मुंगेर के उन 34 गुमनाम शहीदों की दास्तान, जिन्होंने तिरंगे के लिए खाई थीं गोलियां

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
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मुंगेर के उन 34 गुमनाम शहीदों की दास्तान, जिन्होंने तिरंगे के लिए खाई थीं गोलियां

मुंगेर का इतिहास गौरवशाली और बलिदानों से भरा हुआ है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में यूं तो कई शहरों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन मुंगेर के तारापुर का बलिदान एक ऐसी अमर गाथा है, जिसे सुनकर आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। 15 फरवरी 1932 का दिन भारत के इतिहास में एक काले दिन के रूप में दर्ज है। इस दिन तारापुर में अंग्रेजी हुकूमत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे राष्ट्रवादियों पर गोलियां बरसाकर एक भीषण नरसंहार को अंजाम दिया था। इसे अक्सर बिहार का जलियांवाला बाग कहा जाता है।

गांधी-इरविन समझौते की विफलता और ब्रिटिश दमन की शुरुआत कैसे हुई?
स्वतंत्रता संग्राम के इस महत्वपूर्ण अध्याय को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) के बीच एक राजनीतिक समझौता हुआ था, जिसे गांधी-इरविन समझौता कहा जाता है। इस समझौते के तहत सविनय अवज्ञा आंदोलन को रोक दिया गया था और ब्रिटिश सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमति जताई थी। इसके साथ ही, कांग्रेस ने लंदन में होने वाले दूसरे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस (Round Table Conference) में हिस्सा लेने की बात भी स्वीकार की थी।

हालांकि, 1931 के अंत तक हालात बिगड़ने लगे। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी ने पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ा दी थी। वहीं, ब्रिटिश सरकार अपनी दमनकारी नीतियों से बाज नहीं आई। 1932 की शुरुआत में गांधी-इरविन समझौता पूरी तरह से विफल हो गया। इसके परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया और कांग्रेस को एक गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया। जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं को भी जेल में डाल दिया गया। इस दमनकारी कार्रवाई ने पूरे देश, और विशेष रूप से बिहार के मुंगेर में, एक नए आक्रोश को जन्म दिया।

मुंगेर में स्वतंत्रता सेनानियों की गिरफ्तारी और आंदोलन की क्या स्थिति थी?
महात्मा गांधी और अन्य बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद, ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय नेतृत्व को भी कुचलने का प्रयास किया। मुंगेर में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कर रहे कई प्रमुख कार्यकर्ताओं और नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें श्रीकृष्ण सिंह, नेमधारी सिंह, निरापद मुखर्जी, पंडित दशरथ झा, बासुकीनाथ राय, दीनानाथ सहाय और जयमंगल शास्त्री जैसे महान देशभक्त शामिल थे।

अंग्रेजों का मानना था कि स्थानीय नेताओं को जेल में डालने से मुंगेर में राष्ट्रवाद की ज्वाला बुझ जाएगी। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी में आम जनता और युवाओं ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। मुंगेर के लोग किसी भी कीमत पर अंग्रेजों के सामने झुकने को तैयार नहीं थे और वे अपने गिरफ्तार नेताओं के समर्थन में लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे।

शार्दूल सिंह कवीशर के आह्वान ने तारापुर को कैसे प्रेरित किया?
जब कांग्रेस के शीर्ष नेता जेल में थे, तब कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष शार्दूल सिंह कवीशर ने पूरे देश के युवाओं और देशभक्तों से एक बड़ा आह्वान किया। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती देने के लिए सरकारी इमारतों पर भारत का तिरंगा झंडा फहराएं।

यह आह्वान पूरे देश में आग की तरह फैल गया और मुंगेर के तारापुर में भी इसकी गूंज स्पष्ट सुनाई दी। मुंगेर के क्रांतिकारियों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और ब्रिटिश सत्ता के प्रतीक, तारापुर पुलिस स्टेशन (थाना भवन), पर तिरंगा फहराने का दृढ़ निश्चय किया। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए 13 फरवरी 1932 को मुंगेर के जमुआ गांव में क्रांतिकारियों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में मदन गोपाल सिंह के नेतृत्व में पांच स्वयंसेवकों की एक विशेष टीम का गठन किया गया, जिसे तारापुर पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

15 फरवरी 1932 के उस खूनी दिन तारापुर में क्या घटा था?
15 फरवरी 1932 की वह दोपहर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक पलों में से एक बनने वाली थी। योजना के अनुसार, मदन गोपाल सिंह और उनकी पांच सदस्यीय टीम तिरंगा लेकर तारापुर पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ी। उनका हौसला बढ़ाने और इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए लगभग 4,000 लोगों की भारी भीड़ भी वहां जमा हो गई थी।

ब्रिटिश पुलिस को इस योजना की पहले से ही भनक लग चुकी थी और पुलिस के कई अधिकारी वहां हथियारों के साथ तैनात थे। दोपहर लगभग दो बजे, जैसे ही मदन गोपाल सिंह ने पुलिस स्टेशन के भवन पर तिरंगा फहराने की कोशिश की, पुलिस ने निहत्थे और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठीचार्ज शुरू कर दिया। भीड़ ने पुलिस की इस बर्बरता का कड़ा विरोध किया और बचाव में पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिसमें नागरिक प्रशासन का एक अधिकारी घायल हो गया।

इसके बाद ब्रिटिश पुलिस ने अपना सबसे क्रूर चेहरा दिखाया। बिना किसी चेतावनी के, पुलिस ने उस निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई। अंग्रेजों ने लगभग 75 राउंड गोलियां चलाईं। जब बंदूकों का शोर थमा, तो तारापुर की धरती देशभक्तों के खून से लाल हो चुकी थी। घटनास्थल पर 34 लोगों के शव बिखरे पड़े थे, हालांकि स्थानीय लोगों का मानना था कि मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक थी। प्रशासन केवल 13 शहीदों की ही पहचान कर सका।

तारापुर नरसंहार को बिहार का जलियांवाला बाग क्यों कहा जाता है?
1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग में जो हुआ था, ठीक वैसा ही क्रूर कृत्य अंग्रेजों ने 1932 में तारापुर में दोहराया था। दोनों ही घटनाओं में निहत्थे और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे भारतीयों को ब्रिटिश बंदूकों ने मौत के घाट उतार दिया था। इतिहासकार मानते हैं कि तारापुर का नरसंहार जलियांवाला बाग के बाद ब्रिटिश पुलिस द्वारा किया गया सबसे बड़ा और जघन्य नरसंहार था।

जलियांवाला बाग की तरह ही, तारापुर में भी राष्ट्रवादियों का एकमात्र उद्देश्य अपनी स्वतंत्रता की मांग को शांतिपूर्ण ढंग से सामने रखना था। थाने पर तिरंगा फहराना एक प्रतीकात्मक विद्रोह था, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत अपने अहंकार में इतनी अंधी हो चुकी थी कि उसने इसे कुचलने के लिए सीधे गोलियों का सहारा लिया। आज भी मुंगेर और पूरे बिहार के लोग 15 फरवरी के दिन उन 34 अमर शहीदों को नम आंखों से याद करते हैं जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

इस ऐतिहासिक बलिदान की आधुनिक भारत में क्या प्रासंगिकता है?
तारापुर का नरसंहार हमें याद दिलाता है कि जिस आज़ादी की खुली हवा में हम आज सांस ले रहे हैं, उसकी कीमत हमारे पूर्वजों ने अपना खून बहाकर चुकाई है। मदन गोपाल सिंह की हिम्मत और उन हजारों लोगों का अदम्य साहस जो पुलिस की लाठियों और गोलियों के सामने डटे रहे, हमारे लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।

मुंगेर के तारापुर की यह घटना केवल एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं है, बल्कि यह अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने का महान प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े शहरों या बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था; यह मुंगेर जैसे शहरों और तारापुर जैसे कस्बों की आम जनता के असाधारण त्याग की भी कहानी है। इन वीर सपूतों का बलिदान इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/22xqn93c 
2. https://tinyurl.com/24rdfyc3 
3. https://tinyurl.com/26tww5dm 

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