सहारनपुर में मानसून से पहले क्यों बदल बढ़ जाती है, ज़हरीले सांपों की हलचल?

सरीसृप
31-07-2026 06:01 PM
सहारनपुर में मानसून से पहले क्यों बदल बढ़ जाती है, ज़हरीले सांपों की हलचल?

उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे सांपों के वीडियो और उनसे जुड़ी घटनाओं का केंद्र बन गया है। कभी बीच सड़क पर सांपों का जोड़ा आपस में उलझा हुआ दिखाई देता है, तो कभी किसी ग्रामीण के घर की पुरानी दीवारों से एक के बाद एक कई सांप बाहर निकलने लगते हैं। इन घटनाओं ने न केवल आम लोगों के मन में खौफ और कौतूहल पैदा किया है, बल्कि वन्यजीव विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है।

मानसून के आगमन से पहले सांपों के व्यवहार में आने वाला यह बदलाव कोई सामान्य बात नहीं है। इसके पीछे जीव विज्ञान, प्रजनन चक्र और मौसम का गहरा प्रभाव छिपा है। इसके साथ ही, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर की सीमा पर स्थित जडौदा पांडा जैसे इलाकों में सांपों से जुड़ी सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं भी इन घटनाओं को एक अलग ही रहस्यमयी रंग दे देती हैं।

सहारनपुर के देहरादून रोड पर सांपों का जोड़ा क्यों बना चर्चा का विषय?
जून 2026 में सहारनपुर के व्यस्त देहरादून रोड पर अचानक उस समय भारी ट्रैफिक जाम लग गया, जब लोगों ने बीच सड़क पर दो बड़े सांपों को आपस में लिपटे हुए देखा। यह दृश्य इतना दुर्लभ और हैरान करने वाला था कि राहगीरों ने अपनी गाड़ियां रोक दीं और मोबाइल फोन से इस घटना का वीडियो बनाने लगे। देखते ही देखते यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क पर खुले आम इस तरह की गतिविधियां आमतौर पर दो विशेष परिस्थितियों में ही देखने को मिलती हैं।

  • प्रजनन काल (Mating season): मानसून आने से पहले का समय सांपों के मिलन का मुख्य समय होता है।
  • क्षेत्राधिकार की लड़ाई (Territorial fight): कई बार दो नर सांप किसी एक मादा पर अपना अधिकार जताने या अपने इलाके पर कब्जा बनाए रखने के लिए आपस में बुरी तरह लड़ते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब सांप आपस में उलझते हैं, तो यह उनके प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा होता है। खुली सड़क पर उनका इस तरह आना यह भी दर्शाता है कि शहरीकरण के कारण उनके प्राकृतिक आवास कम हो रहे हैं, जिसके चलते उन्हें मजबूरन सड़कों या रिहायशी इलाकों का रुख करना पड़ रहा है।

मानसून से पहले सांपों के व्यवहार में क्या वैज्ञानिक बदलाव आते हैं?

सांपों का जोड़ा (Snake pair) बनाने और उनके प्रजनन का विज्ञान बेहद जटिल और दिलचस्प है। अधिकांश भारतीय प्रजातियों के सांप मानसून (Monsoon) आने से लगभग 2 महीने पहले अपने संभोग काल की शुरुआत करते हैं। इस दौरान नर सांप बहुत अधिक सक्रिय, सतर्क और कभी-कभी चिड़चिड़े हो जाते हैं।

इस विशेष समय में सांपों के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं:

  • केंचुली उतारना (Molting): प्रजनन ऋतु की शुरुआत से ठीक पहले नर सांप अपनी पुरानी त्वचा या केंचुली उतार देते हैं, जिससे वे अधिक चुस्त और फुर्तीले बन जाते हैं।
  • मादा की खोज: मादा सांप स्वभाव से शांत होती है और तब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं देती, जब तक कि कोई उपयुक्त नर उसके पास न पहुंच जाए।
  • अनोखा मिलन: संभोग के दौरान नर और मादा सांप एक-दूसरे से इस तरह लिपट जाते हैं कि वे दो के बजाय एक ही जीव प्रतीत होते हैं। इस प्रक्रिया में वे जमीन से कई फीट ऊपर तक हवा में उठ जाते हैं।

अंडे देने और बच्चों के जन्म के बीच का समय लगभग 60 से 80 दिनों का होता है। पानी के सांप, अजगर और धामन अंडे देते हैं, जबकि रसल वाइपर और समुद्री सांप सीधे बच्चों को जन्म देते हैं।

क्या कस्तूरी ग्रंथियां सांपों को आक्रामक बनाती हैं?

जीव विज्ञान के अनुसार, नर और मादा सांपों की पूंछ के मूल हिस्से में गुदा द्वार (Cloaca) के पास विशेष कस्तूरी ग्रंथियां (Musk glands) मौजूद होती हैं। हर प्रजाति के सांप की इन ग्रंथियों से एक अलग और विशिष्ट गंध निकलती है।

  • प्रजनन काल के दौरान मादा सांप अपनी कस्तूरी ग्रंथियों से एक विशेष गंध वाली रासायनिक लकीर (Scent trail) छोड़ती है।
  • नर सांप इसी गंध का पीछा करते हुए मादा तक पहुंचते हैं।
  • नर सांपों के पास दो अर्द्ध शिश्न (Hemipenes) होते हैं, जो संभोग के समय ही बाहर आते हैं।

कई बार एक ही मादा की गंध का पीछा करते हुए कई नर सांप एक जगह पहुंच जाते हैं। ऐसी स्थिति में मादा पर अपना अधिकार जताने के लिए नर सांपों के बीच भयंकर युद्ध (Combat) होता है। यह लड़ाई इतनी हिंसक होती है कि कई बार इसमें हारने वाले सांप की मौत तक हो जाती है। देहरादून रोड पर दिखा नजारा भी इसी रासायनिक आकर्षण और शक्ति प्रदर्शन का एक हिस्सा हो सकता है।

फतेहपुर के घर की दीवारों से अचानक 7 सांप क्यों निकल पड़े?
सांपों के रिहायशी इलाकों में घुसने का कारण सिर्फ प्रजनन नहीं होता, बल्कि सुरक्षित आश्रय की तलाश भी होता है। दिसंबर 2025 में सहारनपुर के फतेहपुर गांव के पास एक ऐसी ही चौंकाने वाली घटना घटी थी, जिसने पूरे इलाके में दहशत फैला दी थी।

एक ग्रामीण के घर की पुरानी ईंटों की दीवारों और फर्श के नीचे से अचानक एक के बाद एक 7 सांप बाहर निकल आए। परिवार के लोग दहशत में आ गए और पूरे गांव में हड़कंप मच गया। जब एक सपेरे (Snake catcher) को बुलाया गया, तो उसने जांच में पाया कि:

  • सांपों ने फर्श के नीचे मौजूद एक पुरानी खोखली जगह (Hollow space) को अपना घोंसला बना लिया था।
  • सर्दियों के मौसम में तापमान गिरने के कारण सांप खुद को गर्म और सुरक्षित रखने के लिए इंसानी घरों के गर्म हिस्सों (जैसे दीवार की दरारें या फर्श के नीचे) में शरण लेते हैं।

सपेरे ने सभी 7 सांपों को सुरक्षित रूप से पकड़कर पास के जंगल में छोड़ दिया। यह घटना साबित करती है कि मौसम में बदलाव और सुरक्षित ठिकाने की कमी सांपों को इंसानी बस्तियों की ओर धकेलती है।

जडौदा पांडा के 12 गांवों में सांप का जहर बेअसर क्यों माना जाता है?
सहारनपुर में सांपों का जिक्र हो और जडौदा पांडा की बात न हो, ऐसा असंभव है। सहारनपुर और मुजफ्फरनगर की सीमा पर स्थित जडौदा पांडा और इसके आसपास के 12 गांवों में सांपों को लेकर विज्ञान से परे एक गहरी लोक आस्था और मान्यता जुड़ी हुई है।

यहां के निवासियों का मानना है कि इन 12 गांवों की सीमा के भीतर किसी भी व्यक्ति को अगर सांप काट ले, तो उस पर सांप के जहर (Snake venom) का कोई असर नहीं होता। इस चमत्कारिक मान्यता के पीछे एक सदियों पुरानी कहानी है:

  • कहा जाता है कि सदियों पहले इस क्षेत्र में बाबा नारायण दास नाम के एक सिद्ध संत रहा करते थे।
  • गांव वालों का अटूट विश्वास है कि बाबा नारायण दास के आशीर्वाद और तपोबल के कारण ही इस क्षेत्र में सांपों का विष अपना प्रभाव खो देता है।
  • यहां एक प्राचीन मंदिर भी है, जो इस लोककथा का मुख्य केंद्र है और दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं।

हालांकि चिकित्सा विज्ञान इस दावे की पुष्टि नहीं करता और सांप काटने पर तुरंत मेडिकल मदद लेने की सलाह देता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह मान्यता उनके जीवन और संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुकी है।

क्या सांपों और मोरों के मानसून कनेक्शन में कोई समानता है?
सांपों की तरह ही प्रकृति में कई अन्य जीव भी मानसून के आगमन से पहले अपने व्यवहार में भारी बदलाव लाते हैं। इसका सबसे खूबसूरत उदाहरण राष्ट्रीय पक्षी मोर है।

वैज्ञानिकों और जीवविज्ञानियों के अनुसार, मोरों का प्रसिद्ध नृत्य भी महज एक संयोग नहीं है:

  • बारिश के मौसम से ठीक पहले, मोर अपने शानदार पंखों को फैलाकर जो मनमोहक नृत्य करते हैं, वह असल में मादा मोर (Peahen) को आकर्षित करने का एक प्राकृतिक तरीका है।
  • जिस तरह सांप गंध के जरिए अपनी मादा को लुभाते हैं, ठीक उसी तरह मोर अपने दृश्य आकर्षण का उपयोग करते हैं।
  • प्रकृति का यह भी एक दिलचस्प पहलू है कि मोर सांपों के प्राकृतिक शिकारी होते हैं।

चाहे वह सड़क पर आपस में उलझते सांप हों, दीवारों से निकलते उनके झुंड हों, मोरों का मानसून वाला नृत्य हो, या जडौदा पांडा की रहस्यमयी मान्यताएं—ये सभी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति के चक्र कितने गहरे और आपस में जुड़े हुए हैं। इंसानी आबादी के विस्तार के बीच वन्यजीवों के इस प्राकृतिक व्यवहार को समझना और उसका सम्मान करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/28bxl3ma 
2. https://tinyurl.com/2dal2qjg 
3. https://tinyurl.com/29j5opts 
4. https://tinyurl.com/2azouekn 
5. https://tinyurl.com/29oagwqm 

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