उत्तर प्रदेश में मछली पालन: उत्पादन, योजनाएँ और शुरुआत से जुड़ी अहम जानकारियाँ

समुद्री संसाधन
06-01-2026 09:22 AM
उत्तर प्रदेश में मछली पालन: उत्पादन, योजनाएँ और शुरुआत से जुड़ी अहम जानकारियाँ

मेरठवासियों, खेती-किसानी की परंपरा हमारे ज़िले की पहचान रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी कृषि व्यवस्था में मछली पालन (Fisheries) आज नई ताक़त बनकर उभर रहा है? गाँव के तालाबों से लेकर बड़े-बड़े जलाशयों तक, मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में मछली उत्पादन की संभावनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। यह सिर्फ एक खेती का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण आमदनी, रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला क्षेत्र बन चुका है। 
आज के इस लेख में हम मछली पालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल भाषा में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि उत्तर प्रदेश का वर्तमान मछली उत्पादन किस तरह नई ऊँचाइयाँ छू रहा है और इसका मेरठ पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसके बाद, हम मछली पालन उद्योग से मिलने वाले आर्थिक लाभ, रोजगार की स्थिति और किसानों की बढ़ती आय के बारे में बात करेंगे। फिर, हम राज्य की प्रमुख मछली प्रजातियों, उपलब्ध जल संसाधनों और हैचरी व्यवस्था-तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और सब्सिडी - को विस्तार से समझेंगे। अंत में, हम उन सरकारी योजनाओं और प्रक्रियाओं पर ध्यान देंगे जिनकी मदद से कोई भी किसान या युवा मछली पालन शुरू कर सकता है।

उत्तर प्रदेश में वर्तमान मछली उत्पादन की स्थिति
उत्तर प्रदेश में मछली उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा है, और 2023 इसका सबसे बड़ा प्रमाण बना जब राज्य ने 9,15,000 टन का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया। यह आंकड़ा न केवल पिछले वर्ष के 8,09,000 टन से अधिक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राज्य में मछली पालन की दिशा में लगातार प्रयोग, तकनीकी सुधार और किसानों की बढ़ती समझ ने इस क्षेत्र को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। यदि हम पिछले 25 वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो साफ़ दिखता है कि उत्पादन धीरे-धीरे चढ़ाई पर रहा है — 1999 में जहाँ मात्र 1,83,030 टन उत्पादन हुआ था, वहीं आज उसी प्रदेश में लाखों टन की मछली उत्पन्न हो रही है। यह वृद्धि सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि कृषि-आधारित आजीविका की बदलती वास्तविकताओं, तकनीकी अपनाने और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग का संकेत है। मछली पालन अब परंपरा से आगे बढ़कर विज्ञान, प्रबंधन और सरकारी सहयोग का संयुक्त परिणाम बन चुका है।

मछली पालन उद्योग का आर्थिक महत्व और रोजगार स्थिति
उत्तर प्रदेश में मछली पालन अब आर्थिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनता जा रहा है। जहाँ पहले इसे एक सहायक व्यवसाय माना जाता था, वहीं आज हजारों परिवारों के लिए यह प्राथमिक आय का स्रोत बन चुका है। राज्य में 1.25 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से मछली पालन से जुड़े हैं, और हर वर्ष लगभग 10,000 नए लोग इस क्षेत्र में जुड़ते जा रहे हैं। आय के मामले में भी यह क्षेत्र ग्रामीण घरों के लिए बेहद कारगर साबित हुआ है—औसतन एक परिवार 5 से 6 लाख रुपये प्रति वर्ष कमाता है, जो ग्रामीण जीवन में बड़ी आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है। उत्पादन की वृद्धि दर भी बताती है कि यह क्षेत्र कितनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। 2020–21 में 7.40 लाख टन मछली उत्पादन 2023 में बढ़कर 9.40 लाख टन तक पहुँच गया और अनुमान है कि आने वाले समय में यह संख्या 12 लाख टन के स्तर को भी पार कर जाए। रोजगार, आय, और उत्पादन—इन तीनों मोर्चों पर मछली पालन आज उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आकार दे रहा है।

उत्तर प्रदेश की प्रमुख मछली प्रजातियाँ और जल संसाधनों का उपयोग
उत्तर प्रदेश के पास प्राकृतिक जल संसाधनों की कोई कमी नहीं है—10 लाख हेक्टेयर का विशाल जल क्षेत्र राज्य को मछली पालन के लिए अद्भुत क्षमता प्रदान करता है। तालाब, झीलें, नदियाँ, जलाशय और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र, सभी मिलकर एक विविधतापूर्ण जल पारिस्थितिकी का निर्माण करते हैं। इन्हीं संसाधनों के बल पर राज्य में तरह-तरह की मछलियाँ पाली जाती हैं। भारतीय प्रमुख कार्प मछलियाँ (IMC) — रोहू, कतला, मृगल — सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हैं। इनके साथ पांगासियस, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और मिल्कफिश जैसी प्रजातियाँ भी बड़े पैमाने पर पाली जा रही हैं। विविधता का यह विस्तार न सिर्फ उत्पादन बढ़ाता है बल्कि किसानों के जोखिम को भी कम करता है, क्योंकि अलग-अलग प्रजातियों की अलग-अलग जल और तापमान आवश्यकताएँ होती हैं। इस विविधता से किसानों की आय स्थिर रहती है और समग्र जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग संभव हो पाता है।

हैचरी व्यवस्था, तकनीकी सहायता और सब्सिडी प्रणाली
मछली पालन को वैज्ञानिक रूप देने में हैचरी व्यवस्था की भूमिका केंद्रीय है। उत्तर प्रदेश में कुल 324 हैचरीज़ सक्रिय हैं, जिनमें से नौ सरकारी और बाकी निजी हैं। ये हैचरीज़ किसानों को उच्च गुणवत्ता वाला मछली बीज उपलब्ध कराती हैं, जिससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त, किसानों की तकनीकी क्षमता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, रोग नियंत्रण संबंधी जागरूकता और एक विशेष मोबाइल ऐप की मदद से रोग निगरानी की सुविधा भी दी जाती है। स्टॉकिंग डेंसिटी को 8,000–10,000 फिंगरलिंग्स प्रति हेक्टेयर रखना वैज्ञानिक रूप से सबसे अनुकूल माना जाता है और सरकार किसानों को यह मानक समझाने में निरंतर सहायता करती है। तालाब निर्माण या सुधार के लिए पुरुष किसानों को 40% और महिला किसानों को 60% तक सब्सिडी देने की व्यवस्था ने इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाई है। यह पूरा ढांचा मछली पालन को आधुनिक, सुरक्षित और अधिक लाभदायक बनाता है।

निषादराज नाव छूट योजना: उद्देश्य, लाभ और पात्रता
मछुआरा समुदाय को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने और उनकी पारंपरिक गतिविधियों को संरक्षित रखने के लिए निषादराज नाव छूट योजना अत्यंत उपयोगी है। इस योजना के अंतर्गत नाव और जाल खरीदने पर 40% यानी लगभग 28,000 रुपये तक की सब्सिडी दी जाती है। यह सहायता उन परिवारों के लिए जीवन बदल देने वाला साधन बन सकती है जो अपनी आजीविका दृढ़ता से जारी रखना चाहते हैं लेकिन साधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। हर वर्ष 1,500 पट्टा धारकों को इस योजना का लाभ दिया जाता है और अगले पाँच वर्षों में कुल 7,500 परिवारों तक इसे पहुँचाने का लक्ष्य है। योजना का एक बड़ा उद्देश्य अवैध मछली पकड़ने को रोकना और समुदाय को जल संसाधनों की रक्षा के लिए प्रेरित करना भी है, जिससे राज्य की मछली संपदा को लंबे समय तक बचाया जा सके।

मुख्यमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना: तालाब विकास और बीज बैंक कार्यक्रम
यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है। इसके तहत राज्य सरकार ग्राम सभाओं के तालाबों का वैज्ञानिक तरीके से विकास करवाती है और तालाबों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए आवश्यक उपकरण और बीज उपलब्ध कराती है। पहले वर्ष में 100 बीज बैंक स्थापित किए जा चुके हैं और अगले पाँच वर्षों में 500 बीज बैंक बनाने का लक्ष्य है। सबसे बड़ी बात यह कि तालाबों में की जाने वाली लागत का 40% सरकारी सब्सिडी के रूप में दिया जाता है, जिससे गरीब और पिछड़े समुदाय के पट्टा धारकों के लिए यह व्यवसाय आसानी से शुरू किया जा सके। बीज बैंक व्यवस्था से किसानों को गुणवत्तापूर्ण मछली बीज उपलब्ध होता है और उत्पादन में निरंतरता बनी रहती है।

भारत में मछली पालन शुरू करने की मूल प्रक्रिया
मछली पालन शुरू करने का सबसे पहला कदम एक उपयुक्त तालाब का चयन और निर्माण है। तालाब ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ सालभर पर्याप्त पानी मिलता रहे और मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता अधिक हो। इसके बाद मिट्टी की जाँच, तालाब की खुदाई की गहराई, पानी भरने की गति और निकासी की सुविधा को ध्यान में रखकर संरचना तैयार की जाती है। तालाब के तैयार होने के बाद फिंगरलिंग्स (Fingerlings) खरीदी जाती हैं और वैज्ञानिक तरीके से स्टॉकिंग (stocking) की जाती है। मछलियों को संतुलित भोजन देना, जल की गुणवत्ता जांचना और रोगनिरोधी उपचार करना नियमित कार्यों में शामिल होता है। यह प्रक्रिया सुनने में भले लंबी लगे, लेकिन सही दिशा-निर्देशों और सरकारी सहायता के साथ कोई भी किसान इसे सफलतापूर्वक कर सकता है।

स्थान चयन, पर्यावरणीय कारक और तालाब निर्माण की तकनीकी आवश्यकताएँ
एक अच्छा तालाब तभी बनाया जा सकता है जब सही स्थान का चयन किया जाए। सबसे पहले पर्यावरणीय और सामाजिक कारकों को समझना ज़रूरी है - जैसे क्षेत्र की पारंपरिक आदतें, स्थानीय लोगों की रुचि और जल स्रोत की निरंतरता। चयनित क्षेत्र की सफाई की जाती है, जिसमें 10 मीटर तक के क्षेत्र को अवरोधों से मुक्त किया जाता है। मिट्टी-रेत अनुपात (1:2) बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह तालाब के तल को मजबूत बनाता है और पानी को रिसने से रोकता है। इसके बाद आयात पाइप को ऊपरी हिस्से में और निकासी पाइप को निचले हिस्से में लगाया जाता है ताकि तालाब दो दिनों में भर सके और जरूरत पड़ने पर पानी आसानी से बदला जा सके। इन तकनीकी बिंदुओं का पालन तालाब को स्थायी, मजबूत और मछली पालन के लिए सुरक्षित बनाता है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/yvshn3sk  
https://tinyurl.com/2p9wu42z  
https://tinyurl.com/53fsvc3r  
https://tinyurl.com/3kzvummy
https://tinyurl.com/2mus88fb 

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