50 हज़ार शेरों वाला फ़ारसी महाकाव्य 'शाहनामा' यूपी के रामपुर कैसे पहुँचा?

मध्यकाल : 1450 ई. से 1780 ई.
18-04-2026 09:35 AM
50 हज़ार शेरों वाला फ़ारसी महाकाव्य 'शाहनामा' यूपी के रामपुर कैसे पहुँचा?

क्या आपने कभी सोचा है कि एक 1010 ईसवी में लगभग पचास हज़ार शेरों में लिखा गया एक ऐसा महाकाव्य, जो दुनिया के निर्माण से लेकर सातवीं शताब्दी के इस्लामी आक्रमण तक की कहानी बयां करता है, हमारे रामपुर शहर की सबसे सुरक्षित और ऐतिहासिक तिजोरी तक कैसे पहुँचा? यह दास्तान है 'शाहनामा' की, जिसे हकीम अबुल-कासिम फिरदौसी (Hakim Abul-Qasim Firdausi) ने लिखा था। फ़ारस से उठी यह साहित्यिक लहर मुग़ल बादशाहों के दरबारों से होती हुई, रामपुर के नवाबों के उस जुनून तक पहुँची, जिन्होंने दुनिया के दुर्लभ ग्रंथों को हासिल करने के लिए इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद तक खाली चेक देकर अपने नुमाइंदे भेजे थे। यह केवल एक किताब का सफ़र नहीं है, बल्कि यह इंसानी इतिहास, कला और सभ्यताओं के आपसी जुड़ाव की एक ऐसी जीती-जागती कहानी है, जो आज भी रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी की अलमारियों में महक रही है।  

शाहनामा क्या है और यह फ़ारसी पौराणिक कथाओं तथा इतिहास को कैसे प्रस्तुत करता है?शाहनामा, जिसे राजाओं की किताब के रूप में भी जाना जाता है, ग्रेटर ईरान (ईरान ज़मीन) के इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक निर्विवाद राष्ट्रीय महाकाव्य है। यह महाकाव्य दुनिया के निर्माण से शुरू होकर सातवीं शताब्दी में अरबों की विजय तक के कालखंड को समेटता है। इस ग्रंथ में रुस्तम जैसे महान योद्धाओं और सिकंदर महान जैसे ऐतिहासिक राजाओं की दिलचस्प कहानियाँ दर्ज हैं। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan), ताजिकिस्तान (Tajikistan) और काकेशस (Caucasus) के लोग इस ग्रंथ को अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। फिरदौसी ने पूर्व-इस्लामी ईरानी पौराणिक कथाओं को शामिल करके फ़ारसी भाषा और संस्कृति को सहेजने का महान काम किया था। हालांकि बीसवीं सदी में कई राष्ट्रवादियों और विशेष रूप से पहलवी राजवंश ने इस ग्रंथ का राजनीतिकरण किया। उन्होंने इसे अरब और तुर्क प्रभाव के खिलाफ ईरानी श्रेष्ठता का प्रतीक बना दिया और यह भ्रांति फैलाई कि शाहनामा में कोई अरबी शब्द नहीं है और यह इस्लाम या अरबों के ख़िलाफ़ है।

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शाहनामा 

वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। राष्ट्रवादी विचारों ने शाहनामा को एक धर्मनिरपेक्ष और शुद्ध फ़ारसी ग्रंथ साबित करने की कोशिश की, लेकिन तथ्य बताते हैं कि इस महाकाव्य में लगभग नौ प्रतिशत अरबी शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। फिरदौसी ने अपनी किताब की शुरुआत में ईश्वर, ग़ज़नी के सुल्तान महमूद, पैगंबर और उनके परिवार (अहल-ए बैत) की भरपूर प्रशंसा की है, जो उनकी आस्था को दर्शाता है। इस ग्रंथ में बुराई का स्रोत बाहरी दुनिया को नहीं, बल्कि 'अह्रिमन' के रूप में समाज के भीतर ही दिखाया गया है। सियावश और सोहराब जैसे ईरानी नायकों ने ईरानी पठार की सीमाओं के पार जाकर रिश्ते बनाए थे। फिरदौसी ने अपनी कहानी में सुदाबेह और अयोग्य राजा के कवुस जैसे भ्रष्ट ईरानी किरदारों को भी जगह दी है, जो साबित करता है कि यह महाकाव्य केवल खोखले राष्ट्रवाद की वकालत नहीं करता। 1934 में जब तूस शहर में फिरदौसी के मकबरे का पुनर्निर्माण हुआ, तो उसमें सफ़ेद पत्थर का इस्तेमाल इसी तथाकथित भाषाई शुद्धता को दर्शाने के लिए किया गया था और पारसी प्रतीक 'फ़रहर' को परसेपोलिस (Persepolis) से हूबहू नकल किया गया था। तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणों के बाद जब व्यापारिक मार्ग फिर से खुले, तो इलखानी और तैमूरी काल के चित्रकारों ने शाहनामा के चित्रों में चीनी कला को भी अपनाया। मशहूर ईरानी पौराणिक पक्षी 'सीमूर्घ' के चित्रण पर चीनी ड्रैगन (Chinese dragon) और फ़ीनिक्स (Phoenix) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।  

मुग़ल साम्राज्य ने शाहनामा और अन्य फ़ारसी साहित्य को कैसे सहेजा और बढ़ावा दिया?
भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव 1526 में बाबर ने रखी थी। बाबर महान विजेता तैमूर और चंगेज़ ख़ान का वंशज था। वह मूल रूप से उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan) की फ़रग़ना घाटी से आया था और उसका सपना समरकंद पर कब्ज़ा करना था। जब वह तीन बार असफल रहा, तो उसने काबुल और फिर भारत का रुख किया, जहाँ उसने अफ़ग़ान शासक इब्राहिम लोदी को हराया। मुग़ल मूल रूप से तुर्क थे, लेकिन वे फ़ारसी संस्कृति को बहुत परिष्कृत और महान मानते थे। इसी कारण उन्होंने फ़ारसी को अपने दरबार और प्रशासन की आधिकारिक भाषा बना दिया। बाबर कला और साहित्य का प्रेमी था; उसने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' (Baburnama) अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की में लिखी थी, जिसमें उसने अपने युद्धों और भारत की गर्मी का ज़िक्र किया था।

बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ को अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी से हारकर भागना पड़ा और उसने ईरान में सफ़वी शासक शाह तहमास्प के दरबार में पनाह ली। यह निर्वासन मुग़ल इतिहास और कला के लिए एक वरदान साबित हुआ। शाह की मदद से हुमायूँ को राजनीतिक ताकत तो मिली ही, साथ ही उसने तबरीज़ में शाह के स्टूडियो (studio) में बेहतरीन कलाकृतियाँ भी देखीं। वापसी में हुमायूँ अपने साथ कम से कम दो महान फ़ारसी कलाकारों को भारत ले आया, जिन्होंने मुग़ल चित्रकला स्टूडियो की नींव रखी। बाद में अनपढ़ होने के बावजूद बादशाह अकबर ने किताबों के प्रति अपने गहरे प्रेम के कारण अपने पिता की इस परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया। अकबर ने हमज़ानामा (Hamzanama) बनवाया, जिसमें चौदह सौ चित्र थे और जिसे पूरा होने में पंद्रह साल लगे थे। अकबर के समय में बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया गया और निज़ामी, फ़िरदौसी, हाफ़िज़ तथा सादी के ग्रंथों को चित्रित करवाया गया। इस प्रकार मुग़ल काल में फ़ारसी कला और साहित्य ने भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नया मुकाम हासिल किया। 

File:Mahlaj shows his skill to Zumurrud Shah and runs a spear through a tree (From the Hamzanama, Volume 11).jpg
हमज़ानामा 



मुग़ल लघु चित्रकला की उत्पत्ति कैसे हुई और सचित्र पांडुलिपियों से इसका क्या संबंध है?
मुग़ल लघु चित्रकला वास्तव में फ़ारसी और भारतीय कला शैलियों का एक अनूठा संगम है, जो सोलहवीं शताब्दी में अपने चरम पर पहुँची। जब हुमायूँ ईरान से लौटा, तो वह अपने साथ मीर सैयद अली और अब्द अल-समद जैसे महान फ़ारसी कलाकारों को लाया था। इन कलाकारों ने भारतीय कला में आलंकारिक शैली, जटिल विवरण और जीवंत रंगों को पिरोया। सम्राट अकबर के शासनकाल में इस कला को सबसे ज़्यादा संरक्षण मिला और मुग़ल चित्रकला की एक बिल्कुल नई शैली का जन्म हुआ। इन लघु चित्रों के ज़रिए न केवल दरबार की भव्यता को दर्शाया गया, बल्कि हिंदू महाकाव्यों जैसे रामायण और महाभारत को भी मुग़ल शैली में सचित्र किया गया।

इन चित्रों को बनाने की तकनीक बहुत ही बारीक और मेहनत भरी होती थी। मुग़ल चित्रकार मुख्य रूप से कागज़ पर चित्र बनाते थे, जो ताड़ के पत्तों पर चित्रकारी करने की पुरानी भारतीय परंपरा से एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव था। रंग भरने के लिए खनिजों, पौधों और यहां तक कि कीमती पत्थरों से निकले प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि चित्रकारी के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्रश गिलहरी या बिल्ली के बालों से बनाए जाते थे। इन चित्रों में पदानुक्रमित पैमाने का उपयोग किया जाता था, जिसका अर्थ है कि बादशाह या मुख्य व्यक्ति को हमेशा अन्य आकृतियों की तुलना में बड़ा दिखाया जाता था। चित्रों में गहरे लाल, नीले, हरे और सुनहरे रंगों का भरपूर इस्तेमाल होता था और छाया के ज़रिए एक गहरी जीवंतता पैदा की जाती थी। इस तरह लघु चित्रकला ने पांडुलिपियों को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि देखने और महसूस करने वाली कला का खजाना बना दिया।  

रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में संरक्षित सचित्र शाहनामा का क्या सांस्कृतिक महत्व है?
अठारहवीं सदी के अंत में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हो रहा था और दिल्ली में उथल-पुथल मची थी, तब रामपुर के पहले नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान (1774 से 1794) ने भागते हुए कलाकारों, कवियों और विद्वानों को अपने यहां पनाह दी। नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान एक उत्कृष्ट नज़रिए और गहरी बुद्धि वाले इंसान थे। उन्होंने सत्ता के साथ-साथ ज्ञान को सहेजने के महत्व को समझा और पुरानी पांडुलिपियों को इकट्ठा करना शुरू किया, जिससे महान रज़ा लाइब्रेरी की नींव पड़ी। बाद में नवाब कल्ब अली ख़ान और उनके बेटे नवाब हामिद अली ख़ान के दौर में यह लाइब्रेरी पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। इन नवाबों ने इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद जैसी जगहों पर अपने विशेष लोग भेजे और उन्हें खाली चेक देकर दुनिया की सबसे दुर्लभ पांडुलिपियों को रामपुर लाने का काम सौंपा। आज रामपुर के शानदार हामिद मंज़िल में स्थित इस लाइब्रेरी में सत्रह हज़ार से ज़्यादा पांडुलिपियां और अस्सी हज़ार से ज़्यादा मुद्रित किताबें मौजूद हैं।

File:Raza Library.jpg

इसी विशाल और अनमोल संग्रह में सफ़वी फ़ारसी शासक शाह तहमास्प के आदेश पर तैयार किए गए 'शाहनामा' का एक शानदार सचित्र पन्ना भी सुरक्षित रखा गया है। इसके हर पन्ने पर बनी जटिल मुग़ल और फ़ारसी चित्रकारी फ़ारसी नायकों की कहानियों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाती है। इसके अलावा यहाँ बारहवीं सदी की एक ऐसी कुरान भी मौजूद है जिसे केवल स्याही से नहीं, बल्कि सोने से लिखा गया है। यहाँ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर द्वारा अपने हाथों से लिखी गई 'दीवान-ए-हाफ़िज़' (Diwan-e-hafiz) की एक प्रति और ग्यारहवीं सदी के महान विद्वान अल-बरूनी की मूल पांडुलिपि भी सहेजी गई है। इस लाइब्रेरी में अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, तुर्की, पश्तो और उर्दू की बेशकीमती पांडुलिपियां हैं, साथ ही बाबर, हुमायूँ और अकबर के मूल शाही फ़रमान भी मौजूद हैं। 1951 में नवाब सैयद मुर्तज़ा अली ख़ान ने इस लाइब्रेरी को एक ट्रस्ट को सौंप दिया और अंततः 1975 में भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम के माध्यम से इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर दिया। आज यह रज़ा लाइब्रेरी केवल किताबों का संग्रह नहीं है, बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए एक तीर्थस्थल है, जो रामपुर शहर को वैश्विक इतिहास के नक्शे पर हमेशा के लिए अमर कर देता है।  

संदर्भ  
1. https://tinyurl.com/2ytjm3ub 
2. https://tinyurl.com/29ohewd6 
3. https://tinyurl.com/23nk87f7  
4. https://tinyurl.com/2cvrtw2e  

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