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मेरठ के जागरूक पाठकों के लिए इतिहास के पन्नों से एक ऐसी घटना का विश्लेषण प्रस्तुत है, जिसने आधुनिक दुनिया की कूटनीति की नींव रखी। प्रथम विश्व युद्ध के अभूतपूर्व विनाश के बाद दुनिया भर के देशों ने महसूस किया कि भविष्य में ऐसे भयानक युद्धों को रोकने के लिए एक वैश्विक मंच की आवश्यकता है। जिनेवा में स्थापित 'लीग ऑफ नेशंस' दुनिया का पहला ऐसा अंतर-सरकारी संगठन था जिसे अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने और सामूहिक सुरक्षा के ज़रिए शांति बनाए रखने के लिए बनाया गया था। लेकिन विडंबना यह रही कि जिस संगठन का मुख्य उद्देश्य युद्ध रोकना था, वह महज़ दो दशक बाद ही दूसरे विश्व युद्ध को भड़कने से रोकने में पूरी तरह विफल साबित हुआ।

क्या था लीग ऑफ नेशंस और विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया?
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुए भारी जान-माल के नुक़सान के बाद पूरे यूरोप और अमेरिका के राजनयिकों तथा बुद्धिजीवियों के बीच एक ऐसे संगठन की मांग उठने लगी थी जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दे सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने आठ जनवरी उन्नीस सौ अठारह को अमेरिकी संसद के समक्ष अपनी प्रसिद्ध 'चौदह सूत्रीय योजना' पेश की थी। इस योजना के अंतिम बिंदु में एक ऐसे राष्ट्र संघ के निर्माण का आह्वान किया गया था जो छोटे और बड़े सभी राज्यों को राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की समान गारंटी दे सके। चार साल के संपूर्ण युद्ध से थके हुए यूरोप और इस नए संगठन से उम्मीद लगाए बैठे अमेरिकी नागरिकों के बीच विल्सन का यह विचार बेहद लोकप्रिय हुआ। इसका मूल उद्देश्य निरस्त्रीकरण, बातचीत और सामूहिक सुरक्षा के माध्यम से युद्धों को रोकना था। इसके अलावा यह संगठन हथियारों के व्यापार, नशीले पदार्थों की तस्करी और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे अहम मुद्दों पर भी काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

वर्साय की संधि से इसका निर्माण कैसे हुआ और इसकी संरचना कैसी थी?
लीग ऑफ नेशंस का निर्माण पेरिस शांति सम्मेलन के दौरान हुआ। राष्ट्रपति विल्सन ने जनवरी उन्नीस सौ उन्नीस में पेरिस की यात्रा की और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस संगठन के चार्टर को वर्साय की संधि के साथ जोड़ दिया। उनका मानना था कि एक प्रभावी संगठन शांति की शर्तों में होने वाली किसी भी असमानता को कम कर सकेगा। विल्सन और ब्रिटेन के डेविड लॉयड जॉर्ज तथा फ्रांस के जॉर्जेस क्लेमेंस्यू ने मिलकर इसके नियम तय किए। इस संगठन के मुख्य अंगों में सभी सदस्य देशों की एक असेंबली, पाँच स्थायी और चार अस्थायी सदस्यों वाली एक परिषद और एक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय शामिल था। इसका लक्ष्य सदस्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना और शांति भंग होने की स्थिति में आर्थिक व सैन्य प्रतिबंध लगाने का तंत्र विकसित करना था। हालांकि, वर्साय की संधि के साथ इसे जोड़ना विल्सन की एक बड़ी कूटनीतिक भूल साबित हुई क्योंकि बाद में इसी संधि को बहुत ही सख़्त और अव्यवहारिक मानकर ख़ारिज किया जाने लगा।
क्या भारत इसका हिस्सा था और एक ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में इसकी क्या भूमिका थी?
लीग ऑफ नेशंस के गठन के समय भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं था, इसके बावजूद वह इसका एक संस्थापक सदस्य बना। प्रथम विश्व युद्ध में पुरुषों और युद्ध सामग्री के अभूतपूर्व योगदान के कारण भारत को उन्नीस सौ उन्नीस के वर्साय शांति सम्मेलन में जगह मिली थी। इस संगठन में भारत की स्थिति एक अंतरराष्ट्रीय विसंगति की तरह थी क्योंकि यह लीग का एकमात्र ऐसा सदस्य था जिसके पास अपना स्वतंत्र शासन नहीं था। इस अंतरराष्ट्रीय दर्जे ने भारत की बाहरी साम्राज्यवादी स्थिति और आंतरिक औपनिवेशिक वास्तविकताओं दोनों को उजागर किया। जिनेवा में भारत के प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति ने ब्रिटिश भारत और रियासतों वाले भारत के बीच के राजनीतिक भूगोल पर सवाल खड़े किए। जब महिलाओं और बच्चों की तस्करी रोकने जैसे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की बात आई, तो भारत सरकार ने ब्रिटिश और रियासती भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लागू करने से जुड़े कई पेचीदा मुद्दों का सामना किया।
कौन से देश इसके सदस्य थे और समय के साथ सदस्यता में क्या बदलाव आए?
उन्नीस सौ बीस से लेकर उन्नीस सौ छियालीस के बीच कुल तिरसठ देश लीग ऑफ नेशंस के सदस्य बने। शुरुआत में बयालीस देशों ने इसकी सदस्यता ली थी और बाद में इक्कीस अन्य देश इससे जुड़े। इसका सबसे बड़ा आकार अट्ठाईस सितंबर उन्नीस सौ चौंतीस से फरवरी उन्नीस सौ पैंतीस के बीच था जब इसके सदस्यों की संख्या अट्ठावन पहुँच गई थी। सदस्य देशों के इस मंच से जुड़ने और बाहर निकलने का सिलसिला लगातार चलता रहा। एडोल्फ़ हिटलर के सत्ता में आने के बाद जर्मनी ने अक्तूबर उन्नीस सौ तैंतीस में इसकी सदस्यता छोड़ दी। इसी तरह जापान ने भी एक कठपुतली राज्य को मान्यता न मिलने पर लीग से इस्तीफ़ा दे दिया। इटली ने इथियोपिया पर हमले के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण इसे छोड़ दिया। वहीं, सोवियत संघ को फिनलैंड पर अकारण हमला करने के चलते चौदह दिसंबर उन्नीस सौ उनतालीस को लीग से निष्कासित कर दिया गया था। कई अन्य देश भी समय-समय पर इसके फैसलों से असहमत होकर बाहर निकलते रहे।

लीग ऑफ नेशंस को फंड कहाँ से मिलता था और इसका वित्तीय प्रबंधन कैसे होता था?
इस वैश्विक संगठन को चलाने के लिए मुख्य रूप से सदस्य देशों से मिलने वाले आर्थिक योगदान पर निर्भर रहना पड़ता था। प्रत्येक देश की आर्थिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के आधार पर उसका योगदान तय होता था। हालाँकि, सभी देश समय पर और पूरा पैसा नहीं चुकाते थे। सदस्य देशों के इस योगदान के अलावा, लीग ऑफ नेशंस अपने प्रकाशनों की बिक्री से भी कुछ मामूली आय प्राप्त करता था। सबसे अहम बात यह थी कि सदस्य देशों, ग़ैर-सदस्य देशों और निजी संगठनों द्वारा विशेष परियोजनाओं को भी वित्तीय मदद दी जाती थी। उदाहरण के लिए, अमेरिका आधिकारिक तौर पर लीग का सदस्य नहीं था, लेकिन रॉकफेलर फाउंडेशन जैसे अमेरिकी निजी संगठनों ने स्वास्थ्य और पुस्तकालय निर्माण के क्षेत्र में भारी वित्तीय मदद की। इसके अलावा, फ्रांस की सरकार ने पेरिस में अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग संस्थान के संचालन का ज़्यादातर ख़र्च उठाया था।
शांति बनाए रखने और दूसरे विश्व युद्ध को रोकने में यह क्यों विफल रहा?
लीग ऑफ नेशंस की विफलता के पीछे कई ढांचागत कमज़ोरियां और राजनीतिक परिस्थितियां ज़िम्मेदार थीं। सबसे बड़ी कमज़ोरी यह थी कि जिस अमेरिका के राष्ट्रपति ने इसके निर्माण की परिकल्पना की थी, वही अमेरिका इसका सदस्य नहीं बन सका। अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन नेता हेनरी कैबोट लॉज के कड़े विरोध के कारण सीनेट ने वर्साय की संधि को उनचास के मुक़ाबले पैंतीस वोटों से ख़ारिज कर दिया था। इतिहासकारों का मानना है कि यदि अमेरिका इसमें शामिल होता, तो संघर्षों को रोकने में अधिक बल मिलता। दूसरी बड़ी विफलता यह थी कि लीग के पास अपनी कोई सशस्त्र सेना नहीं थी। यह पूरी तरह से सदस्य देशों की सैन्य ताक़त पर निर्भर था, लेकिन कोई भी देश युद्ध के बाद दोबारा अपनी सेना भेजने को तैयार नहीं था। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे इसके सबसे बड़े सदस्यों के भीतर शांतिवाद इतना हावी था कि वे सैन्य कार्रवाई या कड़े प्रतिबंध लगाने से कतराते थे। संगठन ने निरस्त्रीकरण की पुरज़ोर वकालत की थी, जिसके कारण शांति बनाए रखने के लिए ज़रूरी सैन्य शक्ति ही ख़त्म हो गई। जब आक्रामक देशों ने अपना विस्तार करने के लिए दूसरे छोटे देशों पर हमले शुरू किए, तो यह संगठन उन्हें रोकने में पूरी तरह बेबस साबित हुआ। हालांकि इसने भविष्य के संयुक्त राष्ट्र के लिए एक रूपरेखा ज़रूर तैयार की कि कूटनीतिक संगठनों में क्या काम करता है और क्या नहीं।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2fa4g4yc
2. https://tinyurl.com/mes9ve6
3. https://tinyurl.com/2ajroam3
4. https://tinyurl.com/2q9ujonv
5. https://tinyurl.com/2az44uc5
6. https://tinyurl.com/yax4c9zc
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