भारतीय क्रिकेट का पितामह कौन है, जिसके नाम पर खेली जाती है 'रणजी ट्रॉफी'?

गतिशीलता और व्यायाम/जिम
12-05-2026 09:32 AM
भारतीय क्रिकेट का पितामह कौन है, जिसके नाम पर खेली जाती है 'रणजी ट्रॉफी'?

रामपुर शहर के हमारे पाठकों के लिए क्रिकेट के इतिहास की यह कहानी बेहद दिलचस्प होने वाली है, क्योंकि इस खेल की जड़ें हमारे देश की ऐतिहासिक रियासतों और शाही घरानों से बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। आज भारत में क्रिकेट महज़ एक खेल नहीं बल्कि एक धर्म की तरह माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में इस खेल की शुरुआत और इसकी लोकप्रियता के पीछे का इतिहास क्या है? प्रसिद्ध विचारक आशीष नंदी ने क्रिकेट को लेकर एक बेहद मशहूर और सटीक बात कही है कि क्रिकेट असल में एक भारतीय खेल है, जिसे ग़लती से अंग्रेज़ों ने ईजाद कर दिया था। यह वाक्य सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जब हम भारत में क्रिकेट के इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो यह बात बिल्कुल सच साबित होती है। शुरुआत में यह आम जनता का खेल नहीं था, बल्कि इसे औपनिवेशिक काल के दौरान राजघरानों और अमीरों का खेल माना जाता था।

ब्रिटिश राज में क्रिकेट कैसे बना रसूख और सत्ता का प्रतीक?
भारत में क्रिकेट की शुरुआत अठारहवीं सदी में ब्रिटिश नाविकों और ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों द्वारा की गई थी। लेकिन भारतीयों के बीच इस खेल को अपनाने की कहानी केवल शौक तक सीमित नहीं थी। औपनिवेशिक काल के दौरान पारसी समुदाय, अंग्रेज़ी तौर-तरीकों को अपनाने वाले भारतीय समुदायों और सामंती राजकुमारों (रियासतों के राजा-महाराजाओं) ने सबसे पहले इस खेल को खेलना शुरू किया। उन्होंने इस खेल को महज़ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज में अपना रसूख (सोशल स्टेटस) स्थापित करने और ब्रिटिश राज के सत्ताधारी एलीट (उच्च वर्ग) तक अपनी पहुँच बनाने के एक साधन के रूप में अपनाया था। अंग्रेज़ों के साथ क्रिकेट खेलना उस दौर में उनके करीब जाने और उनके समाज का हिस्सा दिखने का एक बेहद कारगर तरीका माना जाता था।
 

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पटियाला के महाराजा ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथ


क्रिकेट ने भारतीयों को अंग्रेज़ी शासन और नियमों का सम्मान करना कैसे सिखाया?
क्रिकेट का प्रभाव केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं था; इसका राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर भी बहुत व्यापक असर पड़ा। इस बात को सी.एल.आर. जेम्स ने अपनी शानदार किताब 'बियॉन्ड द बाउंड्री (Beyond the Boundary)' में बहुत ही बेहतरीन ढंग से समझाया है। जेम्स अपनी किताब में बताते हैं कि क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो नियमों, कानूनों और अंपायरों के निष्पक्ष अधिकार का सम्मान करना सिखाता है। ब्रिटिश शासकों ने बहुत ही चालाकी से इस खेल का इस्तेमाल भारतीयों के मनोविज्ञान को ढालने के लिए किया। अंपायर के फैसलों को बिना सवाल किए मान लेने की इस खेल की परंपरा ने धीरे-धीरे भारतीयों के भीतर औपनिवेशिक नियमों, उनके कानूनों और उनकी सत्ता के प्रति सम्मान और आज्ञाकारिता की भावना पैदा कर दी। इस तरह, क्रिकेट अनजाने में ही ब्रिटिश साम्राज्य के शासन को मज़बूत करने का एक वैचारिक उपकरण बन गया था।

रियासतों के राजा-महाराजाओं ने क्रिकेट और क्रिकेटरों को कैसे संरक्षण दिया?
जैसे-जैसे क्रिकेट का प्रभाव बढ़ा, भारत की बड़ी-बड़ी रियासतों ने इसे पूरी तरह से अपना लिया। इस दिशा में सबसे अहम कदम पटियाला के महाराजा राजिंदर सिंहजी ने उठाया, जिन्होंने अपना एक अलग क्रिकेट क्लब बनाया। पटियाला की देखादेखी भोपाल, बड़ौदा, होल्कर और अन्य कई रियासतों के शासकों ने भी क्रिकेट को गले लगा लिया। इन राजा-महाराजाओं ने न केवल इस खेल को आर्थिक समर्थन दिया, बल्कि उन्होंने बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा किए। उदाहरण के लिए, होल्कर के महाराजा ने भारत के पहले क्रिकेट सुपरस्टार सी.के. नायडू को अपनी सेना में कर्नल के पद पर नियुक्त किया था। इसी तरह, महाराजा धनराजगीरजी ने मशहूर खिलाड़ी मुश्ताक अली को अपना संरक्षण दिया, जबकि जतीथी के राजा ने महान बल्लेबाज़ विजय हजारे को संरक्षण प्रदान किया था। शाही घरानों के इस वित्तीय और सामाजिक समर्थन ने ही भारत में पेशेवर क्रिकेट की शुरुआती नींव रखी थी।  

भारतीय क्रिकेट का पितामह किसे कहा जाता है?
जब शाही घरानों और क्रिकेट के रिश्ते की बात होती है, तो एक नाम ऐसा है जिसके बिना भारत का क्रिकेट इतिहास हमेशा अधूरा रहेगा। यह नाम है कुमार श्री रणजीतसिंहजी का, जिन्हें दुनिया भर में 'रणजी' के नाम से भी जाना जाता है। वे नवानगर की रियासत के शासक थे। उनकी असाधारण खेल प्रतिभा और क्रिकेट के प्रति उनके योगदान को देखते हुए ही उन्हें 'भारतीय क्रिकेट का पिता' कहा जाता है। इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ससेक्स काउंटी और बाद में इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के लिए क्रिकेट खेला। उनकी बल्लेबाज़ी की शैली इतनी अनोखी और कलात्मक थी कि दुनिया ने पहले कभी वैसा कुछ नहीं देखा था। वे पारंपरिक नियमों से बंधकर नहीं खेलते थे, बल्कि उन्होंने क्रिकेट की दुनिया को 'लेट कट' और 'लेग ग्लांस' जैसे बिल्कुल नए शॉट दिए। उनकी इस जादुई बल्लेबाज़ी ने अंग्रेज़ों को भी उनका मुरीद बना दिया था। 

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रणजीतसिंहजी की विरासत भारत की सबसे बड़ी घरेलू प्रतियोगिता कैसे बनी?
हालांकि रणजीतसिंहजी ने अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में ज़्यादातर मैच इंग्लैंड की तरफ से खेले और भारतीय ज़मीन पर उनका क्रिकेट खेलना बहुत सीमित रहा, लेकिन उनका रुतबा और नाम इतना बड़ा था कि भारतीय क्रिकेट हमेशा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गया। एक भारतीय राजकुमार का अंग्रेज़ों के ही खेल में अंग्रेज़ों से बेहतर प्रदर्शन करना, उस दौर में भारतीयों के लिए बहुत बड़े गर्व की बात थी। उनके इसी अभूतपूर्व योगदान और क्रिकेट में उनके ऐतिहासिक दर्जे का सम्मान करने के लिए, भारत की सबसे प्रतिष्ठित घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर रखा गया। जिसे आज हम 'रणजी ट्रॉफी' के नाम से जानते हैं, वह नवानगर के इसी महान राजकुमार की विरासत है। आज भी भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाने का सपना देखने वाला हर युवा खिलाड़ी सबसे पहले इसी रणजी ट्रॉफी में खुद को साबित करने की कोशिश करता है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/26yca7ey
https://tinyurl.com/22mepjej
https://tinyurl.com/24dfaof2
https://tinyurl.com/25q26wnl
https://tinyurl.com/2aevwdon
https://tinyurl.com/y67uzm7f

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