मेरठ के खेतों से देश की थाली तक: गंगा का मैदान कैसे तय करता है भारत की खाद्य सुरक्षा?

भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
20-01-2026 09:18 AM
मेरठ के खेतों से देश की थाली तक: गंगा का मैदान कैसे तय करता है भारत की खाद्य सुरक्षा?

मेरठ, जो गंगा के मैदान का एक अहम हिस्सा है, केवल अपनी ऐतिहासिक पहचान या तेज़ी से बढ़ते शहरी स्वरूप के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा में इसके योगदान के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि गंगा का मैदान और विशेष रूप से मेरठ, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में क्यों महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बाद, हम जलवायु परिवर्तन के कारण गंगा के मैदान की कृषि पर बढ़ते दबाव और उसके प्रभावों पर चर्चा करेंगे। आगे, चावल-गेहूं प्रणाली पर मंडराते संभावित खतरों और मिट्टी की बिगड़ती सेहत को समझने की कोशिश करेंगे। फिर, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में खाद्य असुरक्षा और गरीबी की स्थिति को भारत से जोड़कर देखेंगे। अंत में, हम उन अनुकूलन रणनीतियों और नीतिगत प्रयासों पर बात करेंगे, जिनके माध्यम से कृषि उत्पादन और किसान आय बढ़ाकर गंगा का मैदान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपना योगदान और बढ़ा सकता है।

गंगा का मैदान और मेरठ की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में भूमिका
गंगा का मैदान, जिसे इंडो-गैंगेटिक प्लेन (Indo-Gangetic Plane) कहा जाता है, भारत की कृषि संरचना की रीढ़ माना जाता है। यह मैदान 2.5 मिलियन (million) वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है और देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी के लिए भोजन का मुख्य स्रोत है। मेरठ इसी विशाल और उपजाऊ क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ की भौगोलिक स्थिति, समतल भूमि और ऐतिहासिक रूप से विकसित कृषि परंपराएँ इसे खाद्यान्न उत्पादन के लिए विशेष बनाती हैं। यहां की उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त जल संसाधन और पीढ़ियों से चली आ रही खेती की पद्धतियाँ लंबे समय से देश के खाद्यान्न भंडार को मज़बूती देती आई हैं। ऐसे में, यदि मेरठ जैसे ज़िलों में कृषि उत्पादन को सुरक्षित, टिकाऊ और खाद्य मानकों के अनुरूप बनाए रखा जाए, तो इसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन और गंगा के मैदान की कृषि पर बढ़ता दबाव
वर्तमान समय में गंगा का मैदान तेज़ी से बदलते जलवायु पैटर्न के गंभीर दबाव में है। मानसून की अनियमितता, कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे की स्थिति, बेमौसम बारिश और तीव्र गर्मी की लहरें अब असामान्य नहीं रहीं। ये सभी परिवर्तन सीधे तौर पर कृषि उत्पादन की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। मेरठ सहित इस पूरे क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसान, जो पहले ही सीमित संसाधनों, पानी और पूंजी पर निर्भर हैं, इन जलवायु परिवर्तनों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने न केवल फसल चक्र को असंतुलित किया है, बल्कि किसानों की आय, उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा को भी गंभीर जोखिम में डाल दिया है।

चावल–गेहूं प्रणाली पर जलवायु परिवर्तन का संभावित खतरा
गंगा के मैदान की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से चावल और गेहूं की पारंपरिक प्रणाली पर आधारित है, जो दशकों से देश की खाद्य ज़रूरतों को पूरा करती आई है। लेकिन अनुमान है कि 2050 के दशक तक यह प्रणाली जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक संवेदनशील हो सकती है। चावल की उपज में लगभग 12 प्रतिशत और गेहूं की उपज में 24 प्रतिशत तक की संभावित गिरावट इस खतरे को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। लगातार अधिक उत्पादन लेने की प्रवृत्ति और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी की सेहत भी प्रभावित हुई है, जिससे उपज का स्तर अब स्थिर होने लगा है। इसका सीधा असर उन किसान परिवारों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका पूरी तरह इन्हीं दो फसलों पर निर्भर है और जिनके पास जोखिम सहने की क्षमता सीमित है।

खाद्य असुरक्षा, गरीबी और वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति
वैश्विक स्तर पर खाद्य असुरक्षा आज एक गंभीर और बढ़ती हुई चुनौती बन चुकी है। 2019 से 2022 के बीच तीव्र खाद्य असुरक्षा से प्रभावित लोगों की संख्या 82 देशों में 135 मिलियन से बढ़कर 345 मिलियन तक पहुँच गई है। दक्षिण एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्र फसल विफलता, भूख और कुपोषण के सबसे बड़े जोखिम क्षेत्र बन चुके हैं। भारत भी इसी संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा है। कुपोषण, पानी की कमी, प्रति एकड़ कम कृषि उत्पादन और जलवायु परिवर्तन मिलकर देश के सामने खाद्य सुरक्षा की चुनौती को और अधिक जटिल और गंभीर बना रहे हैं, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और गहराने की आशंका है।

अनुकूलन रणनीतियाँ: कृषि उत्पादन और किसान आय बढ़ाने की संभावनाएँ
हालांकि परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन समाधान की संभावनाएँ भी पूरी तरह मौजूद हैं। बेहतर बुवाई तकनीकों, जलवायु के अनुकूल फसल किस्मों और उत्पादन प्रणाली में सुधार के माध्यम से चावल की उपज में 7 से 15 प्रतिशत तथा गेहूं की पैदावार में 12 से 19 प्रतिशत तक वृद्धि संभव बताई गई है। इन अनुकूलन रणनीतियों के परिणामस्वरूप औसत शुद्ध कृषि प्रतिफल में 11 से 14 प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय में 7 से 8 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है। भविष्य में यदि अधिक किसान इन तरीकों को अपनाते हैं, तो इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि क्षेत्रीय गरीबी को भी उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकेगा।

पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक और नीति समर्थन की आवश्यकता
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के बावजूद, पारंपरिक कृषि ज्ञान, स्थानीय अनुभव, आधुनिक कृषि पद्धतियों और उभरती प्रौद्योगिकियों का विवेकपूर्ण संयोजन भारत में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए व्यापक स्तर पर अनुसंधान, निवेश और मज़बूत नीति समर्थन की आवश्यकता है। फसल संरक्षण और कृषि संवर्धन को राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में पहचानना आज समय की मांग बन चुका है। ऐसी पहलें किसानों की क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ गंगा के मैदान, विशेषकर मेरठ, को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपनी भूमिका और अधिक सशक्त करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।

संदर्भ
https://bit.ly/45Kaiuq 
https://bit.ly/3qncZSn 
https://rb.gy/2sqhe 
https://tinyurl.com/3shv6r37 

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