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रामपुरवासियों के लिए तेज़ी से बदलती शहरी जीवनशैली के साथ एक नई चुनौती भी सामने आ रही है - कचरे का बढ़ता ढेर। शहर की गलियों, बाज़ारों और रिहायशी इलाकों में हर दिन निकलने वाला घरेलू और व्यावसायिक कचरा न केवल स्वच्छता व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है। ऐसे में रामपुर के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि कचरे को सिर्फ़ फेंकने की वस्तु न समझकर, उसके सही प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए। रंगीन कूड़ेदानों की व्यवस्था और कचरे का वैज्ञानिक पृथक्करण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक कदम है, जो शहर को स्वच्छ और स्वस्थ बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।
इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि भारत और रामपुर जैसे शहरों में शहरी कचरे की मात्रा क्यों तेजी से बढ़ रही है और इससे क्या समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इसके बाद हम कचरा पृथक्करण की आवश्यकता और वर्तमान व्यवस्थाओं की कमजोरियों पर चर्चा करेंगे। आगे, हम जानेंगे कि रंगीन कूड़ेदानों - हरे, नीले और काले या लाल - का उद्देश्य क्या है और उनका सही उपयोग कैसे किया जाना चाहिए। अंत में, हम नागरिक जागरूकता, 4आर (4R) सिद्धांत और रामपुरवासियों की भूमिका पर बात करेंगे, जिससे स्वच्छ शहर और स्वस्थ समाज का लक्ष्य हासिल किया जा सके।
भारत में शहरी कचरे की बढ़ती मात्रा और उसकी गंभीर समस्या
भारत में शहरीकरण की तेज़ रफ्तार के साथ कचरे की मात्रा भी लगातार बढ़ती जा रही है। आज देश की करोड़ों की शहरी आबादी हर दिन भारी मात्रा में घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक कचरा उत्पन्न कर रही है। बदलती जीवनशैली, पैक्ड खाद्य पदार्थों का बढ़ता उपयोग और एकल-उपयोग प्लास्टिक ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा (e-waste) और खतरनाक अपशिष्ट न केवल भूमि को बंजर बना रहे हैं, बल्कि नदियों, भूजल और हवा को भी प्रदूषित कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश, नगरपालिकाओं द्वारा एकत्र किए गए कुल कचरे का बड़ा हिस्सा आज भी बिना किसी वैज्ञानिक प्रसंस्करण के खुले मैदानों या लैंडफिल (landfill) में डाल दिया जाता है। इसका सीधा प्रभाव शहरी पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।

कचरा पृथक्करण की आवश्यकता और वर्तमान व्यवस्थाओं की कमजोरियाँ
कचरा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था की नींव कचरा पृथक्करण पर टिकी होती है। यदि गीले और सूखे कचरे को शुरुआत में ही अलग न किया जाए, तो आगे चलकर न तो खाद बन पाती है और न ही पुनर्चक्रण संभव हो पाता है। आज भी अधिकांश शहरों और मोहल्लों में लोग सारा कचरा एक ही डिब्बे में डाल देते हैं। इससे नगर निगम की प्रसंस्करण इकाइयों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और बहुमूल्य संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। यह व्यवस्था न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि पर्यावरणीय संकट को भी गहरा करती है। सही पृथक्करण के अभाव में कचरा समस्या का समाधान संभव नहीं है।

रंगीन कूड़ेदानों का उद्देश्य और उनके उपयोग का वैज्ञानिक आधार
रंगीन कूड़ेदान केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच के आधार पर बनाए गए हैं। इनका उद्देश्य कचरे को उसकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करना है।
• हरा कूड़ेदान जैविक और आसानी से अपघटित होने वाले कचरे के लिए होता है।
• नीला कूड़ेदान सूखे और पुनर्चक्रण योग्य कचरे के लिए निर्धारित किया गया है।
• काला या लाल कूड़ेदान खतरनाक, विषाक्त या जैव-चिकित्सीय कचरे के लिए उपयोग में लाया जाता है।
इस रंग-आधारित प्रणाली का मूल उद्देश्य कचरे को स्रोत पर ही अलग करना है, ताकि आगे उसका सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल और वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित किया जा सके।
हरे और नीले कूड़ेदान: जैविक व पुनर्चक्रण योग्य कचरे का सही निपटान
हरे कूड़ेदान में डाला गया गीला कचरा - जैसे भोजन के अवशेष, सब्जियों और फलों के छिलके, चाय-पत्ती और बगीचे का कचरा - खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। यह खाद खेतों, बागवानी और पौधों के लिए अत्यंत उपयोगी होती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है। वहीं नीले कूड़ेदान में डाला गया प्लास्टिक, कागज, धातु और कांच पुनर्चक्रण प्रक्रिया से गुजरता है। इससे नए उत्पाद बनाए जा सकते हैं, प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है और कचरे की कुल मात्रा में कमी आती है। सही उपयोग से ये दोनों कूड़ेदान कचरा प्रबंधन की रीढ़ बन सकते हैं।
खतरनाक, जैव-चिकित्सीय और ई-कचरे से जुड़े स्वास्थ्य व पर्यावरण जोखिम
कुछ प्रकार का कचरा ऐसा होता है जो सामान्य कचरे की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक होता है। सैनिटरी नैपकिन (stationary napkin), डायपर (diaper), बैटरियाँ, सीएफएल (CFL), ट्यूब लाइट (tube light), दवाइयाँ और मेडिकल कचरा यदि गलत कूड़ेदान में फेंक दिया जाए, तो इससे संक्रमण और गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा कचरा मिट्टी और पानी को जहरीला बना सकता है तथा मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए इनके लिए अलग काले या लाल कूड़ेदान की व्यवस्था की जाती है, ताकि इनका सुरक्षित निपटान या वैज्ञानिक विधि से नष्ट किया जा सके।
जागरूकता, 4आर सिद्धांत और नागरिक जिम्मेदारी की भूमिका
स्वच्छ और स्वस्थ शहर की कल्पना तब तक अधूरी है, जब तक नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। सरकार और नगर निगम अपनी भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन वास्तविक बदलाव लोगों की भागीदारी से ही आएगा। इसके लिए 4R सिद्धांत - Reduce (कम करना), Reuse (पुनः उपयोग), Recycle (पुनर्चक्रण) और Refuse (अनावश्यक वस्तुओं से मना करना) को अपनाना आवश्यक है। विद्यालयों, मोहल्लों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से जागरूकता फैलाकर कचरा पृथक्करण को जनआंदोलन बनाया जा सकता है।
संदर्भ:
https://rb.gy/prsyv
https://rb.gy/hbz3d
https://rb.gy/7ac51
https://tinyurl.com/2jxj22pk
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