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गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!
रामपुरवासियों के लिए यह गर्व की बात है कि भारत के संविधान को लिखने वाले महान सुलेखक प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा इसी भूमि से जुड़े थे। भारत का संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह देश की आत्मा, लोकतंत्र और समानता का प्रतीक है। इसकी पहली हस्तलिखित प्रति आज भी दुनिया को भारतीय कला, अनुशासन और बौद्धिक परंपरा की झलक दिखाती है। रामपुर से निकले प्रेम बिहारी ने अपने हाथों से संविधान को लिखकर न केवल इतिहास रचा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत भी छोड़ी।
इस लेख में हम सबसे पहले भारत के संविधान की पहली हस्तलिखित प्रति और उसके विशेष संरक्षण के बारे में जानेंगे। इसके बाद, संविधान की सुलेख कला और उसकी अद्भुत सौंदर्यात्मक विशेषताओं पर चर्चा करेंगे। फिर हम रामपुर से जुड़े प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा के जीवन और उनके योगदान को समझेंगे। आगे, जवाहरलाल नेहरू द्वारा हस्तलिखित संविधान के निर्णय और शांतिनिकेतन में नंदलाल बोस द्वारा किए गए कलात्मक अलंकरण की भूमिका को जानेंगे। अंत में, हम संविधान के निर्माण, हस्ताक्षर प्रक्रिया और उसके लागू होने की ऐतिहासिक यात्रा पर नज़र डालेंगे, जिससे पूरे विषय की समग्र समझ विकसित हो सके।
भारत के संविधान की हस्तलिखित मूल प्रति और उसका संरक्षण
भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि देश की आत्मा का लिखित स्वरूप है। इसकी पहली हस्तलिखित मूल प्रति आज भी नई दिल्ली में संसद पुस्तकालय के भीतर एक विशेष सुरक्षित कक्ष में संरक्षित है। यह पांडुलिपि हीलियम (Helium) और नाइट्रोजन (Nitrogen) से भरे विशेष बक्से में रखी गई है, जहाँ तापमान लगभग 20 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 30 प्रतिशत के आसपास बनाए रखी जाती है। 251 पन्नों की यह दुर्लभ धरोहर वर्षों बाद भी वैसी ही सुरक्षित है, जैसी संविधान लागू होने के समय थी। यह संरक्षण व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि भारत अपने संवैधानिक मूल्यों और ऐतिहासिक विरासत को कितनी गंभीरता से सहेजता है।

संविधान की सुलेख कला और सौंदर्यात्मक विशेषताएँ
भारत के संविधान की सबसे अनोखी विशेषता इसकी अद्भुत सुलेख कला है। प्रत्येक पन्ना चर्मपत्र कागज पर लिखा गया है, जिसमें इटैलिक (italic) शैली के अक्षर अत्यंत संतुलित, स्पष्ट और सौंदर्यपूर्ण दिखाई देते हैं। अक्षरों की गोलाई, कोष्ठकों की सटीकता और उद्धरण चिह्नों की पूर्णता देखकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि यह कार्य किसी मशीन का नहीं, बल्कि मानव हाथों का है। एक भी शब्द में गलती नहीं, न स्याही का धब्बा और न ही लेखन में असमानता—यह सुलेख भारतीय कला और धैर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा: संविधान के शिल्पकार
इस महान कार्य के पीछे रामपुर से संबंध रखने वाले प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा का नाम अमर है। 1901 में जन्मे प्रेम बिहारी एक प्रतिष्ठित सुलेख परिवार से थे। उनके दादा राम प्रसाद सक्सेना स्वयं फारसी और अंग्रेज़ी के विद्वान और कुशल सुलेखक थे, जिनसे प्रेम बिहारी को बचपन से ही यह कला विरासत में मिली। सेंट स्टीफेंस कॉलेज (St. Stephen's College), दिल्ली से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने सुलेख को ही अपना जीवन बना लिया। उनकी लेखन शैली इतनी प्रसिद्ध हो गई कि संविधान जैसे ऐतिहासिक दस्तावेज़ को लिखने की ज़िम्मेदारी उन्हीं को सौंपी गई।

नेहरू जी की भूमिका और हस्तलिखित संविधान का ऐतिहासिक निर्णय
जब संविधान तैयार हुआ, तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे छपवाने के बजाय हस्तलिखित रूप में सुरक्षित रखने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने प्रेम बिहारी को आमंत्रित किया। जब उनसे पारिश्रमिक के बारे में पूछा गया, तो प्रेम बिहारी ने इसे देशसेवा बताते हुए किसी भी प्रकार का शुल्क लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने केवल यह इच्छा जताई कि हर पन्ने पर उनका नाम और अंतिम पन्ने पर उनके दादा का नाम लिखा जाए। यह निर्णय न केवल संविधान को विशिष्ट बनाता है, बल्कि उस समय के राष्ट्रनिर्माण के भाव को भी दर्शाता है।
शांतिनिकेतन और नंदलाल बोस द्वारा संविधान का कलात्मक अलंकरण
संविधान लेखन से पहले प्रेम बिहारी, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ शांतिनिकेतन पहुँचे, जहाँ प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस से परामर्श किया गया। यह तय हुआ कि प्रेम बिहारी पाठ लिखेंगे और नंदलाल बोस व उनके शिष्यों द्वारा खाली स्थानों को कलात्मक चित्रों से सजाया जाएगा। इन चित्रों में मोहनजोदड़ो सभ्यता, रामायण, महाभारत, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक, अकबर और भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण दृश्य उकेरे गए। इस प्रकार संविधान केवल कानूनी दस्तावेज़ न रहकर भारतीय सभ्यता का चित्रात्मक इतिहास भी बन गया।
संविधान का निर्माण, हस्ताक्षर और लागू होने की प्रक्रिया
संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ था और लगभग 2 वर्ष 11 महीने 18 दिनों की मेहनत के बाद 26 नवंबर 1949 को संविधान को अपनाया गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 284 सदस्यों ने हस्तलिखित संविधान पर हस्ताक्षर किए, जिनमें पहला हस्ताक्षर डॉ. राजेंद्र प्रसाद का था। अंततः 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। आज इसमें 22 भागों में विभाजित अनुच्छेद और अनुसूचियाँ हैं, जिनमें समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं। फिर भी संविधान की पहली हस्तलिखित प्रति आज भी सुरक्षित है और भारत की लोकतांत्रिक यात्रा की सजीव गवाह बनी हुई है।
संदर्भ :-
https://bit.ly/3nWoa03
https://bit.ly/3tVm18M
https://bit.ly/3G53Ccg
https://tinyurl.com/34cjrtzz
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