सहारनपुर में मिली वह रहस्यमयी बेल जिसके फूल मधुमक्खी के बैठते ही करते हैं विस्फोट

व्यवहार के अनुसार वर्गीकरण
31-07-2026 06:03 PM
सहारनपुर में मिली वह रहस्यमयी बेल जिसके फूल मधुमक्खी के बैठते ही करते हैं विस्फोट

क्या आप जानते हैं कि आपके शहर के ऐतिहासिक कंपनी बाग में एक ऐसी रहस्यमयी वनस्पति पाई जाती है, जिसके फूल किसी स्प्रिंग की तरह 'विस्फोट' करके अपने परागकण बिखेरते हैं? फैबेसी (Fabaceae) परिवार से संबंध रखने वाली यह एक बेहद दुर्लभ प्रजाति है। विज्ञान की दुनिया में इसे डेरिस स्कैंडेंस वैरायटी सहारनपुरेंसिस (Derris scandens var. saharanpurensis) के नाम से जाना जाता है। पूरी दुनिया में यह वनस्पति केवल सहारनपुर के वन प्रभाग और कंपनी बाग के कुछ हिस्सों में ही पाई जाती है। इस प्रजाति के ऐतिहासिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका पहला नमूना 1895 में इसी कंपनी बाग से इकट्ठा किया गया था। यह मूल प्रजाति से अपने फल और डंठल की बनावट में काफी अलग है। स्थानीय स्तर पर इस वनस्पति का पारंपरिक उपयोग भी रहा है, जिसमें गठिया के इलाज और मछलियों को पकड़ने के लिए इसके अर्क का इस्तेमाल शामिल है। लेकिन आज यह अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है।

क्या है इस दुर्लभ वनस्पति के फूलों का 'विस्फोटक' रहस्य?
इस वनस्पति की सबसे बड़ी खासियत इसके फूलों की अनूठी संरचना और परागण की प्रक्रिया है। इसके फूल मटर के आकार के होते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में पैपिलियोनेसियस (Papilionaceus) कहा जाता है। इन फूलों की बनावट एक तितली जैसी होती है, जिनमें एक बड़ा ऊपरी हिस्सा, दो किनारे वाले हिस्से और नीचे की तरफ नाव के आकार का एक हिस्सा होता है।
जब कोई मधुमक्खी रस चूसने के लिए इन फूलों पर बैठती है, तो इसके अंदर एक स्प्रिंग जैसा तंत्र सक्रिय हो जाता है। फूल एक झटके के साथ 'विस्फोट' करते हुए खुलता है और अपने परागकण मधुमक्खी के शरीर पर बिखेर देता है। यह विस्फोटक तकनीक दुनिया के कुछ अन्य पौधों जैसे ल्यूपिन (Lupine) और अल्फाल्फा (Alfalfa) में भी देखी जाती है। यह पूरी प्रक्रिया प्रकृति की उस अद्भुत इंजीनियरिंग का नमूना है, जो करोड़ों सालों के विकास का परिणाम है।

सदियों पुराने इस वानस्पतिक उद्यान का निर्माण कैसे हुआ था?
सहारनपुर का कंपनी बाग केवल एक बगीचा नहीं है, बल्कि यह भारत के इतिहास का एक जीता-जागता पन्ना है। इस बाग की नींव 17वीं सदी में मुगल काल के दौरान रखी गई थी। बाद में 1750 में इंतज़ाम-उद-दौला ने इसका जीर्णोद्धार कराया और इसे 'फरहतबख्श' नाम दिया, जिसका अर्थ है आनंद देने वाला।
मुगलों के पतन के बाद यह उद्यान मराठों के अधीन आ गया और अंततः 1817 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस पर अपना अधिकार जमा लिया। इसके बाद यह उद्यान वैज्ञानिक शोध का एक प्रमुख केंद्र बन गया। ब्रिटिश काल में रॉयले (Royle) और डथी (Duthie) जैसे प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानियों ने यहां अधीक्षक के रूप में काम किया। आज उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बाग में मौजूद 100 साल से अधिक पुराने 10 पेड़ों को 'हेरिटेज ट्री' घोषित किया है। यहां एक प्राचीन साइकस (Cycas) का पेड़ भी मौजूद है। इसके अलावा, यहां आम का एक ऐसा अद्भुत पेड़ भी है जिस पर ग्राफ्टिंग तकनीक के जरिए आम की 121 अलग-अलग किस्में उगाई गई हैं।

सहारनपुर के जंगलों में क्यों खत्म हो रही हैं ये दुर्लभ प्रजातियां?
स्थानीय स्तर पर किए गए शोध बताते हैं कि सहारनपुर जिले में जड़ी-बूटी वाली 66 और लकड़ी वाली 33 बेलों की प्रजातियां मौजूद हैं। इनमें से 14 प्रजातियां ऐसी हैं, जिन पर विलुप्त होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। डेरिस स्कैंडेंस वैरायटी सहारनपुरेंसिस की स्थिति इनमें सबसे ज्यादा खराब है।

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ के मानकों के अनुसार, इसे गंभीर रूप से खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में रखा जा सकता है। जंगलों की कटाई, बढ़ते शहरीकरण और प्राकृतिक आवास के नष्ट होने के कारण यह ऐतिहासिक बेल अब केवल कुछ गिने-चुने इलाकों तक ही सीमित रह गई है।

इस अमूल्य वानस्पतिक धरोहर को बचाने के लिए क्या कदम जरूरी हैं?
अगर समय रहते इस प्रजाति को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो 1895 से सहारनपुर की पहचान बनी यह बेल हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी। इसके लिए कंपनी बाग में विशेष संरक्षण कक्ष बनाने, इसके बीजों को सहेजने और आम जनता के बीच इस वानस्पतिक धरोहर के प्रति जागरूकता फैलाने की तत्काल आवश्यकता है। हमारी आने वाली पीढ़ियों को यह जानने का हक है कि उनके शहर की मिट्टी में कभी दुनिया का सबसे अनोखा फूल खिलता था।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/28nrq76a 

2. https://tinyurl.com/29szo2qw 

3. https://tinyurl.com/297wm86n 

4. https://tinyurl.com/23x73tyw 

5. https://tinyurl.com/23x8elch 

6. https://tinyurl.com/2bob7bwb 

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.