लखनऊ की प्रकृति में रचा-बसा मोर: सौंदर्य, नृत्य और सांस्कृतिक पहचान

पक्षी
21-01-2026 09:24 AM
लखनऊ की प्रकृति में रचा-बसा मोर: सौंदर्य, नृत्य और सांस्कृतिक पहचान

लखनऊवासियों, आपने कभी सुबह या मानसून के दिनों में अपने आसपास खेतों, बाग़ों या खुले इलाक़ों के पास मोर को टहलते या नाचते हुए देखा है? लखनऊ का प्राकृतिक परिवेश और आसपास का हरित क्षेत्र मोरों के लिए अनुकूल माना जाता है, इसलिए यहाँ इनका दिखना कोई असामान्य बात नहीं है। नीले रंग के चमकदार पंखों वाला यह पक्षी जब बारिश की पहली फुहारों के साथ अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं उल्लास मना रही हो। मोर केवल देखने में सुंदर ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ पक्षी है।
आज इस लेख में सबसे पहले, हम मोर की प्रजाति, उसके स्वभाव और प्राकृतिक आवास के बारे में जानेंगे। इसके बाद, मानसून के मौसम में होने वाले मोर नृत्य और उसके पीछे छिपे प्रणय निवेदन के कारणों पर चर्चा करेंगे। आगे, हम यह समझेंगे कि मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी क्यों घोषित किया गया। फिर, मोर की शारीरिक बनावट और उसके रंग-बिरंगे पंखों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, भारत और एशिया में प्रचलित मोर नृत्य की परंपराओं और लोकसंस्कृति में इसकी भूमिका को विस्तार से जानेंगे।

मोर का परिचय: प्रजाति, स्वभाव और प्राकृतिक आवास
मोर, जिसे मयूर भी कहा जाता है, पक्षियों के पैवोनिनाए उपकुल के अंतर्गत आता है। नर को मोर और मादा को मोरनी कहा जाता है। स्वभाव से मोर एक शर्मीला पक्षी होता है, जो अधिकतर खुले वनों और शांत इलाक़ों में रहना पसंद करता है। यह प्रायः एकांत में ही विचरण करता है और ज़्यादा शोर-शराबे से दूर रहता है। भौगोलिक दृष्टि से मोर भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है। भारत के कई हिस्सों के साथ-साथ यह श्रीलंका में भी मिलता है। अलग-अलग क्षेत्रों में मोर की कुछ प्रजातियाँ देखी जाती हैं, जैसे नीला मोर और हरा मोर। प्राकृतिक वातावरण में रहकर यह पक्षी जंगलों और खेतों के संतुलन को बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाता है।

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मानसून और मोर नृत्य: प्रणय निवेदन का सुंदर माध्यम
मानसून का मौसम आते ही मोर का नृत्य देखने को मिलता है। जैसे ही बादल घिरते हैं और बारिश शुरू होती है, मोर अपने लंबे, रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नाचने लगता है। यह नृत्य केवल आनंद या उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि मोरनी को आकर्षित करने का एक प्राकृतिक तरीका है। प्रणय निवेदन के दौरान मोर अपनी पूँछ के पंखों को पूरी तरह फैलाकर गोल आकार में खड़ा होता है और लयबद्ध ढंग से घूमता है। मोरनी सामान्यतः उसी नर की ओर आकर्षित होती है, जिसके पंख अधिक बड़े, चमकीले और आकर्षक होते हैं। यही कारण है कि मानसून का मौसम मोरों के जीवन में विशेष महत्व रखता है।

मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किए जाने के कारण
भारत में मोर को वर्ष 1963 में राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था। इसके पीछे कई ठोस कारण थे। मोर भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है और आम लोगों द्वारा आसानी से पहचाना जा सकता है। यह पक्षी भारतीय धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक कथाओं में भी विशेष स्थान रखता है। इसके अलावा, मोर की पहचान इतनी विशिष्ट है कि इसे किसी अन्य देश के पक्षी के साथ भ्रमित नहीं किया जा सकता। भारतीय वन्यजीव संरक्षण क़ानून के तहत इसे पूरी तरह संरक्षित पक्षी का दर्जा भी प्राप्त है, जिससे इसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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मोर की शारीरिक बनावट और पंखों का महत्व
मोर की सबसे बड़ी पहचान उसकी सुंदर पूँछ और सिर पर सजी ताज जैसी कलंगी है। नर मोर के पास लगभग 200 पंखों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जो उसके शरीर का बड़ा हिस्सा बनाती है। यही पंख उसके सौंदर्य और आकर्षण का मुख्य कारण हैं। हर वर्ष वर्षा ऋतु के बाद, विशेषकर अगस्त के महीने में, मोर के पंख झड़ जाते हैं और गर्मियों से पहले फिर से उग आते हैं। रंगों की बात करें, तो मोर मुख्य रूप से नीले रंग का होता है, लेकिन सफेद, हरे और जामुनी रंग के मोर भी पाए जाते हैं। मादा मोरनी के रंग नर की तुलना में कम चमकीले होते हैं और उसके पास सजावटी पंख नहीं होते।

भारत और एशिया में मोर नृत्य की परंपराएँ
मोर के नृत्य से प्रेरित होकर भारत और एशिया के कई देशों में विशेष नृत्य शैलियाँ विकसित हुई हैं। भारत में मोर नृत्य को अलग-अलग रूपों में देखा जाता है, जैसे दक्षिण भारत में थाई पोंगल जैसे उत्सवों के दौरान होने वाला मयिलाट्टम। एशिया के अन्य देशों - जैसे चीन, म्यांमार और इंडोनेशिय - में भी मोर नृत्य लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन नृत्यों में मोर की चाल, उसके पंख फैलाने की मुद्रा और उसकी कोमल गतियों का सुंदर प्रदर्शन किया जाता है।

मोर नृत्य और लोकसंस्कृति: उत्सवों और परंपराओं में भूमिका
मोर नृत्य केवल कला का रूप नहीं, बल्कि आनंद, उल्लास और स्वागत का प्रतीक भी है। कई क्षेत्रों में यह नृत्य त्योहारों, मेलों और विशेष आयोजनों के अवसर पर किया जाता है। कहीं यह वर्षा और समृद्धि का संकेत माना जाता है, तो कहीं अतिथियों के स्वागत का माध्यम बनता है। लोकसंस्कृति में मोर नृत्य ने लोगों को प्रकृति के और क़रीब लाने का काम किया है। यही वजह है कि आज भी मोर और उसका नृत्य केवल जंगलों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बना हुआ है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3kHbRmi 
https://bit.ly/3kD2jZt 
https://tinyurl.com/mr3tmzbz 

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