कचरे में दबता शहरी भारत: लैंडफिल, स्वास्थ्य संकट और विकास की अनदेखी कहानी

शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
27-01-2026 09:25 AM
कचरे में दबता शहरी भारत: लैंडफिल, स्वास्थ्य संकट और विकास की अनदेखी कहानी

मेरठ जैसे शहर, जिनकी पहचान इतिहास, संस्कृति और तेज़ी से बदलते आधुनिक जीवन से बनी है, आज एक ऐसी सच्चाई का सामना कर रहे हैं जिसे अनदेखा करना अब संभव नहीं रहा। बढ़ती आबादी, फैलती कॉलोनियाँ और रोज़मर्रा की सुविधाओं पर बढ़ती निर्भरता ने हमारे जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ कचरे का वह बोझ भी जोड़ दिया है, जो हर दिन चुपचाप शहर के सीने पर जमा होता जा रहा है। मेरठ की गलियों, सड़कों के किनारे, खाली पड़े मैदानों और शहर की सीमाओं पर उभरते कचरे के ढेर केवल गंदगी नहीं हैं, बल्कि वे हमारी शहरी जीवनशैली की सच्ची तस्वीर दिखाते हैं। यह कचरा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस विकास पर हमें गर्व है, क्या वह वास्तव में इंसान और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित है। यह समस्या अब सिर्फ़ नगर निगम की नहीं रही, बल्कि हर उस नागरिक से जुड़ गई है जो इस शहर में सांस लेता है, पानी पीता है और अपने बच्चों के भविष्य का सपना देखता है। यदि इस बढ़ते कचरे को समय रहते नहीं समझा गया, तो यह धीरे-धीरे मेरठ की हवा, ज़मीन और जीवन तीनों को प्रभावित करेगा। आज यह केवल शहर की बाहरी तस्वीर को बिगाड़ रहा है, लेकिन कल यह हमारे स्वास्थ्य, हमारी आजीविका और हमारी आने वाली पीढ़ियों पर गहरा असर डाल सकता है।
आज हम इस लेख में सबसे पहले, हम देखेंगे कि तेज़ शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कचरे की मात्रा कैसे लगातार बढ़ती जा रही है। इसके बाद, लैंडफिल (landfill) और लीगेसी डंप साइट्स (legacy dump sites) की समस्या को समझेंगे, जो शहरों में कचरे के पहाड़ का रूप ले चुकी हैं। फिर, इन डंप साइट्स से उत्पन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरों पर बात करेंगे, जिनका सीधा असर आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। अंत में, हम स्वच्छ भारत मिशन की सीमाओं और भविष्य में इस संकट से निपटने की संभावित दिशा पर संक्षेप में विचार करेंगे, ताकि समस्या का एक समग्र चित्र सामने आ सके।

भारत में शहरीकरण और बढ़ते ठोस कचरे की गंभीर समस्या
भारत में बीते कुछ दशकों में जिस गति से औद्योगीकरण और शहरीकरण बढ़ा है, उसने शहरों की संरचना और जीवनशैली दोनों को बदल दिया है। रोज़गार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मेरठ, लखनऊ, दिल्ली जैसे शहर इस जनसंख्या दबाव को प्रतिदिन महसूस कर रहे हैं। बढ़ती आबादी के साथ उपभोग की संस्कृति भी तेज़ हुई है, जहाँ पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, प्लास्टिक सामग्री, ऑनलाइन खरीदारी (online shopping) से निकलने वाला कचरा और इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (electronic waste - e-waste) आम जीवन का हिस्सा बन चुका है। आज स्थिति यह है कि प्रतिदिन हज़ारों टन शहरी ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है, लेकिन उसका वैज्ञानिक तरीके से पृथक्करण और निपटान नहीं हो पा रहा। घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अक्सर बिना छंटाई के एक साथ फेंक दिया जाता है, जिससे आगे चलकर समस्या और जटिल हो जाती है। यह केवल सफ़ाई की असफलता नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, नागरिक जागरूकता और प्रशासनिक तैयारी की बड़ी कमी को भी उजागर करता है।

लैंडफिल और लीगेसी डंप साइट्स: शहरों में बनते कचरे के पहाड़
भारत में उत्पन्न होने वाले कुल शहरी कचरे का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे लैंडफिल स्थलों पर पहुंच जाता है। समय के साथ ये स्थान केवल कचरा निपटान केंद्र नहीं रहते, बल्कि विशाल और भयावह कचरे के पहाड़ों में बदल जाते हैं। देशभर में 1800 से अधिक लीगेसी डंप साइट्स मौजूद हैं, जहाँ वर्षों से जमा कचरा आज भी पड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश के कई शहर, जिनमें मेरठ भी शामिल है, इस समस्या से अछूते नहीं हैं। मेरठ के बाहरी इलाकों में स्थित पुराने डंप यार्ड आज भी सक्रिय हैं और शहर के विस्तार के साथ अब ये आबादी के बेहद करीब आ चुके हैं। कभी जो स्थान शहर से दूर हुआ करते थे, आज वहीं आसपास कॉलोनियाँ, स्कूल और बाज़ार बस चुके हैं। ये लैंडफिल न केवल भूमि की उपयोगिता को समाप्त कर देते हैं, बल्कि आसपास के पूरे क्षेत्र के लिए एक स्थायी पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम बन जाते हैं।

शहरी लैंडफिल से उत्पन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरे
लैंडफिल केवल बदबूदार स्थान नहीं होते, बल्कि ये लगातार ज़हर उगलने वाले केंद्र बन जाते हैं। यहां सड़ते कचरे से निकलने वाली मीथेन और अन्य जहरीली गैसें वायु प्रदूषण को गंभीर रूप से बढ़ाती हैं। इसका सीधा असर आसपास रहने वाले लोगों के फेफड़ों, आंखों और त्वचा पर पड़ता है। बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब कचरे से रिसने वाला जहरीला तरल मिट्टी में समाकर भूजल और नज़दीकी जल स्रोतों को दूषित कर देता है। कई बार लैंडफिल में आग लगने की घटनाएँ सामने आती हैं, जो दिनों तक जलती रहती हैं और पूरा इलाका धुएँ से भर जाता है। मेरठ जैसे घनी आबादी वाले शहरों में यह स्थिति आम नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाती है और अस्पतालों में सांस संबंधी रोगियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है।

डंप यार्ड के आसपास रहने वाले समुदायों की दयनीय स्थिति
डंप यार्ड (dump yard) के आसपास रहने वाले लोग इस पूरे कचरा संकट के सबसे अदृश्य और उपेक्षित शिकार हैं। अत्यधिक गरीबी और रोज़गार के अभाव के कारण कई परिवार कचरा बीनने को मजबूर होते हैं। ये लोग वही कचरा छांटते हैं, जिसे शहर ने बेकार समझकर फेंक दिया होता है। दुखद यह है कि इस काम में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल होते हैं, जो शिक्षा और सुरक्षित बचपन से वंचित रह जाते हैं। इन इलाकों में रहने वाले लोगों की जीवन प्रत्याशा कम होती है। त्वचा रोग, दमा, टीबी, पेट के संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियाँ यहाँ आम हैं। दूषित हवा और पानी इनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और शहरी विकास की अमानवीय सच्चाई को भी सामने लाती है।

स्वच्छ भारत मिशन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सीमाएँ
स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सरकार ने शहरों की सफ़ाई और कचरा प्रबंधन के लिए बड़े बजट और महत्वाकांक्षी योजनाएँ शुरू कीं। इन प्रयासों से कुछ क्षेत्रों में सुधार भी दिखा, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कई सीमाएँ अब भी बनी हुई हैं। कचरे का स्रोत पर पृथक्करण, यानी घरों से ही गीले और सूखे कचरे को अलग करना, आज भी अधिकांश शहरों में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाया है। कई नगर निकायों में आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित कर्मचारियों और निरंतर निगरानी की कमी है। नीति और प्रशासन के बीच समन्वय का अभाव भी एक बड़ी बाधा है। मेरठ जैसे शहरों में यह साफ़ दिखाई देता है कि योजनाएँ तो मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा।

कचरा संकट से निपटने की आवश्यकता और भविष्य की दिशा
भारत के शहरों को इस संकट से बाहर निकालने के लिए केवल कचरा हटाना ही पर्याप्त नहीं है। हमें लैंडफिल शून्य लक्ष्य की ओर गंभीरता से बढ़ना होगा। इसके लिए कचरे को एक समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखना होगा। पुनर्चक्रण, कंपोस्टिंग (composting), जैविक कचरे से खाद और ऊर्जा उत्पादन जैसे उपायों को व्यापक स्तर पर अपनाना समय की मांग है। साथ ही, डंप यार्ड के आसपास रहने वाले समुदायों के पुनर्वास, स्वास्थ्य सुरक्षा और वैकल्पिक आजीविका पर विशेष ध्यान देना होगा। जब तक मानवीय और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोण से समाधान नहीं खोजे जाएंगे, तब तक शहरी जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार संभव नहीं है।

संदर्भ:
https://rb.gy/dbc6x 
https://rb.gy/xndj7 
https://rb.gy/c67th 
https://tinyurl.com/4uwcyzn7
https://tinyurl.com/3yupfczu  

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