तेजस से राफेल तक: भारत क्यों अब भी विदेशी जेट इंजनों पर निर्भर है?

हथियार और खिलौने
09-07-2026 09:50 AM
तेजस से राफेल तक: भारत क्यों अब भी विदेशी जेट इंजनों पर निर्भर है?

लड़ाकू विमान (Fighter Aircraft) मुख्य रूप से हवा में होने वाले युद्ध के लिए डिज़ाइन किए गए सैन्य विमान होते हैं। युद्ध के दौरान इनका मुख्य काम युद्धक्षेत्र के ऊपर 'हवाई सर्वोच्चता' (Air Superiority) स्थापित करना होता है। यदि आसमान पर एक पक्ष का दबदबा हो, तो उसके बमवर्षक विमान और ज़मीनी हमले करने वाले विमान सुरक्षित रूप से दुश्मन के ठिकानों को निशाना बना सकते हैं।

हवाई युद्ध की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान हुई। शुरुआत में विमानों में कोई हथियार नहीं थे और वे केवल दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए इस्तेमाल होते थे। लेकिन जल्द ही यह महसूस किया गया कि दुश्मन के इन जासूसी विमानों को गिराना ज़रूरी है। पायलटों ने शुरू में पिस्तौल और राइफलों का इस्तेमाल किया, जो काफी कठिन और अप्रभावी था।

असली बदलाव तब आया जब 'सिंक्रोनाइज़ेशन गियर' (Synchronization Gear) का आविष्कार हुआ। इससे मशीन गन को विमान के प्रोपेलर के साथ इस तरह जोड़ा गया कि गोलियाँ घूमते हुए पंखों के बीच से निकल सकें। इस तकनीक ने विमान को एक घातक हथियार में बदल दिया।

शुरुआती लकड़ी के ढांचों से आधुनिक सुपरसोनिक जेट्स तक का सफ़र कैसा रहा?
प्रथम विश्व युद्ध के समय के विमान लकड़ी और कपड़ों से बने होते थे और उनकी अधिकतम रफ़्तार लगभग 100 मील प्रति घंटा (160 किमी/घंटा) थी। 1930 के दशक तक आते-आते लकड़ी की जगह धातु (एल्युमीनियम) ने ले ली और विमानों की बनावट में क्रांतिकारी सुधार हुए।

File:Raptor F-22 27th.jpg
F-22 रैप्टर

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 'मेसरश्मिट Bf 109' और 'सुपरमरीन स्पिटफायर' जैसे विमानों ने 400 मील प्रति घंटा तक की रफ़्तार पकड़ ली थी। लेकिन प्रोपेलर वाले विमानों की एक सीमा थी; वे ध्वनि की रफ़्तार के करीब पहुँचने पर अपनी प्रभावशीलता खोने लगते थे। यहीं से जेट इंजन की कहानी शुरू होती है। 1944 में जर्मनी का 'मेसरश्मिट Me 262' दुनिया का पहला सक्रिय जेट लड़ाकू विमान बना, जिसने युद्ध की दिशा ही बदल दी।

आज के आधुनिक लड़ाकू विमान (जैसे F-22 रैप्टर या तेजस) सुपरसोनिक यानी ध्वनि से भी तेज़ उड़ सकते हैं। इनकी बनावट में अब 'स्टील्थ' (Stealth) तकनीक का इस्तेमाल होता है, जिससे ये दुश्मन के रडार की पकड़ में नहीं आते।

जेट इंजन का आविष्कार किसने किया और इसने विमानन क्षेत्र को कैसे बदला?
जेट इंजन के आविष्कार का श्रेय ब्रिटेन के सर फ्रैंक व्हिटल और जर्मनी के हंस पाब्स्ट वॉन ओहेन को जाता है। फ्रैंक व्हिटल ने 1928 में ही जेट प्रोपल्शन (Jet Propulsion) का विचार पेश कर दिया था, लेकिन ब्रिटिश एयर मिनिस्ट्री ने इसे अव्यावहारिक मानकर ठुकरा दिया था। उन्होंने 1930 में अपना पहला पेटेंट लिया।

दूसरी ओर, जर्मनी में हान्स वॉन ओहेन ने स्वतंत्र रूप से एक सक्रिय जेट इंजन डिज़ाइन किया, जिसने 27 अगस्त 1939 को दुनिया की पहली जेट उड़ान को संभव बनाया। द्वितीय विश्व युद्ध के दबाव ने ब्रिटिश सरकार को व्हिटल के काम को गंभीरता से लेने पर मजबूर किया और 1941 में 'ग्लोस्टर E.28/39' ने उड़ान भरी। जेट इंजन ने पिस्टन इंजन के मुकाबले कम वज़न में कहीं ज़्यादा ताकत और रफ़्तार प्रदान की।

भारत का स्वदेशी 'तेजस' कितना सफल है?
भारत ने 1980 के दशक में अपने पुराने मिग-21 बेड़े को बदलने के लिए 'लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (LCA) कार्यक्रम शुरू किया। 'तेजस' (जिसका अर्थ है आभा या चमक) भारत द्वारा विकसित दूसरा जेट संचालित लड़ाकू विमान है। इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) ने मिलकर बनाया है।

तेजस की कुछ प्रमुख विशेषताएँ:

  • यह अपनी श्रेणी के विमानों में दुनिया का सबसे छोटा और हल्का सुपरसोनिक विमान है।
  • इसमें 'फ्लाई-बाय-वायर' (Fly-by-wire) कंट्रोल सिस्टम और 'ग्लास कॉकपिट' जैसी आधुनिक तकनीकें हैं।
  • इसके एयरफ्रेम का 45% हिस्सा वज़न के हिसाब से कार्बन कंपोजिट सामग्री से बना है, जो इसे मज़बूत और हल्का बनाता है।
तेजस 

भारत आज भी इंजन और इजेक्शन सीट जैसे पुर्ज़ों के लिए विदेशों पर निर्भर क्यों है?
'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में बड़े कदमों के बावजूद, तेजस जैसे आधुनिक विमानों के कुछ सबसे महत्वपूर्ण हिस्से अभी भी आयात किए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कुछ तकनीकी और औद्योगिक कारण हैं:
1. जेट इंजन की जटिलता: जेट इंजन बनाना इंजीनियरिंग का सबसे कठिन काम माना जाता है। इसमें उच्च तापमान (1,500°C से अधिक) को सहन करने वाले सुपर एलॉय और सिंगल-क्रिस्टल टर्बाइन ब्लेड की ज़रूरत होती है। भारत ने 'कावेरी इंजन' प्रोजेक्ट शुरू किया था, लेकिन यह पर्याप्त थ्रस्ट (शक्ति) पैदा करने और वज़न कम रखने में असफल रहा। फिलहाल तेजस में अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस (GE Aerospace) का F404/F414 इंजन इस्तेमाल होता है।
2. सुरक्षा उपकरण: विमान से पायलट को सुरक्षित बाहर निकालने वाली 'इजेक्शन सीट' तकनीक में ब्रिटेन की 'मार्टिन-बेकर' (Martin-Baker) कंपनी का वैश्विक दबदबा है। उनकी सीटों ने अब तक 7,800 से अधिक लोगों की जान बचाई है। तेजस में भी मार्टिन-बेकर सीटों का ही उपयोग होता है।

File:SYAM Martin-Baker Mk 9 Jaguar.jpg


3. सेंसर और रडार: हालाँकि भारत ने अब 'उत्तम' (Uttam) AESA रडार विकसित कर लिया है, लेकिन पिछले मॉडलों में इज़राइली रडार (Elta) का इस्तेमाल किया गया था।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इंजन और सूक्ष्म पुर्ज़ों के निर्माण के लिए एक मज़बूत औद्योगिक इकोसिस्टम की आवश्यकता होती है, जिसे विकसित करने में दशकों का समय लगता है। जीई (GE), रोल्स-रॉयस और सफरान (Safran) जैसी कंपनियों के पास दशकों का अनुभव और गुप्त पेटेंट तकनीकें हैं, जिन्हें वे आसानी से साझा नहीं करते।

भविष्य की राह क्या है?
भारत अब 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (AMCA) जैसे पाँचवीं पीढ़ी के विमानों पर काम कर रहा है। इसके साथ ही, विदेशी कंपनियों (जैसे सफरान) के साथ मिलकर इंजन के सह-विकास की बातचीत चल रही है। रामपुर के जागरूक नागरिकों और युवाओं के लिए यह गर्व की बात है कि भारतीय वायुसेना अब स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता दे रही है, भले ही पूर्ण आत्मनिर्भरता की राह में अभी कुछ और वर्षों की मेहनत शेष है।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/6pte5n6

2. https://tinyurl.com/ycbuqvys

3. https://tinyurl.com/y7tsnyxj

4. https://tinyurl.com/yr3tnn4e

5. https://tinyurl.com/2yfoz4lw

6. https://tinyurl.com/295hzq8x

7. https://tinyurl.com/26dlde97

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