क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई महापुरुष केवल करुणा के वशीभूत होकर अपने प्राणों की आहुति दे दे और एक भूखी बाघिन के सामने खुद को भोजन के रूप में पेश कर दे ताकि वह बाघिन अपने ही नवजात शावकों को न खा जाए । यह कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि बौद्ध धर्म की सबसे पुरानी और प्रसिद्ध जातक कथाओं में से एक 'द स्टार्विंग टाइग्रेस' का हिस्सा है । जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति से पहले के पूर्व जन्मों की 547 कहानियों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें उन्होंने इंसान से लेकर जानवरों तक का रूप धारण किया था । इन प्राचीन कथाओं में आज के दिल्ली यानी इन्द्रप्रस्थ का भी गहरा इतिहास छिपा है, जिसे बौद्ध साहित्यों में 'इन्दपत्त' के नाम से जाना जाता था। यह नगर अपनी शहरी भव्यता, न्यायपूर्ण शासन और नैतिकता के लिए इतना प्रसिद्ध था कि बोधिसत्व ने यहाँ कई बार जन्म लिया। आइए, इन कथाओं के ज़रिए समझते हैं कि प्राचीन भारत में इन्दपत्त की क्या अहमियत थी और क्यों ये जातक कथाएँ आज भी हमारे जीवन को सही दिशा दिखा सकती हैं।
जातक कथाएँ क्या हैं और इनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों का क्या रहस्य छिपा है?
जातक शब्द का अर्थ “जन्म” से है, और ये कथाएँ भगवान बुद्ध के उस अंतिम जन्म से पहले के जीवन की कहानियाँ हैं जब वे सिद्धार्थ गौतम थे । बौद्ध धर्म की सभी शाखाएँ इन कथाओं को प्रामाणिक मानती हैं । यह माना जाता है कि ज्ञान प्राप्ति से ठीक पहले बुद्ध ने अपने सभी पूर्व जन्मों को स्पष्ट रूप से देखा था । थेरवाद ग्रंथों में खुद्दक निकाय के सुत्त पिटक में ऐसी 547 कहानियों का एक बड़ा संग्रह पद्य रूप में मौजूद है । इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य कर्म के सिद्धांत को समझाना है । जातक कथाएँ यह दर्शाती हैं कि इंसान के अच्छे या बुरे कर्म ही उसके भविष्य के अनुभवों और आध्यात्मिक प्रगति को तय करते हैं । हर कहानी में यह साबित किया गया है कि वर्तमान जीवन में मिलने वाले दुख या सुख के तार हमारे पिछले जन्मों की घटनाओं से जुड़े होते हैं । चीन के डुनहुआंग में मोगाओ गुफाओं में 'सूत्र ऑफ़ द वाइज़ एंड द फ़ूलिश' नामक एक लोकप्रिय ग्रंथ मिला है जो जातक कथाओं का ही चीनी अनुवाद है । माना जाता है कि मध्य एशिया के खोतानी भिक्षुओं के प्रवचनों को सुनकर चीनी भिक्षुओं ने इसे लिखा था, जिसे बाद में तिब्बती और मंगोलियाई भाषा में 'ओशन ऑफ़ नैरेटिव्स' के नाम से अनुवादित किया गया।

बौद्ध साहित्य में इन्द्रप्रस्थ को इन्दपत्त के रूप में कैसे दर्शाया गया है?
प्राचीन भारत, जिसे बौद्ध ब्रह्मांड विज्ञान में जम्बुदीप कहा जाता था, के तीन प्रमुख शहरों में से एक इन्दपत्त यानी इन्द्रप्रस्थ था। यह शहर सात योजन तक फैला हुआ था और यह तीन सौ योजन में फैले विशाल कुरु साम्राज्य की राजधानी था। बुद्ध के समय में कुरु 16 महाजनपदों में से एक था जो मज्झिमदेस में स्थित था। इन्दपत्त एक पहाड़ पर बना एक बेहद ऊँचा और सुरक्षित किला था। यह नगर बहुत ही समृद्ध और उपजाऊ था, जहाँ सोना, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना भारी मात्रा में मौजूद थे। यहाँ से एक सीधी सड़क वाराणसी तक जाती थी। यहाँ के राजा युधिट्ठिल गोत के धनंजय कोरव्य थे। कुरु साम्राज्य अपनी शहरी जीवनशैली, न्यायपूर्ण शासन प्रणाली और उच्च नैतिकता के लिए इतना जाना जाता था कि यही वजह थी कि बोधिसत्व ने यहाँ कई जन्म लिए। यहाँ तक कि स्वयं भगवान बुद्ध ने अपने कई सबसे गहरे और महत्वपूर्ण उपदेश कुरु साम्राज्य के निगम यानी व्यापारिक मार्गों के मुख्य बाज़ार में दिए थे।
विधुर पण्डित जातक में इन्दपत्त नगर और राजा धनंजय का क्या उल्लेख मिलता है?
जातक संख्या 545 जिसे विधुर पण्डित जातक के नाम से जाना जाता है, उसमें कुरु साम्राज्य, इन्दपत्त नगर और वहाँ के राजा व उनके योग्य मंत्री का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में लिखा गया है:
कुरु-रट्ठे इन्दपत्त-नगरे धनञ्जयो नामा राजा रज्जं कारेसि ।
इस पंक्ति का अर्थ यह है कि कुरु साम्राज्य में, इन्दपत्त शहर में, धनंजय नाम के एक राजा शासन करते थे।
इसी ग्रंथ में आगे इन्दपत्त नगर की सुंदरता और एक कुशल मंत्री के बारे में बताया गया है:
इन्दपत्ते पुरे रम्मे, कुरु-राजस्स राजिनो
विधुरू'ति अयं अमच्चो, सब्ब-किच्चेसु कोविदो ।
इसका अर्थ है कि कुरु राजा के इस रमणीय और आनंददायक शहर इन्दपत्त में, विधुर नाम का यह मंत्री रहता है, जो सभी तरह के मामलों और कार्यों में पूरी तरह से कुशल और निपुण है।

कुरुधम्म जातक में बारिश लाने वाले हाथी और सदाचार की क्या अद्भुत कहानी है?
जातक संख्या 276 जिसे कुरुधम्म जातक कहा जाता है, में बोधिसत्व का जन्म इन्दपत्त में कुरु राजा धनंजय के पुत्र के रूप में होता है। उस समय राज्य में हर व्यक्ति पाँच नैतिक सिद्धांतों का इतनी पूर्णता के साथ पालन करता था कि वह भूमि हमेशा समृद्ध रहती थी। इस कथा में अञ्जनवसभ नाम के एक राजकीय हाथी का ज़िक्र है जिसके बारे में माना जाता था कि उसमें बारिश लाने की जादुई शक्ति है। एक बार कलिंग साम्राज्य में भयंकर सूखा पड़ा, तो वहाँ के राजा ने इन्दपत्त में अपने दूत भेजे ताकि वे अञ्जनवसभ हाथी को उधार माँग सकें, इस उम्मीद में कि वह उनके राज्य में बारिश लाएगा। जब हाथी के जाने के बाद भी कलिंग में बारिश नहीं हुई, तो कलिंग के राजा को यह अहसास हुआ कि प्राकृतिक तत्वों को अनुकूल बनाने की शक्ति किसी हाथी में नहीं, बल्कि कुरुधम्म यानी उन नैतिक आचरणों के पालन में है जो इन्दपत्त के लोग करते थे।
इस कथा में एक बेहद महत्वपूर्ण श्लोक आता है:
पुनापरं यदा होमि, इन्दपत्ते पुरे उत्तमे;
राजा धनञ्जयो नाम, कुसले दसेहि उपागतो ।
इसका अर्थ है कि और फिर, जब मैं इन्दपत्त के शानदार शहर में धनंजय नाम का राजा था, तो मैं दस कुशल और शुभ कर्मों के मार्ग से संपन्न था।

जातक कथाओं में करुणा और आत्म-बलिदान के कौन से बेमिसाल उदाहरण मिलते हैं?
जातक कथाओं में बोधिसत्व को इंसान और जानवर दोनों रूपों में करुणा और दया का सागर दिखाया गया है । डुनहुआंग की गुफाओं की दीवारों पर सिबि राजा की कथा चित्रित है, जिसमें एक बाज़ एक कबूतर का शिकार करना चाहता है । जब कबूतर राजा की शरण में आता है, तो बाज़ राजा से कबूतर के वज़न के बराबर उनका माँस माँगता है । राजा खुशी-खुशी अपने शरीर का माँस काटकर दे देते हैं ।
इसी तरह 'नौ रंगों वाले हिरण' की कथा है । एक दुर्लभ हिरण ने एक डूबते हुए गरीब आदमी की जान बचाई । लेकिन उस आदमी ने इनाम के लालच में राजा के शिकारियों को हिरण का पता बता दिया । जब हिरण ने इंसानी आवाज़ में राजा को उस आदमी के विश्वासघात की कहानी बताई, तो राजा ने उस आदमी को फटकार लगाई और हिरण को हमेशा के लिए आज़ाद कर दिया ।
एक अन्य कथा में बोधिसत्व एक बंदरों के राजा थे । जब उनके दल पर ख़तरा आया, तो उन्होंने एक बाँस की छड़ी को अपने पैरों से बाँधकर एक पेड़ से दूसरे पहाड़ तक अपने शरीर का पुल बना लिया, ताकि सभी बंदर उनके शरीर के ऊपर से गुज़र कर सुरक्षित स्थान पर पहुँच सकें । इस प्रयास में उनका शरीर सुन्न हो गया, लेकिन अपनी प्रजा की जान बचाना ही उनका इकलौता लक्ष्य था । 'सुपारग' नामक एक कुशल समुद्री कप्तान की कथा में बोधिसत्व एक भयंकर तूफ़ान में फँसे व्यापारियों की नाव को केवल अपने सत्य और सदाचार की शक्ति से बचा लेते हैं और देवताओं से प्रार्थना करके उन्हें सुरक्षित किनारे लगा देते हैं।

आज के समय में बच्चों और बड़ों दोनों के लिए ये कथाएँ क्यों प्रासंगिक हैं?
जातक कथाएँ महज़ प्राचीन साहित्य नहीं हैं; इनमें चार आर्य सत्य, बोधिसत्व की प्रतिज्ञाएँ, अष्टांगिक मार्ग और छह पारमिताओं का पूरा सार छिपा है । इन कहानियों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये बुद्ध को एक साधारण इंसान और प्राणी के स्तर पर लाकर खड़ा करती हैं । कहानियों की शुरुआत में अक्सर कहा जाता है, "जब मैं केवल एक अज्ञानी बोधिसत्व था" । यह बात हम जैसे साधारण इंसानों को यह उम्मीद देती है कि कोई भी व्यक्ति ज्ञान और मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।
इन कथाओं में बोधिसत्व ने राजा, किसान, निचले और उच्च वर्ग के व्यक्ति, महिला, व्यापारी और जानवरों का जीवन जिया है, जो हमें सिखाता है कि हमें बिना किसी भेदभाव के सभी जीवों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि हर प्राणी में बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता होती है । एक खजांची की कथा में दिखाया गया है कि कैसे एक सास के कम सुनने की वजह से फैली ग़लतफ़हमी के कारण लोग उसे इतना गुणी मान लेते हैं कि वह लोगों के इस सम्मान को बनाए रखने के लिए सच में अपना घर छोड़कर संन्यासी बन जाता है । ये कथाएँ हमें सिखाती हैं कि हमारा हर छोटा-बड़ा कर्म हमारे भविष्य को आकार देता है । करुणा, दया और निस्वार्थ सेवा जैसे गुण केवल धर्म की बातें नहीं हैं, बल्कि एक सफल और शांत जीवन जीने के सबसे मज़बूत आधार हैं ।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2bdbf2eh
2. https://tinyurl.com/24vnz33y
3. https://tinyurl.com/286yx2p9
A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.
B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.
C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.
D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.
E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.