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गुजरात के सफ़ेद रण में बन रहा खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र साल 2030 तक 30 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा पैदा करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा प्रतिष्ठान बनने जा रहा है। लेकिन उसी समय महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक 3 गीगावाट का कोयला आधारित संयंत्र लगातार धुआं उगल रहा है, जो उन सैकड़ों संयंत्रों में से एक है जो आज भी भारत के 60 प्रतिशत से अधिक बिजली तंत्र को शक्ति प्रदान करते हैं। रामपुर और इसके आस-पास के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि जब भारत में सौर ऊर्जा की क़ीमत 30 डॉलर प्रति मेगावाट घंटे तक गिर गई है, जो कोयले की क़ीमत से लगभग आधी है, फिर भी सरकार के अनुमान के मुताबिक साल 2047 तक भारत में कोयले की मांग 1755 मीट्रिक टन (metric ton) तक क्यों पहुंच जाएगी। विकास और जलवायु लक्ष्यों के बीच फँसे भारत के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर हमारी अर्थव्यवस्था कोयले पर इतनी निर्भर क्यों है, इसके क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं, और साफ़ ऊर्जा की तरफ़ कैसे बढ़ा जा सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा में कोयले का क्या महत्व है?
भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कोयला एक आधारशिला है, जो हमारी प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों के आधे से अधिक हिस्से का योगदान देता है और उद्योगों की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। पिछले एक दशक में देश के कुल बिजली उत्पादन में थर्मल पावर की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके अलावा कोयला क्षेत्र का आर्थिक महत्व ऊर्जा उत्पादन से कहीं आगे तक फैला हुआ है। भारतीय रेलवे को माल ढुलाई से जो कमाई होती है, उसमें करीब 49% हिस्सा सिर्फ कोयले से आता है, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में 82,275 करोड़ रुपये रही थी। यह क्षेत्र केंद्र और राज्य सरकारों को रॉयल्टी (Royalty) और अन्य करों के माध्यम से सालाना 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व देता है। रोज़गार के मामले में भी यह क्षेत्र काफ़ी अहम है, विशेष रूप से पूर्वी राज्यों में, जहाँ कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) और उसकी सहायक कंपनियों में 2,39,210 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और इसके अलावा हज़ारों लोग ठेके और आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के ज़रिए जुड़े हुए हैं।
कोयले के इस्तेमाल के मुख्य फ़ायदे और नुक़सान क्या हैं?
कोयला दुनिया भर में ऊर्जा के सबसे प्रचुर स्रोतों में से एक है और यह तेल या प्राकृतिक गैस जैसे अन्य जीवाश्म ईंधनों की तुलना में सस्ता है। सौर या पवन ऊर्जा के विपरीत, जो पूरी तरह से मौसम पर निर्भर होते हैं, कोयला बिजली संयंत्र किसी भी मौसम में दिन-रात चल सकते हैं। कोयले का ऊर्जा घनत्व भी अधिक होता है, जिसका अर्थ है कि यह प्रति किलोग्राम बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा कर सकता है। इसके अलावा कोयले से सिंथेटिक ईंधन (synthetic fuel) और रोज़मर्रा के सामान में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी बनाए जा सकते हैं। लेकिन इन फ़ायदों के साथ इसके बड़े नुक़सान भी जुड़े हुए हैं। कोयला जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है। कोयले के प्रदूषण से अस्थमा और हृदय रोग का ख़तरा बढ़ता है, और खदानों में काम करने वाले मज़दूरों को ब्लैक लंग डिज़ीज़ (Black Lung Disease) जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। इसके खनन के लिए जंगलों और पहाड़ों को नष्ट किया जाता है और बिजली संयंत्रों को ठंडा करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इन संयंत्रों से निकलने वाली ज़हरीली राख ज़मीन और पानी दोनों को दूषित करती है।
सौर ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद भारत कोयले पर इतना निर्भर क्यों है?
भारत में सौर ऊर्जा अब कोयले से सस्ती हो चुकी है, फिर भी नए कोयला संयंत्र (coal plant) बनाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं रहती है। एक सौर संयंत्र एक वर्ष में अपने अधिकतम उत्पादन का केवल 15 से 25 प्रतिशत ही पैदा कर पाता है और पवन संयंत्र 25 से 35 प्रतिशत पैदा करता है। इसकी तुलना में कोयला संयंत्र दिन-रात सातों दिन चल सकते हैं और इनका क्षमता उपयोग कारक 70 से 90 प्रतिशत तक होता है। भारत में बिजली की मांग दिन में दो बार चरम पर होती है, एक बार दोपहर में और दूसरी बार सूर्यास्त के बाद। सौर ऊर्जा दिन की मांग को तो पूरा कर देती है, लेकिन जब लोग शाम को घर लौटते हैं और बिजली की मांग बढ़ती है, तब सूरज ढल चुका होता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए विशाल बैटरी स्टोरेज (Battery Storage) की ज़रूरत है, जो अभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। इसके अलावा एक बड़ी भौगोलिक चुनौती भी है क्योंकि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा मुख्य रूप से छह दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है, जबकि कोयले वाले राज्य मध्य और पूर्वी भारत में हैं। इन क्षेत्रों को जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा(Transmission infrastructure) अभी भी कमज़ोर है, जिस कारण कोयले पर निर्भरता कम करना आसान नहीं है। 
कोयले पर निर्भर इस व्यवस्था को साफ़ ऊर्जा में कैसे बदला जा सकता है?
भारत को कार्बन मुक्त बनाने के लिए कोयला संयंत्रों को साफ़ ऊर्जा की ओर ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक हालिया शोध में भारत के 806 कोयला संयंत्रों के डेटा का विश्लेषण किया गया है। इस शोध के अनुसार, यदि केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर भारी निवेश किया जाता है, तो बिजली सस्ती तो होगी लेकिन सामाजिक असमानता बढ़ेगी। अमीर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में हवा और सूरज की रोशनी होने के कारण सारा निवेश वहीं होगा, जबकि पूर्वी भारत के ग़रीब कोयला उत्पादक राज्य पीछे छूट जाएंगे। शोध में पाया गया है कि बिजली की लागत और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित करने का सबसे अच्छा तरीक़ा मौजूदा उच्च दक्षता वाले कोयला संयंत्रों में कार्बन कैप्चर एंड सिक्वेस्ट्रेशन (Carbon Capture and Sequestration) तकनीक लगाना है, जिसके तहत धुएं से कार्बन सोख लिया जाता है। इसके साथ ही कोयले के साथ बायोमास को मिलाकर जलाना भी एक बेहतर विकल्प है। अगर इन तकनीकों को अपनाया जाता है, तो बिजली की लागत में 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और कोयला संयंत्रों का बेहतर उपयोग भी हो सकेगा। हालांकि भारत इस नई कार्बन सोखने वाली तकनीक को लेकर अभी बहुत सतर्क है, लेकिन विदेशी सहयोग और बेहतर नीतियों से इस संकट को सुलझाकर देश एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा वाले भविष्य की ओर बढ़ सकता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2y25ybm9
https://tinyurl.com/2c28hvev
https://tinyurl.com/22e5fmj6
https://tinyurl.com/295pdwy2
https://tinyurl.com/24uqa5jl
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