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मेरठवासियों, आज स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर पूरा देश उस महान आध्यात्मिक पुरुष को याद कर रहा है जिसने अपने अल्पायु में ही पूरी दुनिया की सोच को नई दिशा दी। यह दिन हमें भी एक अवसर देता है कि हम उनके जीवन को, उनकी यात्राओं को और उनके संदेशों को गहराई से समझें। केवल 39 वर्ष की आयु में ही उन्होंने जिस आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ भारत की आध्यात्मिक परंपरा को विश्व मंच पर प्रस्तुत किया, उसका सबसे उज्जवल उदाहरण वर्ष 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में दिया गया उनका ऐतिहासिक संबोधन है। आज इस विशेष अवसर पर हम उनके प्रारंभिक जीवन से लेकर शिकागो की उस यात्रा तक चलेंगे जहाँ उनके विचारों ने पूरी दुनिया को सहिष्णुता, एकता और मानवता के नए अर्थ समझाए।
इस लेख में हम स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनके विचारों को समझेंगे। सबसे पहले हम उनके प्रारंभिक जीवन की झलक देखेंगे और यह जानने का प्रयास करेंगे कि उनके व्यक्तित्व की नींव बचपन में ही कैसे तैयार हो गई। इसके बाद हम उनकी शिकागो यात्रा और विश्व धर्म संसद में दिए गए उनके प्रथम संबोधन के आरम्भ को समझेंगे। फिर हम उनके प्रमुख संदेशों पर ध्यान देंगे जिनमें धार्मिक सहिष्णुता, आपसी सम्मान और मानवता की एकता का विचार प्रमुख रूप से उभरता है। अंत में हम 27 सितंबर को दिए गए उनके अंतिम संबोधन को समझेंगे जिसने धर्मों की एकता और वैश्विक सद्भाव के विषय को अत्यन्त सुंदर और हृदयस्पर्शी रूप दिया।
स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन
स्वामी विवेकानंद का जन्म 1863 में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में हुआ था। बचपन से ही वे अत्यन्त जिज्ञासु और विचारशील स्वभाव के थे। उनके मन में जीवन, सत्य और अध्यात्म से जुड़े प्रश्न लगातार उठते रहते थे। जब वे अपने गुरु श्री रामकृष्ण के संपर्क में आए तो उनके विचार और भी स्पष्ट होने लगे। श्री रामकृष्ण ने उन्हें यह सीख दी कि धर्म का सार मनुष्य की सेवा, प्रेम और सत्य में निहित है। इन्हीं मूल विचारों ने विवेकानंद के व्यक्तित्व को मजबूत आधार दिया और आगे चलकर उनके भाषणों और यात्राओं की दिशा तय की। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सही गुरु और सही दिशा मिल जाए तो मनुष्य समाज के लिए प्रकाश का स्रोत बन सकता है।

शिकागो तक यात्रा और विश्व धर्म संसद में प्रथम संबोधन
विवेकानंद की शिकागो यात्रा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए नहीं थी, बल्कि वह एक आत्मिक और सांस्कृतिक यात्रा भी थी। भारत से निकलते समय उन्हें यह नहीं मालूम था कि उनकी वाणी विदेश की धरती पर लाखों लोगों के मन को छू लेगी। उन्होंने रास्ते में चीन, जापान और कनाडा जैसे देशों की यात्रा की और विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं को समझा।जब वे शिकागो की सभा में पहुँचे तो दुनिया भर के धर्माचार्य उपस्थित थे। शुरुआत में वे शांत और संयमित दिखाई दे रहे थे, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने ऐतिहासिक संबोधन की शुरुआत इन शब्दों से की — “अमेरिका के बहनों और भाइयों”, पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह संबोधन केवल शब्द नहीं थे बल्कि उसमें इतना स्नेह और अपनापन था कि हर व्यक्ति उनकी भावनाओं के साथ जुड़ गया। इसी क्षण से विवेकानंद ने विश्व को भारत की आत्मा से परिचित कराया।
धर्मों में मतभेद क्यों पैदा होते हैं
15 सितंबर 1893 को दिए गए अपने संबोधन में स्वामी विवेकानंद ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि धर्मों के बीच मतभेद क्यों जन्म लेते हैं। उनके अनुसार समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य अपने सीमित अनुभव और विश्वास को ही पूर्ण सत्य मान बैठता है। इसी विचार को समझाने के लिए उन्होंने कुएँ के मेंढक की प्रसिद्ध कथा सुनाई, जिसमें मेंढक अपने छोटे से कुएँ को ही पूरी दुनिया समझ लेता है और समुद्र की विशालता को स्वीकार नहीं कर पाता। विवेकानंद ने कहा कि हिंदू, ईसाई और मुसलमान सभी अक्सर अपने-अपने दायरों में रहकर संसार को देखते हैं। उनके अनुसार विश्व धर्म संसद का उद्देश्य इन्हीं सीमाओं को तोड़ना और मानवता को व्यापक, उदार और समावेशी दृष्टि अपनाने की दिशा में आगे बढ़ाना था।
विवेकानंद के भाषणों के मुख्य संदेश
विवेकानंद के भाषणों की सबसे विशेष बात यह थी कि वे किसी एक धर्म को श्रेष्ठ या दूसरे को छोटा साबित करने की कोशिश नहीं करते थे। वे बार बार यह बताते थे कि भारत की परंपरा केवल सहिष्णुता ही नहीं बल्कि सभी धर्मों को सत्य रूप में स्वीकार करने की अद्भुत शक्ति रखती है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने सदियों से विभिन्न समाजों और उत्पीड़ित समुदायों को शरण और सम्मान दिया है।उन्होंने संकीर्णता और कट्टरता को मानव समाज की सबसे बड़ी कमजोरी कहा। उनके अनुसार संकीर्ण दृष्टि मनुष्य को अपने छोटे दायरे में ही बाँध देती है जिससे वह दूसरों की व्यापकता और सुंदरता को देखने में असफल हो जाता है।उनका संदेश बहुत सरल था कि विभिन्न धर्म और विचारधाराएँ संघर्ष का कारण नहीं बल्कि एक ऐसा सुंदर संगम बन सकती हैं जहाँ सबके लिए स्थान हो। उन्होंने दुनिया को यह बताया कि यदि मानवता को आगे बढ़ना है तो उसे प्रेम, सम्मान और स्वीकार करने की भावना को अपनाना होगा।

सत्ताईस सितंबर का अंतिम संबोधन और उसका महत्व
विश्व धर्म संसद के अंतिम दिन दिए गए विवेकानंद के संबोधन में धर्मों की एकता का अत्यन्त सशक्त और मधुर संदेश था। उन्होंने कहा कि किसी एक धर्म की विजय और दूसरे धर्मों के समाप्त हो जाने से एकता कभी संभव नहीं है। उन्होंने बीज और पौधे का उदाहरण देते हुए समझाया कि बीज मिट्टी, जल और वायु से पोषण लेकर भी अपनी मौलिकता के साथ ही एक पौधे में बदलता है। उसी प्रकार हर धर्म को अपनी पहचान को सुरक्षित रखते हुए दूसरों के अच्छे विचारों को ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पवित्रता, करुणा और उच्च चरित्र केवल किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं होते। हर धर्म ने ऐसे लोग पैदा किए हैं जिन्होंने दुनिया को सेवा, शांति और प्रेम का मार्ग दिखाया है। उनके अनुसार यह सभा दुनिया के लिए एक संकेत है कि अब समय संघर्ष का नहीं बल्कि सहयोग और शांति का है। यह अवसर है कि हम धर्मों की सुंदर विविधता को संघर्ष नहीं बल्कि सौहार्द का माध्यम बनाएं। इसी भावना को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था — “संघर्ष नहीं, सहयोग”, “विनाश नहीं, आत्मसातकरण”, “विभाजन नहीं, बल्कि सौहार्द और शांति” |
संदर्भ-
https://tinyurl.com/scn82ud7
https://tinyurl.com/2rep3tsk
https://tinyurl.com/yey3k22b
https://tinyurl.com/fcd7x34y
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