ऋग्वेद व् ज़ेंद अवेस्ता ग्रन्थ की समानताएं व् मेरठ के 'अब्दुल्लापुर सादात' में झलकता ईरान

विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
18-04-2026 09:37 AM
ऋग्वेद व् ज़ेंद अवेस्ता ग्रन्थ की समानताएं व् मेरठ के 'अब्दुल्लापुर सादात' में झलकता ईरान

क्या आप जानते हैं कि इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन भारतीय आर्यों और प्राचीन ईरानियों के पूर्वज एक ही थे, और वेदों तथा पारसी धर्मग्रंथ ज़ेंद अवेस्ता (Zend Avesta) में देवताओं, अनुष्ठानों और भाषा की इतनी गहरी समानता है जो आज भी इतिहासकारों को हैरान कर देती है? यह तथ्य ऐतिहासिक और भाषाई रूप से साबित हो चुका है कि अवेस्तन और आर्य सभ्यताएं एक ही भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का बेहतरीन उदाहरण हैं, जो समय के साथ धीरे-धीरे अलग होकर दो विशिष्ट सभ्यताओं में बदल गईं। दोनों सभ्यताओं की भाषा, धर्म और संस्कृति में बहुत मजबूत समानताएं देखने को मिलती हैं, क्योंकि इन दोनों की जड़ें समान प्रोटो-इंडो-ईरानी (Proto-indo-iranian) भाषा और परंपराओं से जुड़ी हुई हैं। यह एक ऐसा ऐतिहासिक सच है जो हमें प्राचीन मध्य एशिया से लेकर भारत के आधुनिक शहरों तक की एक लंबी और आकर्षक यात्रा पर ले जाता है। 

ऋग्वेद और अथर्ववेद हमारे प्राचीन ज्ञान और विचारों को कैसे दर्शाते हैं?
प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक नींव वेदों पर टिकी है। इनमें ऋग्वेद का स्थान सबसे अहम है। ऋग्वेद एक ऐसा ग्रंथ है जो शुरुआत में असुरों (अहुरों) का सम्मान करता है, लेकिन इसके छठे मंडल के बाद से यह शक्तिशाली असुरों को एक ऐसे खतरे के रूप में देखने लगता है जिन पर विजय पाना आवश्यक है। यह ग्रंथ उस समाज की व्यवस्था को भी स्पष्ट करता है जिसमें पुजारियों, योद्धाओं और किसानों का वर्गीकरण था। ऋग्वेद में मुख्य रूप से ब्राह्मणों पर ज़ोर दिया गया है, जो पुजारी का कार्य करते थे। ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का ज़िक्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

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ऋग्वेद 

समय के साथ आर्य समाज के विचारों में और भी विकास हुआ। ऋग्वेद के बाद, अथर्ववेद में समाज की संरचना को और भी स्पष्ट किया गया। अथर्ववेद ने योद्धाओं की पहचान राजन्य के रूप में की और वैश्यों को व्यापार तथा कृषि से जोड़ा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि यह केवल काम का बंटवारा था, कोई जन्म आधारित कठोर जाति व्यवस्था नहीं थी। इन ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि शुरुआती दौर में इन सभ्यताओं के पास कोई लिखित साहित्य नहीं था। वे अपने साहित्य और मंत्रों को केवल याद रखते थे, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से ही पहुंचाए जाते थे। 

ज़ेंद अवेस्ता क्या है और प्राचीन ईरानी धर्म में इसका क्या महत्व है?
ज़ेंद अवेस्ता पारसियों (मज़दयी धर्म को मानने वालों) का पवित्र ग्रंथ है। अवेस्ता दरअसल उन ग्रंथों का संग्रह है जो अवेस्तन भाषा में लिखे गए हैं, और ज़ेंद उनका अनुवाद तथा पहलवी भाषा में की गई उनकी व्याख्या है। इस ग्रंथ का महत्व दोतरफा है; एक तरफ यह हमें शुरुआती मज़दयी विचारों के बारे में बताता है, और दूसरी तरफ यह अवेस्तन भाषा का एकमात्र प्रमाण है। यह एक ऐसी प्राचीन ईरानी भाषा है जो पुरानी फ़ारसी के साथ मिलकर इंडो-यूरोपियन (Indo-european) परिवार की इंडो-ईरानी (Indo-irani) शाखा का हिस्सा बनती है। अवेस्ता इक्कीस किताबों (नस्क) का समूह था, जिसे अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) ने बनाया और ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने राजा विष्टास्प तक पहुंचाया। ऐसा माना जाता है कि सिकंदर के आक्रमण के समय यूनानियों ने इस ग्रंथ को नष्ट कर दिया था या बिखेर दिया था। 

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बाद में अर्ससिड (Arssid) शासन के दौरान राजा वलख्स (Valkhs) ने इन बिखरे हुए हिस्सों को, जो मौखिक या लिखित रूप में बचे थे, फिर से इकट्ठा करने का काम शुरू किया। इसके बाद ससानियन राजाओं के काल में इस ग्रंथ को पूरी तरह से सहेजा गया। राजा अर्दशीर ने मुख्य पुजारी तन्सर को अर्ससिड काल के काम को पूरा करने का आदेश दिया। फिर शाहपुर प्रथम ने यूनानियों और भारतीयों द्वारा बिखेरे गए वैज्ञानिक दस्तावेज़ों की खोज करवाई और उन्हें अवेस्ता में शामिल किया। अंततः शाहपुर द्वितीय के समय में आदुर्बाद ई महरास्पंदान (Adurbad e Mahraspandan) ने इसके विहित रूप (कैनन) का सामान्य संशोधन किया। आज जो अवेस्ता मौजूद है उसमें यस्न, विस्पराद, खोरदा अवेस्ता, सीरोज़ा, यश्त और विदेव्दाद जैसे महत्वपूर्ण हिस्से शामिल हैं। विदेव्दाद के उन्नीसवें अध्याय में ज़रथुस्त्र की परीक्षा का वर्णन है, जहां अंगरा मैन्यु उन्हें अच्छे धर्म को छोड़ने के लिए उकसाता है, लेकिन ज़रथुस्त्र अहुरा मज़्दा की ओर मुड़ते हैं। 

वेदों और ज़ेंद अवेस्ता के बीच कैसी अद्भुत समानताएं मौजूद हैं?
आर्यों के वेदों और ईरानियों के ज़ेंद अवेस्ता के बीच की समानताएं इतनी गहरी हैं कि उन्हें देखकर स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों एक ही स्रोत से निकले हैं। दोनों सभ्यताओं की भाषाएं एक ही प्रोटो-इंडो-ईरानी जड़ से उत्पन्न हुई हैं। दोनों ग्रंथों में कई देवी-देवता एक समान हैं, जैसे मित्र, वरुण, इंद्र, वायु, सोम (हाओमा), अर्यमन और अपाम नपात। दोनों ही सभ्यताओं में घोड़े की भूमिका अनुष्ठानों और बलियों में बहुत केंद्रीय थी। यहां तक कि कई भौगोलिक नाम और घटनाओं के स्थान भी दोनों परंपराओं में एक जैसे हैं। ऋग्वेद की 'सरस्वती' नदी को ज़ेंद अवेस्ता में 'हरक्ष्वती' कहा गया है। 

इन दोनों संस्कृतियों में 'असुर' और 'दैव' की अवधारणाएं मौजूद थीं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि समय के साथ इनकी भूमिकाएं पूरी तरह से उलट गईं। अवेस्ता में जहां असुर (अहुर) को पूजनीय माना जाता है, वहीं वैदिक परंपरा में दैव (देवताओं) की पूजा की जाती है। धार्मिक जीवन में अग्नि का महत्व दोनों जगह सबसे ऊपर था। संस्कृत में जिसे 'यज्ञ' कहा जाता था, अवेस्तन में उसे 'यग्य' (यस्न) कहा गया। पीने के पदार्थों में आर्यों का पसंदीदा 'सोम' था, जो अवेस्तनों के लिए 'हाओमा' बन गया, क्योंकि पुरानी फ़ारसी में 'स' का उच्चारण 'ह' की तरह किया जाता था। जनेऊ जैसी पवित्र धागे की रस्म, जो आधुनिक हिंदुओं में आम है, अवेस्तनों में भी पाई जाती है। ज़ेंद अवेस्ता में आर्यों और उनके पवित्र भूभाग (आर्यानेम वेजाह) का बहुत सम्मान किया गया है। 

इन प्राचीन ग्रंथों से भारत और ईरान की साझा विरासत कैसे झलकती है?
इंडो-ईरानी भाषा समूह इंडो-यूरोपियन भाषाओं की सबसे पूर्वी मुख्य शाखा है। विद्वानों की आम सहमति है कि इंडो-ईरानी समूह का मूल स्थान संभवतः आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के उत्तर में, कैस्पियन सागर (Caspian sea) के पूर्व में था, जो आज तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान का इलाका है। यहीं से कुछ ईरानी दक्षिण और पश्चिम की ओर गए, जबकि इंडो-आर्य दक्षिण और पूर्व की ओर भारत के उपमहाद्वीप में आए। ऋग्वेद के भौगोलिक विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि इंडो-आर्यों की सबसे पहली बस्ती भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में थी। यह पलायन एक ही बार में नहीं हुआ, बल्कि यह कई चरणों में हुआ था। 

भाषाई दृष्टिकोण से इंडो-आर्य और ईरानी समूहों के बीच घनिष्ठ संबंध पर कभी संदेह नहीं किया गया। दोनों में कई व्याकरणिक विशेषताएं एक समान हैं। उदाहरण के लिए, वेदों में प्रयुक्त शब्द 'यज्ञ' (पूजा का अनुष्ठान) और अवेस्तन का शब्द 'यस्न' बिल्कुल एक हैं। इसी तरह वैदिक 'होतृ' (अनुष्ठान करने वाला पुजारी) और अवेस्तन 'ज़ओतार' एक ही हैं। इसके अलावा दोनों भाषाओं के बोलने वाले खुद को एक विशिष्ट समुदाय के रूप में पुकारने के लिए एक जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे: संस्कृत में 'आर्य', अवेस्तन में 'ऐरिइया' और पुरानी फ़ारसी में 'अरिया'। व्याकरण के नियमों में भी समानताएं और कुछ अंतर दिखाई देते हैं, जैसे संस्कृत के शब्द 'सप्त' और 'सर्व' ईरानी भाषा में 'हप्त' और 'हउरुव' बन जाते हैं। यह सब एक गहरी और अटूट सांस्कृतिक साझेदारी का प्रमाण है। 

प्राचीन ईरान और भारत का यह ऐतिहासिक जुड़ाव आज मेरठ शहर से कैसे जुड़ता है?
हजारों सालों की इन प्राचीन सभ्यताओं के स्थानांतरण और सांस्कृतिक मिलाप का प्रभाव भारत के आधुनिक भूगोल और समाज पर भी पड़ा है। इसका एक जीता-जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित 'अब्दुल्लापुर सादात' नामक एक ऐतिहासिक मुस्लिम बस्ती है। यह जगह मेरठ के पूर्वी बाहरी इलाके में, गंगा नगर के ठीक दक्षिण में स्थित है। अब्दुल्लापुर सादात से मेरठ सिटी जंक्शन की दूरी राष्ट्रीय राजमार्ग 334(एनएच 334) के रास्ते मात्र बारह किलोमीटर है। इस महत्वपूर्ण बस्ती की स्थापना सैयद मीर अब्दुल्ला नक़वी अल बुखारी ने की थी। बुखारी वंशावली सीधे तौर पर मध्य एशिया और महान ईरानी सांस्कृतिक क्षेत्र के ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाती है। 

अब्दुल्लापुर सादात में मुख्य रूप से सैयदों की एक बड़ी आबादी निवास करती है, इसी कारण इसे अब्दुल्लापुर सादात कहकर पुकारा जाता है। यह क्षेत्र नक़वी समुदाय की कन्नौजी बुखारी और जलाल बुखारी शाखाओं का मुख्य केंद्र है। ये दोनों ही शाखाएं जलालुद्दीन सुर्ख़-पोश बुखारी की वंशज हैं, जो सैयद अली नक़वी और सैयद सदरुद्दीन शाह कबीर नक़वी अल बुखारी के माध्यम से आगे बढ़ीं। सदरुद्दीन शाह सिकंदर लोदी के मुख्य सलाहकार भी थे। अब्दुल्लापुर का 'कोट किला' सोलहवीं सदी की शुरुआत में बनवाया गया था, जो मीर अब्दुल्ला का मुख्य निवास स्थान था। यहां के सैयद लोग 'मीरसाहिब' के नाम से मशहूर हैं और एक समय में उनके पास बावन गांवों की एक विशाल जागीर हुआ करती थी। 

आज भी अब्दुल्लापुर सादात में इतिहास और संस्कृति की कई इमारतें और रिवायतें जीवित हैं। यहां बड़ा दरवाज़ा (कोट किले का मुख्य प्रवेश द्वार), शाकिर महल, 52 दरी, कोट मस्जिद, अज़मत मंज़िल, सैयद का मकबरा और सैयद बरकत अली नक़वी की तीन सौ साल पुरानी पक्की बैठक जैसी महत्वपूर्ण जगहें मौजूद हैं। शिया मुसलमानों के बीच इस कस्बे का ९वीं मुहर्रम का आयोजन काफी प्रसिद्ध है। यहीं के निवासी सैयद कुदरत नक़वी एक जाने-माने पाकिस्तानी लेखक, भाषाविद् और आलोचक थे, जिन्होंने 'ग़ालिब कौन है', 'असास-ए-उर्दू' और 'हिंदी-उर्दू लुग़त' जैसी मशहूर किताबें लिखीं। भारत के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए थे। इस प्रकार, आर्यों और अवेस्तनों की प्राचीन साझा जड़ों से लेकर मेरठ के अब्दुल्लापुर सादात तक, भाषा, संस्कृति और इंसानी इतिहास का यह सफ़र हमें बताता है कि सरहदें भले ही बदल जाएं, लेकिन सभ्यताओं का आपसी जुड़ाव हमेशा कायम रहता है। 

संदर्भ 
1. https://tinyurl.com/232p2cl3  
2. https://tinyurl.com/2bglc2rq 
3. https://tinyurl.com/22wduweo 
4. https://tinyurl.com/27copcw3 
5. https://tinyurl.com/27ny9qpo 
6. https://tinyurl.com/28fp3s9r 
7. https://tinyurl.com/24bywry7 

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