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मेरठवासियो, जब भी हम फलों की मिठास और सेहत की बात करते हैं, तो शरीफा यानी सीताफल का नाम अपने आप जुबान पर आ जाता है। इसकी मीठी खुशबू और मलाई जैसी मुलायम बनावट इसे खास बना देती है। बच्चे हों या बड़े, इसका स्वाद हर किसी को बेहद पसंद आता है। आजकल भारत के कई राज्यों में इसकी खेती तेजी से बढ़ रही है और खासकर उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए यह एक नई उम्मीद लेकर आई है। यह फल केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी है। इसमें विटामिन (Vitamin), मिनरल (Mineral) और प्राकृतिक ऊर्जा प्रचुर मात्रा में पाई जाती है, जो शरीर को ताकत और रोगों से लड़ने की क्षमता देती है। खेती की दृष्टि से भी यह किसानों के लिए फायदेमंद है क्योंकि कम मेहनत और लागत में अच्छा मुनाफा दिला सकता है। यही कारण है कि शरीफा धीरे-धीरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नई पहचान बना रहा है। यह फल न केवल खेतों को हरा-भरा करता है बल्कि किसानों की जिंदगी में भी मिठास और खुशहाली भर रहा है।
इस लेख में हम शरीफा के महत्व को पाँच मुख्य पहलुओं के ज़रिए समझने की कोशिश करेंगे। सबसे पहले हम जानेंगे कि शरीफा क्या है, इसका वैज्ञानिक नाम, इसकी विशेषताएँ और यह किन क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसके बाद हम इस फल के पोषण मूल्य और औषधीय गुणों पर ध्यान देंगे, जिससे पता चलता है कि यह केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है। तीसरे पहलू में हम देखेंगे कि शरीफा का उपयोग किन-किन रूपों में किया जाता है और इसका औद्योगिक महत्व किस तरह बढ़ता जा रहा है। चौथे हिस्से में इसकी खेती की तकनीक और उगाने की विधियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जैसे बीज प्रसार, ग्राफ्टिंग (Graphing), मिट्टी और जलवायु की ज़रूरतें। और अंत में, हम इसके पेड़ों की देखभाल, उत्पादन को बढ़ाने के उपाय और देश के प्रमुख उत्पादक राज्यों की जानकारी प्राप्त करेंगे। इन सभी पहलुओं से हमें पता चलेगा कि क्यों शरीफा किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए एक खास महत्व रखता है।
शरीफा का परिचय और विशेषताएँ
शरीफा, जिसे आमतौर पर सीताफल कहा जाता है और वैज्ञानिक भाषा में एनोना स्क्वैमोसा (Annona Squamosa) के नाम से जाना जाता है, दुनिया के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का एक बेहद लोकप्रिय फल है। इसके बारे में माना जाता है कि इसका मूल संबंध भारत और ब्राज़ील (Brazil) दोनों से रहा है, और समय के साथ यह दुनिया के कई हिस्सों में फैल गया। आज यह फल खास तौर पर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। शरीफा का आकार गोल या हल्का शंक्वाकार होता है और इसके छिलके पर बने छोटे-छोटे खंड इसे आसानी से पहचानने योग्य बनाते हैं। इसका आकार आमतौर पर 5 से 10 सेंटीमीटर व्यास और 6 से 10 सेंटीमीटर लंबाई का होता है, जबकि वजन लगभग 100 से 240 ग्राम तक हो सकता है। इसका गूदा मलाई जैसा नरम, बेहद मीठा और सुगंधित होता है। अंदर छोटे काले चमकदार बीज पाए जाते हैं, हालांकि आजकल कुछ ऐसी किस्में भी उपलब्ध हैं जिनमें बीज बहुत कम या लगभग नहीं होते। इसकी सुगंध और मिठास इसे खास और लोगों का पसंदीदा बनाती है।
पोषण मूल्य और औषधीय गुण
शरीफा को सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अनमोल माना जाता है। इस फल में प्राकृतिक शर्करा की अच्छी मात्रा होती है, जिससे यह शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है। इसमें विटामिन C (Vitamin C) की प्रचुरता प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती है, जबकि विटामिन B6 (Vitamin B6), थायामिन (Thiamine), राइबोफ्लेविन (Riboflavin, B2), नियासिन (Niacin, B3) और फोलिक एसिड (Folic Acid, B9) जैसे तत्व शरीर के विकास, रक्त निर्माण और मस्तिष्क के स्वास्थ्य में मदद करते हैं। मैग्नीशियम (Magnesium), पोटेशियम (Potassium), फॉस्फोरस (Phosphorus) और आयरन (Iron) जैसे मिनरल हड्डियों को मज़बूत बनाने, हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाने और खून की कमी को दूर करने में सहायक होते हैं। शरीफा का नियमित सेवन त्वचा को स्वस्थ और बालों को मज़बूत बनाने के साथ-साथ पाचन तंत्र को भी सही रखता है। इसे प्राकृतिक और हल्का मीठा "एनर्जी फ्रूट" कहना गलत नहीं होगा।
शरीफा के उपयोग और औद्योगिक महत्व
शरीफा का उपयोग सबसे पहले तो इसे सीधे खाने में होता है। इसका मलाईदार और मीठा स्वाद बच्चों और बड़ों दोनों को बेहद पसंद आता है। इसके अलावा इस फल का गूदा अलग-अलग प्रकार की मिठाइयों, आइसक्रीम (Ice Cream), मिल्कशेक (Milk Shake), शरबत और वाइन (Wine) जैसे उत्पादों में भी काम आता है। इसकी गंध और स्वाद से बने पेय पदार्थ और डेसर्ट स्वादिष्ट होते हैं। औद्योगिक दृष्टि से भी शरीफा महत्वपूर्ण है। इसके बीज, पत्ते और छाल औषधीय और व्यावसायिक उपयोग में लाए जाते हैं। बीज और सूखे कच्चे फलों का चूर्ण प्राकृतिक कीटनाशक की तरह खेतों में उपयोग किया जाता है। पत्तियों और बीजों से तेल और रेशा निकाला जाता है, जिसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं और कुछ सौंदर्य उत्पादों में किया जाता है। इस प्रकार यह फल केवल खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई तरह से आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा है।
खेती की तकनीक और उगाने की विधियाँ
शरीफे के पौधों को पारंपरिक रूप से बीज प्रसार विधि से उगाया जाता है। इस विधि में पूरी तरह पके हुए फलों से बीज निकालकर तुरंत 2–3 सेंटीमीटर गहराई पर बोया जाता है। लगभग 30 दिनों में अंकुरण हो जाता है। हालांकि इस विधि में पौधे देर से फल देते हैं और उनकी ऊंचाई ज्यादा हो जाती है। इसलिए आजकल अधिक उत्पादन और एकसमान गुणवत्ता के लिए ग्राफ्टिंग तकनीक को प्राथमिकता दी जाती है। खेती के लिए जलवायु का चुनाव भी महत्वपूर्ण है। शरीफे की अच्छी फसल के लिए 50 से 85 डिग्री फ़ारेनहाइट (Fahrenheit) तापमान उपयुक्त है। यह पौधा सूखा सहिष्णु होता है लेकिन बरसात खत्म होने के बाद 12–15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना जरूरी है। खेती के लिए हल्की, पथरीली और जल निकासी वाली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। फूल आने के समय यदि वातावरण में 60% या उससे अधिक आर्द्रता हो तो उत्पादन में काफी वृद्धि होती है। यह फसल अत्यधिक नमी और पानी भराव को पसंद नहीं करती, इसलिए खेत की तैयारी में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।
देखभाल, उत्पादन और प्रमुख उत्पादक राज्य
शरीफे के पेड़ मजबूत होते हैं लेकिन इन्हें कुछ देखभाल की आवश्यकता होती है। तेज हवाओं से पौधों को बचाना जरूरी है, क्योंकि इससे शाखाएं टूट सकती हैं। खरपतवार समय-समय पर साफ करें ताकि पौधों को पर्याप्त पोषण मिल सके। मिट्टी में उचित जल निकासी होनी चाहिए ताकि जड़ों में पानी रुककर रोग न पैदा करे। यह फसल कम लागत वाली है क्योंकि इसे ज्यादा उर्वरक या कीटनाशक की जरूरत नहीं होती। भारत में महाराष्ट्र इस फल का सबसे बड़ा उत्पादक है, जहां सालाना लगभग 92,000 टन उत्पादन होता है। इसके बाद गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश का स्थान आता है। इसके अलावा राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में भी यह अच्छी तरह उगाया जाता है। इन राज्यों में बढ़ती मांग और वैज्ञानिक खेती तकनीक के कारण शरीफा किसानों के लिए लाभकारी फसल बन चुकी है।
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