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रामपुरवासियों, हम सभी ने कभी न कभी किसी पुराने वीडियो को देखकर यह ज़रूर महसूस किया होगा कि समय कैसे बदलता है और उसके साथ हमारी देखने समझने की आदतें भी बदल जाती हैं। कभी परिवार के साथ बैठकर टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम, कभी हाथ में पकड़े मोबाइल पर बनते छोटे वीडियो और कभी किसी खेल या फ़िल्म का दृश्य जो हमारी यादों में हमेशा के लिए बस जाता है, यह सब वीडियो तकनीक के लंबे सफ़र की देन है। आज हम इस पूरी यात्रा को रामपुर की नज़र से समझने की कोशिश करते हैं ताकि यह पता चले कि दुनिया में हुए इन बदलावों ने हमारे अनुभवों को कितना समृद्ध किया है।
आज हम जानेंगे कि स्लो मोशन (slow motion) तकनीक कैसे काम करती है और क्यों यह किसी भी पल को ठहरकर महसूस करने जैसा जादू रच देती है। फिर हम दुनिया के पहले वीडियो की कहानी समझेंगे और जानेंगे कि शुरुआती फ़िल्में कैसे बनीं। इसके बाद हम वीडियो तकनीक के विकास को शुरुआती कैमरों से लेकर रंगीन टेलीविजन, सैटेलाइट प्रसारण, वीएचएस (VHS) और डीवीडी (DVD) से होते हुए आज के स्ट्रीमिंग युग तक देखेंगे। अंत में, भारत में वीडियो निर्माण की शुरुआत, दूरदर्शन का इतिहास और उन्नीस सौ तीन के दिल्ली दरबार की दुर्लभ फ़िल्म के बारे में बात करेंगे ताकि पूरी यात्रा आपके सामने साफ़ रूप में आए।
स्लो मोशन, जब हर पल ठहरकर अपना अर्थ बताता है
आपने कभी किसी वीडियो में पानी की बूँद को धीरे गिरते देखा होगा या किसी खेल में होने वाले तेज़ पल को दोबारा धीमी गति में देखा होगा। वह अनुभव कुछ अलग ही होता है, जैसे समय हमारे सामने ठहरकर अपनी कहानी सुना रहा हो। यही है स्लो मोशन का जादू। यह तब बनता है जब वीडियो को बहुत ऊँची फ़्रेम दर जैसे साठ एफ पी एस या एक सौ बीस एफ पी एस पर रिकॉर्ड किया जाता है और बाद में उसे चौबीस या तीस एफपीएस (FPS) पर चलाया जाता है। जब अधिक फ़्रेम धीरे धीरे दिखते हैं, तो वही घटना लंबी और शांत लगने लगती है। जैसे अगर किसी दृश्य को एक सेकंड में साठ फ़्रेम पर रिकॉर्ड किया और फिर उसे तीस फ़्रेम की गति पर चलाया जाए तो वही पल दो सेकंड तक खिंच जाता है। यही कारण है कि यह तकनीक भावनाओं और घटनाओं दोनों को अधिक गहराई से दिखा पाती है।

स्लो मोशन हमारे अनुभवों को कहाँ कहाँ बदलता है
स्लो मोशन का प्रभाव सिर्फ़ तकनीकी नहीं बल्कि भावनात्मक और दृश्यात्मक है। फ़िल्में इसे क्रियाओं को यादगार बनाने के लिए उपयोग करती हैं। उदाहरण के लिए मशहूर फ़िल्म द मैट्रिक्स (The Matrix) में गोलियों की गति को इसी तकनीक से पकड़ा गया था। विज्ञापन और डॉक्यूमेंट्री (documentary) में यह प्रकृति या जानवरों की छोटी छोटी हरकतों को समझने में मदद करता है। खेल जगत में यह किसी पल की सच्चाई को सामने लाता है, जैसे फुटबॉल में किसी खिलाड़ी का ऑफसाइड (offside) होना या क्रिकेट में गेंद का बल्ले को छूना।और सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज हमारे मोबाइल तक इस तकनीक को आसानी से रिकॉर्ड कर लेते हैं। किसी बच्चे की हँसी हो, तैराकी की हलचल हो या किसी दोस्त की स्केटिंग (skating), स्लो मोशन हर पल को यादगार बना देता है।

दुनिया का पहला वीडियो, जहाँ से पूरी कहानी शुरू हुई
वीडियो की शुरुआत एक बेहद सरल लेकिन ऐतिहासिक क्षण से हुई। चौदह अक्टूबर अठारह सौ अठासी को लुईस ले प्रिंस नाम के एक फ्रांसिसी आविष्कारक ने इंग्लैंड के लीड्स शहर में अपने परिवार और परिचितों को बगीचे में टहलते हुए रिकॉर्ड किया। यह दृश्य राउंडहे गार्डन सीन (Roundhay Garden Scene) कहलाता है और दुनिया की सबसे पुरानी सुरक्षित फ़िल्म मानी जाती है। इसके बाद लुमीयर बंधुओं ने पेरिस के एक कैफे में पहली व्यावसायिक फ़िल्म स्क्रीनिंग की और दुनिया ने पहली बार चलती तस्वीरों का जादू महसूस किया। उन्नीस सौ सत्ताइस में जैज़ सिंगर (The Jazz Singer) रिलीज़ हुई जो आवाज़ के साथ चलने वाली पहली फ़ीचर फ़िल्म (feature film) थी और इसने मूक फ़िल्मों के युग को विदा कर दिया। कुछ साल बाद रंगीन फ़िल्में जैसे विज़ार्ड ऑफ़ ओज़ (The Wizard of Oz) और फैंटासिया (Fantasia) आईं और सिनेमा की दुनिया नए रंगों में खिल उठी।
वीडियो तकनीक का विकास जिसने दुनिया को जोड़ दिया
वीडियो तकनीक के वास्तविक विकास की शुरुआत तब हुई जब स्कॉटिश इंजीनियर जॉन लोगी बेयर्ड ने निप्को डिस्क नामक उपकरण के आधार पर पहला वीडियो कैमरा तैयार किया। वर्ष 1924 में उन्होंने कुछ फुट की दूरी पर एक टिमटिमाती हुई छवि प्रसारित की, और 1926 में वैज्ञानिकों के सामने दुनिया का पहला वास्तविक टेलीविजन प्रदर्शन किया। यह पल आने वाले समय की पूरी तकनीकी यात्रा की नींव था। इसके बाद वीडियो और टेलीविजन की दुनिया बेहद तेज़ी से आगे बढ़ी।1953 में अमेरिका की आरसीए (RCA) कंपनी को रंगीन टेलीविजन मॉडल की मंज़ूरी मिली, जिसने दृश्य अनुभव को पूरी तरह बदल दिया। 1962 में टेलस्टार वन (Telstar One) के लॉन्च होने के साथ दुनिया का पहला सक्रिय संचार उपग्रह अंतरिक्ष में पहुँचा और पहली बार वैश्विक टेलीविजन प्रसारण संभव हुआ। 1976 में वी एच एस और वी सी आर लोगों के घरों तक आए, जिससे वीडियो रिकॉर्डिंग और देखने की सुविधा हर परिवार तक पहुँचने लगी। 1997 में डीवीडी आए, जिनकी बेहतर तस्वीर और आवाज़ ने वीडियो देखने की गुणवत्ता को एक नया स्तर दिया। फिर 2000 के बाद वीडियो उपभोग की दुनिया एकदम बदल गई। स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म (streaming platform) जैसे यूट्यूब (YouTube), नेटफ्लिक्स (Netflix) और अमेज़न प्राइम (Amazon Prime) ने वीडियो देखने की हमारी आदतों को पूरी तरह नए रूप में ढाल दिया। अब दुनिया सचमुच एक स्क्रीन में सिमट चुकी है और वीडियो हमारे रोज़मर्रा के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गया है।

भारत में वीडियो निर्माण की शुरुआत और विकास
भारत में वीडियो निर्माण की कहानी लगभग उतनी ही पुरानी है जितनी दुनिया की। माना जाता है कि अठारह सौ अठासी में बॉम्बे के हैंगिंग गार्डन (hanging garden) में पहलवान पुंडलिक दादा और कृष्णा नवी की कुश्ती का एक छोटा दृश्य रिकॉर्ड किया गया। उन्नीस सौ तेरह में दादा साहब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र फ़िल्म बनाकर भारतीय फ़िल्म उद्योग की नींव रखी। फिर उन्नीस सौ इकतीस में आलम आरा फ़िल्म आई जो भारत की पहली बोलती हुई फ़िल्म थी। उन्नीस सौ सैंतीस में किसान कन्या फ़िल्म आई जो भारत की पहली रंगीन हिंदी फ़िल्म मानी जाती है। उन्नीस सौ अड़तालीस में फ़िल्म प्रभाग की स्थापना हुई और भारत में सरकारी वृत्तचित्र तथा समाचार निर्माण को एक नई दिशा मिली। उन्नीस सौ सत्तावन में भारत की पहली एनीमेशन फ़िल्म द बैन्यन ट्री (The Banyan Tree) बनी। भारत का पहला टीवी चैनल दूरदर्शन पंद्रह सितंबर उन्नीस सौ उनसठ को शुरू हुआ। उन्नीस सौ बयासी में रंगीन प्रसारण और एशियाई खेलों का कवरेज शुरू हुआ। उन्नीस सौ चौरासी में निजी प्रोडक्शन (production) कंपनियाँ आईं और हम लोग धारावाहिक ने भारतीय परिवारों को नई कहानी संस्कृति दी।
उन्नीस सौ तीन का दिल्ली दरबार, कैमरे में ठहरा हुआ इतिहास
1903 में रिकॉर्ड हुई दिल्ली के राज्याभिषेक दरबार की दो मिनट की ब्लैक एंड वाइट (Black and White) फ़िल्म आज भी इतिहास की अहम दस्तावेज़ मानी जाती है। इसमें भारतीय सेना, घुड़सवार टुकड़ियाँ, हाथियों की सवारी और ब्रिटिश अधिकारियों की उपस्थिति दिखाई देती है। उस समय के कैमरे स्थिर नहीं होते थे, इसलिए कई दृश्य अचानक शुरू हो जाते थे और खत्म हो जाते थे, फिर भी यह फ़िल्म उस समय के वास्तविक वातावरण को सबसे सच्चे रूप में सामने लाती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/bdc7b8zp
https://tinyurl.com/4zzh94yp
https://tinyurl.com/yc6fyftr
https://tinyurl.com/5axx9mww
https://tinyurl.com/3uwrapyk
https://tinyurl.com/35vts6ma
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