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लखनऊवासियों, हमारा शहर अपनी तहज़ीब, गहरी सोच और ऐतिहासिक चेतना के लिए जाना जाता है। यहाँ जब भी किसी महान व्यक्तित्व को याद किया जाता है, तो वह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि आत्मचिंतन का एक सजीव अवसर बन जाती है। आज का दिन भी ऐसा ही है। आज हम पराक्रम दिवस मना रहे हैं, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता केवल विचारों और भाषणों से नहीं मिली, बल्कि साहसिक निर्णयों, अनुशासन और असंख्य बलिदानों से संभव हुई। नेताजी का जीवन इसी पराक्रम का प्रतीक है। उनका संघर्ष, उनकी दृष्टि और उनका नेतृत्व आज भी हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने कर्तव्यों और देश के प्रति ज़िम्मेदारी को कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं।
आज हम सबसे पहले यह जानेंगे कि पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है और इसका वास्तविक महत्व क्या है। इसके बाद हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रारंभिक जीवन पर नज़र डालेंगे, जहाँ से उनके विचारों और साहस की नींव पड़ी। फिर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किस प्रकार किया। अंत में, हम उन मूल्यों और सीखों पर चर्चा करेंगे जो नेताजी ने अपने जीवन से हमें दीं और जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है
पराक्रम दिवस केवल एक महान नेता की जयंती मनाने का दिन नहीं है। यह उस निडर सोच और साहसिक दृष्टिकोण का स्मरण है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। नेताजी का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए केवल प्रतीक्षा करना या याचिकाएँ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए दृढ़ निश्चय, अनुशासन और संगठित प्रयास आवश्यक हैं। पराक्रम दिवस हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत सुख, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करना ही सच्चा साहस है। यह दिन विशेष रूप से युवाओं को प्रेरित करता है कि वे कठिन परिस्थितियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें बदलने का संकल्प लें।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रारंभिक जीवन
सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। बचपन से ही उनमें अनुशासन, आत्मसम्मान और देशप्रेम की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। वे पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे और उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उस समय यह सेवा सम्मान, स्थिरता और शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन नेताजी के लिए यह सब देश की आज़ादी से बड़ा नहीं था। ब्रिटिश शासन के अधीन कार्य करना उन्हें स्वीकार नहीं था, इसलिए उन्होंने एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य को त्यागकर स्वतंत्रता संग्राम का कठिन मार्ग चुना।यह निर्णय दर्शाता है कि नेताजी केवल विचारों के नेता नहीं थे, बल्कि अपने विचारों को जीवन में उतारने का साहस भी रखते थे। प्रारंभिक जीवन में किए गए त्याग और संघर्ष ने आगे चलकर उनके पूरे नेतृत्व को मज़बूत आधार प्रदान किया।
स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान विशिष्ट और अलग था। वे मानते थे कि केवल सभाओं, प्रस्तावों और आश्वासनों से आज़ादी प्राप्त नहीं की जा सकती। उनके अनुसार संगठित शक्ति और स्पष्ट रणनीति ही स्वतंत्रता का मार्ग खोल सकती है। इसी सोच ने उन्हें पारंपरिक रास्तों से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आज़ादी का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि भारत की लड़ाई केवल एक उपनिवेश की समस्या नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और न्याय का प्रश्न है। उन्होंने भारतीयों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे स्वयं अपने भविष्य के निर्माता हैं। उनका योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी था, जिसने देशवासियों को निर्भीक और आत्मविश्वासी बनाया।
आज़ाद हिंद फ़ौज और नेताजी का नेतृत्व
नेताजी का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक योगदान आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व रहा। यह सेना केवल सशस्त्र संघर्ष का माध्यम नहीं थी, बल्कि भारतीयों के भीतर स्वाधीनता और आत्मसम्मान की चेतना जगाने का एक सशक्त प्रयास थी। नेताजी ने इस सेना में अनुशासन, समानता और राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।उनका प्रसिद्ध आह्वान — “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” — उस समय की जनभावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति था। इस आह्वान ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता के लिए त्याग अनिवार्य है। आज़ाद हिंद फ़ौज ने यह सिद्ध किया कि भारतीय स्वयं संगठित होकर अपने देश के लिए बलिदान देने को तैयार हैं, और यही भावना स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान करती है।

नेताजी से मिलने वाली सीख
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन आज भी हमें कई महत्वपूर्ण सीख देता है। उनकी पहली सीख साहस की है, यानी कठिन परिस्थितियों में भी सही और दृढ़ निर्णय लेने की क्षमता। दूसरी सीख अनुशासन से जुड़ी है, क्योंकि बिना अनुशासन के कोई भी आंदोलन या उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। तीसरी सीख नेतृत्व की है, जहाँ नेताजी ने यह दिखाया कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने से बनता है।सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि राष्ट्रहित को हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा जाना चाहिए। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प अडिग हो, तो सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी बदली जा सकती हैं।
आज के समय में पराक्रम दिवस का महत्व
आज के समय में पराक्रम दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपनी स्वतंत्रता, अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। नेताजी के विचार आज भी हमें साहस, ज़िम्मेदारी और कर्मठता की प्रेरणा देते हैं। यह दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं करता, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
संदर्भ -
https://tinyurl.com/ytd2xdwd
https://tinyurl.com/y4sxus2n
https://tinyurl.com/52uaead3
https://tinyurl.com/5e4nudrr
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