मेरठ से दिल्ली का सफर: क्या आप जानते हैं आपकी मेट्रो कैसे और कहाँ बनती है?

गतिशीलता और व्यायाम/जिम
09-07-2026 09:47 AM
मेरठ से दिल्ली का सफर: क्या आप जानते हैं आपकी मेट्रो कैसे और कहाँ बनती है?

भारत में शहरी बुनियादी ढांचे का चेहरा तेज़ी से बदल रहा है। वर्तमान में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश बन चुका है, जो 11 राज्यों के 23 शहरों में 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक फैला हुआ है। जनवरी 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, यह नेटवर्क न केवल लोगों के सफर को आसान बना रहा है, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति में भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। मेरठ के संदर्भ में, दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल प्रोजेक्ट (नमो भारत) इस क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो राष्ट्रीय राजधानी और मेरठ के बीच की दूरी को बेहद कम समय में समेट रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन विशाल प्रणालियों का निर्माण कैसे होता है और ये एस्केलेटर, जो हमें बिना थके ऊपर-नीचे ले जाते हैं, उनके पीछे की इंजीनियरिंग क्या है?

मेट्रो सिस्टम की बनावट और इसके मुख्य हिस्से क्या हैं?
एक मेट्रो सिस्टम किसी शहर की मुख्य नसों की तरह होता है। यह सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि कई जटिल उप-प्रणालियों (Subsystems) का मेल है। मेट्रो के मुख्य हिस्सों में 'रोलिंग स्टॉक' (ट्रेन के कोच), 'ट्रैकवर्क' (पटरियाँ), 'सिग्नलिंग और कंट्रोल', 'पावर सप्लाई' और 'स्टेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर' शामिल होते हैं।

रोलिंग स्टॉक में वे उच्च क्षमता वाली ट्रेनें आती हैं जिनमें उन्नत प्रोपल्शन और ब्रेकिंग सिस्टम लगे होते हैं। सिग्नलिंग के लिए 'ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल' (ATC) जैसी सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि दो ट्रेनें आपस में न टकराएं। पावर सप्लाई के लिए अक्सर ओवरहेड लाइनों या तीसरी पटरी (Third Rail) का सहारा लिया जाता है। इन सभी हिस्सों को एक साथ जोड़ने की प्रक्रिया को 'सिस्टम इंजीनियरिंग' कहा जाता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है, जैसे किसी लेगो (LEGO) महल को बनाने के लिए हर टुकड़े का सही जगह फिट होना ज़रूरी है, वैसे ही मेट्रो की हर मशीनरी और सॉफ्टवेयर का तालमेल आवश्यक है।

File:Meerut Metro.jpg

भारत में मेट्रो कोच का निर्माण कैसे शुरू हुआ?
भारत में स्वदेशी मेट्रो कोच निर्माण का इतिहास काफी पुराना है। भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (BEML) इस क्षेत्र में एक प्रमुख नाम है। 1948 में स्थापित BEML की बेंगलुरु स्थित रेल कोच फैक्ट्री भारत की पहली ऐसी फैक्ट्री थी जिसने पूरी तरह से स्टील के पैसेंजर कोच बनाने शुरू किए थे। शुरुआत में इसे जर्मनी की कंपनी M/s. MAN के तकनीकी सहयोग से चलाया गया था।

मेट्रो के क्षेत्र में BEML ने 2002 में दिल्ली मेट्रो (DMRC) के फेज-1 के लिए रोटेम (Rotem) के साथ तकनीकी सहयोग किया और 220 मेट्रो कारों का निर्माण किया। बीईएमएल अब तक 1,750 से अधिक मेट्रो कोच की आपूर्ति कर चुका है। आज भारत में कोच निर्माण के क्षेत्र में टीटागढ़ रेल सिस्टम्स (Titagarh Rail Systems) जैसी कंपनियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत पिछले एक दशक में मेट्रो परियोजनाओं में लगभग 2,50,000 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जिससे 1,000 से अधिक मेट्रो कोच का स्थानीय उत्पादन संभव हो पाया है।

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वैश्विक कंपनियाँ भारतीय मेट्रो प्रोजेक्ट्स में क्यों आगे हैं?
भले ही भारत ने कोच निर्माण में प्रगति की है, लेकिन 'अल्स्टॉम' (Alstom), 'सीमेंस' (Siemens) और 'डीबी' (DB) जैसी वैश्विक कंपनियाँ आज भी बड़े प्रोजेक्ट्स में आगे रहती हैं। विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के अनुसार, इसके पीछे कई कारण हैं। रोहित कादान के एक विश्लेषण के अनुसार, ये कंपनियाँ 'एंड-टू-एंड' क्षमता रखती हैं, यानी डिजाइन और निर्माण से लेकर अगले 35 सालों तक के रखरखाव (Maintenance) का ज़िम्मा भी लेती हैं।

इनके पास CBTC (कम्युनिकेशन बेस्ड ट्रेन कंट्रोल) जैसी उन्नत सिग्नलिंग तकनीक है, जिसमें भारत अभी भी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है। इसके अलावा, इनका 'लाइफसाइकिल बिजनेस मॉडल' इन्हें लंबी अवधि तक लाभ कमाने में मदद करता है। सीमेंस और भारतीय रेलवे के बीच हुआ लोकोमोटिव सौदा इसका एक उदाहरण है, जहाँ स्मार्ट बिडिंग और तकनीकी श्रेष्ठता ने उन्हें जीत दिलाई।

एस्केलेटर का आविष्कार और इसकी इंजीनियरिंग क्या है?
मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों की आवाजाही को सुगम बनाने में एस्केलेटर की भूमिका अहम है। एस्केलेटर या 'मूविंग स्टेयरकेस' का विचार सबसे पहले 1891 में अमेरिका के जेसी डब्ल्यू. रेनो (Jesse W. Reno) ने दिया था। उन्होंने एक झुकी हुई बेल्ट का आविष्कार किया था। 1900 के पेरिस एक्सपो में पहली बार इसे 'एस्केलेटर' नाम दिया गया, जो मूल रूप से 'ओटिस एलिवेटर कंपनी' (Otis Elevator Company) का ट्रेडमार्क था।

File:Escalators at Auber RER station in Paris, recently renovated, with clean and modern underground architecture.jpg

आधुनिक एस्केलेटर आमतौर पर 30 डिग्री के कोण पर झुके होते हैं और प्रति मिनट 120 फीट की रफ्तार से चल सकते हैं। इनकी इंजीनियरिंग में सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें एक 'कॉम्ब डिवाइस' (Comb Device) लगी होती है—यदि कोई चीज़ सीढ़ी और प्लेटफार्म के बीच फंस जाए, तो एक स्विच तुरंत बिजली काट देता है और एस्केलेटर रुक जाता है। 'कोन' (KONE) जैसी कंपनियाँ अब ऐसे स्मार्ट एस्केलेटर बना रही हैं जो डेटा का उपयोग करके बिजली की बचत करते हैं और संभावित खराबी के बारे में पहले ही सूचित कर देते हैं।

भारत उच्च तकनीक के लिए विदेशों पर क्यों निर्भर है?
भारत ने मेट्रो के बुनियादी ढांचे जैसे सुरंग बनाने और ट्रैक बिछाने में महारत हासिल कर ली है, लेकिन 'हाई-एंड' कंपोनेंट्स के मामले में अभी भी हमारी निर्भरता बनी हुई है। आधुनिक मेट्रो के लिए उन्नत ट्रैक्शन, ब्रेकिंग सिस्टम, कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स और सुरक्षा प्रमाणित ऑटोमेशन की आवश्यकता होती है। ओटिस, कोन और श्ंडलर (Schindler) जैसे वैश्विक दिग्गजों के पास दशकों का अनुसंधान और विकास (R&D) अनुभव है।

मेट्रो परियोजनाओं में सुरक्षा और विश्वसनीयता के कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करना होता है, जिसके कारण अक्सर वैश्विक वेंडर से खरीद की जाती है। सिग्नलिंग और एकीकृत सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म अभी भी एक बड़ी चुनौती हैं। हालांकि, 'मेक इन इंडिया' के तहत तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) की कोशिशें की जा रही हैं ताकि भविष्य में इस निर्भरता को कम किया जा सके।

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 ड्राइवरलेस ट्रेन

भविष्य की मेट्रो कैसी होगी?
आने वाले समय में मेट्रो प्रणालियाँ 'ऑटोमेशन और एआई' (AI) पर आधारित होंगी। ड्राइवरलेस ट्रेनें इसका एक बड़ा हिस्सा हैं, जहाँ कंप्यूटर ही गति और स्टेशनों पर रुकने का नियंत्रण करेगा। इसके अलावा, ऊर्जा दक्षता के लिए 'रीजेनरेटिव ब्रेकिंग' जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे ट्रेन के रुकते समय पैदा होने वाली बिजली को वापस सिस्टम में भेजा जा सके। मेरठ का नमो भारत कॉरिडोर न केवल गति का प्रतीक है, बल्कि यह टिकाऊ शहरी विकास (Sustainable Urban Development) की दिशा में भारत की बढ़ती प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।

निष्कर्षतः, मेट्रो सिस्टम केवल परिवहन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये इंजीनियरिंग, सुरक्षा और तकनीकी सहयोग का एक जटिल नेटवर्क हैं। जैसे-जैसे भारत अपनी विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाएगा, वह दिन दूर नहीं जब हम पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक वाली मेट्रो प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर निर्यात करेंगे।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/23e5bp6j 

2. https://tinyurl.com/274b87lp 

3. https://tinyurl.com/26ndfj7x 

4. https://tinyurl.com/2373jk3s 

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6. https://tinyurl.com/28ov9f7l 

7. https://tinyurl.com/23ala47s 

8. https://tinyurl.com/2b8j3v83 

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