रामपुर, आज हम समझेंगे कि प्राचीन समाजों में ज्ञान, सबसे पहले मौखिक परंपराओं के माध्यम से कैसे प्रसारित किया जाता था। फिर हम पता लगाएंगे कि, इसे लेखन और पांडुलिपियों के माध्यम से कैसे दर्ज किया जाने लगा। आगे, हम देखेंगे कि कैसे पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों ने, ज्ञान को संरक्षित करने और फैलाने में मदद की। हम यह भी पढ़ेंगे कि, प्रिंटिंग प्रेस ने ज्ञान के प्रसार में कैसे क्रांति लाई। जबकि लेख के अंत में, हम जानेंगे कि इंटरनेट और एआई जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकियां, आज ज्ञान साझा करने के तरीके को कैसे बदल रही हैं।
मौखिक परंपरा, मानव संचार का पहला और आज भी सबसे व्यापक तरीका है। मौखिक परंपरा, सिर्फ बात करने के तरीके को ही नहीं, बल्कि ज्ञान, कला और विचारों को विकसित करने, संग्रहीत करने तथा प्रसारित करने हेतु, एक गतिशील व विविध मौखिक-श्रव्य माध्यम को भी संदर्भित करती है। इसकी तुलना आमतौर पर साक्षरता से की जाती है।
लेखन के आविष्कार से पहले सहस्राब्दियों तक, मौखिक परंपरा, समाज और उनके संस्थानों को बनाने और उन्हें बनाए रखने के लिए संचार के एकमात्र साधन के रूप में कार्य करती थी। इसके अलावा, पूरे विश्व में हुए कई अध्ययनों से पता चला है कि, साक्षरता की बढ़ती दर के बावजूद, मौखिक परंपरा, इक्कीसवीं सदी में संचार का प्रमुख माध्यम बनी हुई है।
कुछ तत्कालीन प्राचीन कवियों ने अभिव्यक्ति के व्यवस्थित रूप, सूत्रबद्ध वाक्यांशों, विशिष्ट दृश्यों और कहानी पैटर्न की एक विशेष मौखिक भाषा का इस्तेमाल किया था। यह उनकी स्मरणीय और कलात्मक गतिविधियों को सक्षम बनाती है। कई शुरुआती एवं प्राचीन कविताएं, तब लंबे समय से चली आ रही मौखिक परंपरा से ही निकली थी। मौखिक परंपरा में जड़ें रखने वाले अन्य परिचित कार्यों में, ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल (Bible), गिलगमेश के महाकाव्य (Epic of Gilgamesh) और मध्ययुगीन अंग्रेजी कथा बियोवुल्फ़ (Beowulf), आदि शामिल हैं। इन कार्यों के कुछ घटक यह भी बताते हैं कि, कैसे लचीली मौखिक-पारंपरिक प्रणालियां कई पीढ़ियों में अलग-अलग लेकिन संबंधित विचारों का उत्पादन कर सकती हैं।

तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक, लेखन का उपयोग विशेष रूप से लेखांकन के लिए किया जाता था। फिर धीरे-धीरे विभिन्न प्रतीकों से ध्वन्यात्मक शब्दांश संकेतों का आविष्कार हुआ, जिससे लिपि और वर्णमालाओं का जन्म हुआ। सूचना एकत्र करने, उसमें हेरफेर करने, उसका भंडारण व संचार करने, तथा उसे पुनर्प्राप्त और प्रसारित करने के लिए, लेखन मानव जाति की प्रमुख तकनीक है। माना जाता है कि, लेखन का आविष्कार, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्र रूप से, तीन बार हुआ होगा। ये स्थल निकट पूर्व, चीन और मेसोअमेरिका (Mesoamerica) में होंगे। विभिन्न शिलालेख, उत्कीर्णित ग्रंथ एवं प्रतीक, लेखन के विकास का सुझाव देते हैं। माना जाता है कि, यह काल 600 से 1200 ईसा पूर्व का रहा होगा।
इन तीन लेखन प्रणालियों में से सबसे प्रारंभिक - मेसोपोटामिया (Mesopotamia) की क्यूनिफॉर्म लिपि (Cuneiform script) है, जिसका आविष्कार वर्तमान इराक में हुआ था। केवल इसी लिपि के विकास को 3200 ईसा पूर्व प्रागैतिहासिक पूर्वकाल से लेकर आज की वर्णमाला तक, 10,000 वर्षों की अवधि में बिना किसी विच्छेद के देखा जा सकता है। इसके विकास को चार चरणों में विभाजित किया गया है:
1. विक्रय के माल की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले मिट्टी के टोकन (Token) का लेखांकन के रूप में उपयोग;
2. त्रि-आयामी टोकन का दो-आयामी चित्रात्मक संकेतों में बदलाव;
3. व्यक्तियों के नाम लिखने के लिए पेश किए गए ध्वन्यात्मक संकेत; और
4. फिर कुछ दो दर्जन अक्षरों के साथ, प्रत्येक आवाज की एक ही ध्वनि के लिए बनी वर्णमाला ने, भाषण की प्रस्तुति को परिपूर्ण किया।
इन घटनाओं के विकास के साथ ही, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और संग्रहालयों ने लंबे समय से मानव संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राचीन काल में, पुस्तकालय वे स्थान थे, जहां ज्ञान को एकत्र और संरक्षित किया जाता था। जबकि आज, ज्ञान संस्थान, पुस्तकालय और संग्रहालय इसके महत्वपूर्ण केंद्र बन रहे हैं। लेकिन, डिजिटल युग के विकास के साथ सूचना भंडारण में लगातार बदलाव भी आ रहा है।
ज्ञान के भंडार के रूप में पुस्तकालयों की शुरुआत, एक सहस्राब्दी पहले विद्वानों, दार्शनिकों और अभिलेखीय दस्तावेजों से लिखित जानकारी के भंडारण के साथ हुई थी। प्रारंभिक पुस्तकालय केवल पुस्तकों, स्क्रॉल (Scroll) और अन्य दस्तावेजों का संग्रह थे। इन्हें अद्वितीय इमारतों में रखा गया था। पहला प्रलेखित पुस्तकालय, सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित किया गया था। इसे प्राचीन मध्य पूर्व में, वर्तमान इराक में स्थापित किया गया था। इस संग्रह में, कुछ विषयों के आधार पर वर्गीकृत लगभग 30,000 क्यूनिफॉर्म पट्टियां शामिल थीं। अधिकांश कार्य, विद्वतापूर्ण ग्रंथ और साहित्य के कार्य थे, जिनमें गिलगमेश का प्राचीन महाकाव्य भी शामिल था।

इस बिंदु से आगे बढ़ते हुए, लगभग सभी महान सभ्यताओं ने साझा ज्ञान और ज्ञान के भंडारण का मूल्य सीखा, और उसे संग्रहीत करने के लिए पुस्तकालयों का निर्माण किया। ‘पुनर्जागरण काल’ के दौरान पुस्तकों की संख्या में नाटकीय वृद्धि हुई, और यूरोपीय देशों में पुस्तकालय स्थापित किए गए। यूरोप में सबसे पहले ज्ञात सार्वजनिक पुस्तकालय वेनिस (Venice) और मैड्रिड (Madrid) में थे।
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, बढ़ती संख्या वाली पुस्तकों को रखने के लिए कई पुस्तकालय बनाए गए। ज्ञान के ये संस्थान, भावी पीढ़ियों के लिए शिक्षण और नया ज्ञान साझा करने के बारे में हैं।
इसके पश्चात, पांच शताब्दियों से भी पहले, जोहान्स गुटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) के प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने समाज के सीखने, सोचने और विचारों को साझा करने के तरीके को बदल दिया। ज्ञान पर अब एक छोटे से अभिजात वर्ग का नियंत्रण नहीं रहा। प्रिंटिंग के आविष्कार से किताबें सस्ती हो गईं; मठों और शाही दरबारों से जानकारी आगे बढ़ गई; और साक्षरता का विस्तार हुआ। इससे शिक्षा का प्रसार हुआ, और आम लोगों को जीवन बदलने में सक्षम विचारों तक पहुंच प्राप्त हुई। प्रिंटिंग प्रेस ने सामाजिक प्रगति, वैज्ञानिक जांच और लोकतांत्रिक सोच की नींव रखने में भी मदद की। हालांकि, उन्हीं प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग प्रचार, झूठे सिद्धांत, भड़काऊ पर्चे और नफरत फैलाने के लिए भी किया जाता था।
जबकि वर्तमान समय में, डिजिटल प्रौद्योगिकियों की तीव्र प्रगति ने व्यक्तियों, कंपनियों और समाजों को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है। डिजिटल युग में, इस तरह की प्रगति ने मोबाइल डिवाइस, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud computing) जैसी सस्ती, तेज़ और अधिक सुलभ डिजिटल तकनीकों को जन्म दिया है। डिजिटल प्रौद्योगिकियां आज हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं, जो नवीनतम ज्ञान के कई अवसर प्रदान करती हैं। जबकि डिजिटल प्रौद्योगिकियां हमें अधिक जानकारी तक पहुंचने में सक्षम बनाती हैं, वे गलत सूचना फैलने की मात्रा और गति को भी बढ़ाती हैं। इसलिए, इन प्रौद्योगिकियों के प्रभाव को समझना तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के उपयोग में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे हमारी वैचारिक दुनिया मौलिक रूप से बदल गई है। इन प्लेटफार्मों पर हमारी निर्भरता ने, उन्हें हमारे दैनिक जीवन में जानकारी का अनिवार्य स्रोत बना दिया है। इन ऑनलाइन प्लेटफार्मों के साथ, लोगों के पास अब जानकारी प्राप्त करने, गलत सूचना के हस्तांतरण या प्रसार को तेज करने के लिए कई विकल्प हैं।
आज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) या एआई, इंटरनेट की जगह ले रहा है। एआई, पिछली सूचना प्रौद्योगिकियों से मौलिक विचलन का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि यह जानकारी को संग्रहीत और पुनर्प्राप्त ही नहीं, बल्कि इसे संसाधित और परिवर्तित भी करता है।

पुस्तकों या डेटाबेस जैसे पारंपरिक ज्ञान भंडार में निश्चित जानकारी होती है। जबकि एआई सिस्टम, सक्रिय रूप से जानकारी के साथ जुड़ते हैं, तथा वास्तविक समय में नई अंतर्दृष्टि और समाधान उत्पन्न करते हैं। पिछली प्रौद्योगिकियों ने हमें यह बताया है कि, क्या सोचना है; जबकि एआई हमें बताता है कि, इसके बारे में कैसे सोचना है। पारंपरिक ज्ञान के साथ, मनुष्य को अर्थ और प्रासंगिकता की व्याख्या करनी होती है। लेकिन, एआई सिस्टम संदर्भ को समझ सकते हैं, पैटर्न को पहचान सकते हैं, और किसी स्थिति में क्या मायने रखता है, इसके बारे में निर्णय ले सकते हैं। दूसरी ओर, पुस्तकें और शैक्षिक पाठ्यक्रम सामान्य दर्शकों के ज्ञान प्राप्ति के लिएं डिज़ाइन किए गए हैं। जबकि, एआई अपनी बुद्धिमत्ता को विशिष्ट समस्याओं, संदर्भों और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप बना सकता है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/34krk5wy
2. https://tinyurl.com/y6btef34
3. https://tinyurl.com/5yt82u69
4. https://tinyurl.com/548xcbwm
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