आज के हमारे लेख में हम क्रिकेट के इतिहास को समझेंगे, और जानेंगे कि इसकी शुरुआत कहां एवं कैसे हुई। फिर हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान क्रिकेट की शुरुआत कैसे हुई। आगे, हम देखेंगे कि हमारा शहर मेरठ, क्रिकेट उपकरण निर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र कैसे बना। हम क्रिकेट में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों और इस खेल के नियमों पर भी गौर करेंगे। अंततः, हम सैयद मुश्ताक अली जैसे उल्लेखनीय खिलाड़ियों एवं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे।
माना जाता है कि, क्रिकेट का आविष्कार सैक्सन (Saxon) या नॉर्मन काल (Norman times) के दौरान दक्षिण-पूर्व इंग्लैंड के वेल्ड (Weald) क्षेत्र में रहने वाले बच्चों द्वारा किया गया था। क्रिकेट को वयस्क खेल के रूप में खेले जाने का पहला संदर्भ, 1611 में था। उसी वर्ष, एक शब्दकोश में क्रिकेट को ‘लड़कों के एक खेल’ के रूप में परिभाषित किया गया। यह भी विचार प्रचलित है कि, क्रिकेट की उत्पत्ति कटोरों से हुई होगी, जिनसे बल्लेबाज द्वारा मारे गए गेंद को उसके लक्ष्य तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की जाती थी।

सत्रहवीं सदी के मध्य तक ग्रामीण क्रिकेट विकसित हो चुका था। इसी सदी के उत्तरार्ध में, पहले अंग्रेजी प्रादेशिक संघ बनाए गए। बाद में, अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में लंदन (London) और इंग्लैंड (England) के दक्षिण-पूर्वी प्रदेशों में, एक प्रमुख खेल के रूप में क्रिकेट स्थापित हुआ। हालांकि, यात्रा बाधाओं के कारण इसका प्रसार सीमित था, यह धीरे-धीरे इंग्लैंड के अन्य हिस्सों में लोकप्रियता हासिल कर रहा था। फिर, 1745 से महिला क्रिकेट की भी शुरुआत हुई।
1744 में, क्रिकेट के पहले नियम लिखे गए, और बाद में 1774 में इन्हें संशोधित किया गया। ‘स्टार एंड गार्टर क्लब (Star and Garter Club)’ द्वारा इसके कोड तैयार किए गए थे, जिनके सदस्यों ने 1787 में लॉर्ड्स (Lord’s) में प्रसिद्ध ‘मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (Marylebone Cricket Club)’ की स्थापना की थी। यह क्लब बाद में क्रिकेट के नियमों का संरक्षक व संशोधक बन गया।
सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में, अंग्रेजी उपनिवेशों के माध्यम से क्रिकेट उत्तरी अमेरिका में लोकप्रिय हुआ, और अठारहवीं शताब्दी में यह दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुंचा। वेस्ट इंडीज (West Indies) में इसे उपनिवेशवादियों द्वारा और भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों द्वारा लाया गया था। 1788 में उपनिवेशीकरण शुरू होते ही, यह ऑस्ट्रेलिया (Australia) पहुंचा। जबकि, उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में क्रिकेट न्यूजीलैंड (New Zealand) और दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में प्रमुख बनने लगा।
क्रिकेट के खेल को सत्रहवीं एवं अठारहवीं शताब्दी में इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों और व्यापारियों द्वारा, भारतीय उपमहाद्वीप में परिचित करवाया गया था। भारत में क्रिकेट का सबसे पहला ज्ञात रिकॉर्ड, 1721 का है। इसके अलावा, देश में पहला क्रिकेट क्लब 1792 में स्थापित किया गया था। 1886 और 1888 के ग्रीष्म ऋतु में, भारतीय पारसी क्रिकेट संघ ने इंग्लैंड का दौरा किया। 1889-90 की सर्दियों में, अंग्रेजी खिलाड़ियों का एक संघ, भारत का दौरा करने वाला पहला संघ था। 1912-13 तक, बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) प्रतियोगिताओं में हिंदू क्रिकेट संघ और मुस्लिम क्रिकेट संघ भी शामिल हुए। इसके तुरंत बाद, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) और मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में इसी तरह की स्पर्धाएं शुरू हुई। इस प्रकार, 1918 के अंत तक भारत में प्रथम श्रेणी क्रिकेट की स्थापना हो गयी।
चलिए, अब जानते हैं कि, हमारे शहर मेरठ से क्रिकेट का क्या संबंध है। हमारा मेरठ शहर, लंबे समय से क्रिकेट खेल के सामान के निर्माण में अग्रणी रहा है। मेरठ को अक्सर ही, "भारत का खेल शहर" कहा जाता है, क्योंकि यह देशज और अंतर्राष्ट्रीय खेल सामान बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे शहर के खेल उद्योग की विशेषता, विनिर्माण इकाइयों का समूह है, जिसमें बड़े उद्यमों से लेकर कई छोटे और सूक्ष्म स्तर के व्यवसाय शामिल हैं।
मेरठ के खेल उद्योग की उत्पत्ति का पता उन्नीसवीं शताब्दी से लगाया जा सकता है, जब स्थानीय कारीगरों ने शुरुआत में भारत में तैनात ब्रिटिश सैनिकों के लिए खेल सामान तैयार किए थे। इसमें मुख्य रूप से स्वदेशी लकड़ी और चमड़े का उपयोग किया गया था। हालांकि, इस उद्योग के आधुनिक विकास का सच्चा उत्प्रेरक 1947 में हुआ भारत का विभाजन था। सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान में) से कई उच्च कुशल हिंदू खेल उपकरण कारीगर भारत चले आए। ऐसे कई कारीगर जालंधर (पंजाब) और मेरठ जैसे शहरों में बस गए। इस आमद ने आधुनिक भारतीय खेल सामान उद्योग की नींव रखी, जिसकी औपचारिक औद्योगिक स्थापना 1948 के आसपास मेरठ में शुरू हुई।
तब से, जालंधर के साथ-साथ हमारा शहर मेरठ, एक प्रमुख खेल उद्योग शक्ति के रूप में उभरा है। गौरतलब है कि, मेरठ भारत के कुल खेल सामान उत्पादन में अनुमानित तौर पर 75%-80% योगदान देता है। यहां, आज यह उद्योग 1,500 से अधिक छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों तथा हजारों सूक्ष्म और घरेलू इकाइयों के विशाल नेटवर्क में विकसित हुआ है। यह उल्लेखनीय वृद्धि कारीगरों की पीढ़ियों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है, जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान और सटीकता को निरंतर सुनिश्चित किया है।
हमारे मेरठ व अन्य जगहों पर बनने वाली क्रिकेट की गेंद, कॉर्क से बनी, लाल, सफेद या गुलाबी रंग की होती है, जिसे चमड़े में लिपटा जाता है। सामान्य, गेंद की परिधि 9.1 इंच (23 सेंटीमीटर) होनी चाहिए। दूसरी तरफ, खेल में लकड़ी के बल्ले का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रयुक्त लकड़ी कश्मीर या इंग्लिश विलो पेड़ की होती है। यह 38 इंच (96.5 सेमी) से अधिक लंबा और 4.25 इंच (10.8 सेमी) चौड़ा नहीं हो सकता। बल्ले का हैंडल लंबा होता है, और एक तरफ की सतह सपाट होती है। इस खेल में, तीन सीधे लकड़ी के स्टंप (Stump) का प्रयोग होता है, जिनपर लकड़ी से बने दो क्रॉसपीस (Crosspieces) अर्थात बेल्स (Bails) रखे जाते हैं। गेंद के स्टंप को छूने पर, ये बेल्स गिरते हैं, और तब विकेट लिया जाता है।
इसके अलावा, कोई खिलाड़ी गेंद से अपना बचाव करने हेतु कई तरह के पैड (Pad) और गार्ड (Guard) पहनते हैं। इसमें हेलमेट, पैरों के लिए पैड, छाती एवं हाथों के गार्ड, तथा दस्ताने आदि शामिल हैं।

हम जानते ही हैं कि, क्रिकेट भारत का सिर्फ लोकप्रिय खेल ही नहीं बल्कि, एक सफल खेल भी है। भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट संघ ने 1932 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया, और तब से 2005 से 2008 तक प्रत्येक बार (आईसीसी रैंकिंग) में शीर्ष चार टेस्ट संघों में शामिल रहा। संघ ने 1983 और 2011 में वन डे क्रिकेट विश्व कप जीता था। देश के संघ की अन्य प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय जीतों में, 2007, 2024 और 2026 में तीन बार टी20 विश्व कप तथा 2002, 2013 और 2025 में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी शामिल हैं।
भारत ने अपना पहला विश्व कप 1983 में कपिल देव की कप्तानी में जीता था। फिर, 80 और 90 के दशक में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वी. लक्ष्मण और अनिल कुंबले का भी पदार्पण हुआ, जिन्हें महानतम भारतीय खिलाड़ियों में से एक माना जाता है।
गांगुली की कप्तानी को भारतीय क्रिकेट का निर्णायक मोड़ माना जाता है, क्योंकि उस समय में संघ को बड़ी सफलता मिली। इसके बाद महेंद्रसिंह धोनी ने भी शानदार कप्तानी की। इसके अलावा, आज विराट कोहली, रोहित शर्मा एवं सूर्यकुमार यादव की कप्तानी काफी महत्वपूर्ण है।
क्रिकेट में कुछ खिलाड़ी, अपने दृष्टिकोण से इस खेल को फिर से परिभाषित करने में कामयाब रहे हैं। ऐसे ही एक खिलाड़ी, सैयद मुश्ताक अली है। अपनी आक्रामक बल्लेबाजी और तेजतर्रारता के कारण, उनको काफी प्रशंसा मिली है। सैयद मुश्ताक अली ने विदेश में टेस्ट शतक बनाने वाले पहले भारतीय के रूप में इतिहास रचा था। यह उपलब्धि उन्होंने 1936 में ओल्ड ट्रैफर्ड (Old Trafford) में इंग्लैंड के खिलाफ हासिल की थी। उनका अंतरराष्ट्रीय पेशा 1934 से 1952 के बीच सिर्फ 11 टेस्ट मैचों तक सीमित था। परंतु, इस दौरान उन्होंने 612 रन बनाए, जिसमें दो शतक और तीन अर्द्धशतक शामिल थे।

दाएं हाथ से बल्लेबाजी करने वाले मुश्ताक अली ने अपने अभूतपूर्व प्रथम श्रेणी पेशे में, 226 मैच खेले, 13,213 रन बनाए और 30 शतक एवं 63 अर्द्धशतक लगाए। उन्होंने अपनी बाएं हाथ की स्पिन से 162 विकेट भी लिए। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अपने शीर्ष घरेलू टी20 क्रिकेट स्पर्धाओं में से एक प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर रखकर, उनकी विरासत का सम्मान किया है। यह प्रतियोगिता सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी है।
संदर्भ
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