अकबर के दौर में सत्ता और सिक्के: सल्तनत से मुगल प्रशासन तक का ऐतिहासिक सफ़र

मध्यकाल : 1450 ई. से 1780 ई.
09-01-2026 09:25 AM
अकबर के दौर में सत्ता और सिक्के: सल्तनत से मुगल प्रशासन तक का ऐतिहासिक सफ़र

जब हम उत्तर भारत के मध्यकालीन इतिहास को देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि कई नगर केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं थे, बल्कि सत्ता, प्रशासन और अर्थव्यवस्था की धुरी के रूप में कार्य करते थे। दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगल साम्राज्य तक, ऐसे ही एक महत्वपूर्ण क्षेत्र ने समय-समय पर सैन्य, राजस्व और व्यापारिक केंद्र की भूमिका निभाई। मुस्लिम आक्रमणों, सल्तनती शासन और फिर मुगल प्रशासन के दौरान इस क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ता गया। कालांतर में, इसी क्षेत्र, जिसे आज हम मेरठ के नाम से जानते हैं - में स्थापित टकसालों, कृषि समृद्धि और प्रशासनिक व्यवस्थाओं ने इसे एक साधारण भू-भाग से आगे बढ़ाकर उत्तर भारत की ऐतिहासिक संरचना का अहम स्तंभ बना दिया।
आज के लेख में हम पहले समझेंगे कि कैसे प्रारंभिक मुस्लिम आक्रमणों और सल्तनत शासन ने उत्तर भारत की राजनीतिक दिशा तय की। इसके बाद हम देखेंगे कि मुगल साम्राज्य में मेरठ का प्रशासनिक महत्व कैसे बढ़ा। फिर हम अकबर के प्रशासन, शेरशाह सूरी के प्रभाव और तीन-धातु मौद्रिक व्यवस्था को समझेंगे। अंत में, हम मेरठ की तांबे की टकसाल, अकबर के सिक्कों की विशेषताओं और उनके व्यापारिक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

प्रारंभिक मुस्लिम आक्रमण और सल्तनती नियंत्रण
11वीं सदी के बाद जब उत्तर भारत पर लगातार मुस्लिम आक्रमणों की श्रृंखला शुरू हुई, तब मेरठ और इसके आसपास के क्षेत्र भी इन ऐतिहासिक हलचलों के केंद्र में आ गया। 1191 में क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने मेरठ सहित आसपास के कई क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया, और यह वह क्षण था जब मेरठ पहली बार दिल्ली सल्तनत की औपचारिक सत्ता में शामिल हुआ। इसके बाद गुलाम वंश की स्थापना हुई, और मेरठ सीधे तौर पर सल्तनती प्रशासन के आधिपत्य में आने लगा। तुर्क, खिलजी, तुगलक, सय्यद और लोदी वंश - सभी ने अपनी-अपनी अवधि में मेरठ को एक महत्वपूर्ण सैन्य और राजस्व क्षेत्र के रूप में संचालित किया। यही काल था जिसमें मेरठ एक सीमांत कस्बे से बढ़कर कर-संग्रह और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए उपयोगी केंद्र बनता गया। लगातार सत्ता परिवर्तन के बावजूद मेरठ की पहचान एक ऐसे क्षेत्र के रूप में बनने लगी जिसे हर शासन अपनी रणनीतिक वजहों से मजबूती से पकड़ना चाहता था।

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मुगल साम्राज्य में मेरठ का प्रशासनिक महत्व
1526 में बाबर की विजयी वापसी और पानीपत के युद्ध के बाद दिल्ली सल्तनत का अंत हुआ और मुगलों का नया अध्याय शुरू हुआ। मेरठ और इसके आसपास के क्षेत्र इस सत्ता-परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण सामरिक हिस्सा बन गया। अकबर और जहांगीर के समय में यह क्षेत्र प्रशासनिक स्थिरता, कृषि उत्पादन और व्यापार मार्गों के विस्तार में बेहद उपयोगी साबित हुआ। गंगा-घाट के प्रमुख रास्तों पर स्थित होने के कारण बिजनौर, हरिद्वार, दिल्ली, आगरा और पूर्वी क्षेत्रों की ओर जाने वाले मार्ग मेरठ से होकर गुजरते थे, जिससे यह व्यापार और सैन्य गतिविधियों के लिए एक अनिवार्य पड़ाव बन गया। 18वीं सदी के अंत तक मुगल शक्ति कमजोर होने लगी, और 1788 में मराठों ने मेरठ पर कब्ज़ा कर लिया। यह शहर प्राचीन से मध्यकालीन राजनीति में लगातार एक प्रमुख भूमिका निभाता रहा।

File:Portrait of Akbar by Manohar.jpg

अकबर का प्रशासन और शेरशाह सूरी की नीतियों का प्रभाव
अकबर का शासन भारतीय इतिहास में सुवर्ण युग के रूप में जाना जाता है, लेकिन उसकी प्रशासनिक और मौद्रिक संरचनाओं की जड़ें काफी हद तक शेरशाह सूरी की प्रतिभा तक जाती हैं। शेरशाह सूरी ने सिर्फ ग्रांड ट्रंक रोड (Grand Trunk Road) जैसे विशाल परियोजनाएँ ही नहीं बनाईं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण - एक अत्यंत संगठित राजस्व और मुद्रा प्रणाली स्थापित की। अकबर ने इन्हीं व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाया, उन्हें और अधिक कार्यक्षम, विस्तृत और स्थायी रूप दिया। अकबर की विशेषता यह थी कि वह सैन्य शक्ति के साथ-साथ आर्थिक नीति, धार्मिक सहिष्णुता, कला, शिक्षा और व्यापार को लेकर भी दूरदर्शी था। उसके शासन में पूरे साम्राज्य में एकरूपता लाना, किसानों की स्थिति सुधारना, व्यापारियों को सुरक्षित माहौल देना और प्रांतों में प्रशासनिक अनुशासन स्थापित करना प्रमुख प्राथमिकताएँ थीं। इसी नीति का एक बड़ा हिस्सा था - मुद्रा व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना ताकि देश के किसी भी हिस्से में व्यापार और कर-संग्रह बिना किसी भ्रम के हो सके।

अकबर की मौद्रिक प्रणाली: सोना, चांदी और तांबे के सिक्के
अकबर की मुद्रा व्यवस्था दुनिया की सबसे उन्नत और संगठित मौद्रिक व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। उन्होंने तीन धातुओं - सोना, चांदी और तांबा - में सिक्के जारी किए, ताकि साम्राज्य के हर वर्ग के लिए उपयुक्त विकल्प उपलब्ध हो। सोने की मौहर, जिसका वजन लगभग 170 ग्रेन (grain) था, बड़े व्यापारी, अमीर, शाही घराने और उच्च प्रशासनिक अधिकारी बड़े लेनदेन में इस्तेमाल करते थे। चांदी का रूपया, जो शेरशाह के समय से प्रचलन में था, अकबर द्वारा नए स्वरूप में जारी किया गया और इसका उपयोग बाजारों, किसानों, धान्य-व्यापार और कर-संग्रह में किया जाता था। इसी धातु में उन्होंने एक हल्की मुद्रा “शाहरुख़ी” जारी की जिसका वजन लगभग 72 ग्रेन था और यह रोज़मर्रा के व्यापार में अधिक सुविधाजनक थी। तांबे का दाम, जिसका वजन लगभग 330 ग्रेन था, आम जनता - खासकर किसानों, कारीगरों और स्थानीय व्यापारी वर्ग - के लिए प्रमुख मुद्रा था। तीनों धातुओं की यह परतदार प्रणाली साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को अत्यंत स्थिर, सुलभ और पारदर्शी बनाती थी।

मेरठ की तांबे के सिक्कों की टकसाल: ऐतिहासिक महत्व
अकबर ने पूरे साम्राज्य में कई टकसालें स्थापित कीं, और उनमें मेरठ का नाम विशेष महत्व रखता है। मेरठ में मुख्यतः तांबे के सिक्कों (दाम) की ढलाई होती थी, जो पूरे साम्राज्य की आम जनता के लिए रोज़मर्रा की सबसे उपयोगी मुद्रा थी। आइन-ए-अकबरी में मेरठ की टकसाल का उल्लेख मिलता है, जिससे सिद्ध होता है कि यह शहर उस समय आर्थिक रूप से कितना महत्वपूर्ण था। टकसालें केवल सिक्के बनाने का स्थान नहीं थीं - वे स्थानीय कला, तकनीक, श्रम और कौशल का केंद्र भी थीं। यह टकसाल मेरठ की मध्यकालीन पहचान का एक गौरवपूर्ण अध्याय है।

File:Copper Dam coins from the reign of Akbar the Great, Mughal Empire, from a personal collection, photographed on June 8, 2023.jpg

अकबर के सिक्कों की विशेषताएँ और अंकन प्रणाली
अकबर की मुद्रा व्यवस्था की सबसे उन्नत विशेषता थी - एकरूपता, शुद्धता और स्पष्टता। उसके सिक्कों पर तीन प्रमुख प्रकार की सूचनाएँ अनिवार्य रूप से खुदी होती थीं:

  1. सिक्के के ढलने का वर्ष,
  2. जिस टकसाल में वह ढला हो,
  3. और अकबर की पूर्ण उपाधि।

यह उस दौर में विश्व की सबसे आधुनिक अंकन प्रणालियों में से एक थी। इससे नकली सिक्कों की संभावना बेहद कम हो गई और व्यापार में ईमानदारी तथा सटीकता बढ़ी। इस व्यवस्था ने साम्राज्य में आर्थिक पारदर्शिता को एक नए स्तर पर पहुंचाया। इस प्रणाली की विश्वसनीयता इतनी थी कि बाद के सभी मुगल शासकों - जहांगीर, शाहजहां, औरंगज़ेब - ने भी इसी परंपरा को जारी रखा। यह व्यवस्था बताती है कि अकबर केवल एक योद्धा नहीं था, बल्कि आर्थिक नियोजन का एक अद्भुत वास्तुकार भी था।

मुगल सिक्कों का व्यापार पर प्रभाव और ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका
मुगल युग में सिक्के केवल एक प्रशासकीय प्रतीक नहीं थे - वे पूरे व्यापार जगत की रीढ़ थे। भारत में व्यापार, कृषि-बाज़ार, अनाज मंडियाँ, अंतर-प्रांतीय माल-परिवहन - सब कुछ मुगल रुपए और दाम पर निर्भर था। इतना ही नहीं, एशिया के कई हिस्सों - विशेषकर फारस, मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया - में भी भारतीय चांदी का रूपया अत्यंत विश्वसनीय माना जाता था। जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई, तो शुरुआती दशकों में उसने भी मुगल सिक्कों का ही उपयोग किया क्योंकि भारतीय जनता उन्हीं सिक्कों पर भरोसा करती थी। मुगल मुद्रा की शुद्धता, वजन की एकरूपता और व्यापक स्वीकृति ने भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक स्थिर बनाया।

संदर्भ:  
https://bit.ly/2EvoegY
https://tinyurl.com/3unz8mc5 
https://tinyurl.com/46raxhsb 
https://tinyurl.com/ypyc9snh 
https://tinyurl.com/27hf7mm7 
https://tinyurl.com/aebda5kc 

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