगे कि आज के वैश्विक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कितनी महत्वपूर्ण बन चुकी है।
भारत का प्राचीन वस्त्र उद्योग: सभ्यता से संस्कृति तक
भारत का वस्त्र उद्योग केवल व्यापार या आजीविका का साधन नहीं रहा है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आत्मा का हिस्सा रहा है। इसके प्रमाण हमें सिंधु घाटी सभ्यता से ही मिलने लगते हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों - जैसे स्पिंडल व्होरल (spindle whorl), कपास के बीज और बुने हुए वस्त्रों के चिन्ह - यह स्पष्ट करते हैं कि लगभग 4000-2500 ईसा पूर्व भारत में सूत कातने और कपड़ा बुनने की उन्नत तकनीकें मौजूद थीं। उस समय कपास की खेती, धागा निर्माण और हथकरघा उद्योग ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग थे। प्राचीन भारत के वस्त्रों की गुणवत्ता और सौंदर्य का प्रभाव इतना गहरा था कि ग्रीस और बेबीलोन जैसी सभ्यताओं में “भारत” शब्द को ही कपास का पर्याय माना जाने लगा। भारतीय सूती और रेशमी कपड़े न केवल एशिया, बल्कि मध्य एशिया, अरब और यूरोप तक निर्यात किए जाते थे। भारतीय वस्त्रों की कोमलता, टिकाऊपन और रंगों की चमक ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। यही कारण था कि भारत को लंबे समय तक विश्व का सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक और निर्यातक माना जाता रहा। वस्त्र केवल शरीर ढकने का साधन नहीं थे, बल्कि सामाजिक स्थिति, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाते थे। अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित वस्त्र शैलियाँ - जैसे बनारसी रेशम, दक्षिण भारत का सूती वस्त्र, और उत्तर भारत की कढ़ाई परंपराएँ - भारतीय विविधता को एक सूत्र में पिरोती हैं।
औपनिवेशिक प्रभाव और स्वतंत्रता के बाद वस्त्र उद्योग का पुनरुत्थान
यूरोपियों के आगमन से पहले तक भारत का वस्त्र उद्योग पूरी तरह आत्मनिर्भर और समृद्ध था। 15वीं शताब्दी में वास्को डि गामा (Vasco da Gama) द्वारा समुद्री मार्ग की खोज के बाद भारतीय वस्त्रों तक यूरोप की सीधी पहुँच बनी। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन ने व्यापार को संगठित रूप दिया। प्रारंभ में यह व्यापार भारतीय कारीगरों के लिए लाभकारी रहा, लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। इंग्लैंड में मशीनों से बने सस्ते कपड़े भारतीय बाजारों में भर गए। ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने वस्त्रों पर आयात शुल्क हटाए, जबकि भारतीय वस्त्रों पर ब्रिटेन में भारी कर लगाए गए। इस असमान नीति ने भारतीय हथकरघा और कारीगरों को गहरी चोट पहुँचाई। कई पारंपरिक बुनकर और कारीगर बेरोज़गार हो गए, और सदियों पुरानी शिल्प परंपराएँ संकट में पड़ गईं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने खादी और स्वदेशी वस्त्रों को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया। ब्रिटिश वस्त्रों के बहिष्कार ने भारतीय वस्त्र उद्योग में नई चेतना भरी। 1947 के बाद सरकार ने अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड और राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान जैसे संस्थानों के माध्यम से पारंपरिक कारीगरों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। आज भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक है, और यह उद्योग लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करता है।
लखनऊ: हस्तशिल्प और कढ़ाई के कारण “पूरब का स्वर्ण”
लखनऊ केवल नवाबी तहज़ीब, अदब और संगीत के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह शहर सदियों से भारतीय हस्तशिल्प और कढ़ाई कला का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी समृद्ध विरासत के कारण लखनऊ को “पूरब का स्वर्ण” कहा जाता है। यहाँ की गलियों, चौकों और मोहल्लों में आज भी सुई-धागे से रची जा रही कला जीवित है। लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान यहाँ के कारीगरों से जुड़ी हुई है। ये कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने हुनर को सँजोते आए हैं। नवाबों के संरक्षण में यहाँ की कढ़ाई कला ने शाही वैभव और सौंदर्य का रूप लिया। लखनऊ का वस्त्र-शिल्प न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करता है, बल्कि शहर को वैश्विक मंच पर पहचान भी दिलाता है। आज भी लखनऊ की चिकनकारी और ज़रदोज़ी देश-विदेश के फैशन बाज़ारों में प्रतिष्ठित मानी जाती हैं। यह कला यहाँ के लोगों के लिए सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि गौरव और पहचान का स्रोत है।
चिकनकारी कढ़ाई: मुगलकाल से आधुनिक फैशन तक
चिकनकारी लखनऊ की सबसे प्रसिद्ध और विशिष्ट कढ़ाई शैली है। इसकी उत्पत्ति को लेकर एक लोकप्रिय मान्यता है कि मुगल सम्राट जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ इस कला को फारस से भारत लाई थीं। नवाबों के संरक्षण में यह कला अवध में फली-फूली और समय के साथ लखनऊ की पहचान बन गई। चिकनकारी की खासियत इसके नाज़ुक और बारीक टाँकों में है। टेपची, बखिया, जाली, फंदा, मुरी जैसे लगभग 36 पारंपरिक टाँके चिकनकारी को अद्वितीय बनाते हैं। ये टाँके शिफॉन, मलमल, रेशम और ऑर्गेंज़ा जैसे हल्के कपड़ों पर किए जाते हैं, जिससे वस्त्र बेहद सुरुचिपूर्ण और आरामदायक बनते हैं। आज चिकनकारी केवल पारंपरिक परिधानों तक सीमित नहीं है। फैशन डिज़ाइनरों ने इसे आधुनिक कट्स, कुर्तियों, साड़ियों, ड्रेसेज़ और यहाँ तक कि वेस्टर्न आउटफिट्स में भी शामिल किया है। वैश्विक फैशन मंच पर लखनऊ की चिकनकारी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

ज़रदोज़ी कढ़ाई: शाही वैभव और ऐतिहासिक परंपरा
ज़रदोज़ी कढ़ाई शाही ठाठ और वैभव की प्रतीक मानी जाती है। इसका मूल फारस में माना जाता है, जहाँ ‘ज़र’ का अर्थ सोना और ‘दोज़ी’ का अर्थ कढ़ाई है। हालांकि सोने और चाँदी के धागों से कढ़ाई की परंपरा प्राचीन भारत में भी मौजूद थी, जिसे ‘हिरण्य’ वस्त्रों के रूप में जाना जाता था। मुगल काल में ज़रदोज़ी कढ़ाई अपने चरम पर पहुँची। शाही पोशाकें, दरबारी परिधान और राजसी सजावट इसी कढ़ाई से सुसज्जित होती थीं। लखनऊ में नवाबों के संरक्षण ने ज़रदोज़ी को विशेष पहचान दी। मखमल, साटन और रेशम जैसे भारी कपड़ों पर की गई यह कढ़ाई आज भी शादियों और भव्य आयोजनों की शान है। आज ज़रदोज़ी आधुनिक फैशन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। डिज़ाइनर परिधान, दुल्हन के जोड़े और इंटीरियर डेकोर (interior decor) में इसका व्यापक उपयोग होता है।

आधुनिक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई का आर्थिक महत्व
आज के वैश्विक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति भी है। हज़ारों कारीगर इस उद्योग से जुड़े हैं, जिनकी आजीविका चिकनकारी और ज़रदोज़ी पर निर्भर करती है। लखनऊ के कढ़ाई उत्पाद देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व तक निर्यात किए जाते हैं। डिज़ाइनर ब्रांड्स (designer brands) और फैशन हाउसेज़ (fashion houses) लखनऊ की कढ़ाई को अपने कलेक्शन में शामिल कर रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय रोज़गार को बढ़ावा मिला है, बल्कि भारत की हस्तशिल्प पहचान भी मज़बूत हुई है। हालाँकि मशीनों और तेज़ फैशन के दौर में कारीगरों के सामने चुनौतियाँ भी हैं, लेकिन यदि इस कला को उचित समर्थन और बाज़ार मिले, तो यह आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है। लखनऊ की कढ़ाई आज भी यह साबित करती है कि सुई और धागे से गढ़ी गई कला समय, सीमाओं और फैशन के बदलते रुझानों से कहीं ऊपर होती है - और यही इसे सच मायनों में “पूरब का स्वर्ण” बनाती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/ye2atkj3
https://tinyurl.com/sxyjeawd
https://tinyurl.com/bdd37ews
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